Wednesday, 29 December 2010

अपने चश्मे उतारें और मुर्गों को पहनायें



वे महिला पुरूष युगल जो विवाहपूर्व अपनी मित्रता को लम्बे समय तक यौनसम्बधों से बचाये रखते हैं उनका विवाह उनके लिए कई प्लस प्वांइट लेकर आता है। अमरीकन साइकोलॉजीकल एसोसिएशन की पारिवारिक मनोविज्ञान शाखा के जर्नल में छपे एक अध्ययन में 2035 विवाहितों ने भाग लिया। इस निष्कर्ष में उन युगलों को विवाहोपरांत अतिरिक्त लाभ मिले जो अपने संबंधों में यौनसंसर्ग को काफी बाद में या वर्षों की देरी से लाये। जब उनसे पूछा गया कि आप अपने रिश्ते में यौन सम्बंधों में कब उतरे? उनके उत्तरों का सांख्यकीय विश्लेषण करने से यह निष्कर्ष सामने आये:
- संबंधों में स्थिरता की दर अन्य युगलों से 22 प्रतिशत ऊंची थी
- संबंधों से संतुष्टि की दर अन्य से 20 प्रतिशत ज्यादा थी।
- संबंधों में यौन संबंधों की गुणवत्ता भी अन्यों से 15 प्रतिशत बेहतर थी।
- संबधों में आपसी सामंजस्य, संवाद भी 12 प्रतिशत बेहतर रहता है।

जो लोग विवाह पूर्व ही यौन सम्बंधों में पड़े उनको इन बिन्दुओं से आधे से भी कम लाभ मिले। आस्टिन की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के समाज विज्ञानी मार्क रेगनेरस ने बताया कि उनकी रिसर्च संबंधों में वैयक्तिक अनुभवों पर आधारित थी ना कि संबंधों की अवधि पर ।

ब्रीघम यंग यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फैमिली लाईफ के प्रोफेसर डीन बसबी के अनुसार - संबंध, यौन संसर्ग के अलावा भी बहुत कुछ होते हैं लेकिन हमने यह जानने की कोशिश की कि वो लोग जो अपने संबंधों के यौन पक्ष के प्रति प्रतीक्षापूर्ण रवैया अपनाते हैं, ज्यादा खुशहाल रहते हैं। क्योंकि वे लोग जीवन के भावी प्रश्नों के बारे में आपस में बातचीत करना और साथ मिलकर काम करना सीख लेते हैं।

जो लोग हनीमून की पहली रात को ही यौन संसर्ग में उतर जाते हैं उन्हें लगता है कि उनका बाद का वैवाहिक जीवन, जीवन के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अपरिपक्व था। यहां तक कि संबंधों को स्थिरता, साथी की विश्वसनीयता जैसे गुणों के पनपने में भी यह ‘‘पहली ही रात का यौन संबंध’’ प्रतिकूल रहा।
जो युगल अपने संबंधों में यौन संसर्ग के प्रति प्रतीक्षावान दिखे, उनके रिश्ते को उनका धार्मिक पक्ष भी इस मामले में मजबूती प्रदान करता है।
कैंसरग्रस्त निःसंतान युगलों के लिए विज्ञान का नया वरदान

कैंसर के इलाज के दौरान बड़ी संख्या मंे महिलाएं बांझपन और पुरूष नपुंसकता से ग्रस्त हो जाते हैं। कैंसरग्रस्त मरीज भी बेऔलाद ना रहें, मां-बाप बन सकें इसके लिए सेना के रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल में डॉक्‍टरों ने महिलाओं के अंडाशय यानि ओवरी के ऊतक संरक्षित करने करने में सफलता प्राप्त की है।

अब कैंसर का इलाज करने से पहले महिलाओं की ओवरी के कैंसर कोशिकाओंरहित ऊतकों को संरक्षित कर लिया जायेगा और जब भी कोई कैंसरग्रस्त महिला माँ बनना चाहेगी इन अंडाशय के ऊतकों को महिला की बांह के अगले हिस्से की त्वचा के नीचे या पेट में इंप्लांट किया जा सकेगा। कुछ दिन बाद, यदि इंपलांट वाले स्थान पर मटर के दाने के बराबर उभार नजर आता है तो डॉक्‍टर समझ जायेंगे के अंडाशय के ऊतकों में अंडाणु बन चुके हैं। इन ऊतकों से अंडाणु को अलग कर आईवीएफ तकनीक के जरिये महिलाएं 3-4 माह में गर्भधारण कर सकती हैं।

चिकित्सीय जॉंचों के लिए मोबाइल फोन के आकार का गैजेट
बैंगलोर की रजनीकांत वांगला एंड टीम एक ऐसा गैजेट परिष्कृत करने में जुटी है जिससे विभिन्न तरह की जांचे जेसे फोरेंसिक जांच, एचआईवी, कैंसर, अज्झाईमर और ब्रेन ट्यूमर आदि की जांच मात्र 20 मिनिट में और केवल रू 150/- के खर्च पर की जा सकेगी।
इससे जैनेटिक जांच से भाग रहे नारायण दत्त तिवारी जैसे पतित नेताओं के पापों की गणना भी हो सकेगी। काश चुनाव में खड़े होने वाले नेताओं के चरित्र की जांच करने का भी कोई गैजेट निकाला जा सके जो बताये कि आने वाले सालों में वो किन किन भ्रष्टाचारों, दुष्कर्मों के कर्ताधर्ता बनेंगे तो देश का भला हो।

अपने चश्मे उतारें और मुर्गों को पहनायें

चीन के दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र के चेगदू प्रांत के मुर्गी पालकों ने मुर्गों को आपस में लड़कर घायल होने से बचाने के लिए चश्में का उपाय ढूंढा है। यहां के मुर्गे स्वभाव से बेहद लड़ाकू होने की वजह से अक्सर आपस में लड़ते रहते हैं और परस्पर एक-दूसरे को बहुत बुरी तरह से घायल कर देते हैं। ऐसे मुर्गों को चश्मा पहना दिया जाता है जिससे उनको ठीक से नजर नहीं आता और वो आपस में नहीं लड़ते। 
लेकिन इंसानों की बीमारी ठीक उलट है - उनकी आंखों पर धर्म, जाति, सम्प्रदाय, पार्टी, समूह विशेष के चश्में उम्र के साथ-साथ एक के बाद एक चढ़ते ही चले जाते हैं, जिनको उतारना बहुत ही आवश्यक है जिससे वो किसी भी तथ्य को नंगी आंखों से ज्यों का त्यों देख सकें।

एक वैज्ञानिक जोक:
यदि आपको आये दिन गैस रहती है। वायु विकार रहता है। गैस बहुत बनती है। इस विकार से आप हर वक्त परेशान रहते हैं तो आपको वायु विकार से बचने के लिए डॉ उमेश पुरी ज्ञानेश्वर एक उपाय बता रहे हैं। डॉ उमेश पुरी ज्ञानेश्वर के अनुसार यह टोटका अचूक है और इसमें मन्त्र का प्रयोग होता है।
मन्त्र इस प्रकार है-ऊँ वम वज्रहस्ताभ्याम नमः
इस मंत्र को किसी भी सूर्य ग्रहण में 10माला पढ़कर सिद्ध कर लें। बाद में मिश्री या कोई वस्तु को इस मन्त्र से 21 बार अभिमन्त्रित कर दें। रोगी को वह मिश्री खाने को दे दें। वायु विकार में तुरन्त आराम होगा। इस मन्त्र को जितना जपेंगे उतना अधिक सिद्ध होगा और लाभ भी अधिक होगा। वायु विकार से मुक्ति का अनुभूत मन्त्र प्रयोग है। इस मन्त्र को करके आप भी लाभ उठाएं और अपने मिलने जुलने वालों या परिचितों को बताकर लाभ पहुंचाएं। अंधविश्वास सहित किया प्रयोग सफल होता है।

अब ये सब लिखने और आप तक पहुंचाने की वजह यही है कि मैं अपने दिमाग का वह हिस्सा काफी समृद्ध करना चाहता हूं जो मस्तिष्क वैज्ञानिकों के अनुसार, सोशल नेटवर्क होने की वजह से फलता-फूलता है।
इस कुछ वर्षों के लिए मिली देह और मनमस्तिष्क के साथ ही आवश्यक है कि हम कुछ और गहरे उतर, अमर तत्व - अपनी आत्मा के बारे सोचें करें, जिसके लिए निम्नलिखित लिंक बहुत ही सहायक हो सकता है।

Monday, 6 December 2010

भोपाल में प्री-पेड स्मार्ट मोडम डिवाइज टाटा फोटोन विज

भोपाल शहर में टाटा इंडिकॉम के आउटलेट्स की कार्यप्रणाली

इंटरनेट तक घर पर ही पहुंच के उद्देश्य से इस बार टाटा के प्रीपेड कनेक्शन ”फोटोन विज“ को चुना ताकि कामचलाऊ विकल्प घर पर भी रहे। इसके लिए हम टाटा इंडिकॉम आउटलेट नं. 1 पर गये जहां पर यह प्लान समझाया गया। 1399 की यूएसबी मोडम डिवाइज है+रू 100 की एक्टिवेशन किट+रू 300 रू. का प्रारंभिक रिचार्ज जिसमें आपको एक महीने अनलिमिटेड नेट एक्सेस मिलेगा।

लेकिन भाई ने बताया कि फोटोन विज डिवाइज नहीं है दूसरे आउटलेट से मंगा कर रखते हैं, आप कल फोन सम्पर्क करें। दूसरे दिन कहा गया फोटोन विज डिवाइज तो आ गई है पर इन दिनों इस डिवाइस का एक्टिवेशन कार्य तकनीकी कारणों से बंद है (सर्वर संबंधित)। आप यदि कल फोन लगायेंगे तो हम बता पायेंगे कि क्या स्थिति है। तीसरे- चैथे दिन फोन लगाने पर पता चला की स्थिति अभी भी ज्यों की त्यों है।

आखिकर कार 5वें दिन हमने आउटलेट नं. 2 का रूख किया। जहां बैठी मोहतरमा ने बताया कि उन्हें तो इस प्लान का पता ही नहीं जिसमें 1 महीने अनलिमिटेड एक्सेस का प्रावधान है। लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें अभी अभी पता चला है अब कोशिश कर के देख लेते हैं। खैर डिवाइज भी थी, एक्टिवेशन भी हो रहा था तो हमने 1800 रू दिये डिवाइज हमारे नाम पर रजिस्टर कर दी गई पर आधे घंटे तक कोशिशों के बाद भी 300 रू. का प्रारंभिक रिचार्ज जिसमें आपको एक महीने अनलिमिटेड नेट एक्सेस मिलेगा, ये रिचार्ज नहीं हो सका। खैर वक्त की कमी के कारण हमें आउटलेट से घंटे बाद निकलना पड़ा।

6ठे दिन फोन करने पर भी तकनीकी समस्या। सातवें दिन फोन करने भी यथा स्थिति। आठवें दिन परेशान होकर कहा गया कि आप 224 में माह भर सीमित घंटों का रिचार्ज ही करवा लें। करवा लिया गया। हमने इसकी रसीद मांगी तो फिर वही तकनीकी समस्या। रसीद आज तक नहीं मिली है। टाटा इंडि‍कॉम के कस्टमर केयर सेंटर पर बताया गया कि हमारे आईडी का कोई कनेक्शन है, यह रिकार्ड में ही नहीं है।

अब समस्या यह कि डिवाइज की स्पीड इतनी भी नहीं कि सुविधापूर्वक मेल चेक कर सकें। पर इस खरीद की रसीद भी नहीं दी गई है। पता चला है कि 15-20 दिनों से चल रही तकनीकी समस्या ज्यों कि त्यों है।

तो लेपटाप डेस्‍कटॉप धारक, प्री-पेड स्मार्ट मोडम डिवाइज फोटोन विज के प्रत्याशियों को उपरोक्त कथा सनद रहे कि‍ टाटा की सेवा के दौरान कोई तकनीकी खराबी महीने भर तक संभव है।

Thursday, 4 November 2010

सभी मि‍त्रों को दीपावली की हार्दि‍क शुभकामनाऍं

सभी मि‍त्रों को दीपावली की हार्दि‍क शुभकामनाएँ

Monday, 1 November 2010

ऐ मेरे मन राम संभल

इस जीवन का क्या है हल
जीना मुश्किल, मौत सरल

रोटी, कपड़ा और मकान में
दुनियां, चिंता की दुकान में
चिता के तयशुदा विधान में
सुकून की हर आशा निष्फल

हर जन माया गैल बढ़ा है
मन में सबके मैल बड़ा है
हवस का इत्र फुलेल चढ़ा है
कम पड़ता हर गंगाजल

निन्यान्वे के फेर में ओटा
बहुत हो फिर भी, लगता टोटा
उम्र का सच है, बहुत ही छोटा
बड़ा है इच्छाओं का छल

कर्म की बातें झूठी दिखतीं
सारी लकीरे झूठी दिखतीं
सारी तद्बीरें रूठी दिखती
सच लगता, बस भाग्य प्रबल


हर सीता माया-मृग पीछे
वनवासों के जंगल खींचें
सोने की लंका है पीछे
ऐ मेरे मन राम संभल

इस जीवन का क्या है हल
जीना मुश्किल, मौत सरल

Wednesday, 20 October 2010

मैंने सच की बात की तो लोग दुश्मन हो गये


मैंने सच की बात की तो लोग दुश्मन हो गये
बात हक के साथ की तो लोग दुश्मन हो गये

उम्र भर जिनसे निभाई मैंने दुश्मनी बार बार
मौत की मंजिल पे सारे मेरे हमदम हो गये

कभी कभी जिनसे मिला, सबने ही प्यारा कहा
साथ जिनके बरसों से, वो लोग बेमन हो गये

खून के रिश्तों की लज्जत, जाने कब कहां खो गई
अजनबी लोगों से रिश्ते, दिल की उलझन हो गये

रूह की बातें पराई, मन से अनबन हो गई
खरीद लो और बेच दो, अब लोग बस तन हो गये

Monday, 11 October 2010

मोहसि‍न का हदयस्‍पर्शी कलाम


मेरे कातिल को पुकारो कि मैं जिन्दा हूं अभी
फिर से मक्तल को संवारो कि मैं जिन्दा हूं अभी

ये शब-ए-हिज्र तो साथी है मेरी बरसों से
जाओ सो जाओ सितारों कि मैं जिन्दा हूं अभी

ये परेशान से गेसू नहीं देखे जाते
अपनी जुल्फों को संवारो कि मैं जिन्दा हूं अभी

लाख मौजों में घिरा हूं, अभी डूबा तो नहीं
मुझको साहिल से पुकारो कि मैं जिन्दा हूं अभी

कब्र से आ भी ‘मोहसिन’ कि आती है सदा
तुम कहां हो मेरे यारों कि मैं जिन्दा हूं अभी

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मक्तल - कत्ल का स्थान
शब ए हिज्र- विरह की रात
गेसू - चेहरे पर आई लट

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वो अक्सर मुझसे कहती थी
वफा है जात औरत की
मगर जो मर्द होते हैं
बहुत बे-दर्द होते हैं
किसी भंवरे की सूरत
गुल की खुशबू लूट जाते हैं
सुनो तुम को कसम मेरी
रिवायत तोड़ देना तुम
ना तन्हा छोड़ कर जाना
ना ये दिल तोड़ कर जाना

मगर फिर यूं हुआ मोहसिन
मुझे अनजान रास्तों पर
अकेला छोड़ कर उस ने
मेरा दिल तोड़ कर उस ने
मोहब्बत छोड़ दी उस ने
वफा है जात औरत की
रिवायत तोड़ दी उसने

Wednesday, 6 October 2010

एक सुन्दरतम सन्ध्या


एक सुन्दरतम सन्ध्या
जब पावन काल
किसी साध्वी की मौन आराधना सा
शांत और मुक्त है।

इस खामोशी की मदहोशी में
एक सूरज
सागर के हर किनारे पर
अपने आप डूब रहा है।

स्वर्गीय विनम्रता
सागर की स्निग्ध छाती पर
उग आयी है।

सुनो
परमचेतना
जाग रही है।

उसके उगते हुए स्वरों में
किसी अत्यंतिक
तूफान सी सरसराहट है।

मेरे साथियों
यह प्रकृति कहीं भी
कम दिव्य नहीं है।

अपने सीने में
रहने वाले हर्ष को
सदैव महसूस करो।

उसी हर्ष के मन्दिर में
हमारी बाहरी भटकनों को जानने वाला
परमात्मा भी है।
भले ही हम उसे ना जानते हों।


विलियम वर्डसवर्थ की कवि‍ता का अनुभव

Tuesday, 28 September 2010

आदमी की औसत उम्र


फिजूल है
आदमी की औसत उम्र की बात

एक आदमी
बस 10 बरस में
बचपने की बेहोशी
भूख प्यास और खंडित कयासों से
दम तोड़ देता है

दूजा जीता है
बीमारियों
धुंधलकों
प्रश्नों,
और जिन्दगी की व्यर्थता के साथ
130 बरस

और आप
तीजे की औसत उम्र 70 बरस
घोषित कर देते हैं

तो फिजूल है
औसत उम्र का गणित


और वो सारे गणित
जो आप जिन्दगी के बारे में लगाते हैं
जिन्दगी का हर कदम
अपवादों की राह पर बढ़ता है

आपकी सांसे सदियों तक चल सकती हैं
आप इसी वक्त ‘सब कुछ से’ नाकुछ हो सकते हैं
और नाकुछ से सारा संसार

जिन्दगी के खेल का
यही मजा है
कि आप चाहें इसके नियम बनायें
चाहें अपवादों की राह चलें
आपका हासिल परिणाम नहीं
वो खेलना होता है,
जो आप खेल रहे हैं
जो आप तब तक खेल सकते हैं
जब तक कि वो क्षण नहीं आता
जिसका आपको नहीं पता है।

देखो आज मैंने
मौत शब्द का
कहीं भी इस्तेमाल नहीं किया।

Wednesday, 22 September 2010

जी करता है मिल जाए......


हो गया है निकट दृष्टि दोष
दूर का सब दिखता है स्पष्ट और आकर्षक
पास का सब हो गया है धुंधला विकर्षक
दूर का सब स्पष्ट, चित्ताकर्षक
और हष्ट पुष्ट दिखता है

जी करता है मिल जाए
हर दूर स्थित कल्पना का,
बस एक अनुभव एहसास।
दूर में ही दिखता है,
पाने योग्य समग्र खास।

दूर का हर चेहरा, बहुत सुन्दर है।
दूर की हर काया,
उत्तेजना का लहराता समन्दर है।
दूर का हर रिश्ता बड़ा गहरा है,
दूर का सर्वस्व सपनों में ठहरा है।


पास जो है सब बीत चुका है जैसे
जंग लगा, सब चूक चुका है जैसे
नजर कुछ नहीं आता
बस महसूस होता है बासापन,
जो किसी भी भूख को खा जाता है
ये बासापन
लगता है जैसे सारा भविष्य खा जायेगा।


फफूंद लगे नजारे
बासी कड़ी’याँ
जिन्दगी के सारे उबाल
ठंडे कर देती हैं।

करने को अभी कितना कुछ बाकी है -
फिल्मी हीरोइनें
फिल्मी माई बाप
फिल्मी बच्चे
फिल्मी कारें
फिल्मी रहन-सहन
फिल्मी बाजार
फिल्मी चालाकियाँ, चोरी-डकैती
फिल्मी कत्ल
फिल्मी सजाएं
फिल्मी मौत।

मन के सुरमई अंधकार भरे कोने में
सुविधाओं के गुनगुने ताप पर
लगता है गाँव में -
दादी की गोद की मक्खनी गंध,
मां के चेहरे से टपकता प्यार,
बाप का भविष्य को आकार देता गुस्सा,
मौसी का प्रेरक दुलार,
ताऊ के बच्चों संग कुश्ती,
सब समय नष्ट करना था।

सच और झूठ के छद्म सिद्धांत पढ़े बिना
सच और झूठ की परवाह किये बिना
जो हो रहा है वही सही है जैसे

मां बाप का वृद्धाश्रमों में रहना,
बहू बेटियों का उघड़े बदन बहना।
बच्चों का टीवी चैनलों में गर्क होना।
सब कुछ फलता फूलता नर्क होना।

इंटरनेट पर
हवस की मरीचिका में
हर क्षण लगता है
जैसे कोई अदृश्य रिश्ता
इन ऊब से पके दिनों से
कहीं दूर ले जायेगा

फिर
अचानक अनायास खुल गई
सूनामी, भूकंप, बाढ़ राहत कोश से संबंधित
किसी वेबसाईट को देखकर
मेरा एक खयाल -
कि (मेरे पास हों तो करोड़ों में से...
कुछ लाख तो मैं दूंगा
इन मानवीय कार्यों में।)
बिल गेट्स से ज्यादा।

ये खयाल
मेरे निकट दृष्टिदोष को बेबाक
और दूरदृष्टि को पुष्ट करता
और तैशदार बनाता है।

हालांकि सच और झूठ की
परवाह किये बगैर
एक सांवली बीवी
दो औसत बुद्धि बच्चे
एक अदद बूढ़े मां बाप
हजारों की कमाई से
कुछ सैकड़ा की अपेक्षा किये बिना
इन दुआओं के साथ
कि ”फिल्में देख-देख कर खराब हो चुकी नजर
हकीकत की रोशनी में आ सुलझ जाये
मेरे साथ ही रहते हैं।“

मुझे भी समझना चाहि‍ये
जि‍न्‍दगी 3 घंटे से ....
कुछ ज्‍यादा होती है।

बुल्‍लेशाह की अदभुत वाणी

बुल्‍लेशाह की अदभुत वाणी
http://yogmarg.blogspot.com/2010/09/blog-post.html

Tuesday, 14 September 2010

इस लहर के उठने का सबब याद नहीं है

मुद्दत से मेरा दिल है कि आबाद नहीं है
होंठों पे मगर आज भी फरियाद नहीं है

आता है खयालों में मेरे उसका ही चेहरा
बस उस के सिवा कुछ भी मुझे याद नहीं है

फिरते हैं सभी लोग यहां सहमे हुए से
इस शहर में जैसे कोई आजाद नहीं है

देखा है उजड़ते हुए कितने ही घरों को
है कौन जो इस इश्क में बर्बाद नहीं है

इक लहर सी उठी है आज मेरे भी दिल में
इस लहर के उठने का सबब याद नहीं है

पता नहीं कि‍सकी गजल है पर बेहतरीन लगी सो शेयर कर रहे हैं।

Monday, 13 September 2010

बड़ी अटपटी दुनियां

Image by : Kees Straver
  
ख्यालों से छंटी दुनियां, कैसे-कैसे बंटी दुनिया
आशाओं-सपनों में उलझी, हकीकत से कटी दुनिया

रिवाजों में सहूलियत है, नयेपन से हटी दुनियां
इतिहास में भविष्य देखे, बड़ी अटपटी दुनियां

स्वाद कैसा होता है अम्मी-अब्बा से जाना
जुबां जब बूढ़ी हुई तो, लगी चटपटी दुनियां

सच-शांति की राहों से बोर हो हटी दुनियां
झूठ और फरेबों के संग्रामों में डटी दुनियां

जिन्दगी के मैदानों में दूर तलक भागी है
डरी-सहमी रहे फिर भी, मौत से सटी दुनियां

Monday, 23 August 2010

देखेंगे मौत के बाद फरिश्ते, क्या तारे होकर ढूंढते हैं


रात चले उग आते हैं मेरी आंखों में तेरी यादों के चांद
फिर सहर तलक, सारे जुगनू, बंजारे होकर ढूंढते हैं

जिसने भी देखा जलवा तेरा, हुआ बलवा उसके खयालों में
फिर सारी उम्र तक एक सफर, बेचारे होकर ढूंढते हैं

अंजाम पे पहुंची कहानी है, ये दिल तेरे गम की निशानी है
देखेंगे मौत के बाद फरिश्ते, क्या तारे होकर ढूंढते हैं

इन आग के शोलों पर ना जा, कि रूसवाई से क्यों है रजा
इस काले धुंए में छिपा है क्या, अंगारे होकर ढूंढते हैं

Thursday, 19 August 2010

हाँ मुझे मोहब्बत है उनसे... पर...

ए मेरी उदासी, ए मेरी बदहवासी
ऐ मेरे दिल की कसक, ऐ मेरी रूह प्यासी
ना उभरो चेहरे पे बेताबियों के नक्शो
हाँ मुझे मोहब्बत है उनसे... पर मुझको बख्शो

ए मेरी आंखों में उतरे पानी,
ए बेजा बरसों गुजरी नादां जवानी
ए मेरे नजरों में बसे, बंजर नजारों
हाँ मुझे मोहब्बत है उनसे... पर मुझको बख्शो

ऐ बदनामियों की हवा, ऐ जुल्मों की घटा
ऐ लानतों की नमी, ऐ जमाने की सजा
ऐ मेरे सीने की घुटन, ख्यालों की टूटन
हाँ मुझे मोहब्बत है उनसे... पर मुझको बख्शो

ऐ मेरी तन्हाई, तेरा फर्द चेहरा
ऐ मेरे शैदाईपन तेरा ताब गहरा
ऐ मेरे ख्वाबों की कालिख, नींदों की दहशत
हाँ मुझे मोहब्बत है उनसे... पर मुझको बख्शो



ha mujhe mohabbat hai unse... par mujhko bak-sho
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ae meri udaasi, ae meri bad-hawasi
ae mere dil ki kasak ae meri rooh pyaasi
naa ubhro chehre pe be-taabi-yo ke nak-sho
ha mujhe mohabbat hai unse... par mujhko bak-sho

ae meri aankhon me utre paani
ae beja barson gujri naadan jawaani
ae meri najro me basae banjar najaaro
ha mujhe mohabbat hai unse... par mujhko bak-sho

ae badnami-yo ki hawa, ae julmo ki ghata
ae laanto'n ki nami ae jamaane ki saza
ae mere sinay ki ghutan, khayalo'n ki tootan
ha~ mujhe mohabbat hai unse... par mujhko bak-sho

ae meri tanhai, tera fard chehra
ae mere shedai~pan, tera taab gahra
ae mere khwabo ki kalikh, neendo ki dahshat
ha~ mujhe mohabbat hai unse... par mujhko bak-sho


Monday, 16 August 2010

वो शख्स बात-बात पे बिगड़ता हुआ दिखा


वो शख्स बात-बात पे बिगड़ता हुआ दिखा
ख्वाबों में भी नाराज हो चिढ़ता हुआ दिखा

मैं दिल की बात मानकर, परेशान ही रहा
नींदों में भी खुद से ही लड़ता हुआ दिखा

जब रिश्ते बोझ बन गये, तो वक्त को लगा
अपना ही साया, अपने से बिछड़ता हुआ दिखा

समझाया लाख दिल को, मगर मानता नहीं
हर छोटी-मोटी बात पर अड़ता हुआ दिखा

उनसे मिली नजर तो, हम बयान क्या करें
कुछ धारदार सीने में गढ़ता हुआ दिखा

Saturday, 14 August 2010

सुकून का घर


मैं सालों से सोचता हूं
पर मैं जाना ही नहीं चाहता
हालांकि मुझे मालूम है
सुकून का घर

सुकून के घर में
रहती है
मौज और आनंद की धुंधली किरणों के साथ
ऊर्जा के सूर्यों की गर्मी
और चांदनी का पागलपन।

भ्रम है कि सुकून के घर में
रहती है
बेकारी, असफलता, आलस्य
सभी सफल, मशहूर, अमीर
कटते हैं
ऐसी बोर और मनहूस कही जाने वाली जगहों से


सुकून के घर में निवास करने वाले पर
लोग लानते भेजते हैं

सुकून के घर के बारे में
लगभग रोज ही
तकरीरें- कविताएं
लिखी और पढ़ी जाती हैं
गली-गली चैराहे-चैराहे पर
इस तरह ही लोगों को लगता है
कि वो जानते हैं
‘‘सुकून’’ शब्द का अर्थ
वरना वो कैसे
लोगों को समझा लेते,
कविता लिख लेते
गीत गा लेते।

यूं तो बहुत से लोग
सुकून के घर की तलाश करते हैं
क्योंकि
सुकून के बारे में सोचना, तलाश करना
हर जमाने का फैशन रहा है।
पर सुकून के घर में रहना
दुनियां में हमेशा नासमझी रहा है।

लोग ऐसा भी कहते हैं कि
सुकून के घर में
उम्र भर की हम्माली है
रोटी कपड़े मकान के लिए
दर-दर की भटकन है

सुकून के घर में
साथ ही रहता है
सर्दी जुकाम बुखार जैसी छोटी सी बीमारियों से
मर जाने का खतरा भी।

पर फिर भी
सुकून के बारे में लिखे हुए मंत्र
हर सुबह या शाम को
दीपक की लौ और अगरबत्तियों के धुंए में
खूब जपे जाते हैं
गाई जाती हैं आरतियां
ताकि
सुकून की चाह की तकलीफ से
बचा जा सके।

पता नहीं क्या है हकीकत
या जानते समझते हुए....
या कि हम समझना ही नहीं चाहते
कि पढ़ना, सुनना,
कहना, या लिखना
या सुकून के घर में रहने जैसा दिखना
सुकून नहीं लाता।

सुकून से रहने के लिए
जरूरी है
कि हम सुकून के घर में रहें।

Saturday, 7 August 2010

वक्त जाने क्या दिखलाता है?


बर्बादी में कसर नहीं, फिर क्यों दिल घबराता है
बिखरे-बिखरे मन को, हर टूटा आईना डराता है

बैचेन हवा, है नींद उड़ी, फिर भी मुर्दों सा पड़े रहें
तन्हाई है, गहराई तक, सपना भी नहीं आता है

सालों तक, हम रहे तरसते, वो सूरत फिर दिखी नहीं
कब मिलता वो ढूंढे से, इक बार जो दिल से जाता है

तेरी बातें अपने तक, आंसू, आहें, चाहें सब
देखते हैं खामोश जुबां का अमल, क्या असर लाता है

अजनबी सा हर दिन मिलता है, गुजर जाता खामोशी से
हर वक्त यही लम्बी सोचें, वक्त जाने क्या दिखलाता है?

Tuesday, 3 August 2010

यदि

यदि लोग अपनी कमजोरियों के लिए, तुम्हें दोष दे रहे हों
और तुम तन कर खड़े रह सको
अगर सब तुम पर शक करें
और तुम खुद पर भरोसा कर,
उनके शक को ’निराधार’ होने का उपहार दो।

अगर तुम इंतजार कर सको
और इंतजार करते हुए थको नहीं
या, झूठ तुम्हें डुबो रहा हो, पर तुम झूठा व्यवहार ना करो
या, नफरत से, नफरत कर ना निपटो
और इस तरह बहुत अच्छे ना दिखो
या बहुत अच्छा कहने वाला ना दिखो

अगर तुम सपने देख सको और सपनों को खुद पर सवार ना होने दो
अगर तुम सोच सको और विचारों को अपना लक्ष्य ना बनने दो
अगर तुम विजयी दुदुंभियों और त्रासदियों की खामोशी से
एक सा निर्वेद व्यवहार करते हुए मिलो

अगर तुम अपने ही कहे सत्य को
मूर्खों द्वारा तोड़ मरोड़ कर पेश करने पर
सुनते हुए संभले रहो
अगर तुम जीवन को दिये तोहफों को टूट बिखरता देखो
तो उसे रोको और तत्क्षण पुनर्निमाण में रम जाओ

यदि तुम अपने सारी जीतों को
हमेशा नये दांव पर लगाने को तत्पर रहो
अगर हारो भी तो, बार बार शुभारंभ के कर गहो

सांस भर भी टिप्पणी ना करो पराजयों पर हानियों पर
अगर तुम अपने तन-मन को मिटने के अंतिम क्षण तक
दृढ़ मांसपेशियों से बलवान रखो
तब भी.... जब कि तुम्हारे पास कुछ भी ना हो
सिवा इन शब्दों के कि ‘‘जमे रहो।’’

यदि तुम भीड़ से बातें करते हुए अपने जीवन मूल्यों को बचाये रख सको
या, राजाओं के साथ चलते हुए एक आम आदमी का सामान्यपन ना खोओ
ना तो दुश्मन ही तुम्हें दुखी कर सके, ना मित्र ही तुम्हारा दिल दुखा सके
यदि सभी लोगों को अपने ही साथ गिन सको, पर किसी को भी विशेष ना जानो
यदि तुम अक्षम्य क्षणों में भी उद्विघ्न ना होओ
और अक्षम्य क्षणों से पार जाने के लिए
तुम्हें 60 सेकेंडस भी जरूरत से ज्यादा हों
तो तुम धरती माता की असली संतान हो
जिसमें सारी दुनियां समाई है
और यह उससे भी ज्यादा है..
कि तुम इंसान हो मेरे पुत्र।

रूडयार्ड किपलिंग की कविता ‘यदि’ का राजेशाकृत हिन्दी अनुवाद
 

Monday, 2 August 2010

सब जानते हैं क्या गलत क्या सही है।

कत्ल-चोरियां जिनकी जाहिर नहीं है,
चर्चों में उनकी शराफत रही है।

दया धर्म सेवा के पाखण्डों के पीछे
धन-दौलत-शोहरत की हसरत रही है।

दुनियां कहती - पैसा खुदा तो नहीं
कसम खुदा की, खुदा से कम भी नहीं है।

कानून दुनिया भर के, गरीबों के सर पे
अमीरों पर इलजामों से शोहरत बही है

इश्क रह गया कुत्ते बिल्लियों का मजहब
इंसानों में हवस की ही बरकत रही है।

हिंदू मुसलमान सिख ईसाई मिलते हैं
कहीं भी दिखती इंसानियत नहीं है।

सच की राहों पे चलना बड़ा मुश्किल,
यूं सब जानते हैं क्या गलत क्या सही है।

Saturday, 24 July 2010

यदि‍ आप पेस्‍ट करना नहीं जानते तो कॉपी ना करें


शहर के एक प्रतिष्ठित सभागृह में एक प्रसिद्ध धुरंधर दार्शनिक-वक्ता अपने श्रोताओं से घिरा हुआ था।
वह बोला: वह मेरी जिन्दगी के बेहतरीन साल थे जो मैंने एक ऐसी औरत की बाहों में बिताये जो कि मेरी पत्नी नहीं थी।
उस प्रसिद्ध वक्ता के इस वाक्य से सारे हॉल में सन्नाटा छा गया, लोग स्तब्ध थे।
तभी वक्ता ने अपने वाक्य में जोड़ा ”और वो थी मेरी माँ।“
चारों ओर हर्ष छा गया। हॉल दार्शनिक की उच्च नैतिकता की प्रशंसा में तालियों से गूंजने लगा।

एक सप्ताह बाद की बात है। इसी प्रसिद्ध वक्ता के एक शिष्य ने उपरोक्त रोमांचक वाक्यों से अपनी भली छवि गढ़ने के लिए, इन्हें घर में अपनी पत्नि के साथ आजमाना चाहा।

महाशय आज की शाम को दोस्तों के साथ बार में बिता कर आये थे, हल्का-हल्का सा नशा चढ़ा हुआ था, पत्नी किचन में चावल उबलने रख रही थी।

तभी बड़े दार्शनिक अंदाज में पति के मुंह से निकला - वह मेरी जिन्दगी के बेहतरीन साल थे जो मैंने एक ऐसी औरत की बाहों में बिताये जो मेरी पत्नी नहीं थी।

पत्नी ने यह सुना तो दुख और क्रोध से थर थर कांपने लगी।

पति यह वाक्य कहने के बाद पत्नि के हाव भाव देखने लगा, पर मिनिट भर के अंतराल के बाद नशे में उसे खुद याद नहीं रहा कि आगे कौन सा समापन वाक्य कहना है, या वह औरत कौन थी।
पर समय गुजरने के बाद जब पति महाशय होश में आये वो किसी अस्पताल के एक बेड पर थे। सारे शरीर पर उबलता हुआ पानी डाल देने से बने फफोलों का इलाज चल रहा था।

शिक्षा: यदि हम यह नहीं जानते कि कहां, क्या और कब पेस्ट करना है तो हमें कॉपी नहीं करना चाहिये, कम्प्यूटर पर भी ...... जिन्दगी में भी।

Friday, 23 July 2010

भारत की सांस्‍कृति‍क वि‍रासत


दृश्य एक:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं तीसरा आता है, उन्हें लड़ते हुए देखता और चला जाता है।
जी हॉं यह मुम्बई है।

दृश्य दो:
दो व्यक्ति लड़ते लड़ते अचानक चले जाते हैं और अपने दोस्तों यारों को ले आते हैं इस प्रकार एक जगह पर 50 लोग लड़ते-भिड़ते हुए मारकाट मचा देते हैं।
जी हॉं यह पंजाब है।

दृश्य तीन:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं तीसरा आता है और बीच बचाव करने की कोशिश करता है। इस पर लड़ने वाले दोनो लोग बीच बचाव की कोशिश करने वाले को ही पीटने लगते हैं।
जी हॉं यह दिल्ली है।

दृश्य चार:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं और तमाशा देखने के लिए काफी भीड़ इकट्ठी हो जाती है। तभी एक व्यक्ति आता है और चुपके से चाय का ठेला लगा कर चाय बेचना शुरू कर देता है।
जी हॉं यह अहमदाबाद है।

दृश्य पांच :
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं और एक तीसरा व्यक्ति उन्हें लड़ते हुए देखता है, वो अपना लेपटाॅप खोलता है और लड़ाई से बचने के लिए एक साफ्टवेयर विकसित करता है। लेकिन लड़ाई नहीं रूकती क्योंकि साफ्टवेयर में वायरस होता है।
जी हॉं यह जगह बैंगलोर है।

दृश्य छ:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं और भीड़ इकट्ठी हो जाती है। तभी एक व्यक्ति आता है और कहता है अम्मा को यह सब पसंद नहीं है, इस पर लोग तितर बितर हो जाते हैं।
जी हॉं यह जगह चैन्नई है।

दृश्य सात:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं तभी एक तीसरा व्यक्ति आता है और बताता है कि सही कौन है, इसी तरह दो चार और लोग आते हैं और सभी बतातें हैं कि कौन किस तरह सही है, जबकि कोई किसी की नहीं सुन रहा।
जी हॉं यह जगह कोलकाता है।

दृश्य सात:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं तभी एक तीसरा व्यक्ति आता है और कहता है मेरे घर के सामने मत लड़ो, लड़ो पर कोई और जगह तलाश कर लड़ो।
जी हॉं यह जगह केरल है।

दृश्य आठ:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं तभी एक तीसरा व्यक्ति बियर की बोतलों की पेटी लेकर आता है। सभी एक दूसरे को गालियां बकते हुए बियर पीतें हैं और दुबारा मिलने का वादा कर अपने अपने घर चले जाते हैं।
जी हॉं यह जगह गोवा है।

Saturday, 17 July 2010

फिर से गलत अनुमान था मेरा।


तुमको अपना समझ लिया था,
फिर से गलत अनुमान था मेरा।

इन्‍कार उन्‍होंने नहीं कि‍या था

बस इतना सम्मान था मेरा।

सारे सितम हँस के सहता था
ये किस पर अहसान था मेरा?

जीते-जी कभी नहीं मिला था,
हाँ! वही तो भगवान था मेरा।

बरसों पहले भूल गया था,
क्या पहला अरमान था मेरा।

रोता और भड़क जाता था,
अभी जिन्दा इंसान था मेरा।

घुड़की-गाली सुन लेता था,
अहं नहीं परवान था मेरा।

Monday, 12 July 2010

तुम्‍हारे लि‍ये ही......


मुझे तुम्हारा बहुत ही इंतजार था
मैंने तुम्हारे सपने देखे
मैं दुनियां की भीड़ में अकेला
तुम्हारे लिये तरसता रहा
ऐ मेरे दोस्त
मुझे रोजी-रोटी और बोटी से फुरसत ही नहीं मिली
कि उन लम्हों का आयोजन कर पाता
जिनसे मेरी जिन्दगी कहे जाने वाले लम्हे
कुछ और लम्बे हो जाते
बच अचानक
कभी पान की दुकान पर,
कभी पंचर बनाते हुए,
कभी चैराहे पर लालबत्ती के ट्रेफिक में ठहरे हुए
कभी बाजार में सब्जी खरीदते वक्त
या
बिजली का बिल जमा करते हुए
या
नेट पर कभी कभार!
तुम्हारे साथ
गंदे थियेटरों में देखी फिल्में
पार्कों में खाई मूंगफली
दोराहों पर पी काॅफी
और खड़कती बसों में किया गया सफर
सब बड़ा सुहाना था
उन दिनों भी
जब बारिश के दिनों में
पानी नहीं बरसता था।
या
सर्दियों में भी
हम गले में स्वेटर नहीं लटकाते थे
कि गर्मी लगती थी।
चिलचिलाती, उमस भरी
या अनचाही गर्मियों में भी
बस तुम्हारा साथ
बहुत ही सुहाना
फुहार सा
और गुनगुना लगता।
हर बार
बहुत अचानक तुम मिले हो
बस कुछ गिने चुने पलों के लिए।
मुझे अक्सर अफसोस रहा
उन व्यस्तताओं से
जो तुम्हारे साथ के बहानों को
खा जाती।
बस मैंने अपशकुन के डर से
तुमसे कभी भी
फिर से मिलने का वक्त नहीं तय किया
कि तुम्हारा अचानक मिलना
बड़ा ही सुकून देता
सांसों की वीरान बस्ती में।
कभी कभी बड़ा ही भाया मुझे
बदकिस्मत होना
क्योंकि ऐसी ही उलझन भरी उदासियों में
कभी नेट पर बैठे
या कभी ताल के किनारे पर
या सारे संसार से रूठकर
किसी अन्जान पार्क में
तुम अनचाहे ही आ गये हो।
कभी कभी तो लगा
कि मेरी उदासियों और
तुम्हारे आने में
शायद कोई सम्बंध हो
पर मैं खुद से भी छुपाता रहा
ऐसी किन्हीं भी उदासियों में
तुम्हारा इंतजार।
आज मैंने सोचा
कि कुछ पल हैं
तो तुम्हारे लिए
संदेश लिख छोड़ूं
कि तुम कभी कहीं खोलो
कोई मेल
तो उसमें दर्पण की तरह
तुम्हारी चाहतें भी
मेरी अनाम आशाओं के
दर्पण में नजर आयें।
----------------------
उन सभी लोगों के नाम
जो मुझे जिन्दगी में
कभी कहीं मिले थे और
जिनके साथ बिताये
कुछ लम्हों ने
मेरी मौत की तरफ बढ़ती उम्र से बचकर
एक उम्र को
जिन्दगी का नाम दिया।

Wednesday, 7 July 2010

आज का फैशन क्‍या है ?


मनुष्य से जुड़े किसी भी विषय से संबंधित किसी विशेष समय के रूझान को फैशन कहते हैं। ये रूझान नवीनता की अनुभूति की प्रेरणा से संचालित होते हैं लेकिन पीढ़ियों के अन्तर के कारण पुराने चीजें ही वर्तुल बनाती हुई फैशन में आती-जाती रहती हैं।

फैशन के प्रसिद्ध या प्राथमिक विषय निम्नलिखित हैं:
साजसज्जा और पहनावा - वस्त्र, जेवर, घड़िया, केशविन्यास , सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री, जूते-चप्पलें आदि।
विचार - पुरातनवादी, नूतनतावादी, समाजवादी,, पूंजीवादी, फक्कड़तावादी, अहंवादी, पर्यावरण समर्थक, क्रांतिसमर्थक आदि।
जीवन शैली - सामान्य, रफ एंड टफ, कूल, अल्ट्रामार्डन आदि।

इस लिंक पर देखि‍ये फैशन डि‍जाइनर की कुशलता क्‍या चीज है।



संगीत और नृत्य: संगीत और नृत्य में फैशन प्रेरित शब्द हैं - क्लासिक, मार्डन और फ्यूजन। इन्हीं से निकला संवर्धित, परिष्कृत या संकर, कोई अन्य प्रकार भी फैशन में हो सकता है।

फैशन के अन्य विषयों में कला, विज्ञान के वे सभी क्षेत्र आतें हैं जिनमें मनुष्य कार्यरत रहता है, जो बहुत तेजी से फैलते हैं और अपनी विशेष वृत्तियों से मनुष्य की संवेदनाओं को संतुष्ट करते हैं।

फैशन के निर्धारक तत्व:

अदृश्य सौन्दर्य मानदण्ड: ये मानदण्ड समाज में व्यक्तियों द्वारा धीरे-धीरे स्थापित किये जाते हैं, कालांतर में इनका अनुकरण अपरिहार्य सा हो जाता है। यही नहीं विशेष समयों में इन मानदण्डों को तोड़ना भी फैशन का ही एक अंग है। जूतों के साथ जुराबें पहनना एक नियमित फैशन है पर बिना जुराबों के जूते पहनने का अंदाज नया है।

परिस्थति विशेष की मांग: जैसे बीच पर बिकनी पहनना सामान्य है पर शहर के चैराहे पर नहीं। रात के समय आप चड्डा पहनकर मोहल्ले में निकल सकते हैं पर 12 बजे इसे अच्छा नहीं माना जायेगा। इसी प्रकार मोहल्ले के आसपास आप घरेलू वस्त्रों में निकल सकते हैं, पर शहर के प्रसिद्ध चैराहे पर आपसे सलीकेदार परिधान की अपेक्षा की जाती है।

संस्कृति: किसी देश की संस्कृति वहां के किसी भी फैशन पर आधारभूत प्रभाव डालती है। गहराई से अन्वेषण करें तो हम पायेंगे कि समय समय पर बदलता हुआ फैशन अपने पीछे जो मूल तत्व छोड़ जाता है वही संस्कृति के अंग बन जाते हैं और भविष्य में खुद को दोहराते हैं।

आर्थिक स्थिति: कोई व्यक्ति फैशन के किस रूप को अंगीकार करता है यह उसकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है।

सामाजिक माहौल: किस समय कितनी जनसंख्या किस प्रकार के विचारों को पुष्ट कर रही है, या किस प्रकार के विचारों को अनदेखा कर रही है इससे भी फैशन निर्धारित होता है। जैस वर्तमान में ‘‘प्रकृति मित्र’’ नेचर फ्रेंडली शब्द आज के समाज के प्रकृति के प्रति संरक्षणवादी नजरिये के फलस्वरूप उपजा है।

कुशलता: किसी कार्यक्षेत्र में कुशलता प्राप्त व्यक्ति भी उस क्षेत्र में फैशन के निर्धारक होते हैं। ये कुशल या गुरू व्यक्ति ही किसी फैशन के उच्च मानकों को स्थापित कर उसे परिवर्धित करते हैं और उनके संरक्षण के उपाय करते हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक खोजें: कोई भी नई खोज पहले पहल फैशन सी लगती है, आम होने पर जरूरत बन जाती है। उदाहरण के लिए मोबाइल, लेपटाॅप, महंगी घड़ियां, नयी तकनीक के टीवी, कम्प्यूटर आदि।

किसी व्यक्ति की एक विशेष अभिनव जीवन शैली ही बाद में फैशन बन जाती है- साईं बाबा के सिर पर बंधा विशेष तरह का साफा, उनकी नकल करने वाले बाबाओं का फैशन है। माइकल जैक्सन के अनुकरण करने वाले उन्हीं की तरह के कपड़े पहनते हैं। हो सकता है पहले भी कई लोगों ने उस शैली को अपनाया हो पर राजीव गांधी की शाॅल धारण करने की शैली बाद में उन्हीं के नाम हो गई। फैशन कभी तो शौक होता है, कभी मजबूरी। इसका सुविधा असुविधा से बहुत लेना देना नहीं। अब देखिये ना तंग जींस पहनने में बहुत मर्दों को असुविधा होती है पर फैशनपरस्त पहनते हैं। ऊंची हील के सेंडल्स पहनने के साइड इफेक्ट इसे पहनने वाली महिलाओं को इनसे दूर नहीं करते। काजल, लिपिस्टिक, सुर्खी, पावडर, क्रीम, तेल, ब्लीच महिलाओं की लगभग समस्त सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री उनके स्वास्थ्य के लिए हितकर है या अहितकर ये विवाद का विषय रहा है, लेकिन ये निर्विवाद है कि हर काल की महिलाओं का ये अभिन्न अंग रहा है।

इस प्रकार संवेदना-उन्मुख जीवन की विशिष्ट शैली यानि फैशन, किसी विशिष्ट व्यक्ति से होता हुआ करोड़ों व्यक्तियों तक या एक बहुत बड़े समूह से किसी व्यक्ति के निज-जीवन की ओर निरन्तर एक प्रवाह की तरह है। इस संसार में रहता हुआ कोई भी मनुष्य इससे अछूता नहीं रहता, अब देखिये ना हो सकता है सलवार कुर्ते पर बुर्का कभी फैशन रहा हो पर अब मल्‍लि‍काएं कुछ उलटी ही हवाएं बहा रही हैं।

Tuesday, 6 July 2010

असल में हमारा जीवन क्‍या है ?

मौत को महसूस कि‍ये बि‍ना, जि‍न्‍दगी क्‍या है ? इस सवाल का जवाब नही मि‍ल सकता
http://jkrishnamurthyhindi.blogspot.com/

Saturday, 3 July 2010

हर तरफ, तेरी याद बिखरती देखी

जब कभी, कहीं, बारिश बरसती देखी
हर तरफ, तेरी याद बिखरती देखी

यूं तो मेरे दिल सा, बुझदिल कोई ना था
तुम मिले, इसी दिल से, दुनिया डरती देखी

तेरी याद के गहरे सन्नाटे में अक्सर
इक हूक सी उठती-उभरती देखी

कि हमने ख्वाहिशों को पालना ही छोड़ दिया
तेरी जुदाई में, ख्वाहिशें सभी, मरती देखी
_________________________________________________________________________
d

Friday, 2 July 2010

अपने अंदर झांकता, तू भी नहीं मैं भी नहीं

तू मुझे और मैं तुम्हें इल्जाम देता हूं मगर
अपने अंदर झांकता, तू भी नहीं मैं भी नहीं

वक्त ऐसा बन पड़ा कि जुदा से लगते खयाल
वैसे कुदरत का बुरा, तू भी नहीं मैं भी नहीं

अजब सी दिशाओं में, दोनों का सफर जारी रहा
एक लम्हें को रूका तू भी नहीं मैं भी नहीं

चाहते हैं हम दोनों ही, एक दूजे को टूटकर
पर कभी जताता हकीकत, तू भी नहीं मैं भी नहीं



सूचना - भाई लोग ऊपर लि‍खा ये लाईन्‍स अपना नहीं है, अपने दोस्‍त ने बोला तो रि‍फाइन कर लि‍खा है। 

रोचक तथ्‍य : 


  • पतंगे की 6 टांगे होती हैं पर वह चल नहीं सकता।
  • एल्कोहल की छोटी सी मात्रा से ही बिच्छु पागल हो उठता है और खुद को ही डंस कर मार डालता है। खुद में ही जहर की प्रतिरोधक शक्ति के ना होने पर बिच्छु अपने ही डंक से स्वयं मर सकता है।



  • मेंढक कभी कभी इतने जुगनु खा लेते हैं कि वो खुद भी जगमगाने लगते हैं।
  • जिराफ खांस नहीं सकता।
  • चीलें हवा में ही संभोग करती हैं।
  • गोल्ड फिश धुंधले स्थान या बहते पानी में रहने पर अपना रंग खो देती है।
  • शार्क अपना आहार बनने वाली मछलियों को उनके दिल की धड़कन सुनकर तलाश कर लेती है।
  • लकड़बग्घा निरंतर अन्य जानवरों की विष्ठा खाता रहता है।
  • अगर कोई मेंढक चल फिर नहीं सकता, तो वो देख नहीं सकता और यदि वह देख नहीं सकता तो वह खा नहीं सकता।
  • गोह या गोधा के दो लिंग होते हैं।
  • मनुष्य के पिछले चार हजार वर्षों के इतिहास में आज तक किसी नये पशु को पालतू नहीं बनाया जा सका है।
  • शारीरिक संरचना के कारण, किसी भी सुअर के लिए यह असंभव है कि वो आकाश की ओर देख सके।

Thursday, 1 July 2010

और कोई नई ताजी ?


चि‍त्र : गूगल से साभार

जब भी घर पर होते हैं या घर से बाहर निकलते हैं किसी व्यक्ति से हैलो, हाय करने के बाद हमारे मुंह से एक ही सवाल निकलता है, और कोई नई ताजी ? लोगों को इस ‘सवाल’ की आशंका नहीं होती। तो लोग इस सवाल के जवाब में या तो बगले झांकने लगते हैं या कहते हैं ‘‘बस कट रही है,’’ आप सुनाओ? बूमरेंग की तरह अपने पर ही लौट के आया यह सवाल बड़ा ही परेशान करता है। जिन्दगी फिल्म थोड़ी ना है कि हर सीन में कहानी आगे बढ़े। जिन्दगी के सीन फिल्मों से ज्यादा लम्बे होते हैं। रिटेक के ज्यादा मौके होते हैं पर आदमी पर आदर्श भूमिका का नशा चढ़ा होने के कारण वह ‘‘बुरा’’ करे या ‘‘अच्छा’’, रिटेक नहीं करता। दूसरे शब्दों में इस को ही अहंकारी होना कहते हैं क्योंकि आदमी जिन्दगी और फिल्म में अंतर करता है। फिल्म फिल्म है, असल जिन्दगी असल जिन्दगी। पर कब्रों में समाये लोगों से पूछिये फिल्म और जिन्दगी में क्या अन्तर है या उस आदमी से फिल्मों और जिन्दगी में अंतर पूछिये, जिसकी फिल्म जिन्दगी के टाॅकीज से उतर गई है या फ्लाॅप रही है। आप कहेंगे कि हम फिर फिलासफी पर उतर आये... पर क्या किया जाये, इस कहानी को समझना फिलासफी की श्रेणी में ही आता है।

जब तक अर्थी तक नहीं पहुंचते, लोग अपने ही अर्थ निकालते रहते हैं। हकीकत को जानना या देखना, समझना ही नहीं चाहते। रामलुभाया की वसासम्पन्न 75 किग्रा के दो पहलवानो के वजन को मात करती बीवी ने हांफते हुए घर में प्रवेश किया और बोली, - ”सुनिये जी खिड़की दरवाजे बंद कर लीजिये, मैंने अभी अभी बाजार में सुना कि सर्कस से एक शेर भाग निकला हैं। मैंने सुना है कि वो हमारे मोहल्ले के आस-पास ही है।
इस पर रामलुभाया अपने ख्यालों में खोई निश्चिंत मुद्रा में बड़बड़ाये - चिंता क्यों कर रही हो दुर्भाग्यवती, शेर सर्कस से क्रेन लेकर थोड़ी ना भागा है कि तुम्हें ले उठा जायेगा। ऐसी सोच ने हमें सदा ही प्रभावित किया है जो घिसी पिटे अर्थों से भिन्न अर्थ प्रदान करती हों।

फलौदी जी तीन चीजों का एकसाथ उपयोग कर गर्भनिरोधक अभियान चला रहे हैं। पहली बात मोबाईल फोन जेब में रखो, दूजी बात नीम की दातुन करते समय 5 6 पत्तियां नियमित रूप से खाओ, तीसरा किराना इकट्ठा ना खरीद कर हर दिन किसी ना किसी चीज खरीदने के बहाने डिपार्टमेन्टल स्टोर जाओ और बिल जरूर लो इस बिल को अपने हाथों और मुंह के संपर्क में जरूर लाओ।

अब आप कहेंगे कि इन उपायों का वैज्ञानिक आधार क्या है? जी इनका वही वैज्ञानिक आधार है जिन आधारों पर विचार ना किया गया और आप पैदा हो गये। जी हां यह सब विज्ञानसम्मत तथ्य हैं। मोबाइल फोन से होने वाला विकिरण, नीम में मौजूद रसायन, और छोटे छोटे प्रिन्टरों में इस्तेमाल होने वाली स्याही इन सब से नंपुसकता का खतरा है। खतरा ही कभी-कभी वरदान भी साबित होता है यह हमें फलौदी जी ने ही बताया। वह स्लोगन तो आपने ही सुना होगा कि ‘‘डर के आगे जीत है।’’ इसलिए डर से डरने की नहीं, उसे समझने की जरूरत है। डरना खतरनाक है क्योंकि डर के ही मर गये तो समझेगा कौन - कि डर के आगे कौन से मजे थे।

डर से नहीं डरना चाहिये किन्तु ऐसे खयाल नहीं पालने चाहिए कि कयामत आ जाये, हमारे बाप का कुछ नहीं बिगड़ना है। अब यह वाकया ही लीजिए।

जिस दिन 9/11 को वल्र्ड ट्रेड सेन्टर पर हमला हुआ, उस दिन की बात है। सुबह कार्यालयीन समय में एक व्यक्ति अपनी पुरानी पत्नि के चंगुल से निकल, प्रेमिका के घर पहुंचकर स्वर्गीय नजारे ले रहा था। व्यवधानों की संभावनाओं को कम करने के लिए दरवाजे और टीवी, रेडियो बन्द थे।
अचानक विमान इमारत में घुस गया, उस व्यक्ति की पत्नि का टीवी चालू था, जिसमें ये भयावह वीडियो दिखाये जा रहे थे। घबराई, पगलाई बीवी ने पति को फोन लगाया, पूछा - आप कहां हो? पति का वही आम सा जवाब था - श्योरली डियर ऑफि‍स में। पत्नि सारा माजरा समझ गई और उसी दिन पत्नि ने तलाक के कागजात बनवाये और प्रेमिका के घर भिजवा दिये।

तो डर से आंख फेरना और डर के आगोश में जा समाना, यानि डर से पलायन और डर के स्वीकार के अलावा हमारे पास ये रास्ता है कि हम डर को समझें कि वो आखिर है क्या। इसी में सारा नयापन है ना कि रोजाना की ताजा जिन्दगी को बासी पुराने दृष्टिकोण की फफूंद लगाकर, फफूंदों का पहाड़ पालते रहना। विचार शब्द की मजबूरियों से परे, विचारातीत सोचना इसमें नयापन है। यही उस सवाल का जवाब है, जब मैं आपसे पूछूं कि ‘‘और कोई नई ताजी?’’

Tuesday, 29 June 2010


तन्हा लहर है, तन्हा किनारे,
सारे सागर हैं तन्हा
हम ही उसकी यादों की भीड़ में
सारे नजारे हैं तन्हा

जलाती है जुदाई की आग
हम दीवाने परवानों को
शमां को कोई खबर ही नहीं
सारे शरारे हैं तन्हा

चांद ना जाने कहां गया है
चातक की सारी रात गई
सारे बादल भटक रहे हैं
सारे सितारे हैं तन्हा

तुम जो हमसे पराये हुए
पराये सारे साये हुए
मौत जिन्दगी में फर्क खत्म है
हम बेचारे हैं तन्हा

Friday, 25 June 2010

प्रीत नगर की कठिन डगर जिंदगी कैसे तय कर पायेगी

पंजाबी साहि‍त्‍य में "वि‍रह के सम्राट" कहे जाने  वाले
शि‍व कुमार "बटालवी"  के काव्‍य का हि‍न्‍दी अनुवाद
कडी : 1

जब  दूर चला जाऊंगा कहीं
अपने बेगाने ढूंढेगे
आज मुझे दिवाना कहते हैं
कल हो दीवाने ढूंढेगे

मुझे जानने पहचानने वालों से जब
लोग, मेरी बर्बादी का पूछेंगे
इक भेद छुपाने के लिए
वो क्या क्या बहाने ढूंढेगे

जब मस्त हवा ने खेल किकली
किसी शोख घटा का घूंघट उठाया
उस वक्त किसी की मस्ती को
रो रो मस्तान ढूंढेंगे

किकली: एक खेल है जिसमें लड़कियां एक दूसरे के हाथ हाथों में लेकर पैरों को केन्द्र बनाकर वृत्ताकार घूमती हैं।

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मित्रों को पत्र

पूनम के चांद को कोई अमावस
क्योंकर अर्ध्‍य चढ़ायेगी
क्यों कोई डाची सागर खातिर
मरूस्थल को तज जायेगी
डाची-ठेठ पंजाबी भाषा में ऊंटनी को कहते हैं।

कर्मो की मेंहदी का सजना
रंग किस तरह चढ़ पायेगा
जो किस्मत, मीत की पाती को
पैरों तले रौंदती जायेगी

गम का मोतिया उतर आया है
मेरे संयम के नैनों में
प्रीत नगर की कठिन डगर
जिंदगी कैसे तय कर पायेगी

कीकर के फूलों की मेरे मीत,
कौन करता है रखवाली ?
कब किसी माली की इच्छा
हरीतिमा बंजर को ओढ़ायेगी

प्रेम के धोखे खा खा कर
हो गये गीत विष से कड़वे
पतझड़ के आंगन में जिंदगी
सावन के गीत कैसे गायेगी

प्रीत के गले छुरी फिरती है
पर कैसे मैं रो पाऊंगी
मेरे गले में चांदी के हार
यही चंद कौढ़ियां फंसायेंगी

तड़प तड़प के मर गई है
तेरे मिलन की हसरत अब
इश्क की जुल्मी अदायें अब
विरह के बाण चलायेंगी

Thursday, 24 June 2010

एक नशीला पंजाबी गीत हि‍न्‍दी में


पंजाबी संस्‍करण:
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा, रंग गोरा गुलाब लै बैठा
किन्नी पीती ते किन्नी बाकी ए, मैंनू ए हो हिसाब लै बैठा
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा, रंग गोरा गुलाब लै बैठा

मैंनू जद वी तुसी हो याद आये, दिन दिहाड़े शराब बैठा
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा, रंग गोरा गुलाब लै बैठा

चंगा हुंदा सवाल ना करदा, मैंनू तेरा जवाब लै बैठा
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा, रंग गोरा गुलाब लै बैठा
 
जब कदी वेल मिली फर्जा तों, तेरे मुख दी किताब ले बैठा
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा, रंग गोरा गुलाब लै बैठा


हिन्दी अनुवाद :
मुझे तेरा शबाब ले बैठा, 
रंग गोरा गुलाब ले बैठा

कितनी पी ली ओ, कितनी बाकी है
मुझ को ये ही हिसाब ले बैठा।
मुझे तेरा शबाब ले बैठा......


मुझको जब भी कभी तुम याद आये
भरी दुपहरी शराब ले बैठा।
मुझे तेरा शबाब ले बैठा......

अच्छा होता सवाल ना करता
मुझको तेरा जवाब ले बैठा।
मुझे तेरा शबाब ले बैठा......
 
जब कभी वक्त मिला फर्जों से,
तेरे मुख की किताब ले बैठा
मुझे तेरा शबाब ले बैठा......




गीतकार: शिव कुमार "बटालवी"
गायक: ये गीत जगजीत सिंह की आवाज में यू टॅयूब पर उपलब्ध है। 
वैसे इसे आसा सिंह मस्ताना और महेन्द्र कपूर ने भी गाया है।

Tuesday, 22 June 2010

अकल को नकल में नहीं, नव सृजन में लगायें


हमारी परीक्षा प्रणाली याददाश्त पर आधारित है। साल भर पाठ्यक्रम में उल्लिखित हर प्रश्न का उत्तर अपने दिमाग में डाल लो और परीक्षा वाले दिन चुने हुए प्रश्नों के उत्तर उत्तरपुस्तिका पर उगल आओ। जो प्रश्न पूछा गया है यदि आपको उसका किताब में लिखा गया उत्तर शब्दशः याद है तो आपको पूरे अंक मिलेंगे यानि यहां आपकी याददाश्त के ही अंक दिये जाते हैं। यहां तक कि भौतिक, गणित जैसे विषयों के संबंध में भी ये बात सही है। गणितीय सवालों जवाबों, को भी छात्र रटकर परीक्षा देने जाते हैं और अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होते हैं। हम यह कहना चाह रहे हैं कि आपके बुद्धिमत्ता-स्तर से भारतीय शिक्षाप्रणाली का कोई सरोकार नहीं है।

अगर हमने जो याद किया है वो प्रश्न पत्र में पूछा गया है तो बल्ले बल्ले वर्ना आपकी हालत पतली हो जाती है। प्रश्नपत्र सामने होता है, जाने पहचाने इसी वर्ष पढ़े हुए प्रश्न हैं, पर उनके उत्तरों के बारे में हमें कुछ नहीं सूझता। यदि परीक्षक उदार है तो फिर परेशान आदमी अपने अगल-बगल, आगे-पीछे नजर डालता है। आगे पीछे कोई अपना ही राशि-भाई या बहन मिल जाये तो उसकी किस्मत में लिखा हुआ हम अपने पेपर में उतार कर, जो वो हो सकता है वही हम भी हो सकते हैं। यानि जिसकी उत्तर पुस्तिका से नकल की जा रही है वो पास तो हम भी पास वो फेल तो हम भी फेल। इसे सारे कुकर्म को नकल कहा जाता है।

छात्र के दिमागी, शारीरिक लक्षणों के अनुसार नकल के अनेक प्रारूप हैं। संबंधित विषय की सम्पूर्ण किताब, कॉपि‍यों को ले जाना अधोगति प्रदान करने वाला पाप है इसमें छात्र और परीक्षक दोनों फंसते हैं। किताबों कॉपि‍यों के लघु संस्करणों गाईड, 20 से लेकर 40 प्रश्नमाला तक को ले जाना भी डूबो सकता है। प्रश्न उत्तरों के संक्षिप्त और सूक्ष्म संस्करण काम आते हैं, पार लगाते हैं, अगर आप बच पाते हैं।

मेधावी छात्र आधा याद करते हैं, चैथाई भाग अगल-बगल या आगे पीछे वाले से कन्फर्म कर लेते हैं और चैथाई भाग के अपनी मेहनत से सूक्ष्म संस्करण तैयार करते हैं।

आप ये ना समझें कि यह ”भारतीय परीक्षा प्रणाली में नकल के तरीके“ विषय पर लेख है। यह सब आपको यह बताने के लिए था कि परीक्षा के दौरान नकल का क्या अर्थ है।  इस लेख का आशय उस मानवीय वृत्ति का उदघाटन करना है, जिसमें बचपन में जो सामने वाला कर रहा है वही प्रतिक्रिया उसे देना, यह तोता-रटन्तपना या बन्दरपन, हमारी सारी जिन्दगी पर फैल जाता है।

वानर आदमी के पूर्वज हैं ऐसा ही नहीं है। ये भी सत्य है कि अभी भी वानरजाति मौजूद है। अपने बचपन को देखें हम मां-बाप, भाई बहनों या अपने ही परिवेश में रहने वालों के हाव-भाव अपना लेते हैं। हमारे माता पिता और अन्य लोग भी यह जान देखकर खुश होते हैं कि हम उनकी नकल कर रहे हैं। स्कूल में प्रवेश लेते ही सहपाठी के पास उपलब्ध परिधान, जूते, बैग, पानी की बोतल, बरसाती आदि हम भी चाहने लगते हैं। तथाकथित पढ़ने में अच्छे बच्‍चों की कॉपि‍यॉं घर लाकर उतारने का उपक्रम शुरू हो जाता है।

स्कूली पढ़ाई खत्म होते होते, उम्र 18-20 वर्ष पार कर जाती है पर इन वर्षों में हम अनुकरण-वृत्ति में किसी ना किसी तरह निष्णात हो चुके होते हैं। पेंट शर्ट के पहनावे से लेकर अगले 5 से 10 वर्ष तक पढ़े जाने वाले विशिष्ट विषयों के चयन पर भी हमारे सहपाठियों या परिवेश का प्रभाव हम पर पड़ता है। यानि सहेली ने बायो लिया तो मुझे भी बायो लेना है और दोस्त ने विज्ञान विषय लिया तो अपन भी विज्ञान विषय ही लेंगे। कैरियर के मामले में भी हम बाजार की हवा में बह जाते हैं, जिस नौकरी धंधे में उठाव चल रहा हो उसी में हम भी तैरने लगते हैं। गजब तो तब होता है जब आदमी अपनी जिन्दगी भर के लिए लिये जाने वाले फैसले भी देखा-देखी करता है यानि प्रेम, शादी विवाह जैसी बातें। गौर से देखने पर आप पायेंगे कि जिन्दगी से मौत तक आदमी एक भेड़चाल में चला जा रहा है। उसे पता ही नहीं कि कहानी कहां से शुरू हुई और कब्र का ये गड्ढा कब आ गया।

नकल क्या है?
नकल एक विवशता है: जब जिन प्रश्नों के उत्तर हमें नहीं सूझते, उन दुर्बोध प्रश्नों के उत्तरों के लिए हम नई, पुरानी किताबों, गुरूओं या दूजों के विचारों, धारणाओं में उनके उत्तर ढूंढते हैं। यानि ये हमारी प्रश्न का उत्तर ना पा पाने की अक्षमता है। इसलिए हम दूसरों का कहा हुआ मान लेते हैं, हकीकत वही रहती है कि हम उस विषय के बारे में जानते नहीं है। ये सब हमारे बचपन में किया जाने वाला वो काम है जिसके तहत जब हमें कुछ समझ नहीं आता तो हम प्रतिक्रिया में वही करते हैं जो सामने वाला कर रहा है।

नकल अक्षमता है: नकल करने का यह भी मतलब है कि आप मौलिक सोच-विचार करने में अक्षम हैं। आपका विषय विशेष के बारे में कोई समझ, अनुमान या ज्ञान नहीं है, आपका दिमाग उस विषय या कार्य को नये तरीके से देख ही नहीं पा रहा। सामने क्या क्रिया हो रही है उसे हम पहचान ही नहीं पा रहे हैं।

नकल मूढ़ता है: यदि आप शेव बना रहे हैं तो आपकी देखा-देखी बन्दर उस्तरे से अपने गाल छील लेगा। इसी तरह दूसरे की गतिविधियों की नकल उतारना आपकी जिन्दगी में खतरनाक हो सकता है। आपको याद है दिल्ली में रेडियोएक्टिव पदार्थ पकड़ा गया था, उसकी चपेट में आने वाले ऐसे ही लोग थे जिनको उसकी कोई जानकारी, ज्ञान नहीं था। या उन्हें यही पता हो कि यह कीमती चीज है पर कितनी खतरनाक इसका अंदाजा ही नहीं था।

हम नकल क्यों करते हैं?
सुविधा: क्योंकि इसमें हमारे दिमाग पर जोर नहीं पड़ता। हमें सब पका पकाया मिल जाता है, दूसरों का लिखा, पढ़ा या सुना देखा हुआ। हमें बस यंत्रबद्ध होकर वही करना है जो पहले भी हो चुका है। यानि लकीर का अनुसरण ही तो करना है। इससे मार्ग पर आने वाले विध्न बाधाओं की आशंका भी नहीं रहती। पर इन सभी आसानियों और सुविधाओं के कारण किसी भी विषय या कार्य में सामान्य और विशिष्टता का भेद पैदा होता है। अर्थात् एक ही तरीके से करने वालो को असफलता ओर संघर्ष तथा अपने विशेष गुणों से किसी कार्य को खास तरीके से करने वाले को अभूतपूर्व सफलता व समृद्धि मिलती है।

विषय के सच झूठ में अन्तर कर पाने की असामर्थ्‍य : जब हम किसी विषय या कार्य की असलियत से वाकिफ नहीं होते तब भी हम अनुसरण या नकल की वृत्ति की चपेट में आ जाते हैं। हमारे एक मित्र थे। अपने दफ्तर के सामने ही बन रही इमारत में लगे एक ठेकेदार को देखा कि साल भर में ही उसने एक खुदाई मशीन से कमाई करके दूसरे खुदाई मशीन भी खरीद ली है। तो हमारे मित्र ने भी अपनी बरसों की जमा पूंजी से एक खुदाई मशीन खरीद ली। अब इस ठेकेदारी क्षेत्र के उतार चढ़ाव से तो वो परिचित नहीं थे। 2 - 4 महीने मशीन किराये पर रही, निश्चित आमदनी देती रही फिर महीनों बेकार पड़ी रही, समय समय पर ड्राइवर भी नहीं मिलते थे। डेढ़ साल बाद ही उन्हें वह मशीन बहुत ही घाटे में बेचनी पड़ी, फिर तो किसी भी अनजाने क्षेत्र में प्रवेश से या अन्धानुकरण से तौबा कर ली।

यथार्थ या सत्य से पलायन : क्योंकि यथार्थ और सत्य बड़ा ही अनिश्चित, भलाई या बुराई से परे, सुविधा असुविधा से परे होता है इसलिए इन सब बातों से बचने का हम एक आसान सा शार्टकट ढूंढते हैं। हम सड़क पर पड़े पत्थर की पूजा करने लगते हैं, अपने ही भावों और भजनों से उसमें प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। वो पत्थर हमारी ही पूजा, भक्ति, श्रद्धा के अनुसार हमारे ही चेतन-अचेतन द्वारा तय परिणाम देने लगता है। ईसाई को पूजा पाठ में सफल होने पर गणेश जी नहीं दिखते ईसा ही नजर आते हैं। मुसलमान को बन्दगी सफल होने पर आयतें सुनाई पड़ती हैं, ना कि गीता के श्लोक। यह पत्थर प्राचीन हो यानि कोई मन्दिर, मस्जिद जितना ही पुराना हो, पुरानी शराब सा वह उतना ही मादक होता है। कहने का मतलब ये कि जिस रास्ते पर करोड़ों लोग गयें हों उसी रास्ते पर चलने में ज्यादा मजा आता है, बनिस्बत कांटे हटाकर, गड्ढे भरकर, खाईयां पार कर, पहाड़ चढ़कर नये रास्तों पर जिन्दगी के सच देखने के।

स्वाभिमान का अभाव : जब किसी में स्वाभिमान का अभाव होता है तो वो ऐसे सारे कार्यों में आसानी से संलग्न हो जाता है जो दूसरे कर रहे हों, भले ही वो कार्य सही हों या गलत। किसी कार्य को अपनी विशिष्ट शैली में करने में जो आनन्द है उसका मुकाबला कोई भी ईनाम नहीं दे सकता। जब हम खुद में कुछ खास नहीं होते तभी हम दूसरों की तरह बनना चाहते हैं। अगर हम में कुछ खास है और उसे हम पहचान नहीं पा रहे तो भी हम दूसरों द्वारा किये जाने वाले, श्रेष्ठ घोषित कामों, चीजों की नकल करते हैं।

सुनिश्चितता: हम इस बारे में आसानी से सुनिश्चित हो जाते हैं कि ऐसा तो हो ही चुका है। हमें तो बस तयशुदा प्रक्रिया अपनानी है परिणाम भी वही होंगे जो तय हैं। ये वाक्य हमी ने तो गढ़ा हुआ है कि ‘‘इतिहास अपने को दोहराता है’’ जबकि इस इतिहास का आधार हम ही होते हैं ये आसमान से नहीं टपकता। हम खुद को दोहराते हैं। अनिश्चय के रोमांच में मजा है, पर ये बेहद तनाव भरा है इस तनाव में ना उतरने वाले भी तयशुदा यांत्रिक क्रियाओं में लगे रहते हैं।

प्रत्याशा: हम नकल इसलिए भी करते हैं क्योंकि अन्य को जो करने से लाभ हुआ होगा वही हमें भी होगा। उदाहरण तो सामने ही होता है, हमें बस वैसा का वैसा ही आचरण करना होता है। हम यह नहीं जानते कि किसी की देखा देखी किया गया कार्य वह परिणाम नहीं देगा जो हमारी शारीरिक मानसिक सामथ्र्य अनुसार कुदरती, स्वाभाविक, सहज प्रेरणा से किया जाने वाला काम।

लोभ: हममें यह लोभ होता है कि दूसरे ने उस कार्य को किया तो उसे बहुत मजा आया वही मजा हमें भी आयेगा जबकि ऐसा हो सकता है कि उस व्यक्ति ने कुछ ऐसे बिन्दुओं को बड़े ही मजे से पार कर लिया, या उसमें कुछ ऐसी जन्मजात विशेषताएं हों जो जिन्हें तय करने में आपकी उम्र ही निकल जाये। दूसरी बात यह भी है कि यदि एक बार हमें किसी काम को करने में बड़ा मजा आया तो वही मजा हम बार बार चाहते हैं पर हो सकता है वक्त के साथ बदले घटकों से वही खुशी दोबारा प्राप्त ना हो। हमारे जीवन में आनन्द हमेशा एक अलग अंदाज में आता है, जिससे पहचानना जरूरी है। इस प्राकर अतीत के अनुभवों का लोभ भी हम से नकल करवाता है।

संपूर्णतत्व का बोध: हमने ही एक और सिद्ध वाक्य बनाया हुआ है प्रैक्टिस मेक मेन परफेक्ट अर्थात ”अभ्यास से कार्य सिद्ध और व्यक्ति कुशल हो जाता है।“ लेकिन हम यह नहीं जानते कि हम उसी में संपूर्णत्‍व प्राप्त करते हैं जो हम कर रहे होते हैं और एक समय बाद यंत्र की तरह हमारी आदत भी घिसते घिसते क्षरण को प्राप्त होती है। यानि यदि आप कोई गलत कार्य कर रहे हैं तो गलती ही बढ़ते बढ़ते भयंकर परिणाम को प्राप्त होती है, अभ्यास से गलत काम सही नहीं हो जाता। क्या आपने ऐसे कारीगर नहीं देखे जो अपनी सारी उम्र एक ही काम करते रहे हों पर उन्हें उस कार्य की पृष्ठभूमि का ही ज्ञान नहीं। इसलिए भी लोग उम्र भर वह काम करते हैं जिसमें उन्हें भले ही रस ना हो। आपने ऐसे दसियों बरसों से चल रहे रेस्टोरेंट नहीं देखे जिनके आगे नया-नया आया खोमचे वाला महीनों में ही शहर वालों का दिल जीत कर होटल मालिक की ईष्र्या का कारण बन जाता है।

असंवेदनशीलता, आलस या झंझट में ना पड़ने की आदत: यानि जैसे कोई काम किया जाता है उसे वैसे ही जैसे-तैसे सम्पन्न कर के पिंड छुड़ाना। किसी कार्य की जटिलता, या उसके सत्य से, असलियत से पलायन करना। किसी भी कार्य को उसकी संपूर्णता में ना करने से उसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। पानी को उबलने की अवस्था में आने के लिए 100 डिग्री तापमान की जरूरत होती है इससे कम पर पानी नहीं उबलता। इसी तरह मनुष्य को नये विषय पर काम करने के लिए 100 प्रतिशत समर्पण चाहिये होता है पर अनमनापन, फुर्ती का अभाव और कठिनाईयों से जूझने की अनिच्छा आदमी को अतीत का अनुकरण कराती है। किसी कार्य मंे संपूर्णता या नवीनता के लिए अथक परिश्रम और बुद्धिमत्ता की आवश्यकता होती है। इन सब से बच के, केवल धकमपेल से, हम अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते।

लोकोपवाद: हमें यह संकोच और भय भी रहता है कि किसी कार्य को नई तरीके से सोचने-करने पर लोग क्या कहेंगे? हम असफल हो गये तो लोग कहेंगे कि देखो ये अपनी ही राह बनाने चले थे जब कि पारंपरिक रास्ता तो था ही। इसलिए भी हम रीति-रिवाजों, परपंराओं का अनुसरण करते हैं। पारंपरिक मार्ग की नकल या लोगों का अनुसरण करने पर लोग कुछ नहीं कहते और एक छद्म सपोर्ट मिलता है। पर बने बनाये रास्तें से आप नई मंजिलें नहीं तय कर सकते, नयी अछूती मंजिलों के लिए आपके कदमों को नयी राहों पर ले जाना होगा।

नकल के दुष्परिणाम:
हम वही गाना गाने लगते हैं जो पड़ोसी गा रहा है: पूंजीवाद, समाजवाद जैसे वादों के बारे में हम आसपास के लोगों की सुनी सुनाई बातों पर विश्वास कर लेते हैं। कभी कभी तो हमारे निर्णय बड़े ही बचकाने होते हैं। यदि हमारा कोई शासकीय काम कोई रिश्वत लेकर कर दे तो हम निकटवर्ती चुनाव में उसी पार्टी को वोट देंगे जिसने हमारा काम कर दिया। यदि हमें संस्थान की लेबर यूनियन में कोई पद मिल जाये तो हम समाजवादी या माक्र्सवादी हो जाते हैं। आपके सरकारी काम अटकने लगें, आपसे हुई लूट को थाने में दर्ज नहीं किया जाता तो हम नक्सली भी हो सकते हैं। लेकिन हम क्यों नहीं देखते कि इन सब बातों मंे हम अनायास ही किसी की नकल कर रहें या एक ढांचाबद्ध प्रक्रिया में लगे हुए हैं।

हम अंधविश्वास और विश्वास शब्द का प्रयोग भिन्न भिन्न अर्थों में करते हैं पर क्या कभी आपके मन में यह प्रश्न उठा कि इन दो शब्दों अंध-विश्वास और विश्वास में आखिर फर्क क्या है? रास्ते में बिल्ली रास्ता काट जाती है तो इसे आप अंधविश्वास कहते हैं पर यदि आप अपने किसी मित्र या रिश्तेदार के भरोसे थे कि वो आपकी आकस्मिक विशेष परिस्थितियों में मदद करेगा और वो ऐन वक्त पर फैल जाता है तो इसे आप विश्वास का टूटना ना कहकर अंधविश्वास क्यों नहीं कहते? आपके पीर फकीरों देवी-देवताओं के बारे मंे तो यह बात और भी भयानक साबित होती है। दोस्त नकारा निकल जाये तो आप उसे विश्वासघात कहते हैं पर देवता मनौती पूरी ना करे तो भय के कारण विश्वासघात जैसा इल्जाम नहीं लगाते बल्कि आसपास के लोगों की या बाजार में आजकल जिसकी मांग है उस परंपरा की देखा-देखी किसी दूसरे देवता की शरण ले लेते हैं। देवी देवता भी आपके अपने तय किये हुए नहीं बल्कि आपकी अपूर्ण इच्छाओं या दूसरे के सुझाये-दिखाये हुए हैं।

हमारे एक परिचित की बिटिया कि 12-14 वर्ष की अल्पायु में कैंसर से मृत्यु हो गई। उस समय वो जिन बाबा को मानते थे उनके कहे कर्मकाण्ड आदि करने, आशीर्वाद लेने के बाद भी यह सब हुआ तो उन्होंने उनको मानना छोड़ दिया... वापिस अपने देवी देवता की शरण में आ गये। फिर बरसों बाद उनके बेटे का विवाह के बाद नई बहू घर आयी तो समधियों के गुरू के वचनों में ही उन्हें मजा आने लगा। तो यह सब एक ‘‘मानने’’ कि प्रक्रिया है, जानने की नहीं।

दरअसल हम जानने से ज्यादा मानने में सुविधा पाते हैं। क्योंकि किसी भी विषय के बारे में जानने, समझने, बूझने में शारीरिक मानसिक श्रम लगता है, जो हम कदापि नहीं चाहते। मानने में ना कुछ लगता है ना जाता है, मुफत में कुछ उपलब्ध हो जाने या किसी तरह का संतोष या आशा मिल जाती है। जबकि ये मानने की प्रक्रिया एक तरह का पूर्वाग्रह है यानि जैसा आप चाहते हैं या मानते हैं वैसा मिल जाये तो उसकी शरण में बने रहना। हमारे मन को पंरपरा, रीति-रिवाजों, संस्कृति आदि में इस कारण ही रस आता है क्योंकि इन सबकी पूर्वनिर्धारित या ढांचागत प्रक्रिया है। नकल करने की वृत्ति इतनी गहरी है कि अपनी उम्र के बाद के वर्षों में हम अपनी ही पुरानी होती आदतों की नकल या अनुकरण में एक झूठा सुख हासिल करने लगते हैं। यदि इस सारी प्रक्रिया के बारे में हमें कोई बताये समझाये तो हम कहते हैं हम क्या करें, सारी उम्र तो यह किया अब फिर से कुछ नया समझें, तलाशें, करें अब नहीं होगा.... आदि आदि।

भौतिक जगत में अपने जीवन में व्यवस्था, शारीरिक सुविधा के लिए हमने यंत्र और अन्य साधन बनाये हैं जिनकी तयशुदा या ढांचागत, प्रतिक्रियाएं, गतिविधियां होती हैं -ये ठीक हैं, लेकिन हम मन की उड़ान को भय, अनिश्चितता, कठिनाइयों, नये अनुभवों से बचाकर तयशुदा राहों पर चलेंगे तो कहीं नहीं पहुंचेंगे। मजे मंजिलों पर नहीं, उन कदमों में होते हैं जो मंजिल तक पहुंचने के लिए हम तय करते हैं।

Friday, 18 June 2010

अध्ययन के समय ध्यान केन्द्रित करने के 7 तरीके


1. सभी कार्य अधिक ध्यानपूर्वक करें उदाहरणतः जब आप पढ़ रहें हो तो ‘‘केवल पढ़ें’’, कोई वाहन चला रहें तो ‘‘केवल वाहन चलायें’’। खुद से कहें कि आप ही को किसी विषय विशेष पर ध्यान केन्द्रित करना है और आप ही खुद को भटकने दे रहे हैं।
 2. प्रत्येक कार्य और कोई भी कार्य करते हुए उसमें अपना पूरापन उड़ेल दें, कुछ भी करते समय उसमें गलती की संभावना को न्यूनतम करते हुए शून्य पर लायें।
 3. विचारों को स्पष्ट रखें। लिखकर मिटाना या कागज फाड़ कर फेंक देना एक गंदा व्यवहार है। किसी बात को उसकी पूरी स्पष्टता से सोचें, शब्दों को आप अपनी विशिष्ट शैली में अनुक्रम दें, वाक्य बनायें और लिख डालें। किसी शब्द की संरचना के लिए डिक्शनरी की मदद लेने में संकोच ना करें।

4. अपनी पठन क्षमता या पढ़ने की सामथ्र्य बढ़ायें। प्रत्येक वाक्य का अर्थ समझते हुए ज्यादा से ज्यादा तेजी से पढ़ने की कोशिश करें, ताकि पूरे पैराग्राफ का एक निचोड़ वाक्य स्पष्ट रहे। जितना ही समय कम लगेगा, दिमाग ज्यादा केन्द्रित होगा।

5. किसी भी चीज का गहराई से विश्लेषण करें। हम किसी भी बात को गंभीरता, गहराई से नहीं देखते, यहां तक कि हम कार्य करते वक्त परिवेश का भी ध्यान नहीं रखते। तो किसी भी चीज पर ध्यान केन्द्रित करते समय समग्रतापूर्व दृष्टि रखें।

6. अपने आसपास घट रही घटनाओं, चीजों पर नजर रखें कि कब, कहां, कैसे, क्या हो रहा है पर उन्हंे अपने वर्तमान काम के आड़े ना आनें दें और वर्तमान विषय को ही प्रमुखता दें। देखें कि व्यवधान, बाधा क्या है, ध्यान भटकने के क्या कारण हैं।

7. किसी बड़े और कठिन लक्ष्य को सामने रखने पर घबराहट के कारण मन भटकता है, नकारात्मक विचार आते हैं। तो अपने बड़े लक्ष्य के छोटे छोटे हिस्से करें, इतने छोटे कि कुछ मिनटों या घंटों में उस लक्ष्य के प्रति कुछ कार्य कर सकें। उन छोटे-छोटे कार्यों को सम्पन्न करते जायें, यही जुड़कर उस बड़े लक्ष्य को सम्पन्न कर देंगे। याद रखें समतल रास्ते तय करने हों या एवरेस्ट हम एकत्र-एक कदम चल कर ही दूरी तय कर सकते हैं।

पढ़ते समय ध्यान केन्द्रित करने के तीन चरण
1. पता लगायें कि कारणों से आपका ध्यान भटक रहा है, ना तो बार-बार उठ जायें ना ही जम कर बैठ जाने का संकल्प लेकर खुद से जबर्दस्ती करें।
2. भटकाने वाले विचारों को देखते चले जायें और इस बात को समझें कि आप इन कारणों को दूर करने की बजाय वर्तमान विषय का अध्ययन कितना महत्वपूर्ण है।
3. किसी विषय पर पूर्वधारणा बनाने, स्वीकारने या नकारने की बजाय उस सारी बात को समझ लेने की आदत बना लें।

अन्य कारणों और उनके निवारण हेतु यह महत्वपूर्ण चार्ट देखें:

Thursday, 17 June 2010

कहीं इलाज ही आपको बीमार ना कर दे?


सावधानी प्रत्येक उपचार की माँ है परन्तु आज के आदमी की सबसे बड़ी तकलीफ - वो इतना व्यस्त है कि सावधान या होश में रहने में उसे बड़ी तकलीफ होती है। वो चाहता है कि सारे समाधान पके-पकाये उसकी जद में आ जायें। लेकिन यदि आप चाहते हैं कि आप स्वस्थ, सकुशल जिन्दा रहें तो आपका सावधान रहना ही किसी भी युग या काल में आपकी हर समस्या का समाधान हो सकता है।

क्या आपको कभी सिरदर्द हुआ तो आपने झट उस प्रचलित ब्रांड की गोली नहीं ले ली जो बचपन से दिन में कई बार रेडियो, टीवी, अखबारों में गूंजती रही है। पेट, दांत, बदन दर्द, जुकाम-बुखार, खांसी जैसे आम रोगों पर हम झट अपने आत्मविश्वासपूर्ण ज्ञान के हिसाब से एलोपैथिक गोलियां या कैप्सूल्स गटक जाते हैं। ऐसा भी होता है कि पिछली बार जिस बीमारी के लिए डॉक्‍टर ने जो दवाईयां लिखीं थी हफ्तों, महीनों या साल बाद पुनः उसी बीमारी की चपेट में आने पर हम डॉक्‍टर के पर्चे में लिखी वही दवाईयां लेने कैमिस्ट की दुकान पर पहुंच जाते हैं। ये समझदारी है या नादानी?

कभी कभी हम डॉक्‍टर के मुंह से ये भी सुन लेते हैं कि खुद ही डॉक्‍टर  ना बनें, पर इसमें क्या बुरा मानने जैसी बात है? हम अपनी ही एक भूतपूर्व सहकर्मी को जानते हैं जो केवल साक्षर थीं, उनको उनके ही किसी संबंधी ने एक पुस्तक भेंट दी थी जिसमें सामान्य रोगों की जानकारी और उनके एलोपैथिक उपचार स्वरूप ली जाने वाली औषधियों का वर्णन था। वो हिन्दी-साक्षर महिला जिसे अंग्रेजी की दवाईयों के लिखे हुए नाम भी पढ़ने नहीं आते थे वो अपने सिर, पेट, बदन दर्द का इलाज उसी किताब में लिखी दवाईयों से कर रही थी। मैंने उन्हें इसकी गंभीरता और भयावहता को समझाने की कोशिश की परन्तु... असर तो वही होता है जिसकी इजाजत हम स्वयं खुद को दें।

आजकल इंटरनेट पर दवाइयों की जानकारियां देने वाली साईटों की संख्या बढ़ती जा रही है। इनमें कुछ साईट्स दवा कंपनियों की होती हैं, कुछ चिकित्सा संस्थानों की... और आप जानते हैं कि कोई भी दवा निर्माता कंपनी दवा विशेष के उपयोग के 36 कारण गिना सकती है, इनमें आप किस वजह से ये दवा खायेंगे और आपके शरीर के इतिहास के हिसाब क्या असर होगा यह कहीं नहीं लिखा, इस बारे में एक जिन्दा और योग्य चिकित्सक ही कुछ समाधान दे सकता है। जब आप दवा खाने जा रहे हैं तो यह इन सवालों के बारे में सोचें -

- क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आपको बुखार, दस्त या पेट, बदनदर्द तो हो पर उसकी वजह वो ना हो जो पहले कभी थी?
- क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इस बार हुआ रोग या जुकाम बहुत ही साधारण हो और आप जुकाम की दवाई की भारी खुराक ले रहे हों?
- सीने में उठ रहे दर्द की वजह गैस का बनना है, सीने में कफ जमना है, दिल की धमनियों में अवरोध है, या दमें के कारण.... क्या ये सब आप ही तय कर ले रहे हैं?
- एक ही समय में उभरे दो रोगों के लक्षणों में से किसका प्राथमिक रूप से निदान करना है ये कौन तय करेगा?
- हो सकता है कोई दवाई तत्‍कालि‍क रूप से आपको आराम दे पर बाद में बुरे साइड इफेक्‍टस।

ये सारे प्रश्न इस बात की ओर इशारा करते हैं कि अपनी किसी बीमारी के बारे में हम पूर्वधारणा बनाकर, खुद अपनी तीमारदारी के चक्कर में खुद को किसी रोग की गंभीर अवस्था में तो नहीं डाल रहे?

किसी रोग के बारे में हमारी सोच सकारात्मक हो या नकारात्मक .... हमें कई तरह के जैसे आर्थिक, सामाजिक, मानसिक, शारीरिक दुष्परिणाम दे सकती है। ये भी हो सकता है कि रोग छोटा सा हो पर आप उसे पढ़ी-सुनी बातों के आधार पर बड़ा कर डालें। जैसा कि मेरे एक मित्र के साथ हुआ। मामूली सिरदर्द था जो कि नियमित नहीं था। पर किसी फिल्म का प्रभाव था या किसी निकट संबंधी से प्राप्त किसी बीमारी की जानकारी। मेरे मित्र ने अपने सिर को तीन बार स्केन करवाया। एक डॉक्‍टर ने कहा कि कुछ नहीं है तो उस पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ, दूसरी बार लेब टेक्नीशियन ने उन्हें कन्फर्म किया कि परिणाम कुछ अनियमित हैं (जो कि प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से अलग अलग हो सकते हैं) तीसरी बार डाॅक्टर ने भी  मित्र की हां में हां मिलाई। कुछ दिन दवाईयां खाईं फिर लगा कि कोई पाजीटिव या निगेटिव असर नहीं है तो खुद ही छोड़ छाड़ दीं। पर इस बीच ही उन्होंने अपने दिमाग का रोना रो रोकर लोगों के मन में शक पैदा किया, जांचों डॉक्‍टरों की फीसों में हजारों के नोट गंवाए अपने जिस्म में जो रसायन डाले उनका असर क्या हुआ ये भगवान ही जाने। तो ये मुद्दा बड़ा ही संवेदनशील है।

एक बार हमें पेट में दर्द रहने लगा, हफ्ते दस दिन की निगरानी के बाद भी सामान्यीकरण के आसार ना देख घर के ही निकट रहने वाले एक अविख्यात से डॉक्‍टर वर्मा जी के पास गये। पर क्‍लीनि‍क  के अंदर जाने पर दिखा कि नजारा कुछ और ही था। बरसों पहले के अनाम से डॉक्‍टर वर्मा जी तो वी सुमित वर्मा जी निकले जिनका शहर के बीचों बीच बड़ा उदररोग अस्पताल है। क्‍लीनिक पर सामान्य 100-150 के स्थान पर फीस 400 रू. की फीस से झटका लगा, वर्मा जी ने कि कहा कि हम उनको अस्पताल में मिलें वो जांच वगैरह करेंगे। अस्पताल में लम्बी लाईने लगीं थी। पूरा दफ्तरी माहौल था। जब डॉक्‍टर का पर्चा हमने वहां मौजूद एक अधिकारीनुमा व्यक्ति को दिखाया तो वो बोला कि आपको कुल जमा 5000 रू कि जांचे करवानी हैं उसके बाद ही डॉक्‍टर के पास जाना/मिलना हो पायेगा क्योंकि तभी वे कुछ बता पायेंगे। हमारी सिट्टी पिट्टी गुम, हमने अस्पताल के बाहर आकर डॉक्‍टर को फोन लगाया कि सर गरीब आदमी हैं हमारी तो एक तनख्वाह ही आपकी जांचों में निकल जायेगी, कृपया उचित दवाई गोली लिख दें फिर जो होगा भगवान पर। डॉक्‍टर को शायद रहम आया उन्होंने तुरन्त आने को कहा। हमने अधिकारीनुमा व्यक्ति को जाकर कहा कि डॉक्‍टर ने खुद बुलाया है वो कैबिन में गया और पूछकर हमें साथ ले गया। डॉक्‍टर ने ऊपर से नीचे तक देखा और शोषण के अयोग्य पाकर हमारे अस्तित्व के नकारापन को लानत देते हुए उस रोग का सामान्योपचार लिख दिया। ईश्वर की कृपा से 4 दिन में में सुखद परिणाम रहे और फिर सालों बाद तक सकुशल रहे।

तो बीमार होने इन बातों का ख्याल रखना बेहतर हो सकता है?
- बीमारी के बारे में अपने कहीं से लिखे, पढ़े या सुने मुताबिक कोई पूर्वधारणा ना बनायें। यानि कि ना तो बीमारी को हल्का लें ना ही इतना गंभीर कि आपकी सोच ही अमल में आने लगे।
- खुद दवाईयां लेना किसी भी परिस्थिति में गंभीर हो सकता है, इस बारे में तो महंगे या सस्ते किसी योग्य डॉक्‍टर का परामर्श ही आधार हो सकता है।
- बच्चे हों या बड़े,  कुछ बीमारियों के घंटों मिन्टों में ही मिजाज बदलते देर नहीं लगती, तो सावधानी में ही सलामती है। हमारा जरूरत से ज्यादा आलस्य या फुर्ती दोनों नुक्सानदायक हो सकते हैं। क्योंकि हो सकता है कि आलस्य से बीमारी बढ़े या फुर्ती दिखा कर हम तीन दिन में 2 डॉक्‍टरों की दवाईयां खा लें और चौथे दिन बीमारी अपने आप ही ठीक हो सकती हो।

हमारा अपना बड़ा दुराग्रह था आयुर्वेदिक चिकित्सा को लेकर। एक बार पीलिया हुआ, जांच में मात्रा 7 बिन्दु तक पाई गई। निकट के रिश्तेदारों के सुझाव पर, उनके पुत्र के इसी रोग का निदान करने वाले, एक आयुर्वेदिक चिकित्सक कमाल पाशा के पास गये। उन्होंने एलोपैथिक डॉक्‍टरों की तरह ही 40 दिनों में 4 बार रक्त की जांच करवाई दवाईयां बदल बदल कर देते रहे। हालत ये हो चली की जिंदगी में पहली बार दुबलेपन और शारीरिक अशक्तता का क्या अर्थ होता है समझ में आ गया। थक हार कर, शहर में अपोलो अस्पताल की नई नई खुली ब्रांच में गये जहां कि महज 3 दिन की खुराक से जिस्म पटरी पर लौट आया। तो हमने जाना कि आयुर्वेदिक, ऐलोपैथिक, हौम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति तो अपनी जगह है डॉक्‍टर ही योग्य ना हो तो क्या कर लोगे। मुझे अपने ग्रामीण रिश्तेदारों की स्थिति का भान हुआ। पिछले 30 वर्षों से गांव में (शहर में झोलाछाप डॉक्‍टर कहे जाने वाला) एक डॉक्‍टर कुनैन की कड़वी गोली और लाल शर्बत या सामान्य मलहमों से ही सारे ग्रामीणों का इलाज करता आया है ऐसी नौबत कम ही आयी कि स्थिति उस झोलाछाप डॉक्‍टर के वश से बाहर हो गई हो।

कुछ बातें डॉक्‍टरों के बारे में भी खयालों में आती हैं-
- प्रत्येक उपचार के लिए किसी ना किसी तरह की जांच ही आजकल के डाॅक्टरों के उपचार का आधार है, क्या पिछली सदियों में जो डॉक्‍टर अनुमान से कर रहे थे वो सब गलत था या मजबूरी थी ? या आयुर्वेदिक डॉक्‍टरों की तरह ही एलोपैथिक वैज्ञानिक डॉक्‍टर भी तुक्के लगाकर ही काम चला रहे थे।

- एक्स-रे, सीटी स्केन जैसी जांचें मनुष्य के शरीर के लिए आज तक भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं हुई हैं। डॉक्‍टर सलाह देते हैं कि इस तरह की जांचें एक अंतराल के बाद ही और सकुशल तकनीशियन से ही, कराया जाना उचित है। अंग विशेष के अनुसार भी इन विकिरणों के दुष्प्रभाव आम या खास होते हैं। जांच प्रयोगशालाओं से सेटिंग के कारण कई डॉक्‍टर अक्सर जांचें लिखने में तत्परता दिखाते हैं जो कि कई बार अनावश्यक होती हैं।

- कुछ दवाईयां एक रोग के निदान के लिए तो पूरी तरह समर्थ होती है पर कुछ समय लेकर भयंकर परिणामों का कारण भी होती है। कुछ दवाईयां बहुत ही जरूरी होती हैं पर आम आदमी को जिन्दगी के दर्दों से छुटकारा दिलाने में प्रवृत्त सरकारों की अनुमति और दवा कंपनि‍यों के लालच से ये दवाईयां अपने साइड इफेक्टस की अपूर्ण जानकारी के ही बाजारों में प्रसारित हो जाती हैं। इसलिए अपडेटेड डॉक्‍टर के पास ही जायें, जिसे इस बात की जानकारी हो कि कौन सी दवाईयां किस कारण, किस देश में प्रतिबंधित हो चुकी हैं। पुराने इलाजों से ही काम चला रहे डॉक्‍टर पुरानी दवाईयों के जाहिर हो चुके दुष्परिणामों से बेखबर होकर रोगी को साईड इफेक्ट दे रहे होते हैं।

मानसिक, मौसमी और एलर्जिक रोगों के बारे में रोगी ज्यादा बता सकता है कि किन चीजों या परिवेश से वह कितना प्रभावित होता है। इसी तरह कुछ बातें पूरी तरह रोगी की ओर से स्पष्ट होना जरूरी हैं, क्योंकि हो सकता है समयाभाव या किन्हीं कारणों से डॉक्‍टर कुछ प्रश्न पूछे ही ना। किसी भी रोग के बारे में बिना मान अपमान की चिंता, शर्म लिहाज किये हमें चिकित्सक को सारा अतीत जाहिर कर देना चाहिए। हमारी समझदारी किसी भी डॉक्‍टर के अचूक निदान का कारण हो सकती है। अतः जरूरी है हम खुद से ही ये प्रश्नों के उत्तर पूछकर डॉक्‍टर के समक्ष उपस्थित हों।

- हम रोग के प्राथमिक लक्षणों को किस गंभीरता से ले रहे हैं?
- पिछली बार रोग के लक्षणों, आक्रमण की क्या स्थिति थी?
- अपने पुश्तैनी रोगों के बारे में हमें कितनी जानकारी है?
- अपनी मानसिक, शारीरिक प्रकृति और रोग के इतिहास को हम डॉक्‍टर को कितना स्पष्ट कर पाये हैं?
- पहले कभी किन दवाईयों के हमारे शरीर पर क्या साइड इफेक्ट रहे?
- खान पान की मात्रा और कि‍न चीजों को हमारा शरीर आसानी से स्‍वीकार कर लेता है और कि‍न आम चीजों से ही तकलीफ या समस्‍याएं खड़ी होने लगती हैं।

एलोपैथि‍क डॉक्‍टर अक्‍सर खानपान से संबंधि‍त कि‍सी खास परहेज की बात नहीं करते दि‍खते, वहीं हौम्‍योपेथि‍क चि‍कि‍त्‍सक का बुनि‍यादी परहेज ही ये है कि‍ मीठी गोलि‍यों के 30 मि‍नि‍ट पहले और बाद  में क्‍या खाना है और क्‍या नहीं। आयुर्वेदि‍क चि‍कि‍त्‍सक भी तेल, खटटा और तीखे खाद्य से दूर रहने की समझाइश देते हैं लेकि‍न ये तो हम ही अपने बारे में बता सकते हैं कि‍ हमारी जुबान पर हमारा कि‍तना वश चलता है। डॉक्‍टर खुदा तो नहीं पर खुदा से कम भी नहीं, अगर ये वि‍श्‍वास मरीज ही डॉक्‍टर को दि‍ला सके तो दोनों के लि‍ये भला ही होगा।

हमने देखा कि किस तरह रोग कोई हो... चाहे दैविक या दैहिक, हर कदम पर सावधान रहने की जरूरत है। रोगी यानि हम स्वयं, दवाई, और डॉक्‍टर इन सबसे पहले यदि ‘‘सावधानी’’ रहे तो रोग पैदा होने से पहले ही खत्म हो सकता है, पैदा हो गया है तो शीघ्र खत्म हो सकता है और लाइलाज है तो हम अपनी पूरी उम्र तक पूर्ण सक्षमता से जिन्दगी के मजे ले सकते हैं।

Tuesday, 15 June 2010

उस मिट्टी में सौन्दर्य की प्रवाहना सी है


मेरी काया में जो आत्मा सी है
उसके लौट आने की संभावना सी है


वो बदल ले मार्ग या सम्बंध बदल ले
वही रहेगी, जो प्रेम की भावना सी है

मैं पानी की तरह पटकता रहूंगा सर
उस पत्थर में विचित्र चाहना सी है

मैं क्यों उस मौन को नकार मान लूं
उस मौन में मेरी सराहना सी है

छानूंगा, गूंथूंगा, गढूंगा, कभी तो संवरेगी
उस मिट्टी में सौन्दर्य की प्रवाहना सी है

Monday, 14 June 2010

तुम कहती हो - ना डरा डरा सोचूं जो भी सोचूं हरा भरा सोचूं


तुम कहती हो ना
ना डरा-डरा सोचूं
जो भी सोचूं हरा-हरा सोचूं
तुम्हीं बताओ कैसे?

तुम बस एक ही बार मिली थी
मुझे साफ-साफ दिखा था
कि अब कोई मंजिल बाकी नहीं
पर तुम चलीं गयीं
अब सब बाकी है तुम्हारे सिवा
डर, घृणा, झूठ, बेबसी, अफसोस
और रोतले गीत, सिसकती गजलें

और अब फिर
क्या पता तुम हो भी कहीं?
वैसे ही जैसे कि
महसूस होती हो मेरे आसपास
तुम कहती हो - ना डरा डरा सोचूं
जो भी सोचूं हरा भरा सोचूं
तुम्हीं बताओ कैसे?
कि गांव खत्म हो गये हैं?
जहां बिना मतलब के बात करने वाले लोग थे
अब तो मुझे खुद
किसी से बेमतलब शब्द कहे या सुने
बरसों हो गये हैं

तुम थीं,
तुम कुछ भी नहीं थीं, ...
फिर भी तुम्हारा इंतजार रहता था
मैंने अजनबी होते हुए भी
तुमसे सबकुछ कहा था
यहां तक कि
वो सच भी
जिसे कहा नहीं जाता
‘‘कि मैं तुमसे प्यार करता हूं’’
पर तुमने सुना ही नहीं।
तुमने बरसों फैले
रेगिस्तान पर छोड़ दिया है रेत सा
और अब लौटी हो
एक मरीचिका बनकर
और कहती हो
कि जो भी सोचूं हरा हरा सोचूं।

पता नहीं तुम धोखा हो
या मेरा बुना हुआ सच
या पता नहीं किया
तुम बोलती हो मुझमें
या तुम्हारे बहाने में खुद से ही
बातें करने लगा हूं।
रेगिस्तानी सन्नाटे,
खुद से ही बातें करते हैं।

और देखो ना
कितना गहरा रेगिस्तान है
सीमेंट की इमारतें
लोहे की रेलिंग्स
गलतफहमियों की तरह
उस राह के हर ओर सजी हैं
जिस पर हजारों लाशें बिछीं हैं
जिन लाशों को
जिन्दा से दिखते लोग
रेत का भाव भी नहीं देते।

तड़क-भड़क-हवस से भरे माॅल
और अजनबी सी अंगे्रजी में
किसी भी उम्र की भीड़ में
तुम कहीं नहीं दिखती
ना मैं ही लायक रहा हूं
कि कॉल सेन्टर में काम कर सकूं

मेरे जिस्म में कुछ ढल सा गया है
जानबूझकर गलत अंजामों को जानते हुए
अब लड़ा सा नहीं जाता

बस कभी कभी
यही उम्मीद चमकती है
कि तुम थके हुए पार्कों में
कहीं मिल जाओ
अपने खेलते हुए बच्चों के किनारे
उस सुलझी हुई जिन्दगी से उदास
जिसके लिए
तुमने किसी भी प्रेम की आवाज
नहीं सुनी थी।

जो रहस्यमयी ऊर्जा से भरी आवाज
बहुत मंद हो कर
दुनियां के नक्कारखाने में
जब तब होती मौतों पर
अकेली ही गूंजती रहती है
जिसे कमउम्र लोग
निपट लीचड़पना और बोरियत
या राशिफल में लिखे
किसी आशंका सा
अपशकुन समझते हैं।

क्या पता तुम हो या नहीं ?
क्या पता मैं कितना बचा हूँ?