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शनिवार, 26 मई 2012
ये भी बुरा है
अगर मैं
इससे बेखबर रहूं
कि मैं खुद,
और तुम
कब तक साथ रहेंगे?
और
दिन ऐसे बिताऊं
जैसे मैं
या तुम
हमेशा ही साथ रहेंगे,
और तुम्हें
कोई वजह ना होने से भुलाऊं
कभी जरूरी ही
कोई बात करूं
और सारा दिन
काम धंधें में खपाऊं
तो बुरा है।
और अगर मैं
हमेशा
ये ध्यान रखूं
कि क्या पता
कब मैं,
या,
कब तुम,
साथ नहीं रहेंगे
और तुमसे
सारा सारा दिन
चिपका रहूं
बीतते हुए
बरसों-बरस
छोड़ूं ही ना तुम्हें
जीने के लिए
तो ये भी बुरा है
कुछ भी
भला नहीं लगता -
मौत के
लिहाज से।
गुरुवार, 10 मई 2012
एक होना, यानि पूर्ण होना।
जैसे ही दो लोग मिलते हैं,
एका होने से, खुशी होती है।
जब वो कुछ कहने लगते हैं,
वो अपनी-अपनी ”बात“ होती है,
किसी ”बात“ का मतलब ही होता है
दो चीजें।
इस तरह दो चीजों में बंटते ही
खुशी काफूर हो जाती है,
इसलिए
चुप रहो।
जब कुछ महसूस किया जाता है
खो जाता है सबकुछ
वक्त भी।
जब फिर से मांगा जाता है वही महसूसना,
तो वक्त लौट आता है
अतीत, वर्तमान और भविष्य के
तीन सिरों में कटा हुआ।
कटी-फटी-टुकड़ों में बंटी चीजें
अशुभ होती हैं।
इसलिए
महसूस करो और
चुप रहो।
याद करो
उन दिनों हम कितने खुश थे
जब ना कोई बोली थी
ना कोई भाषा
मौजूदगी को महसूसने की
थी
अपनी ही अबूझ परिभाषा।
जब से हमने
अहसासों को बांधने की कोशिश की है-
बोलियों-भाषाओं में,
शब्दों-स्मृतियों में।
हम बेइन्तहा बंट गये हैं।
इतने कि
एक छत और
एक बिस्तर को
एक साथ महसूसने के बाद भी
हम एक नहीं हो पाते।
इसलिए हो सके तो
कुछ ना कहो
चुप रहो।
प्रार्थना
कैसे की जा सकती है?
क्योंकि जैसे ही प्रार्थना की जाती है,
एक खाई बन जाती है
प्रार्थना करने वाले, और
जिससे प्रार्थना की जारी रही
उसमें।
इसलिए चुप रहो।
सहज खामोशी में हम
एक हो सकते हैं।
खामोश होने के लिए
जरूरी है कि हम
वही रहें, जो हैं।
और कुछ होना ना चाहें
उसके सिवा
जो है।
जो हैं,
बस वही भर रह जाने से
हम एक हो जाते हैं।
खामोशी रह जाती है।
एक होना, यानि पूर्ण होना
मृत्यु रहित होना।
बुधवार, 9 फ़रवरी 2011
जिन्दगी एक वीडियो गेम है
जिन्दगी एक कम्प्यूटर गेम की तरह है
आपको मिलता है एक तयशुदा वक्त
इस तयशुदा वक्त में
तय करने होते हैं अनगिनत रास्ते
और अनगिनत मंजिलें
कुछ रास्ते जैसे दिखते से हैं
पर भूलभुलैया होते हैं
कुछ मंजिलों जैसे दिखते हैं
पर वो पड़ाव होते हैं
लाईफ कम हो जाती है
किन्हीं पड़ावों पर ठहर जाने पर
लाईफ कम हो जाती है
निषिद्ध चीजों को स्पर्श करने पर
कुछ ऐसी चीजें होती है
जो किन्हीं खास पड़ावों पर ही काम आती हैं
कुछ ऐसी चीजें होती हैं
जिन्हें ना लें तो कोई फर्क नहीं पड़ता
पर जिन्हें धारण कर लें तो लाईफ बढ़ जाती है
इस गेम में हर लेवल पर
कुछ मुश्किलें मिलती हैं,
और इनका सामना ही
असली खेल है।
खेल के प्रमुख नियम हैं
लाईफ को सुदृढ़ करते/रखते हुए
मंजिल दर मंजिल तय की जाये।
प्राथमिकता अनुसार
सही वक्त पर सही काम किया जाये
सही वक्त पर सही चीज ली जाये
हर लेवल पर हर वो चीज ली जाये
जिनसे लाईफ बढ़ती हो
क्योंकि ये लाईफ वहां खर्च होनी है
जहां हमें कुछ निषिद्ध चीजों को भी छूना होगा
कहीं चलना होगा दबे पांव
कहीं संभलकर तेज चलना होगा
कहीं सर्वोच्च कुशलता से छलांग मारनी होगी
और वहां तो अक्सर लोग चूक कर जाते हैं
जिस बिन्दु पर इस गेम में
कुछ भी नहीं करना होता
सिवा कुछ पलों के इंतजार के।
कुछ धैर्य रखने के।
पर जैसे कि आप गेम के चरम पर हों,
कभी कभी ऐसा भी होता है,
कि अचानक बिजली गुल हो जाये।
आपको मौका होता है,
कम्प्यूटर/गेम को कभी फिर से शुरू करने का।
पुरानी कुशलताओं को और तीखेपन से दोहराने,
और गलतियों से सीख लेने का।
लेकिन जिन्दगी के खेल में
हमें, बस एक ही बारी मिलती है।
और पता नहीं क्या होता है,
बिजली गुल हो जाने पर
मौत आने पर।
शुक्रवार, 28 जनवरी 2011
इतनी जल्दी में .... हम बस वहीं पहुंचेंगे
लोग बहुत जल्दी में हैं
आंखे होते हुए भी देखना नहीं चाहते
कान होते हुए भी सुनना नहीं चाहते
और इसी तरह
लोग अपने जिस्म की ताकतों से भी दूर होकर
लोग बस भाग रहे हैं
यहां तक कि उन्हें यह भी नहीं पता
कि वो कब उड़ने लगे हैं
लोग बहुत जल्दी में हें
झूठ की फिसलन भरी राहों पर
जैसे हवाई जहाज से
आत्म हत्या के लिये कूदा हुआ कोई आदमी
किसी के भी हाथ में नहीं आये
यहां तक की सच के भी
लोग बहुत जल्दी में हैं
बटोर ले जाना चाहते हैं
धन दौलत, और
अपनी हवस के सारे अनुभव
इस धरती के पार तक
किसी अनजान ग्रह पर
लोग बहुत जल्दी में हैं
इतनी जल्दी में
कि उन्हें खुद नहीं मालूम
कि वो किस राह पर हैं
और उस राह की
कोई मंजिल है भी या नहीं
लोग बहुत जल्दी में हैं
और जिसे वो जिन्दगी की जुगाड़ कहते हैं
उस इंतजाम में खोये हुए
वो बस अचानक
खुद ही
वहां पहुंच जाते हैं जिससे बचते हुए
लोग बहुत जल्दी में होते हैं हर वक्त
लोग बहुत जल्दी में हैं
और अचानक अपने आपको पाते हैं उस शै के सामने
जिसे 'अचानक' शब्द का पर्याय कहते हैं।
लोग बहुत जल्दी में हैं
किसी के भी हाथ नहीं आते
सिवा मौत के।
सोमवार, 24 जनवरी 2011
जिन्दगी यूं ही ना गुजर जाये
मौत की ओर बढ़ते हुए
कोई कैसे सोच सकता है
किन्हीं लालिमामय होंठों का
तीखा नाजुकी भरा रसीलापन
पर
देह के रसायनों का असर देखो
मन की मौज का कहर देखो
मुझे कुछ और नजर ही नहीं आता
इन होंठो के सिवा।
मौत की ओर बढ़ते हुए
कोई कैसे मजे ले सकता है
बरसों पके हुए अभिमान के
कार, बंगला, बैंक बैलेंस
हर घड़ी प्रशस्त
ऐश-ओ-आराम के
पर मुझे अहं की मस्ती में
कुछ सूझता ही नहीं
कि इसके सिवा
जिन्दगी क्या है?
मौत की ओर बढ़ते हुए
किसी को कैसे सूझ सकते हैं नौकरी धंधे
हर बात में दलाली
हर बात से नोट उगाहने के फंदे
पर मुझे कुछ सूझता ही नहीं
नोटों की ताकत के सिवा
मैं दिन रात गर्क हूं गुलामी में
हर उस काम में
जो मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा
हर वो काम जिससे
जिस्म, मन और रूह कांपते हैं
हर वो काम-जिससे खीझ होती है
हर वो काम-जिसे करते हुए जी मिचलाता है
हर वो काम, जिसे बंद करके
एक उम्र बाद, आराम से मुझे
मौत का हँस के स्वागत करना है
मौत की ओर बढ़ते हुए
पता नहीं मैं इतना निश्चिंत क्यों हूं
क्यों मुझे लगता है कि
आदमी की एक हर देश में
एक औसत उम्र होती है
जबकि अखबार रोज कहते हैं
कि उन बहानों से भी मौत रोज आती है
जो हमने कभी भी ख्याल में नहीं लिये
और अचानक कभी भी...
‘‘अचानक’’ शब्द ‘मौत‘ का पर्याय ही है।
मौत की ओर बढ़ते हुए
मैं मौत से इतना बेखबर क्यों हूं
क्यों उलझा हुआ हूँ
फिल्मों में, हीरो-हीरोइनों की बातों में
चैपाटियों पर, पिज्जा बर्गर के स्वादों में
हर तरह की किताबों में
शेर ओ शायरी, कविता कहानियों में
समाज सेवा की नादानियों में
मौत की ओर बढ़ते हुए
किस डर से बचने के लिए
किस चीज को बचाने के लिए
मैं व्रतों उपवासों में फंसा हूं
तंत्रों मंत्रों को लिखते, जपते
खुद पर कई बार हँसा हूं
कि ऐसा पागलपन क्यों?
और हर सुबह मैं जपता हूं
वही मंत्र यंत्रवत।
मौत की ओर बढ़ते हुए,
मौत की बातें सोचने से,
क्या मौत नहीं आयेगी?
अचानक आये उस पल के पहले
जिसे मौत कहते हैं -
कोई कैसे सोच सकता है
किन्हीं लालिमामय होंठों का
तीखा नाजुकी भरा रसीलापन
पर
देह के रसायनों का असर देखो
मन की मौज का कहर देखो
मुझे कुछ और नजर ही नहीं आता
इन होंठो के सिवा।
मौत की ओर बढ़ते हुए
कोई कैसे मजे ले सकता है
बरसों पके हुए अभिमान के
कार, बंगला, बैंक बैलेंस
हर घड़ी प्रशस्त
ऐश-ओ-आराम के
पर मुझे अहं की मस्ती में
कुछ सूझता ही नहीं
कि इसके सिवा
जिन्दगी क्या है?
मौत की ओर बढ़ते हुए
किसी को कैसे सूझ सकते हैं नौकरी धंधे
हर बात में दलाली
हर बात से नोट उगाहने के फंदे
पर मुझे कुछ सूझता ही नहीं
नोटों की ताकत के सिवा
मैं दिन रात गर्क हूं गुलामी में
हर उस काम में
जो मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा
हर वो काम जिससे
जिस्म, मन और रूह कांपते हैं
हर वो काम-जिससे खीझ होती है
हर वो काम-जिसे करते हुए जी मिचलाता है
हर वो काम, जिसे बंद करके
एक उम्र बाद, आराम से मुझे
मौत का हँस के स्वागत करना है
मौत की ओर बढ़ते हुए
पता नहीं मैं इतना निश्चिंत क्यों हूं
क्यों मुझे लगता है कि
आदमी की एक हर देश में
एक औसत उम्र होती है
जबकि अखबार रोज कहते हैं
कि उन बहानों से भी मौत रोज आती है
जो हमने कभी भी ख्याल में नहीं लिये
और अचानक कभी भी...
‘‘अचानक’’ शब्द ‘मौत‘ का पर्याय ही है।
मौत की ओर बढ़ते हुए
मैं मौत से इतना बेखबर क्यों हूं
क्यों उलझा हुआ हूँ
फिल्मों में, हीरो-हीरोइनों की बातों में
चैपाटियों पर, पिज्जा बर्गर के स्वादों में
हर तरह की किताबों में
शेर ओ शायरी, कविता कहानियों में
समाज सेवा की नादानियों में
मौत की ओर बढ़ते हुए
किस डर से बचने के लिए
किस चीज को बचाने के लिए
मैं व्रतों उपवासों में फंसा हूं
तंत्रों मंत्रों को लिखते, जपते
खुद पर कई बार हँसा हूं
कि ऐसा पागलपन क्यों?
और हर सुबह मैं जपता हूं
वही मंत्र यंत्रवत।
मौत की ओर बढ़ते हुए,
मौत की बातें सोचने से,
क्या मौत नहीं आयेगी?
अचानक आये उस पल के पहले
जिसे मौत कहते हैं -
मैं बड़ा ही बेचैन हूं.... कुछ वो करने को
अहसास के जगत में
जिन्दगी भरा, जिन्दा-सा कुछ -
ताकि जिन्दगी हुई सो हुई,
मरना निरर्थक का ना हो।
जिन्दगी भरा, जिन्दा-सा कुछ -
ताकि जिन्दगी हुई सो हुई,
मरना निरर्थक का ना हो।
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बुधवार, 22 सितंबर 2010
जी करता है मिल जाए......
हो गया है निकट दृष्टि दोष
दूर का सब दिखता है स्पष्ट और आकर्षक
पास का सब हो गया है धुंधला विकर्षक
दूर का सब स्पष्ट, चित्ताकर्षक
और हष्ट पुष्ट दिखता है
जी करता है मिल जाए
हर दूर स्थित कल्पना का,
बस एक अनुभव एहसास।
दूर में ही दिखता है,
पाने योग्य समग्र खास।
दूर का हर चेहरा, बहुत सुन्दर है।
दूर की हर काया,
उत्तेजना का लहराता समन्दर है।
दूर का हर रिश्ता बड़ा गहरा है,
दूर का सर्वस्व सपनों में ठहरा है।
पास जो है सब बीत चुका है जैसे
जंग लगा, सब चूक चुका है जैसे
नजर कुछ नहीं आता
बस महसूस होता है बासापन,
जो किसी भी भूख को खा जाता है
ये बासापन
लगता है जैसे सारा भविष्य खा जायेगा।
फफूंद लगे नजारे
बासी कड़ी’याँ
जिन्दगी के सारे उबाल
ठंडे कर देती हैं।
करने को अभी कितना कुछ बाकी है -
फिल्मी हीरोइनें
फिल्मी माई बाप
फिल्मी बच्चे
फिल्मी कारें
फिल्मी रहन-सहन
फिल्मी बाजार
फिल्मी चालाकियाँ, चोरी-डकैती
फिल्मी कत्ल
फिल्मी सजाएं
फिल्मी मौत।
मन के सुरमई अंधकार भरे कोने में
सुविधाओं के गुनगुने ताप पर
लगता है गाँव में -
दादी की गोद की मक्खनी गंध,
मां के चेहरे से टपकता प्यार,
बाप का भविष्य को आकार देता गुस्सा,
मौसी का प्रेरक दुलार,
ताऊ के बच्चों संग कुश्ती,
सब समय नष्ट करना था।
सच और झूठ के छद्म सिद्धांत पढ़े बिना
सच और झूठ की परवाह किये बिना
जो हो रहा है वही सही है जैसे
मां बाप का वृद्धाश्रमों में रहना,
बहू बेटियों का उघड़े बदन बहना।
बच्चों का टीवी चैनलों में गर्क होना।
सब कुछ फलता फूलता नर्क होना।
इंटरनेट पर
हवस की मरीचिका में
हर क्षण लगता है
जैसे कोई अदृश्य रिश्ता
इन ऊब से पके दिनों से
कहीं दूर ले जायेगा
फिर
अचानक अनायास खुल गई
सूनामी, भूकंप, बाढ़ राहत कोश से संबंधित
किसी वेबसाईट को देखकर
मेरा एक खयाल -
कि (मेरे पास हों तो करोड़ों में से...
कुछ लाख तो मैं दूंगा
इन मानवीय कार्यों में।)
बिल गेट्स से ज्यादा।
ये खयाल
मेरे निकट दृष्टिदोष को बेबाक
और दूरदृष्टि को पुष्ट करता
और तैशदार बनाता है।
हालांकि सच और झूठ की
परवाह किये बगैर
एक सांवली बीवी
दो औसत बुद्धि बच्चे
एक अदद बूढ़े मां बाप
हजारों की कमाई से
कुछ सैकड़ा की अपेक्षा किये बिना
इन दुआओं के साथ
कि ”फिल्में देख-देख कर खराब हो चुकी नजर
हकीकत की रोशनी में आ सुलझ जाये
मेरे साथ ही रहते हैं।“
दूर का सब दिखता है स्पष्ट और आकर्षक
पास का सब हो गया है धुंधला विकर्षक
दूर का सब स्पष्ट, चित्ताकर्षक
और हष्ट पुष्ट दिखता है
जी करता है मिल जाए
हर दूर स्थित कल्पना का,
बस एक अनुभव एहसास।
दूर में ही दिखता है,
पाने योग्य समग्र खास।
दूर का हर चेहरा, बहुत सुन्दर है।
दूर की हर काया,
उत्तेजना का लहराता समन्दर है।
दूर का हर रिश्ता बड़ा गहरा है,
दूर का सर्वस्व सपनों में ठहरा है।
पास जो है सब बीत चुका है जैसे
जंग लगा, सब चूक चुका है जैसे
नजर कुछ नहीं आता
बस महसूस होता है बासापन,
जो किसी भी भूख को खा जाता है
ये बासापन
लगता है जैसे सारा भविष्य खा जायेगा।
फफूंद लगे नजारे
बासी कड़ी’याँ
जिन्दगी के सारे उबाल
ठंडे कर देती हैं।
करने को अभी कितना कुछ बाकी है -
फिल्मी हीरोइनें
फिल्मी माई बाप
फिल्मी बच्चे
फिल्मी कारें
फिल्मी रहन-सहन
फिल्मी बाजार
फिल्मी चालाकियाँ, चोरी-डकैती
फिल्मी कत्ल
फिल्मी सजाएं
फिल्मी मौत।
मन के सुरमई अंधकार भरे कोने में
सुविधाओं के गुनगुने ताप पर
लगता है गाँव में -
दादी की गोद की मक्खनी गंध,
मां के चेहरे से टपकता प्यार,
बाप का भविष्य को आकार देता गुस्सा,
मौसी का प्रेरक दुलार,
ताऊ के बच्चों संग कुश्ती,
सब समय नष्ट करना था।
सच और झूठ के छद्म सिद्धांत पढ़े बिना
सच और झूठ की परवाह किये बिना
जो हो रहा है वही सही है जैसे
मां बाप का वृद्धाश्रमों में रहना,
बहू बेटियों का उघड़े बदन बहना।
बच्चों का टीवी चैनलों में गर्क होना।
सब कुछ फलता फूलता नर्क होना।
इंटरनेट पर
हवस की मरीचिका में
हर क्षण लगता है
जैसे कोई अदृश्य रिश्ता
इन ऊब से पके दिनों से
कहीं दूर ले जायेगा
फिर
अचानक अनायास खुल गई
सूनामी, भूकंप, बाढ़ राहत कोश से संबंधित
किसी वेबसाईट को देखकर
मेरा एक खयाल -
कि (मेरे पास हों तो करोड़ों में से...
कुछ लाख तो मैं दूंगा
इन मानवीय कार्यों में।)
बिल गेट्स से ज्यादा।
ये खयाल
मेरे निकट दृष्टिदोष को बेबाक
और दूरदृष्टि को पुष्ट करता
और तैशदार बनाता है।
हालांकि सच और झूठ की
परवाह किये बगैर
एक सांवली बीवी
दो औसत बुद्धि बच्चे
एक अदद बूढ़े मां बाप
हजारों की कमाई से
कुछ सैकड़ा की अपेक्षा किये बिना
इन दुआओं के साथ
कि ”फिल्में देख-देख कर खराब हो चुकी नजर
हकीकत की रोशनी में आ सुलझ जाये
मेरे साथ ही रहते हैं।“
मुझे भी समझना चाहिये
जिन्दगी 3 घंटे से ....
कुछ ज्यादा होती है।
सोमवार, 13 सितंबर 2010
बड़ी अटपटी दुनियां
![]() |
| Image by : Kees Straver |
ख्यालों से छंटी दुनियां, कैसे-कैसे बंटी दुनिया
आशाओं-सपनों में उलझी, हकीकत से कटी दुनिया
रिवाजों में सहूलियत है, नयेपन से हटी दुनियां
इतिहास में भविष्य देखे, बड़ी अटपटी दुनियां
स्वाद कैसा होता है अम्मी-अब्बा से जाना
जुबां जब बूढ़ी हुई तो, लगी चटपटी दुनियां
सच-शांति की राहों से बोर हो हटी दुनियां
झूठ और फरेबों के संग्रामों में डटी दुनियां
जिन्दगी के मैदानों में दूर तलक भागी है
डरी-सहमी रहे फिर भी, मौत से सटी दुनियां
आशाओं-सपनों में उलझी, हकीकत से कटी दुनिया
रिवाजों में सहूलियत है, नयेपन से हटी दुनियां
इतिहास में भविष्य देखे, बड़ी अटपटी दुनियां
स्वाद कैसा होता है अम्मी-अब्बा से जाना
जुबां जब बूढ़ी हुई तो, लगी चटपटी दुनियां
सच-शांति की राहों से बोर हो हटी दुनियां
झूठ और फरेबों के संग्रामों में डटी दुनियां
जिन्दगी के मैदानों में दूर तलक भागी है
डरी-सहमी रहे फिर भी, मौत से सटी दुनियां
शनिवार, 14 अगस्त 2010
सुकून का घर
मैं सालों से सोचता हूं
पर मैं जाना ही नहीं चाहता
हालांकि मुझे मालूम है
सुकून का घर
सुकून के घर में
रहती है
मौज और आनंद की धुंधली किरणों के साथ
ऊर्जा के सूर्यों की गर्मी
और चांदनी का पागलपन।
भ्रम है कि सुकून के घर में
रहती है
बेकारी, असफलता, आलस्य
सभी सफल, मशहूर, अमीर
कटते हैं
ऐसी बोर और मनहूस कही जाने वाली जगहों से
सुकून के घर में निवास करने वाले पर
लोग लानते भेजते हैं
सुकून के घर के बारे में
लगभग रोज ही
तकरीरें- कविताएं
लिखी और पढ़ी जाती हैं
गली-गली चैराहे-चैराहे पर
इस तरह ही लोगों को लगता है
कि वो जानते हैं
‘‘सुकून’’ शब्द का अर्थ
वरना वो कैसे
लोगों को समझा लेते,
कविता लिख लेते
गीत गा लेते।
यूं तो बहुत से लोग
सुकून के घर की तलाश करते हैं
क्योंकि
सुकून के बारे में सोचना, तलाश करना
हर जमाने का फैशन रहा है।
पर सुकून के घर में रहना
दुनियां में हमेशा नासमझी रहा है।
लोग ऐसा भी कहते हैं कि
सुकून के घर में
उम्र भर की हम्माली है
रोटी कपड़े मकान के लिए
दर-दर की भटकन है
सुकून के घर में
साथ ही रहता है
सर्दी जुकाम बुखार जैसी छोटी सी बीमारियों से
मर जाने का खतरा भी।
पर फिर भी
सुकून के बारे में लिखे हुए मंत्र
हर सुबह या शाम को
दीपक की लौ और अगरबत्तियों के धुंए में
खूब जपे जाते हैं
गाई जाती हैं आरतियां
ताकि
सुकून की चाह की तकलीफ से
बचा जा सके।
पता नहीं क्या है हकीकत
या जानते समझते हुए....
या कि हम समझना ही नहीं चाहते
कि पढ़ना, सुनना,
कहना, या लिखना
या सुकून के घर में रहने जैसा दिखना
सुकून नहीं लाता।
सुकून से रहने के लिए
जरूरी है
कि हम सुकून के घर में रहें।
पर मैं जाना ही नहीं चाहता
हालांकि मुझे मालूम है
सुकून का घर
सुकून के घर में
रहती है
मौज और आनंद की धुंधली किरणों के साथ
ऊर्जा के सूर्यों की गर्मी
और चांदनी का पागलपन।
भ्रम है कि सुकून के घर में
रहती है
बेकारी, असफलता, आलस्य
सभी सफल, मशहूर, अमीर
कटते हैं
ऐसी बोर और मनहूस कही जाने वाली जगहों से
सुकून के घर में निवास करने वाले पर
लोग लानते भेजते हैं
सुकून के घर के बारे में
लगभग रोज ही
तकरीरें- कविताएं
लिखी और पढ़ी जाती हैं
गली-गली चैराहे-चैराहे पर
इस तरह ही लोगों को लगता है
कि वो जानते हैं
‘‘सुकून’’ शब्द का अर्थ
वरना वो कैसे
लोगों को समझा लेते,
कविता लिख लेते
गीत गा लेते।
यूं तो बहुत से लोग
सुकून के घर की तलाश करते हैं
क्योंकि
सुकून के बारे में सोचना, तलाश करना
हर जमाने का फैशन रहा है।
पर सुकून के घर में रहना
दुनियां में हमेशा नासमझी रहा है।
लोग ऐसा भी कहते हैं कि
सुकून के घर में
उम्र भर की हम्माली है
रोटी कपड़े मकान के लिए
दर-दर की भटकन है
सुकून के घर में
साथ ही रहता है
सर्दी जुकाम बुखार जैसी छोटी सी बीमारियों से
मर जाने का खतरा भी।
पर फिर भी
सुकून के बारे में लिखे हुए मंत्र
हर सुबह या शाम को
दीपक की लौ और अगरबत्तियों के धुंए में
खूब जपे जाते हैं
गाई जाती हैं आरतियां
ताकि
सुकून की चाह की तकलीफ से
बचा जा सके।
पता नहीं क्या है हकीकत
या जानते समझते हुए....
या कि हम समझना ही नहीं चाहते
कि पढ़ना, सुनना,
कहना, या लिखना
या सुकून के घर में रहने जैसा दिखना
सुकून नहीं लाता।
सुकून से रहने के लिए
जरूरी है
कि हम सुकून के घर में रहें।
सोमवार, 12 जुलाई 2010
तुम्हारे लिये ही......
मुझे तुम्हारा बहुत ही इंतजार था
मैंने तुम्हारे सपने देखे
मैं दुनियां की भीड़ में अकेला
तुम्हारे लिये तरसता रहा
ऐ मेरे दोस्त
मुझे रोजी-रोटी और बोटी से फुरसत ही नहीं मिली
कि उन लम्हों का आयोजन कर पाता
जिनसे मेरी जिन्दगी कहे जाने वाले लम्हे
कुछ और लम्बे हो जाते
बच अचानक
कभी पान की दुकान पर,
कभी पंचर बनाते हुए,
कभी चैराहे पर लालबत्ती के ट्रेफिक में ठहरे हुए
कभी बाजार में सब्जी खरीदते वक्त
या
बिजली का बिल जमा करते हुए
या
नेट पर कभी कभार!
तुम्हारे साथ
गंदे थियेटरों में देखी फिल्में
पार्कों में खाई मूंगफली
दोराहों पर पी काॅफी
और खड़कती बसों में किया गया सफर
सब बड़ा सुहाना था
उन दिनों भी
जब बारिश के दिनों में
पानी नहीं बरसता था।
या
सर्दियों में भी
हम गले में स्वेटर नहीं लटकाते थे
कि गर्मी लगती थी।
चिलचिलाती, उमस भरी
या अनचाही गर्मियों में भी
बस तुम्हारा साथ
बहुत ही सुहाना
फुहार सा
और गुनगुना लगता।
हर बार
बहुत अचानक तुम मिले हो
बस कुछ गिने चुने पलों के लिए।
मुझे अक्सर अफसोस रहा
उन व्यस्तताओं से
जो तुम्हारे साथ के बहानों को
खा जाती।
बस मैंने अपशकुन के डर से
तुमसे कभी भी
फिर से मिलने का वक्त नहीं तय किया
कि तुम्हारा अचानक मिलना
बड़ा ही सुकून देता
सांसों की वीरान बस्ती में।
कभी कभी बड़ा ही भाया मुझे
बदकिस्मत होना
क्योंकि ऐसी ही उलझन भरी उदासियों में
कभी नेट पर बैठे
या कभी ताल के किनारे पर
या सारे संसार से रूठकर
किसी अन्जान पार्क में
तुम अनचाहे ही आ गये हो।
कभी कभी तो लगा
कि मेरी उदासियों और
तुम्हारे आने में
शायद कोई सम्बंध हो
पर मैं खुद से भी छुपाता रहा
ऐसी किन्हीं भी उदासियों में
तुम्हारा इंतजार।
आज मैंने सोचा
कि कुछ पल हैं
तो तुम्हारे लिए
संदेश लिख छोड़ूं
कि तुम कभी कहीं खोलो
कोई मेल
तो उसमें दर्पण की तरह
तुम्हारी चाहतें भी
मेरी अनाम आशाओं के
दर्पण में नजर आयें।
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उन सभी लोगों के नाम
जो मुझे जिन्दगी में
कभी कहीं मिले थे और
जिनके साथ बिताये
कुछ लम्हों ने
मेरी मौत की तरफ बढ़ती उम्र से बचकर
एक उम्र को
जिन्दगी का नाम दिया।
शनिवार, 22 मई 2010
आवाज दूं समन्दर को
अर्थों के किनारों तक
नहीं पहुंचती बहुत सी लहरें।
आंखों की गलियों के
बादल, बारिश से ये रिश्ते थे
उन बूंदों के नाम नहीं थे
इन्हें आंसू कहा,
जो कभी झरते थे,
कभी रिस्ते थे।
क्या कहते हैं उस अन्तर को?
सीने में फैली बाढ़
बहुत सी दीवारें तोड़ती है
मोड़ती है मेरा बर्हिमुखीपन
अन्दर को।
मचल सा जाता हूं कि दोस्ती करूं
आवाज दूं समन्दर को।
शुक्रवार, 21 मई 2010
मौत से निपटने के कई रास्ते हैं।
रेलवे ट्रेक के किनारे
कुछ मजदूर
मशीनों से निकले बड़े बड़े पत्थरों को
छोटे चौकोर अलंगों में तराशते हैं
ये लोग मूर्तिकार जितने पारंगत नहीं होते
इन लोगों को केवल उन चोटों का पता होता है
जिनसे किसी बड़े पत्थर का
एक नियत आकार का हिस्सा
चैकोर हो जाता है।
जबकि मूर्तिकार जानता है
सारे अनुपात।
घुमावदार कोणों पर,
चोटों की हल्की और भारी मात्रा,
उथलेपन, उभारों और गहराई के मायने।
मैंने पढ़ा है निराला की
”तोड़ती पत्थर“
और देखा है
पत्थर तोड़ता हुआ, पत्थर।
सूरज की गर्मी, त्वचा से उठते धुंए के बावजूद
हाथों-भुजाओं में उतरी ऊर्जा।
या ये मेरा भ्रम है
ये सब इंतजाम है
रोटी का नहीं
उस वक्त से बदला लेने का
जिसने उसे पत्थर बनाया है
जिसने उसे चैकोर किया है।
कि कोई पानी नहीं
टूटते हुए बदन पर
अन्दर और बाहर तक
ठर्रे का अभिषेक ही
इतनी राहत पहुंचायेगा
कि
कल तक फिर जिन्दा रहा जा सके!
झूठ है
मूर्तियां
अगले पिछले
ऊपरी या निचले उभार
झूठ हैं छैनी के
हल्के या दबावदार स्पर्श
झूठ हैं
अपने ही भीतर तक पड़ती
उथली और गहरी चोटें।
अधिकतर तो केवल यही सही है
कि आदमी चार कोनों वाला अलंगा है!
उसे किसी मकान की नींव बनना है।
या बंगले की बाउंड्री वाल में पेंट होकर सजना है।
मैं सोचता हूं
उस तोड़ते हुए पत्थर को
क्यों देखता हूं मैं?
क्योंकि मैंने निराला की कविता पढ़ी थी,
और मैं
गहरे भाग की व्यथा ही नहीं
उभरे हुए तल की बेबसी को गढ़ना चाहता था
साफ साफ।
या
अभी बहुत कुछ सीखना है आदमी को
बड़े बड़े पत्थरों को
बिना तराशे ही उपयोग में लेना।
या
मुझे कविता नहीं
उस आदमी के साथ
शाम के बेसुध होने के इंतजाम में
शरीक होना चाहिए।
और उसे समझाना चाहिए
कि यदि वह
मूर्ति बनाने की झंझट में नहीं पड़ना चाहता
तो क्या हुआ,
बेसुध होने के अलावा भी
मौत से निपटने के
कई रास्ते हैं।
सोमवार, 10 मई 2010
झण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं,
इसलिए हमें सहेज लो, ममी, सही ।
जीवित का तिरस्कार, पुजें मक़बरे,
रीति यह तुम्हारी है, कौन क्या करे ।
ताजमहल, पितृपक्ष, श्राद्ध सिलसिले,
रस्म यह अभी नहीं, कभी थमी नहीं ।
शायद कल मानव की हों न सूरतें
शायद रह जाएँगी, हमी मूरतें ।
आदम के शकलों की यादगार हम,
इसलिए, हमें सहेज लो, डमी सही ।
पिरामिड, अजायबघर, शान हैं हमीं,
हमें देखभाल लो, नहीं ज़रा कमी ।
प्रतिनिधि हम गत-आगत दोनों के हैं,
पथरायी आँखों में है नमी कहीं ?
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राजेशा
पता नहीं क्यों लोग
किस लिए जिन्दा रहना चाहते हैं
हमेशा के लिए
पता नहीं लोग
किस उम्मीद में जिये जाते हैं
बरसों-बरस नौकरी, बीवी, बच्चे
ढेरों रिश्ते। ..........
जिनकी चुगलियां
अक्सर वो अपने
बहुत करीबी रिश्तों से करते हैं
जो नितान्त-जिस्मानी-रूहानी-करीबी रिश्ते
मौत के वक्त किसी काम नहीं आते।
पता नहीं लोग
क्या सोचकर अमर होना चाहते हैं
नौकरी करने के लिए?
बीवी बच्चे पालने के लिए?
ब्लागिन्ग करने के लिए?
और तो और
झोपड़पट्टियों की नालियों
और सफेद कालरों की सजी मैल में
पले रहे कीटाणु भी
हर सुबह दिये और अगरबत्तियां जलाते हैं
पता नहीं
किसी चीज का शुक्रिया अदा करने के लिए
या किस डर से
क्या और भी कुछ निकृष्टतम होता है
कीच में जिन्दा रहने से।
कितनी अफसोसजनक है ये बात कि
बेहद नाकुछ लोग
जो इस बात का जश्न मना सकते हैं,
अफसोस जाहिर करते हैं ...
कि हाय! वो ‘‘कुछ’’ नहीं है।
शनिवार, 8 मई 2010
शार्टकट कहीं नहीं ले जाता
सभी शार्टकट पर हैं
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
मैकाले सम्मत पढ़ाई करो
वैज्ञानिक, नेता, इंजीनियर, अभिनेता, विक्रेता बनो
बेच दो
आत्मा तक।
ये आत्मा ही तो सबसे बड़ी परेशानी है।
एक अजनबी बीवी ले आओ
अजनबी बच्चे पैदा करो
अजनबी रहो ताउम्र बहुत अपनों से
यहां तक कि अपने ही माँ बाप से
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
शादी कर लो
एक बुलाआगो
करोड़ जिम्मेदारियां पाओगे
सारे जन्मों के मक्सद भूल जाओगे।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
सुख ढूंढो देह में।
सुख मिले ना मिले
सारी ऊर्जा चुक जायेगी
जो शायद जिन्दगी का मक्सद ढूंढने में काम आती।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
60 साल तक अंधाधुंध नौकरी करो।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
सैकड़ों चैनल्स वाला एलसीडी टीवी देखो
पहाड़ों, झीलों, जाग्रत ज्वालामुखियों वाले देशों के टूर करो
खुद को सांबा नृत्यों के नशे में चूर करो।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
ब्लागिंग करो।
ना तुम्हारा कुछ बनना बिगड़ना है टिप्पणियों से,
ना टिप्पणीकार का।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
समाज सेवा करो।
दान पुण्य करो!
राहू केतु शनि के मन्दिरों में
तेल, उड़द, मूंग दाल चढ़ाओ।
जिसके स्वाद से अनभिज्ञ
इथियोपिया में कई रूहें
जिस्म से अलग हो रहती हैं।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
कोई हिन्दू, मुसलमान, ईसाई या सिक्ख ईश्वर पकड़ लो।
पकड़ लो करोड़ों में से कोई देवता।
पीर फकीर!
मरों में विश्वास ना कर पाओ तो
जिन्दा गुरू पकड़ लो।
जिसे अन्दर ही अन्दर अपने पर अटूट विश्वास हो
कि हजारों हैं मुझे मानने वाले
मुझमें कुछ तो होगा, मैं कहीं तो पहुंचूंगा।
मगर गुरू
जिन्दगी का मक्सद समझने के
इतने शार्टकट अपनाने के बाद भी
चैन ना पाया,
तो कहां जाओगे?
लौट कर
अपने तक ही आओगे।
तो क्यों ना
वैज्ञानिक, नेता, इंजीनियर, अभिनेता, विक्रेता बनो
बेच दो
आत्मा तक।
ये आत्मा ही तो सबसे बड़ी परेशानी है।
एक अजनबी बीवी ले आओ
अजनबी बच्चे पैदा करो
अजनबी रहो ताउम्र बहुत अपनों से
यहां तक कि अपने ही माँ बाप से
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
शादी कर लो
एक बुलाआगो
करोड़ जिम्मेदारियां पाओगे
सारे जन्मों के मक्सद भूल जाओगे।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
सुख ढूंढो देह में।
सुख मिले ना मिले
सारी ऊर्जा चुक जायेगी
जो शायद जिन्दगी का मक्सद ढूंढने में काम आती।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
60 साल तक अंधाधुंध नौकरी करो।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
सैकड़ों चैनल्स वाला एलसीडी टीवी देखो
पहाड़ों, झीलों, जाग्रत ज्वालामुखियों वाले देशों के टूर करो
खुद को सांबा नृत्यों के नशे में चूर करो।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
ब्लागिंग करो।
ना तुम्हारा कुछ बनना बिगड़ना है टिप्पणियों से,
ना टिप्पणीकार का।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
समाज सेवा करो।
दान पुण्य करो!
राहू केतु शनि के मन्दिरों में
तेल, उड़द, मूंग दाल चढ़ाओ।
जिसके स्वाद से अनभिज्ञ
इथियोपिया में कई रूहें
जिस्म से अलग हो रहती हैं।
जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
कोई हिन्दू, मुसलमान, ईसाई या सिक्ख ईश्वर पकड़ लो।
पकड़ लो करोड़ों में से कोई देवता।
पीर फकीर!
मरों में विश्वास ना कर पाओ तो
जिन्दा गुरू पकड़ लो।
जिसे अन्दर ही अन्दर अपने पर अटूट विश्वास हो
कि हजारों हैं मुझे मानने वाले
मुझमें कुछ तो होगा, मैं कहीं तो पहुंचूंगा।
मगर गुरू
जिन्दगी का मक्सद समझने के
इतने शार्टकट अपनाने के बाद भी
चैन ना पाया,
तो कहां जाओगे?
लौट कर
अपने तक ही आओगे।
तो क्यों ना
सबसे पहले अपने को ही समझ लो ।
शायद यही
जिन्दगी का मक्सद समझने का रास्ता भी हो
और मन्जिल भी।
नहीं?
शायद यही
जिन्दगी का मक्सद समझने का रास्ता भी हो
और मन्जिल भी।
नहीं?
मंगलवार, 27 अप्रैल 2010
पारदर्शिता
हर आयी हुई सांस
बस पल भर ठहर कर सीने में
फिर कुछ नया लेने
आकाश में जाती है!
हमारे मशीनी जिस्म का
हमेशा ताजा जिन्दा रहने का
यह अनूठा कुदरती तरीका है
फिर पता नहीं क्यों
मैं
हर शाम
धुंधली रोशनी में
गुजश्ता अहसासों के
जहरीले जंगलों में
क्या ढूंढता हूं
मैंने सांसों को रोका है
आकाश में बिखर जाने से पहले
और
आह की तरह जाहिर किया है
भावनाओं की छोड़िये
मैंने जिस्म की उत्तेजनाओं को भी
किताबों के कहने पर
जब तब कुचला है
उन किताबों के कहने पर
जो हर ऐरा गैरा नत्थू खैरा
अतीत से बदला
और वर्तमान पर चढ़ बैठने की खुन्नस में
कभी भी, कहीं भी लिख मारता है
और हद है नासमझी की
लोग
किताबों की टीकाओं पर भी
किताबें लिख मारते हैं।
मैं सपनों में भी रंगीन बादलों को
काला और सफेद बनाकर देखता हूं
पर रूई के फाहों का,
कोई गणित होता है क्या?
शर्म नहीं आती,
लोग आती-जाती गजलों को
अपनी गिनतियों में रखते हैं
कि मरने से पहले
किसी हवस को वाह-वाही का कोई पंखा झलता रहे।
जन्मो-जन्म बेहोशी का इंतजाम चलता रहे।
और उस गणित की परवाह ही नहीं -
कि बेहोशी में
पिछले 54 जन्म निकले हैं
और इस बार भी
उम्र छठवें दशक को पार करती है।
मेरा खुद से बस यही कहना है
कि
आती जाती सांस की तरह ही
हिसाब मत रखो
उन खूब-औ,-बदसूरत ख्यालों का
मत इकट्ठा करो
जहन के शीशे पर
कोई भी रंग
भले ही वो सफेद ही क्यों ना हो
क्योंकि
कोई भी रंग ढंक देता है
पारदर्शिता
और
पारदर्शिता में ही दिख सकता है
शीशे के इधर और
उधर का
हकीकत जहान।
बुधवार, 3 मार्च 2010
तुमसे बातचीत
मैंने तो खूब चाहा था
कि आज रात...
चांद से बोल-चाल बंद रखूं।
पर, तुमने आज भी चेहरा छिपा रखा था
बेजुबान शब्दों की खामोशी में।
मेरे जलते हुए सीने में
सूरज रोज डूबता है।
और हर रात मैं -
सुबह तक चांद से बातें करता हूं।
कि, कभी तो तुम्हारा चेहरा समझ आयेगा
और उसके कहे हुए,
अबोले शब्द भी।
सोमवार, 28 दिसंबर 2009
रोज की तरह
रोज की तरह
हम सुबह उठकर
घर से
बाहर मोहल्ले की ओर देखते हैं
कि आज के सूरज के नयेपन जैसा
कुछ हम में भी उगेगा।
पर हर ढलती शाम को
काम धंधे से लौटते हुए
हमने यही पाया है
कि सवेरा तो सवेरा
हमारी यह शाम भी
कल की शाम की तरह ही
हजारों साल बासी है।
यही बासापन
रोज
सुबह से शाम तक
हमें परेशान करता है।
इसलिए
हमारी कोई भी कविता
बासे शब्दों से
कभी भी
निवृत्त नहीं हो पाती।
हम दिल से नहीं चाहते
कि ये पीलेपन और फफूंद लिये शब्द
किसी को दिखायें।
पर मेरे ख्याल से
अब बचा ही क्या है, इनके सिवा।
सोमवार, 21 दिसंबर 2009
गर्मी बुझने ना पाये
दिल की जमीं पर बादल छाये,
उम्मीद का सूरज ठण्डा है,
सपनों पर कोहरा छाया है,
तदबीरों पर बर्फ गिरी है।
जमे-ठिठुरते इस मौसम में,
कंपकंपाती छांव से धूप खो गई है।
ओस के गहरे गीलेपन से,
शाम की सड़कें काली हुई हैं।
रात चली तो चाँद की खिड़की,
बिन आवाज ही बन्द हुई है।
चाँदनी पिघल रही बन शबनम।
शहर के सारे दीवानों को,
बेघर, आवारा इन्सानों को
जिस्म संभाल के रखने होंगे।
मौत के नक्श फिर चुभने लगे हैं,
बाजारों में बैठे कचरे के,
अब तो अलाव जलाने होंगे,
ढूंढ-ढूंढ कर लानी होंगी
भले बुरे के भेद से हटकर,
सूखी, जलने के माफिक चीजें
कि,
सीनों में गर्मी बुझने ना पाये।
उम्मीद का सूरज ठण्डा है,
सपनों पर कोहरा छाया है,
तदबीरों पर बर्फ गिरी है।
जमे-ठिठुरते इस मौसम में,
कंपकंपाती छांव से धूप खो गई है।
ओस के गहरे गीलेपन से,
शाम की सड़कें काली हुई हैं।
रात चली तो चाँद की खिड़की,
बिन आवाज ही बन्द हुई है।
चाँदनी पिघल रही बन शबनम।
शहर के सारे दीवानों को,
बेघर, आवारा इन्सानों को
जिस्म संभाल के रखने होंगे।
मौत के नक्श फिर चुभने लगे हैं,
बाजारों में बैठे कचरे के,
अब तो अलाव जलाने होंगे,
ढूंढ-ढूंढ कर लानी होंगी
भले बुरे के भेद से हटकर,
सूखी, जलने के माफिक चीजें
कि,
सीनों में गर्मी बुझने ना पाये।
शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009
क्या आपको ऐसा नहीं लगता ?
अक्सर एक सपना सा चलता है
कि चारों ओर श्मशान सा माहौल है
अजीब सा लगता है
मुर्दों के बीच रहना
चलना फिरना
उनसे बातें करना
उनकी निंदा उनकी प्रशंसा करना
फिर कभी कभी शक होता है
कि कहीं हम भी मुर्दे ...
और नींद टूट जाती है।
और जागने के बाद भी लगता है
कि ये ही हकीकत है ? या,
वो ही हकीकत थी ?
कि चारों ओर श्मशान सा माहौल है
अजीब सा लगता है
मुर्दों के बीच रहना
चलना फिरना
उनसे बातें करना
उनकी निंदा उनकी प्रशंसा करना
फिर कभी कभी शक होता है
कि कहीं हम भी मुर्दे ...
और नींद टूट जाती है।
और जागने के बाद भी लगता है
कि ये ही हकीकत है ? या,
वो ही हकीकत थी ?
शनिवार, 14 नवंबर 2009
सोमवार, 9 नवंबर 2009
आदमी की संभावना
कुत्ता, कुत्ते सा
अजगर, अजगर सा ही होता है
गिरगिट, गिरगिट सा
भेड़िया, भेड़िये सा ही होता है
गिद्ध गिद्ध सा
सूअर, सूअर सा ही होता
बैल, बैल सा
गधा, गधे सा ही होता है
सांप, सांप सा
केंचुआ केंचुए-सा ही होता है
फिर क्यों आदमी
कुत्ता, अजगर, गिरगिट
गिद्ध, सूअर, बैल
गधा, सांप, केंचुआ
सब कुछ हो जाता है?
क्यों नहीं रहता
आदमी, आदमी सा?
या,
आदमी वो संभावना है
जो सब कुछ हो सकता है?
आदमी से बदतर,
आदमी से बेहतर।
या,
आदमी का होना
बदतर और बेहतर
दो अतियों में झूलना है।
या,
आदमी, इस सारे प्रपंच से
होश की छलांग लगाकर
बाहर हो सकता है?
हमेशा के लिए।
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