Monday, 23 August 2010

देखेंगे मौत के बाद फरिश्ते, क्या तारे होकर ढूंढते हैं


रात चले उग आते हैं मेरी आंखों में तेरी यादों के चांद
फिर सहर तलक, सारे जुगनू, बंजारे होकर ढूंढते हैं

जिसने भी देखा जलवा तेरा, हुआ बलवा उसके खयालों में
फिर सारी उम्र तक एक सफर, बेचारे होकर ढूंढते हैं

अंजाम पे पहुंची कहानी है, ये दिल तेरे गम की निशानी है
देखेंगे मौत के बाद फरिश्ते, क्या तारे होकर ढूंढते हैं

इन आग के शोलों पर ना जा, कि रूसवाई से क्यों है रजा
इस काले धुंए में छिपा है क्या, अंगारे होकर ढूंढते हैं

Thursday, 19 August 2010

हाँ मुझे मोहब्बत है उनसे... पर...

ए मेरी उदासी, ए मेरी बदहवासी
ऐ मेरे दिल की कसक, ऐ मेरी रूह प्यासी
ना उभरो चेहरे पे बेताबियों के नक्शो
हाँ मुझे मोहब्बत है उनसे... पर मुझको बख्शो

ए मेरी आंखों में उतरे पानी,
ए बेजा बरसों गुजरी नादां जवानी
ए मेरे नजरों में बसे, बंजर नजारों
हाँ मुझे मोहब्बत है उनसे... पर मुझको बख्शो

ऐ बदनामियों की हवा, ऐ जुल्मों की घटा
ऐ लानतों की नमी, ऐ जमाने की सजा
ऐ मेरे सीने की घुटन, ख्यालों की टूटन
हाँ मुझे मोहब्बत है उनसे... पर मुझको बख्शो

ऐ मेरी तन्हाई, तेरा फर्द चेहरा
ऐ मेरे शैदाईपन तेरा ताब गहरा
ऐ मेरे ख्वाबों की कालिख, नींदों की दहशत
हाँ मुझे मोहब्बत है उनसे... पर मुझको बख्शो



ha mujhe mohabbat hai unse... par mujhko bak-sho
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ae meri udaasi, ae meri bad-hawasi
ae mere dil ki kasak ae meri rooh pyaasi
naa ubhro chehre pe be-taabi-yo ke nak-sho
ha mujhe mohabbat hai unse... par mujhko bak-sho

ae meri aankhon me utre paani
ae beja barson gujri naadan jawaani
ae meri najro me basae banjar najaaro
ha mujhe mohabbat hai unse... par mujhko bak-sho

ae badnami-yo ki hawa, ae julmo ki ghata
ae laanto'n ki nami ae jamaane ki saza
ae mere sinay ki ghutan, khayalo'n ki tootan
ha~ mujhe mohabbat hai unse... par mujhko bak-sho

ae meri tanhai, tera fard chehra
ae mere shedai~pan, tera taab gahra
ae mere khwabo ki kalikh, neendo ki dahshat
ha~ mujhe mohabbat hai unse... par mujhko bak-sho


Monday, 16 August 2010

वो शख्स बात-बात पे बिगड़ता हुआ दिखा


वो शख्स बात-बात पे बिगड़ता हुआ दिखा
ख्वाबों में भी नाराज हो चिढ़ता हुआ दिखा

मैं दिल की बात मानकर, परेशान ही रहा
नींदों में भी खुद से ही लड़ता हुआ दिखा

जब रिश्ते बोझ बन गये, तो वक्त को लगा
अपना ही साया, अपने से बिछड़ता हुआ दिखा

समझाया लाख दिल को, मगर मानता नहीं
हर छोटी-मोटी बात पर अड़ता हुआ दिखा

उनसे मिली नजर तो, हम बयान क्या करें
कुछ धारदार सीने में गढ़ता हुआ दिखा

Saturday, 14 August 2010

सुकून का घर


मैं सालों से सोचता हूं
पर मैं जाना ही नहीं चाहता
हालांकि मुझे मालूम है
सुकून का घर

सुकून के घर में
रहती है
मौज और आनंद की धुंधली किरणों के साथ
ऊर्जा के सूर्यों की गर्मी
और चांदनी का पागलपन।

भ्रम है कि सुकून के घर में
रहती है
बेकारी, असफलता, आलस्य
सभी सफल, मशहूर, अमीर
कटते हैं
ऐसी बोर और मनहूस कही जाने वाली जगहों से


सुकून के घर में निवास करने वाले पर
लोग लानते भेजते हैं

सुकून के घर के बारे में
लगभग रोज ही
तकरीरें- कविताएं
लिखी और पढ़ी जाती हैं
गली-गली चैराहे-चैराहे पर
इस तरह ही लोगों को लगता है
कि वो जानते हैं
‘‘सुकून’’ शब्द का अर्थ
वरना वो कैसे
लोगों को समझा लेते,
कविता लिख लेते
गीत गा लेते।

यूं तो बहुत से लोग
सुकून के घर की तलाश करते हैं
क्योंकि
सुकून के बारे में सोचना, तलाश करना
हर जमाने का फैशन रहा है।
पर सुकून के घर में रहना
दुनियां में हमेशा नासमझी रहा है।

लोग ऐसा भी कहते हैं कि
सुकून के घर में
उम्र भर की हम्माली है
रोटी कपड़े मकान के लिए
दर-दर की भटकन है

सुकून के घर में
साथ ही रहता है
सर्दी जुकाम बुखार जैसी छोटी सी बीमारियों से
मर जाने का खतरा भी।

पर फिर भी
सुकून के बारे में लिखे हुए मंत्र
हर सुबह या शाम को
दीपक की लौ और अगरबत्तियों के धुंए में
खूब जपे जाते हैं
गाई जाती हैं आरतियां
ताकि
सुकून की चाह की तकलीफ से
बचा जा सके।

पता नहीं क्या है हकीकत
या जानते समझते हुए....
या कि हम समझना ही नहीं चाहते
कि पढ़ना, सुनना,
कहना, या लिखना
या सुकून के घर में रहने जैसा दिखना
सुकून नहीं लाता।

सुकून से रहने के लिए
जरूरी है
कि हम सुकून के घर में रहें।

Saturday, 7 August 2010

वक्त जाने क्या दिखलाता है?


बर्बादी में कसर नहीं, फिर क्यों दिल घबराता है
बिखरे-बिखरे मन को, हर टूटा आईना डराता है

बैचेन हवा, है नींद उड़ी, फिर भी मुर्दों सा पड़े रहें
तन्हाई है, गहराई तक, सपना भी नहीं आता है

सालों तक, हम रहे तरसते, वो सूरत फिर दिखी नहीं
कब मिलता वो ढूंढे से, इक बार जो दिल से जाता है

तेरी बातें अपने तक, आंसू, आहें, चाहें सब
देखते हैं खामोश जुबां का अमल, क्या असर लाता है

अजनबी सा हर दिन मिलता है, गुजर जाता खामोशी से
हर वक्त यही लम्बी सोचें, वक्त जाने क्या दिखलाता है?

Tuesday, 3 August 2010

यदि

यदि लोग अपनी कमजोरियों के लिए, तुम्हें दोष दे रहे हों
और तुम तन कर खड़े रह सको
अगर सब तुम पर शक करें
और तुम खुद पर भरोसा कर,
उनके शक को ’निराधार’ होने का उपहार दो।

अगर तुम इंतजार कर सको
और इंतजार करते हुए थको नहीं
या, झूठ तुम्हें डुबो रहा हो, पर तुम झूठा व्यवहार ना करो
या, नफरत से, नफरत कर ना निपटो
और इस तरह बहुत अच्छे ना दिखो
या बहुत अच्छा कहने वाला ना दिखो

अगर तुम सपने देख सको और सपनों को खुद पर सवार ना होने दो
अगर तुम सोच सको और विचारों को अपना लक्ष्य ना बनने दो
अगर तुम विजयी दुदुंभियों और त्रासदियों की खामोशी से
एक सा निर्वेद व्यवहार करते हुए मिलो

अगर तुम अपने ही कहे सत्य को
मूर्खों द्वारा तोड़ मरोड़ कर पेश करने पर
सुनते हुए संभले रहो
अगर तुम जीवन को दिये तोहफों को टूट बिखरता देखो
तो उसे रोको और तत्क्षण पुनर्निमाण में रम जाओ

यदि तुम अपने सारी जीतों को
हमेशा नये दांव पर लगाने को तत्पर रहो
अगर हारो भी तो, बार बार शुभारंभ के कर गहो

सांस भर भी टिप्पणी ना करो पराजयों पर हानियों पर
अगर तुम अपने तन-मन को मिटने के अंतिम क्षण तक
दृढ़ मांसपेशियों से बलवान रखो
तब भी.... जब कि तुम्हारे पास कुछ भी ना हो
सिवा इन शब्दों के कि ‘‘जमे रहो।’’

यदि तुम भीड़ से बातें करते हुए अपने जीवन मूल्यों को बचाये रख सको
या, राजाओं के साथ चलते हुए एक आम आदमी का सामान्यपन ना खोओ
ना तो दुश्मन ही तुम्हें दुखी कर सके, ना मित्र ही तुम्हारा दिल दुखा सके
यदि सभी लोगों को अपने ही साथ गिन सको, पर किसी को भी विशेष ना जानो
यदि तुम अक्षम्य क्षणों में भी उद्विघ्न ना होओ
और अक्षम्य क्षणों से पार जाने के लिए
तुम्हें 60 सेकेंडस भी जरूरत से ज्यादा हों
तो तुम धरती माता की असली संतान हो
जिसमें सारी दुनियां समाई है
और यह उससे भी ज्यादा है..
कि तुम इंसान हो मेरे पुत्र।

रूडयार्ड किपलिंग की कविता ‘यदि’ का राजेशाकृत हिन्दी अनुवाद
 

Monday, 2 August 2010

सब जानते हैं क्या गलत क्या सही है।

कत्ल-चोरियां जिनकी जाहिर नहीं है,
चर्चों में उनकी शराफत रही है।

दया धर्म सेवा के पाखण्डों के पीछे
धन-दौलत-शोहरत की हसरत रही है।

दुनियां कहती - पैसा खुदा तो नहीं
कसम खुदा की, खुदा से कम भी नहीं है।

कानून दुनिया भर के, गरीबों के सर पे
अमीरों पर इलजामों से शोहरत बही है

इश्क रह गया कुत्ते बिल्लियों का मजहब
इंसानों में हवस की ही बरकत रही है।

हिंदू मुसलमान सिख ईसाई मिलते हैं
कहीं भी दिखती इंसानियत नहीं है।

सच की राहों पे चलना बड़ा मुश्किल,
यूं सब जानते हैं क्या गलत क्या सही है।