Monday, 26 September 2011

कब होंगे पूरे हम?



जन्म से अधूरे हम, लाख मांगी मनौतियां,
कब होंगे पूरे हम?

जिस मां से जन्म थे, वह भी तो सहमी थी
बीते कल में डूबी, आज से तो वहमी थी
सोचें क्या अब हट के, जड़ता के बूरे हम
जन्म से अधूरे हम, कब होंगे पूरे हम?

अपने ही हाथों से, भय को सजाया है,
पाया जो, उस पर भी, जोखिमों का साया है
आशंका की छत के, ऊपरी कंगूरे हम
जन्म से अधूरे हम, कब होंगे पूरे हम?

कोई, कैसी हो सांत्वना, रास नहीं आती है
मिटने की अभिलाषा, फि‍र-फि‍र सिर उठाती है
जन्मते ही खोया सब, विषफल के चूरे हम
जन्म से अधूरे हम, कब होंगे पूरे हम?

Wednesday, 21 September 2011

जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?



जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

जन्म के ही संग मिलीं हैं,
इच्छा की विषधर फुफकारें
उम्रों रही सिखाती जिन्दगी
आभावों को कैसे बिसारें
अपना किया ही सबने पाया
फिर लगता बेमजा क्यों है
जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

माई-बाप की अपनी उलझन
बचपन के रहे अपने बन्धन
जवानी ने बेईमानी दिखाई
उम्र गई, राग रहा ना रंजन
लगे अब, सब बेवजा क्यों है?
जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

जितनी भी सुविधायें पाईं
सत्पथ पर बाधायें पाईं,
चुनौतियों से जितना भागे,
उतनी ही मुंह-बाये आईं
दिल दिमाग का द्वंद्व क्षय है
फिर ये क्षय ही बदा क्यों है?

जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?


क्‍या करना है, क्‍या नहीं करना
लगा रहा उम्रों यही डरना
बीतें जन्‍म की बि‍सरी यादें
क्‍या कि‍या? कि‍ पड़ेगा भरना
सच और झूठ का एक तराजू
सदा सि‍र पर लदा क्‍यों है

जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

Monday, 19 September 2011

वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था

काग़ज की कश्ती, पानी का किनारा था
मन में मस्ती थी , दिल ये आवारा था
आ गये कहां से, ये समझदारी के बादल
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था

वो कंचों की खन-खन में दिन का गुजरना
यारों का झुण्डों में, मुहल्लों में टहलना
साईकिल पर मीलों तक, वो शाम की सैरें
उन सुबह और रातों का, मोहब्बत में बहलना
हैं यादें वो शीरीं, वो दिल की अमीरी
जेबों से फक्कड़ था, हिसाब में नाकारा था
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था


वो मीनू से यारी, वो सोहन से कुट्टी
वो मोहन से खुन्नस, वो गोलू की पिट्टी
था कौन सा काम? कि ना हो पहला नाम
पतंग उड़ानी हो या गढ़नी हो मिट्टी
अजब थी अदा, थे सबसे जुदा
कहते सब बदमाश, और सबसे न्यारा था
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था

फिर कहानियों से यारी,, फिर इश्क की बीमारी
दिन रातें खुमारी,, फिर सपनों की सवारी
नहीं जानते थे कि ऐसा, ना रहेगा हमेशा
बेफिक्री की सुबहें, रातें तारों वाली
लगता वहीं तक बस, जीवन सारा था
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था
- राजेशा


मूल पंक्तियाँ-
कागज की कश्ती थी पानी का किनारा था, खेलने की मस्ती थी दिल ये आवारा था
कहां आ गए इस समझदारी के बादल में, वो नादान बचपन ही कितना प्यारा था
- यश लखेरा, मण्डला, मप्र

Saturday, 17 September 2011

Tuesday, 13 September 2011

क्‍या जि‍न्‍दगी एक अधूरा शॉट है ?

फिल्मी कलाकार, अक्सर इतने मंजे हुए अभिनेता होते हैं, या इतने सौभाग्यशाली कि उन्हें स्वयं पता नहीं होता।  जिनका एक शॉट पहली बार में ही ओ.के. हो जाता है। या दूजी बार,- या तीजी बार, या दसवीं, या पचासवीं या सौंवी..बस दो-चार सौंवी बार... और अभिनेता की किस्मत देखिये कि यदि शॉट ओ.के. नहीं हो पा रहा, तो डुप्लीकेट तैयार होता है, शॉट ओ.के. करने के लिए।
पर आम आदमी. और मुझ जैसे लोग. क्लर्क, मोची, धोबी, भंगी, या किसी नौकरी पर जाने वाले नौकर कहाने वाले। जि‍न्‍दगी भर मजबूरन कि‍सी तयशुदा काम या धंधे पर जाने वाले लोग। किसी काम के साथ में "वाला" जोड़कर पुकारे जाने वाले. दूधवाला, प्रेसवाला, किरानेवाला, पानवाला, सब्जीवाला, या मजदूर सड़क खोदकर फिर से बनाने वाला .. 50-60-70 बरस, जब तक हाथ पैर हिलें उसे बस एक तयशुदा शॉट ओ.के. करवाने में सारी जिन्दगी निकल जाती है.। और बावजूद इसके कोई अदृश्य ईश्‍वर या डायरेक्टर कभी भी आकर नहीं कहता कि ठीक है, शॉट ओ.के. है, तुम्हें अब कोई जन्म नहीं लेना। 


मेरा हर जन्‍म, कोई पूरा सीन या कहानी नहीं होता। वह पूरा शॉट भी नहीं होता। मेरी सारी जि‍न्‍दगी अधूरा शॉट होती है, जिसे मैं अनवरत रोज रीटेक करता हूँ। टूटकर गि‍र जाने तक।

एवंई, Misc, जो कि‍ बहुत जरूरी होता है Very Important

Thursday, 8 September 2011

इसे चिराग क्यों कहते हो?

ये बुझा हुआ है। 
रौशनीना तो बाहर हैना ही अन्दर
औरइसे जलना भी नहीं आता।
इसे चिराग क्यों कहते हो?

Friday, 2 September 2011

मेरा आपसे रि‍श्‍ता


"मैं" कुछ पढ़ूं और
अगर, वो
बहुत ही विस्मयकारी,, रूचिकर और बेहतरीन हो
तो "मैं" सोचता हूँ, "मैं" तो कभी भी ऐसा उत्कृष्‍ट नहीं सोच पाऊंगा
और मुझे ग्लानि होती है
कि कितनी साधारण है मेरी सोच
कि क्या मुझे अपनी ‘सोच’ को, सोच कहना भी चाहिए?
ऐसी हीनभावना उठाने वाली किताब
"मैं" पटक देता हूं।

"मैं" कुछ पढ़ूं
और वो साधारण हो
तो "मैं" सोचता हूँ,
लो, इससे बेहतर तो "मैं" लिख सकता हूं!
"मैं" लिखता ही हूं।
"मैं"  इस तरह की चीजें क्यों पढ़ूं?
और "मैं" किताब पटक देता हूं।

फिर
"मैं" ने कुछ लिखा,
और किसी ने नहीं पढ़ा
तो भी "मैं"
अपनी किताब उठाता हूं
और पटक देता हूं।
इन लोगों की समझ में कुछ नहीं आयेगा।


फिर मैंने
दूसरों का लिखा पढ़ना,
खुद लिखना,
और अपना लिखा दूसरों को पढ़ाना
छोड़ दिया।

अब मुक्त हूं,
हर तरह  के
"मैं"  पन से।
 


Kavita, Ego, Read-Write, Poetry, Rajeysha पढ्ना-लि‍खना, कवि‍ता, अहं


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कैसे दुख से मुक्त हुआ जाये