Wednesday, 30 December 2009

नये साल के मतलब



नये साल के मतलब सबके लिये अलग-अलग हैं। वैसे ही जैसे हर त्यौहार का मतलब उसके मनाने वाले पर निर्भर करता है। एक हिन्दू के लिए ईद या क्रिसमस का क्या मतलब है? एक मुसलमान के लिए दीवाली का क्या मतलब है?
यदि आप हिन्दू हैं और किसी पोंगापंडित ज्योतिषी के घर पैदा हुए हैं तो आपका नया साल तो हिन्दू कैलेण्डर के हिसाब से शुरू होना है यानि इस 1 जनवरी वाले दिन का आपके लिए क्या मतलब?
रामू एक छोटा सा बच्चा है 5 साल का, खेलकूद उसे पसंद है। उसके घर में रहने वाले चाचा की नई-नई नौकरी लगी है और अखबार मैगजीन्स पढ़कर, दोस्तों से सुनकर, और टीवी चैनल्स इंटरनेट पर देखकर.. उसके चाचा पर नये साल का बुखार भी चढ़ा है। पर रामू को 30 तारीख को बुखार था वह ढंग से खेल नहीं पाया 31 को वो ठीक हो गया और दोस्तों के साथ गलियों में खेला, दरअसल 1 तारीख के लिए उसमें अभी कोई उत्तेजना नहीं है क्यों? समयबोध न होने के कारण। वह 1 तारीख को एक सामान्य दिन की तरह जिएगा हो सकता है वो पढ़े, खेले, सोये। न पिछले सालों को याद करेगा न पिछले महीने को न पिछले हफ्ते को... यहां तक कि वो पिछले दिन को भी याद नहीं करेगा।
ऐसा तथाकथित पढ़े लिखे सभ्य शहरी लोग के साथ नहीं होगा, दरअसल ये लोग भी पिछली जिन्दगी की तरह ही 1 तारीख को भी कुछ खास नहीं करने वाले, ये भी एक आम दिन की तरह ही जिएंगे पर नये साल के बारे में उन्हें बहुत गलतफहमियां हैं। मुझे मालूम है आप नये साल को क्या करने वाले हैं:
1 आप पिछले सालों को पलट कर देखेंगे और रूंआसे होंगे या खुश होंगे, जबकि ऐसा करने से या ना करने से आप जो हैं उसमें अंतर नहीं पड़ने वाला।
2. आप यह कहेंगे कि मैं 1 तारीख को सामान्य दिन की तरह ही मनाएंगे और कोई महत्व नहीं देंगे, इससे भी कुछ नहीं होगा क्योंकि ये वैसे ही एक सामान्य दिन है, आपके सामान्य तरह जीने से ये सामान्य नहीं हो रहा।
3. आप नये साल की रात यारों दोस्तों संग दारू डांस पार्टी में मनायेंगे ये सब भूल भाल कर कि पिछले साल भी आपने ऐसी पार्टी में दारू पीकर एक लड़की को छेड़ा था और आपके भयंकर जूते पड़े थे। उसके बाद घर जाकर उल्टियाँ की थीं और उनमें खून भी देखा था। इसके बाद कयामत तो तब हुई थी जब पता चला कि वो असल में लड़की थी ही नहीं।
4. नये साल पर कुछ नये संकल्प करेंगे, जबकि पिछले साल जो संकल्प लिखकर किये थे वो चौथे दिन ही टूट गये थे... तो ऐसा करने से फायदा। पिछले सालों में ऐसा कई बार हुआ है।
5. आप कुछ भला करेंगे, राम नाम का कीर्तन करवायेंगे या उसमें शामिल होंगे या अनाथाश्रम में बूढ़ों या बच्चों के बीच दिन बितायेंगे और फिर महीनों तक अपने इस कृत्य का चाहे अनचाहे, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चहुं ओर बखान करेंगे, यूं आपका अहं आपको बिना खबर किये छल जायेगा।
5. आप कहेंगे कि आखिर करें क्या? कुछ करने की जरूरत क्या है? आप इसे 3 फरवरी जैसे एक अनाम दिन की तरह मनाएं जिससे कोई भी पुण्यतिथि, जन्मतिथि, वर्षगांठ या कोई स्मृति जुड़ी नहीं होती एक ऐसे दिन की तरह जब सब कुछ नियमित अनियमित सा....आम सा हो खास होने की इच्छा किये बिना.... या अचानक ही खास हो गया हो।
नये साल में यांत्रिक शुभकामनाओं के साथ, निजी वैयक्तिक रूप से जिन्दा लोगों से मिलने के लिए समय निकालना और बिना कारण मिलना ज्यादा बेहतर हो सकता है। नये अंग्रेजी साल की हार्दिक शुभकामनाएं।

Tuesday, 29 December 2009

गुनगुनाने की कोशिश




सुबह ने सारे सपने खोये, रात ने साये उजालों के
आंसू का खारापन चुभता, यादों के उभरे छालों पे

आंखों पर धुंधलापन उतरा, धूल जमीं है जालों पे
लोग क्यों बेजा अटके से हैं, धूप चांदनी की मिसालों पे


पत्तों से छनकर उतरी जो, आंच नहीं वो सीलन है
यह जम कर जहरीली होगी, वक्त की कई सम्हालों पे

गुनगुनाने की कोशिश में, सांसों से कई कराहें उठीं
अक्सर कई निगाहें उठीं, शुष्क लबों के तालों पे


कई कुपोषण फैले थे, मेरे सीने में तपेदिक से
ऐतराज था उनको, गिनकर, मेरे खुश्क निवालों पे

मौत की खूंटी पर टंगी, चिथड़े-सी जिन्दगी लटकी थी
लहराती थी अंगड़ाई लेकर, मेरे जवाबों-सवालों पे

Monday, 28 December 2009

रोज की तरह



रोज की तरह
हम सुबह उठकर
घर से
बाहर मोहल्ले की ओर देखते हैं
कि आज के सूरज के नयेपन जैसा
कुछ हम में भी उगेगा।

पर हर ढलती शाम को
काम धंधे से लौटते हुए
हमने यही पाया है
कि सवेरा तो सवेरा
हमारी यह शाम भी
कल की शाम की तरह ही
हजारों साल बासी है।

यही बासापन
रोज
सुबह से शाम तक
हमें परेशान करता है।

इसलिए
हमारी कोई भी कविता
बासे शब्दों से
कभी भी
निवृत्त नहीं हो पाती।

हम दि‍ल से नहीं चाहते
कि‍ ये पीलेपन और फफूंद लि‍ये शब्‍द
कि‍सी को दि‍खायें।

पर मेरे ख्‍याल से
अब बचा ही क्‍या है, इनके सि‍वा।

बि‍ना कि‍सी बाहरी र्नि‍भरता के हम अपने आपको कैसे जाने समझें ?

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Monday, 21 December 2009

गर्मी बुझने ना पाये



दिल की जमीं पर बादल छाये,
उम्मीद का सूरज ठण्डा है,
सपनों पर कोहरा छाया है,
तदबीरों पर बर्फ गिरी है।

जमे-ठिठुरते इस मौसम में,
कंपकंपाती छांव से धूप खो गई है।

ओस के गहरे गीलेपन से,
शाम की सड़कें काली हुई हैं।

रात चली तो चाँद की खिड़की,
बिन आवाज ही बन्द हुई है।
चाँदनी पिघल रही बन शबनम।

शहर के सारे दीवानों को,
बेघर, आवारा इन्सानों को
जिस्म संभाल के रखने होंगे।

मौत के नक्श फिर चुभने लगे हैं,
बाजारों में बैठे कचरे के,
अब तो अलाव जलाने होंगे,

ढूंढ-ढूंढ कर लानी होंगी
भले बुरे के भेद से हटकर,
सूखी, जलने के माफिक चीजें
कि,
सीनों में गर्मी बुझने ना पाये।

Friday, 18 December 2009

बुरा क्‍यों देखन मैं चला



लाईने तो पुरानी भी ठीक थीं और इतनी ठीक थीं कि इन पर लोगों ने भरपूर किताबें लिखीं। कभी-कभी जिन चीजों का अर्थ जल्दी समझ में आ जाता है वो काम की नहीं रह जातीं। आदमी का भी यही हाल है जो आदमी समझ में आ जाये वो काम का नहीं - सीधा, झल्ला, पगला, गेला...अन्यान्य सम्बोधनों से टाल दिया जाता है। कौए-लोमड़ी सा तिकड़मी, घाघ, चालू, चलता पुर्जा, स्मार्ट, ऐसे शब्दों को अर्थ देने वाले व्यक्तित्व ही आदमी कहलाते हैं।
तो लाइने ये थीं -

बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोय।
जो दिल देखा आपना मुझसे बुरा न कोय।।

इन पंक्तियों का सीधा अर्थ जो भी हो, निकाला ये जाने लगा कि मैं बुरा देखने निकला तो मुझे कोई भी बुरा न मिला लेकिन अंदर झांका तो मुझमें ही सारी बुराईयां थीं।
ईसाइयों के चर्च़ में लोग कन्फेशन यानि स्वीकारीकरण करते हैं, यानि व्यवस्था ये कि यदि पाप किया है तो इस बात को स्वीकार कर लो। तद्-भांति एक व्यवस्था जैनों में भी है वो साल में एक बार क्षमा-दिवस मनाते हैं। मैंने एक विज्ञापन एजेंसी में अपनी सेवाएं दी, दुकान मालिक जैन थे वो क्षमा दिवस के दिन एक बड़ा- सा विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित करवाते थे, जिसमें ये लिखा होता था कि चाहे-अनचाहे हुई गलतियों/पापों के लिए वे क्षमा माँगते हैं। यह विज्ञापन साल दर साल हर साल छपता था। यानि ये निश्चित था कि जब जब उन्होंने विज्ञापन छपवाया, पक्के तौर पर पाप किया होगा। ये विज्ञापन अखबारों वाले इसलिए छापते थे क्योंकि वो जानते थे कि विज्ञापन एजेंसी के मालिक का ‘क्षमा माँगने का विज्ञापन’ न छापना कितना अक्षम्य हो सकता है, अन्य कमाऊ विज्ञापन नहीं मिलेंगे।
मुझे ये कन्फेशन और क्षमा माँगना एक पाप के भार से मुक्त होने और अन्य के लिए प्रशस्त होने का चरण बन जाता दिखा। पाप किया इससे निपटने की विधि स्वरूप क्षमा मांगी। इससे हुआ ये कि आपने पाप की कोंपले छांट दी। पूरा दरख्त और शाखाएं हरियाए हुए मजे से झूमते रहे।
कुछ लोग अपने बारे में ही कि वे इतने बुरे कि उन्होंने ये किया ....ये किया और वो किया ......जो नहीं किया वो भी गिना देंगे। लेकिन इस स्वीकारीकरण का फल ये नहीं निकलता कि वे उन दोषों से दूर हो जाते हैं जिनको वे स्वीकार कर रहे हैं। इस स्वीकारीकरण से वे उन्हीं दोषों से दूर होने ...उन दोषो से निवृत्त होने को एक प्रक्रिया बनाते हुए, टालते हुए लगते हैं।
मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद प्रत्येक भाषा में दिये शब्दों के नये अर्थ किये जाना, पालन करने वाले परमात्मा का परमगुण है। इस दोहे का अर्थ है कि बुराई देखने की वृत्ति एक भारी बुराई है न कि.. ये कि मैं सबसे बुरा हूं, मुझसे पंगा लेकर तो देखो... मुझसे बुरा कोई नहीं (धमकाने वाले अंदाज में)। एक सफल बलात्कारी के ये कहने का क्या अर्थ कि जिस लड़की से उससे कुकर्म किया, उससे शादी कर लेगा।
कुछ अन्य सकारात्मकता से देखने के हितैषी लोग कहते हैं ‘पॉजीटिव थिंकर बनो‘।



जे कृष्णमूर्ति कहते हैं कि ‘क्या’ और ‘क्यों’ को भलीभांति देख लेने पर, ‘कैसे’ की समस्या नहीं रहती। आप ने यह देखा कि ‘आपका बुरा देखना, एक बुराई है’ तो उसके बाद देखना चाहिए कि ऐसा क्यों है, मुझसे बुरा क्यों हो रहा है, मैं क्यों बुरा देख रहा हूं, बुराई क्यों है... इस तरह देखने पर सारा परिदृश्य साफ हो जाता है, साफ करना नहीं पड़ता। आपने देखा कि बुरा क्या है, क्यों है... एक समझ आती है और बुरा करने की वृत्ति और मूल कारण तुरंत विदा हो जाते हैं।

अगर आप पाप करने और उसके बाद पश्चाताप करने की कहानी में यकीन करते हैं तो आप निश्चित ही उलझन में हैं। क्योंकि असली पश्चाताप यह है कि वो अब वो पाप अपने आप ही... आपसे न हो। अगर आप इतनी सरलता से नहीं देख रहें हैं तो अवश्य ही आपका मन कोई न कोई कलाबाजी कर आपको ही उल्लू बना रहा है, आप अपने से ही छल कर रहे हैं।
''पुर्नप्रेषि‍त''

जो व्‍यक्‍ि‍त प्रेम में हो वो उसमें शत्रुभाव नहीं होता

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Wednesday, 16 December 2009

कोई आया ही नहीं मेरे पास, आहटों के सिवा



मैने किस-किस के लिए, क्या-कया तोहफे रखे थे
कोई आया ही नहीं मेरे पास, आहटों के सिवा।

गया जमाना कि इन्सान को भी पढ़ा जाता था
अब तो बस लोग, सब पढ़ते हैं, लिखावटों के सिवा।

याद कुछ रहता नहीं, अपनी ही खबर किसको?
पुराने लोग थे कुछ और, बनावटों के सिवा।

मैं उससे बात तो करूंगा, पर क्या वो समझेगा?
मेरा खजाना है कुछ और, दिखावटों के सिवा।

पुल, नाव, तिनकों, दुआओं को सहारा बनाया
उसने ही पाया कुछ अलग, रूकावटों के सिवा।

बहुत थीं खूबियाँ, तो भी क्‍यों नाकाम रहा?
सब कुछ आता था उसे, सजावटों के सिवा।

हैरान थे अपनी किस्मत से



खुशी का आंसू, गम का आंसू, कैसे मैं पहचान करूं?
दोनों ही बहुत चमकते हैं, दोनों ही तो खारे हैं

बेबस मैं उम्रों-उम्रों तक, उस दिलबर का अरमान करूं
ख्वाबों में रहें या हकीकत में, मेरे जीने के सहारे हैं

मिले इक बार ही जीवन में, है उनका बहुत अहसान यही
उनकी यादों के भंवर में डूबे, हम तो लगे किनारे हैं

हमने था जिसे खुदा जाना, उसने ही समझा बेगाना
हैरान थे अपनी किस्मत से, कि हम कितने बेचारे हैं

नफरत करें या करें उल्फत, दोनों का अंजाम यही
उनके लिए हम ‘अजनबी’ हैं, वो सदा ही हमको प्यारे हैं

( पुर्नप्रेषि‍त)

Sunday, 13 December 2009

जिन्दगी बहुत खास थी हर घड़ी



राह की दुश्वारियों से बचकर, लोग रोज मंजिले बदलते रहे।
जिन्दगी बहुत खास थी हर घड़ी, लोग आम होकर जीते रहे मरते रहे।

पर्वतों के शिखर पर कितने सूरज, रोज उगते रहे और ढलते रहे।
यहाँ शहर की स्याह सड़कों पर, लोग छिलकों पे ही फिसलते रहे।

क्या बुरा कर दिया इंसान ही था, उधार की सांसों का मेहमान ही था,
लोग बेवजह नजरों से गिराते रहे, खुद ही फिर उम्र भर संभलते रहे।

उम्मीदें सांसों संग ही जीती रहीं, दिल में अरमान भी मचलते रहे,
मेरी नजरें तो धुंधली हो चली थीं, ख्वाब आंखों में फिर भी पलते रहे।

अजब नशा था मौत का होना, इस घड़ी पाना, उस घड़ी खोना,
फिर क्यों लोग निशानियां बचाते रहे? हो कर मायूस हाथ मलते रहे।

Saturday, 12 December 2009

क्‍या आपने कामधंधे, कैरि‍यर और जीवन को इस नजरि‍ये से देखा है ???



दो सौ साल पहले व्यापारी अपने संस्थानों यानि कंपनियों की औसत उम्र पीढ़ियों में गिना करते थे। आज एक संस्थान की औसत उम्र 30 वर्ष मानी जाती है, और भविष्य के अनुमान कहते हैं कि अगले 20 सालों में यह उम्र घटकर 5 वर्ष रह जायेगी। यह आंकड़े हम में से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन पर गहरा असर डालते हैं क्योंकि एक आम आदमी की नौकरी धंधे की उम्र औसतन 50 साल होती है।

आधुनिक व्यावसायिक इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति पर यह दबाव है कि वो इस हकीकत के प्रभाव जाने कि हम अपने ही व्यापार यानि अपने आपको ही बेचने खरीदने में लगे हुए हैं। हालांकि अपने को ही खरीदने बेचने के व्यवसाय में सीधे-सीधे न लगे होकर.... हम अपना समय बेचते हैं, इस समय की कीमत हमारी उत्पादकता - यानि हमारी कुशलता या ज्ञान की गुणवत्ता द्वारा निर्धारित होती है। हम अपने ज्ञान को कितने प्रभावकारी ढंग से क्रियान्वित कर पा रहे हैं यही तथ्य हमारी काम धंधे की आयु में हमारे बाजार मूल्य को ऊंचाईयों की ओर ले जा सकता है।

आपके ज्ञान के उत्पाद की गुणवत्ता अकेले आप के निष्पादन में पर्याप्त नहीं क्योंकि आप के संभावित ग्राहकों में वे कम्पनियां हैं जो अपनी प्रकृति से ही लोगों की टीमों द्वारा बनी हैं। ऐसे लोगों की टीमों से जिनके पास विविध प्रकार का ज्ञान और कौशल होता है। इसलिए आपके उत्पादता के मूल्य की असली माप सीधे सीधे इस बात से जुड़ी है कि आप उस समय कितनी सक्षमता, प्रभावपूर्ण तरीके से योगदान कर सीधे परिणाम दे रहे हैं या एक अर्थवान सहभागिता उस टीम में करते हैं जिसके अंतर्गत आप संचालित किये जा रहे हैं।
अक्सर उस उम्र से जब हम अपने आप से यह कहना शुरू करते हैं कि ”अब कुछ करना चाहिये " हम उस परिवेश में चले जाते है, जहाँ हम अपना आकलन करना शुरू कर देते हैं कि अब ”हम यह करने के लायक हो गये हैं“ और इसके बाद हमें यह भी दिखना शुरू हो जाता है कि हमारी प्रगति के लिए वह क्या प्रभावी योगदान हैं जो हम इन टीमों में कर सकते हैं। इन वास्तविकताओं का मतलब यह भी है कि एक वैयक्तिक व्यवसायिक योजना के तहत हम अपनी जिम्मेवारी, अपनी ही जागरूकतापूर्वक देखभाल, समय के साथ समायोजन और समय-समय पर अपना मूल्यांकन कर इनमें बदलाव की भूमिका निभायें। कोई भी कंपनी आपके कैरियर की योजना नहीं बनाती, आपको अपने लिए जो जरूरी है वो खुद ही योजनाबद्ध कर क्रियान्वित करना होगा।

यही वह जगह है जहां असली चुनौती है, क्योंकि हमें अपना जीवन योजनाबद्ध करने, अपनी व्यावसायिक योजना बनाते समय यह साफ होना चाहिए कि हम कौन है - हमें अपने बारे में समझपूर्ण होना होगा। हम सब चाहते हैं कि हम खुश रहें, स्वस्थ रहें, हम प्यार करें, लेकिन हमारा मन बहुत ही अशांत रहता हैं और इन सब के बीच हमारा शरीर इतना क्लांत रहता है कि हम अपने अस्तित्व के उस भाग पर ध्यान देने में सफल ही नहीं हो पाते जो कि हमारे जीवन की सारी बातों की नींव है और हमें हमारे उद्देश्यों के निर्धारण और जीवन को दिशा देने में सहायक होता है, वह है - हमारी आत्मा।

अपने आपको जानने समझना का पहला चरण है कि ”हम कौन है?“ इसके तीन आयामों को समझें। यह हैं - पहला आपका शरीर, दूसरा मन, तीसरा आत्मा।
- आपका शरीर अणुओं का संग्रह है जो आपको संसार का अनुभव कराने में सक्षम है। आपके शरीर में वो संवेदनशील अंग शामिल हैं जो आपको वातावरण से सम्बन्धित करते हैं (सुनना, महसूस करना, देखना, चखना और सूंघना आदि) और संचालन तंत्र (आपका बोलना, हाथ और पैर इत्यादि) आपको कार्य करने में सक्षम बनाता हैं। हर दिन आपके संवेदन अनुभव आपके तंत्रिका तंत्र में कई प्रकार के रासायनिक एवं वैद्युतीय परिवर्तन करते हैं जो आपके शरीर के हर अणु और प्रत्येक अवयव के गुण और संरचना को बदलते हैं। इस प्रकार आपके अनुभव आपको जैविक रूप से प्रभावित करते हैं।
- आपका मन विचारों का क्षेत्र है जो सदा इस वार्तालाप में संलग्न रहता है कि क्या हुआ, क्या हो रहा है और आपके साथ आगे क्या होगा? आपके सतत प्रत्येक अनुभव से ही भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से रंगे आपके मत, विचार, मान्यताएं, मूल्यांकन और निर्णय आकार लेते हैं। आपके विचार, स्मृतियां, इच्छायें और अहसास मन की ही विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।
- आपकी आत्मा, आपके शरीर और मन की तटस्थ प्रत्यक्षदृष्टा है। आप यह देखें कि 10 वर्ष पूर्व आपका रूप रंग आकार कैसा था और अब कितना बदल चुका है। इस प्रकार आपका शरीर बदलता रहता है। अपने और संसारे के बारे में आपके विश्वास भी पहले के समय से ही नहीं रहते। पर इन सबको आपकी आत्मा सतत देखती रहती है, आपकी पहचान को निरंतरता देते हुए, एक धुरी देते हुए ताकि आप संतुलित रह सकें।
जब आप आत्मा का अवलोकन करते हैं, विचारों से मन बनता है और भौतिक शरीर तद्नुरूप समायोजित होता है, आप अपने इरादों को पसंद में जाहिर करते हैं जिनसे परिणामस्वरूप आपकी इच्छाएं बनती हैं। यह आपकी आत्मा का ही निर्णय होता है जो परिवर्तन के द्वार में आपको इस प्रकार प्रशस्त करता है, आप इससे गुजरते हुए समय में दुबारा वापस लौटने का इरादा नहीं रखते। यही संकल्प या प्रतिबद्धता कहलाता है, जिसमें अपनी जिम्मेदारी हम खुद लेते हैं।

अपने जिन्दगी और कैरियर की जिम्मेदारी लेते समय भी आपको इसी प्रकार की प्रतिबद्धता और संकल्प की आवश्यकता होती है। प्रतिबद्धता में आपका कर्म क्रियान्वित होता है जिसे एक निरंतरता में करना होता है। इन्हीं नियमित कर्मों से आपकी अच्छी और बुरी आदतें बनती हैं जिनके द्वारा आप आपने जीवन को एक (ऑटोमेटिक मोड) ‘‘अपने आप चलने वाले निकाय’’ में डाल देते हैं।
यहाँ आपको तीन मार्गदर्शक सिद्धांत अपनाने होंगे:
1. आप जो सोचते हैं, वही हो जाते हैं।
अपनी आत्मा की गहराई में आपको संदेह रहता है कि आपने अभी भी अपनी पूर्ण सामथ्र्य को नहीं पहचाना है। आप अभी भी और अधिक के योग्य हैं। आपको अपने प्रति ईमानदार रहते हुए अपने मन को इस संदेह के विश्लेषण में लगाना होगा क्योंकि यह चेतन मन ही जो आपको प्रशस्त करता है और सामथ्र्यवान बनाता है कि आप अब एक बेहतर अध्याय रच सकें, उस सब से अप्रभावित रहते हुए जो कि आज की तारीख तक हुआ। अब आपकी प्राथमिक आवश्यकता यह होती है कि आप की जाने वाली चीजों को एक अलग नजरिये से देखें ताकि आप नये नतीजों को पहचान कर उन्हें प्राप्त कर सकें।
2. अपने अतीत से मुक्त हो जायें!
हम सभी के पास मुश्किलें और समस्याएं होती हैं। हम समस्याओं से निपटने की कोशिश में, उनकी जड़ तक जाने के लिए सालों का समय और अमूल्य ऊर्जा लगाते हैं। इस प्रकार समस्या को हल करने के लिए भी, समस्या को प्रमुखता देना अत्यंत सफल रणनीति नहीं है। यह स्पष्ट रूप से समझना संभव है कि हम क्यों नाखुश हैं, लेकिन इसके बाद भी हम खुश क्यों नहीं होते? यह संभव है कि आप जान जायें कि आपने अतीत में गलत चुनाव और निर्णय किये, लेकिन ये ज्ञान आपको वर्तमान को बेहतर बनाने में सक्षम नहीं बनाता। सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि हम अतीत को देखें, जाने दें और बदलने के लिए प्रतिबद्ध हों। हमें अपनी जिन्दगी बदलने के लिए, खुद को बदलना होगा।
3. असीखा होना या बने बनाये सांचों और ढाँचों से निकलना।
आपको यांत्रिक जीवन से बाहर निकलना होगा। हम में से बहुत से लोग अपनी जिन्दगी उस सीखे-सिखाये जानवर जैसे जीते हैं जिसे यह पता होता है कि किन परिस्थितियों, हालातों या लोगों से मिलने पर, किस तरह की प्रतिक्रिया देनी है। क्योंकि उन्हीं चीजों और बातों को दोहराने में सुरक्षितता होती है, लोग उन रिश्तों में भी बने रहते हैं जो उनके लिए भले नहीं होते, उन कामधंधों में भी लगे रहते हैं जिनमें उनकी आत्माभिव्यक्ति की कम ही गुंजाइश होती है और उस दिनचर्या को भी निरन्तर बनाये रखने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं जिनसे वो अपने आस-पास ही हमेशा मंडरा रहे अवसरों के प्रति सुन्न और असंवेदनशील हैं। आप यह सुनना पसंद करें या ना करें पर यह सच है कि आप आदतों के गुलाम हो गये हैं या रोबोट से हो गये हैं। आप वो खेत हैं जिनको बागड़ ही निगल गयी है। यदि आप को जीवन में वो चाहिए जो आपको नहीं मिल रहा है तो आपको इन आदतों को पहचानना, इनसे मुक्त होना और इनको पार करना होगा। क्योंकि आप आदतों को बनाने वाले हैं, ना कि आदतों के द्वारा बने हैं। आपको जानना ही होगा कि आप वास्तव में क्या हैं?
यह आपका कर्म है जो जिन्दगी में वहां ले जाता है जहां आप जाना चाहते हैं न कि आपकी या किसी अन्य की पुष्टि। सफल लोग कभी भी अपने आपको निरन्तर यह नहीं कहते रहते कि ‘‘मैं एक शक्तिशाली व्यक्ति  हूँ’’ बल्कि वो यह अपने कर्मों से सिद्ध करते रहते हैं कि वो उससे अधिक के योग्य हैं, जो वो अभी हैं।
चुनौती अभी और यहीं है। आपके पास चुनने के लिए अन्य कोई मार्ग नहीं है सिवा इसके कि आप अपने जिन्दगी और कैरियर की बागडोर अपने हाथ में ले लें क्योंकि अन्य कोई व्यक्ति आपके लिए ऐसा नहीं करने वाला है। अन्य लोग भी आपकी ही भांति भ्रमित हैं। यह निर्धारित करें कि कौन सा ज्ञान है जो आपको प्राप्त करना है, यह जाने कि कैसे और कहाँ से ये ज्ञान मिलेगा, वहां जायें और इसे प्राप्त करें और प्रयोग में लायें। अपने आपको अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में सर्वोत्तम उत्पाद बनायें।
इन बातों के लिए प्रतिबद्ध हों:
1. आपको कौन सा, किस चीज का ज्ञान चाहिए
2. इस नये ज्ञान को पाने के मार्ग निर्धारित करें।
3. इस नये ज्ञान को व्यावहारिकता में उतारते समय अपने प्रति ईमानदार रहें। याद रखें आपके अन्दर से आये गलत फैसले, आपको असफल बनाने में बाहरी तथ्यों से 6 गुना ज्यादा बड़ा कारण बनते हैं।
व्यवसाय में सफलता, जीवन में सफलता प्राप्त करने की तरह ही है और दोनों में बुनियादी बातें समान हैं कि अपने कब, कहाँ, क्या किया? क्या यह विचारणीय नहीं है?

Friday, 11 December 2009

"बेटि‍यों पर" एक मर्मस्पर्शी पंजाबी गीत हिन्दी में



हिन्दी में:

लोगो ये कहर मत बरपाओ,
बेटियाँ कोख में ही मत मिटाओ

ये सदा ही माँ बाप के घर की खैर माँगती हैं,
बेटे तो जायदाद-जमीनें, बेटियाँ दुखों को बँटाती हैं

मशीनों से टुकड़े-टुकड़े कर के फेंक देना
कली को खिलने से पहले ही मसल देना
ये कैसा दस्तूर है ऐ लोगो
कुछ तो समझो कुछ तो सोचो
कभी बेचारी गौएं कभी चिड़िया कहाती हैं
बेटे तो जायदाद-जमीनें, बेटियाँ दुखों को बँटाती हैं

बिन बिटियों के खानदान कैसे आगे बढ़ाओगे
कौन जनेगा बेटे, रिश्ते कैसे जुटाओगे
इनका तो गुरूओं-पीरों ने गुणगान गाया है
इन्होंने दुनियाँ में हमारा मान बढ़ाया है
तो भी अभी तक ये पैर की जूती कहाती हैं
बेटे तो जायदाद-जमीनें, बेटियाँ दुखों को बँटाती हैं




पंजाबी गीत सुनने के नीचे पंजाबी शब्‍द पर क्‍ि‍लक करें। 
"मूल पंजाबी गीत" 


पंजाबी बोल:

लोको ना ए कहर गुजारो.......
धीयां कुख दे विच ना मारो.........

सदा सदा मां प्यां दे घर दी खैर मनाओं’दि’आं ने
पुत वंडोन जमीनां, धीयां दुख वंडो’दि’यां ने

नाल मशीनां टुक्कड़े टुक्कड़े कर के सुट देना
किसी कली नूं खिड़ने तो, पहलां ही पुट देना
ऐ कैसा दस्तूर वे लोको, कुछ ते समझे कुछ तो सोचो
कदें विचारियां गौआं, कदी चिड़ियाँ अखवोंदियां ने

बिन धीयां दे खान दान किवें अग्यां तोरां गे
कौन जम्मेगा पुत ते किथे रिश्ते जोड़ांगे
इह नूं गुरू पीरां वडयाया, दुनियां दे विच मान वदाया
तावीं पैर दी जुत्ती जै ही क्यों रखवोंदिया हैं

Saturday, 5 December 2009

पलकों पे अश्कों के चिराग सजा




पलकों पे अश्कों के चिराग सजा, अंधेरे कमरों में बैठते हैं
कभी देखा नहीं तेरा चेहरा, कोई रोशनी भली नहीं लगती


उम्र के पाखी उड़ते हैं, हम बेबस बैठे देखते हैं
उम्मीद का लटका है सेहरा, क्यों दुल्हन छली-छली लगती


कुछ भी तो समझ नहीं आता, क्यों लोग बेवजह ऐंठते हैं
मेरा रूप तो वैसा ही इकहरा, क्यों जवानी टली नहीं लगती


क्या ऐसी सजा भी मिलती है, कि सब जख्मों को सेकते हैं
जब तक समझें हम ककहरा, ये जिन्दगी चली-चली लगती


अब तक जो देखे भरम ही थे, ऐसे क्यों सच मुंह फेरते हैं?
रस्सी पे बल ठहरा-ठहरा, क्यों अकड़न जली नहीं लगती।

सारे मंजर गुजर गये, मौसम भी कौन ठहरते हैं
बाकी रहा मीलों सहरां, कोई तेरी गली नहीं लगती 


* ककहरा - ए बी सी डी

इस नवगजल का ऑडि‍यो लि‍न्‍क इस पंक्‍ि‍त को क्‍ि‍लक करें


Friday, 4 December 2009

क्‍या आपको ऐसा नहीं लगता ?




अक्‍सर एक सपना सा चलता है
कि‍ चारों ओर श्‍मशान सा माहौल है

अजीब सा लगता है
मुर्दों के बीच रहना
चलना फि‍रना
उनसे बातें करना
उनकी निंदा उनकी प्रशंसा करना

फि‍र कभी कभी शक होता है
कि‍ कहीं हम भी मुर्दे ...

और नींद टूट जाती है।


और जागने के बाद भी लगता है
कि‍ ये ही हकीकत है ? या,
वो ही हकीकत थी ?

Wednesday, 2 December 2009

कहाँ नहीं मिलती मोहब्बत ?




मिलेगा जो चाहेगा खुदा, सब्र रख
दुआएं अमल में ला, सब्र रख


किसे मिला है ज्यादा उसके रसूख से?
खुदा पे यकीन ला, सब्र रख


सिकन्दर भी गए हैं, पैगम्बर भी गए हैं
वक्त की शै से धोखा न खा, सब्र रख


छोटी-छोटी बातों के क्या शिकवे गिले
खुदा बन, जो चाहता है खुदा, सब्र रख


नाकामियों उदासियों के सागर कितने गहरे?
तरकीब-ए-सुराख आजमा, सब्र रख


कहाँ नहीं मिलती मोहब्बत “अजनबी”
कुर्बानियाँ बढ़ा, दीवानगी बढ़ा, सब्र रख