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बुधवार, 7 दिसंबर 2011

शादी करनी चाहिए या नहीं?


शादीशुदा और बाल-बच्चों वालों से विवाहयोग्य-अयोग्य लोग पूछा करते हैं, भैया जी! शादी के बारे में आपका क्या ख्याल है? शादी करनी चाहिए या नहीं? ये पूछताछ उन सर्वोत्कृष्ट औपचारिकताओं में होती है जो आदमी अपनी जिन्दगी में कर सकता है। क्योंकि ये प्रश्न अक्सर वो लोग करते हैं - जिनके मन में शादी के लड्डू फूट रहे होते हैं... जो इन भावनाओं के मजे ले रहे होते हैं और कहीं ना कहीं, नये रिश्ते का इंतजार भी कर रहे होते हैं... यानि ये प्राणी निश्चित ही शादी की तारीख तय कर चुके होते हैं। जिनको शादी से कोई मतलब नहीं, वो किसी तरह के प्रश्न क्यों करेगा ?

दरअसल शादीशुदा से यह प्रश्न करने का अर्थ ही समझ नहीं आता। क्योंकि यदि वह कहे कि ”नहीं करनी चाहिये“ तो यह उसका अनुभव है, और कहे कि ”करनी चाहिए“ तो यह भी उसका निजी अनुभव है.... आपके बारे में भविष्यवाणी कैसे की जा सकती है। आप किसी संबंध को शारीरिक, मानसिक रूप से कैसे निभाते है.. नहीं निभाते हैं यह आप पर निर्भर है ना कि किसी शादीशुदा पर। निजी जीवित संबंधों का सामान्यीकरण कैसे किया जा सकता है?

लेकिन इसके उत्तर के बारे में सोचते हुए याद आया कि - कहीं पढ़ा था ...
आप जिससे प्यार करते हो उससे शादी मत करो .... शादी उससे करो जो आपसे प्यार करता है।
ये वाक्य सरलता से समझ नहीं आता, पर जिन्दगी के सच ऐसे ही होते हैं।

साथ ही किस उम्र में शादी करनी चाहिए, इसके लिए... ये पंक्तियां भी।
कुरकुरा टोस (तोस) खाना हो
तो तोस ही खाओ
ब्रेड को महीनों ना सुखाओ

बहुत ही नर्म ब्रेड खानी हो तो
ताजा ब्रेड ही खाओ
तोस को नमी में ना डुबाओ

वैसे आजकल असल जिन्दगी में वो युवक-युवतियां निश्चित ही प्रेरक हैं जो शादी को नौकरी-धंधे के बाद प्राथमिकता दे रहे/रही हैं या शादी को किसी तरह की प्राथमिकता ही नहीं दे रहे। जीवन के चरण और लक्ष्य कुछ और रख रहे हैं।

बुधवार, 16 नवंबर 2011

बड़बड़ाना छोड़ दो

बड़बड़ाना छोड़ दो, क्या पता, तुम्हें भी पता ना चले कि तुमने क्या कह दिया है...और दुनियां वाले क्या-क्या समझ लें। बड़बड़ाना छोड़ दो, सबको खबर हो जायेगी - कि तुम सोचते कैसे हो? किन वजहों से, किन बातों का समर्थन करते हो, किन वजहों से... किन बातों के सख्त खिलाफ हो।

बड़बड़ाना छोड़ दो, सबको पता चल जायेंगे...तुम्हारे भय। बड़बड़ाना छोड़ दो, तुमने सुना नहीं- जिसे, दूसरों से छिपाना चाहते हैं, उसे, खुद से भी नहीं कहते।
बड़बड़ाना, अनजाने ही नंगे होने के तरह है। तुम्हें बड़बड़ाने से बचना चाहिये, क्योंकि तुम तो दीवारों और दरवाजों से बंद बाथरूम में भी कपड़े पहनकर नहाते हो।

बड़बड़ाना छोड़ दो- सबको पता चल जायेगी... तुम्हारे पागलपन की मात्रा।
बड़बड़ाना छोड़ दो, किसी भी रिश्ते से... सीधे-सीधे सपाट शब्दों में कहो। इससे दिल के दौरों से बचा जा सकता है।
बड़बड़ाना छोड़ दो - जो होना है, होगा ही... चाहे तुम बड़बड़ाओ या, चुप रह जाओ।

तुम परिणाम नहीं बदल सकते। ना शामिल होने से बचे रह सकते हो, इसलिए भी...बड़बड़ाना छोड़ दो। सीधे सपाट कहना भी छोड़ दो, अपने हाथों होनी को देखो। क्योंकि तुम ही जिम्मेदार हो अगर तुमने सच को छोड़ा, और किसी तरह तुम्हारी सांसें चलती रहीं और तुम उस तरह बचे रह गये, जिसे तुम जिन्दगी कहते हो।

बुधवार, 9 नवंबर 2011

आखिरकार

कल एक अवसर था श्मशान जाने का। पर एक नहीं 4-5 चिताएं एक साथ सजाई जाती हुई, जलती और राख होती देखीं। अगर मौत दुर्घटना नहीं है और इतनी अचानक ना आये तो हमें तैयारी करनी चाहिए। सांसे छूटने से कुछ साल पहले से अन्न त्यागना चाहिए, कुछ महीने पहले शाक आदि पेय, और आखिर जल पर निर्भर रहना चाहिए। इससे देह में रासायनिक क्रियाएं कम होंगी। देह हल्की रहेगी और चार कंधे देने वालों को सुविधा होगी। जगह और लकड़ी भी कम लगेगी। जीते जी भले ही आप एक सुन्दरतम हीरो या हीरोइन हों, मृत देह को छून से सब हिचकते हैं। इसलिए देह पर प्राकृतिक सुगंध जैसे चन्दन आदि का लेप भी लगाना चाहिए। अपने मित्रों की टेलीफोन, मेल लिस्ट भी किसी विश्वस्त व्यक्ति को देनी चाहिए कि टाईम पर लोगों को सूचित कर दे। श्मशान जाकर खुद ही अरेंजमेंट कर देने से घर वालों को सुविधा होगी।

कभी-कभी हमें जो महसूस हुआ वह लिखा नहीं जाया जाता। ये एक झूठी कोशिश है -

जिन्दगी है क्या देखो
जलती हुई चिता देखो

कैसे आती है मौत की खबर
क्या होता है दिल पे असर
क्यों झूठा जिन्दगी का समर
क्या खोया क्या मिला देखो
जलती हुई चिता देखो।

पल में सब छूटता है कैसे
सारा भरम टूटता है कैसे
मैं, मेरा, मुझे लूटता है कैसे
क्या रहा, क्या मिटा देखो
जलती हुई चिता देखो।

कैसे लकडि़यां सजाते हैं,
कैसे देह लेटाते हैं,
कैसे आग लगाते हैं,
आखिरी सफर है क्या, देखो
जलती हुई चिता देखो।

आग देह से लिपटे कैसे
उठती हैं लपटें कैसे
राख कर देने सब झपटे कैसे
सबकी नजर है क्या देखो
जलती हुई चिता देखो।


सोमवार, 10 मई 2010






 



 उमाकांत मालवीय

झण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं,
इसलिए हमें सहेज लो, ममी, सही ।

जीवित का तिरस्कार, पुजें मक़बरे,
रीति यह तुम्हारी है, कौन क्या करे ।
ताजमहल, पितृपक्ष, श्राद्ध सिलसिले,
रस्म यह अभी नहीं, कभी थमी नहीं ।

शायद कल मानव की हों न सूरतें
शायद रह जाएँगी, हमी मूरतें ।
आदम के शकलों की यादगार हम,
इसलिए, हमें सहेज लो, डमी सही ।

पिरामिड, अजायबघर, शान हैं हमीं,
हमें देखभाल लो, नहीं ज़रा कमी ।
प्रतिनिधि हम गत-आगत दोनों के हैं,
पथरायी आँखों में है नमी कहीं ?




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राजेशा 

पता नहीं क्यों लोग
किस लिए जिन्दा रहना चाहते हैं
हमेशा के लिए

पता नहीं लोग
किस उम्मीद में जिये जाते हैं
बरसों-बरस नौकरी, बीवी, बच्चे
ढेरों रिश्ते। ..........

जिनकी चुगलियां
अक्सर वो अपने
बहुत करीबी रिश्तों से करते हैं
जो नितान्त-जिस्मानी-रूहानी-करीबी रिश्ते
मौत के वक्त किसी काम नहीं आते।

पता नहीं लोग
क्या सोचकर अमर होना चाहते हैं
नौकरी करने के लिए?
बीवी बच्चे पालने के लिए?
ब्‍लागि‍न्‍ग करने के लिए?

और तो और
झोपड़पट्टियों की नालियों
और सफेद कालरों की सजी मैल में
पले रहे कीटाणु भी
हर सुबह दिये और अगरबत्तियां जलाते हैं
पता नहीं
किसी चीज का शुक्रिया अदा करने के लिए
या किस डर से
क्या और भी कुछ निकृष्टतम होता है
कीच में जिन्दा रहने से।

कितनी अफसोसजनक है ये बात कि
बेहद नाकुछ लोग
जो इस बात का जश्न मना सकते हैं,
अफसोस जाहिर करते हैं ...
कि हाय! वो ‘‘कुछ’’ नहीं है।

शनिवार, 8 मई 2010

शार्टकट कहीं नहीं ले जाता


सभी शार्टकट पर हैं


जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो 
मैकाले सम्मत पढ़ाई करो
वैज्ञानि‍क, नेता, इंजीनियर, अभिनेता, विक्रेता बनो
बेच दो
आत्मा तक।
ये आत्मा ही तो सबसे बड़ी परेशानी है।




एक अजनबी बीवी ले आओ
अजनबी बच्चे पैदा करो
    अजनबी रहो ताउम्र बहुत अपनों से
    यहां तक कि अपने ही माँ बाप से


जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
शादी कर लो
एक बुलाआगो
करोड़ जिम्मेदारियां पाओगे
सारे जन्मों के मक्सद भूल जाओगे।


जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
सुख ढूंढो देह में।
सुख मिले ना मिले
सारी ऊर्जा चुक जायेगी
जो शायद जिन्दगी का मक्सद ढूंढने में काम आती।


जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
60 साल तक अंधाधुंध नौकरी करो।


जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
सैकड़ों चैनल्स वाला एलसीडी टीवी देखो
पहाड़ों, झीलों, जाग्रत ज्वालामुखियों वाले देशों के टूर करो
खुद को सांबा नृत्यों के नशे में चूर करो।


जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
ब्लागिंग करो।
ना तुम्हारा कुछ बनना बिगड़ना है टिप्पणियों से,
ना टिप्पणीकार का।




जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
समाज सेवा करो।
दान पुण्य करो!
राहू केतु शनि के मन्दिरों में
तेल, उड़द, मूंग दाल चढ़ाओ।
जिसके स्वाद से अनभिज्ञ
इथियोपिया में कई रूहें
जिस्म से अलग हो रहती हैं।




जिन्दगी का मक्सद समझ ना आये तो
कोई हिन्दू, मुसलमान, ईसाई या सिक्ख ईश्वर पकड़ लो।
पकड़ लो करोड़ों में से कोई देवता।
पीर फकीर!


मरों में विश्वास ना कर पाओ तो
जिन्दा गुरू पकड़ लो।
जिसे अन्दर ही अन्दर अपने पर अटूट विश्वास हो
कि हजारों हैं मुझे मानने वाले
मुझमें कुछ तो होगा, मैं कहीं तो पहुंचूंगा।




मगर गुरू
जिन्दगी का मक्सद समझने के
इतने शार्टकट अपनाने के बाद भी
चैन ना पाया,
तो कहां जाओगे?
लौट कर
अपने तक ही आओगे।


तो क्‍यों ना 
सबसे पहले अपने को ही समझ लो ।
शायद यही
जिन्दगी का मक्सद समझने का रास्ता भी हो
और मन्जिल भी।


नहीं?

मंगलवार, 23 फ़रवरी 2010

मेरी आरजू...कमीनी। मेरे ख्‍वाब भी....कमीने....।


एक छोटा सा तथ्य आदमी के चरित्र का सारा बखिया उधेड़ देता है। आज तक के मानवीय इतिहास में हमने देखा है कि कोई भी देश अपने सर्वश्रेष्ठ महानगरों में आधुनिकता और कृत्रिम सभ्यता ही नहीं, उस काल्पनिक नर्क को भी यथार्थ में पालता है जो कि कई धर्मों में सविस्तार वर्णित हैं।

“भारत के आई.टी.सिरमौर शहर बैंगलोर में यदि आप अगली बार किसी मधुशाला में जायें तो संभव है कोई साकी सलीकेदार सलवार कुर्ते जैसा परिधान पहने जाम पेश करे।” खबर छोटी सी है पर विचार की कसौटी पर रखने पर मानव के व्यक्तित्व संबंधी कई सवाल पैदा करती है।

व्यावहारिक और व्यवस्थासम्पन्न बात तो ये है कि आपको शराबखाने में हट्टे-कट्टे-मुस्टंडों द्वारा शराब परोसी जाये, ताकि आपका चरित्र जब पीकर अपना जौहर दिखाने को हो तो उसे सक्षम प्रत्युत्तर देने का सामान तैयार रहे। लेकिन आप ऐसे मदिरालय के ग्राहक नहीं बनेंगे।

तो थोड़ा और आगे बढ़कर मधुशालामालिक आपको एक महिला के हाथों शराब पेश करना शुरू करता है। आदमी उस बार में जाना शुरू करते हैं, क्योंकि उसे ‘शराब और शबाब’ के संयोजन का साकार रूप उपलब्ध होता है।

होशपूर्वक देह की उत्तेजनाओं में गर्क होने में सभी स्त्री-पुरूष सक्षम नहीं होते। शराबी पैसे का मुंह नहीं देखता। शराबखाना संचालक भी आदमी के बेहोश होकर दैहिक उत्तेजनाओं के आनन्द लेने को थोड़ा और सम्बल प्रदान करता है। वो आदमी के लिए सभी उम्र, देहाकार वाली स्त्रियां ‘‘साकी’’ के पद पर नियुक्त करता है।

अब आदमी को अपने चर्मचक्षुओं और कल्पनाओं के धुआंे के छल्लों को कुछ और रंगीन करने का साक्षात जीवन्त सामान मिल जाता है। पीने के बाद बातें और आगे बढ़ती हैं। पर कौन कम्बख्त इन बातों को रोकना चाहता है- न शराबी, न मधुशालास्वामी, न झीने वस्त्रों में आवृत्त साकी।

ये संसार है और कुछ लोग ये मान के चलते हैं कि कुछ नर्क गढ़ना संसारी व्यक्ति के मौलिक अधिकारों में से एक है। लेकिन होश आने पर जब पिछली रात के नारकीय दृश्य रह रह कर नजर आते हैं तो वो उसे सलीकों का जामा पहनाना शुरू करता है। ”साकी के लिए सलवार कुर्ते और अन्य सलीकेदार सु-श्लील परिधान“ - क्या इसी तरह का पाखण्ड नहीं? हो सकता है आने वाले वर्षों में वेश्याओं के लिए कुछ तरह के टीकाकरण अभियान अनिवार्य कर दिये जायें ताकि पुरूषों को एड्स या अन्य संक्रामक बीमारियों से बचाया जा सके।

लेकिन अपनी हवस के निवारणार्थ ईसामसीह, बुद्ध, नानक, कबीर द्वारा बताये उपायों को लागू करने के लिए एक आम आदमी को व्यक्तिगत रूप से ही आगे आना होगा। ये काम सामाजिक संस्थाओं या सरकारों पर टालना उन्हें अमल में ना लाने के बहाने के सिवा कुछ भी नहीं।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2010

1411 वो खूबसूरत, आकर्षक, चुम्‍बकीय, रोमांचक अहसास का चेहरा खो ना जाये, आओ इसे बचायें...


बाघ बचाओ, मि‍साल बनाओ।
हमारा राष्ट्रीय वन्य जीव जिन्दगी और मौत के संघर्ष में झूल रहा है। एक मोटे अनुमान अनुसार 19वीं सदी में बाघों की आबादी 40,000 थी जो 20वीं सदी और अब तक घटते-घटते 1411 पर पहुंच गई है। इस हिसाब से बुरे आदमी की हवस और भले इंसानों की नजरअंदाजी कितनी तेजी से अमल में आयी है; इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।
याद रखिये 5 अरब मानवों को अपने जीवन की एकरसता और ऊब से बचाने के लिए ही नहीं, प्राकृतिक चक्र की संतुलित गति के लिए भी विविध जैव प्रजातियों का संरक्षण अपरिहार्य है। यह वैज्ञानिक रूप से भी पृथ्वीवासियों के लिए आवश्यक है।
यदि अब हमने कुछ ना किया या, इस बात को नजरअंदाज किया तो हमारे राष्ट्रीय चिन्हों के रूप में अन्य जीव ढूंढने होंगे। तो क्यों ना उसी जीव का संरक्षण करें, जिसकी मिसालें इंसान के व्यक्तित्व का हिस्सा हैं।

मेरे विचार से बाघ और सिंह के संरक्षण में हम इस प्रकार से योगदान कर सकते हैं:
  • यदि आपके क्षेत्र के आसपास कहीं बाघ पाया जाता हो तो उनके जीवन के बारे में जाने, नियमित रूप से उनकी प्रगति, विकास का ध्यान रखें।
  • यदि आपके आसपास के वन्य उद्यान/चिड़ियाघर/जू में बाघ हो तो यथासंभव नियमित अन्तराल से उसकी जानकारी लें। अपने मित्रों, परिजनों, बच्चों को बाघ के बारे में विस्तृत रूप से बतायें।
  • यदि आपको बाघ को हानि पहुंचाने वाली किसी भी मानवीय गतिविधि का पता चले तो कानून की मदद करें और बाघ को बचायें।
  • बाघ और ऐसे ही अन्य विलुप्तप्राय जीवों की जिन्दगी बचाने के अन्य उपाय भी सोचें, यथासंभव प्रचार प्रसार करें और जितना बन पड़े अमल में लायें।

बाघों-शेरों के बारे में मेरा अपना अनुभव यह रहा है कि भोपाल तालाब के किनारे स्थित ‘‘वनविहार‘‘ में मैंने अपने जीवन भर में दो चार बार इनके दर्शन किये हैं। यहीं पर मैंने एक दो बार हष्ट-पुष्ट बाघ देखे। एक बार माँ बाघि‍न भी देखी । एक बार दो बढ़ते हुए शावक देखे। सफेद बाघ को देखने का दुर्लभ नजारा भी हुआ। वैसे वनविहार का प्रबंधन ऐसा है कि जीवों को घूमने फिरने विचरने की सुविधा रहती है, इसलिए आपको इनके दर्शन के लिए अपनी किस्मत का सहारा लेना पड़ता है। वैसे इनको भोजन पानी देने के समय और वनविहार कर्मियों से विस्तृत जानकारी लेकर इन दुर्लभ जीवों के दर्शन संभव हैं।
बीच - बीच में भोपाल के अखबारों में बाघ, सिंह और अन्य प्राणियों के वनविहार में आने-जाने की खबरें पढ़ते-सुनते हैं। पर वर्ष 2009 में कई दुखद खबरें ही ज्यादा सुनने को मिलीं।
जैसे बाबा रामदेव ने आयुर्वेदि‍क औषधि‍यों में हड्डि‍यों के प्रयोग की बात कही वैसे ही चीनी दवाओं में जीवों के अंगों का इस्‍तेमाल होता है। बाघ की हडिड्यों का पावडर मनुष्‍य के शरीर में कामोत्‍तेजनवर्धक होने के कारण भी बाघों का बहुतायत में शि‍कार कि‍या गया।
कौन जि‍म्‍मेदार नहीं है- वो अमीर, जि‍नके शो केसों में बाघ की खाल लटकी या तख्‍तों पर बि‍छी होती है, वो साधु सन्‍यासी जो बाघ की खालों को योग-ध्‍यान हेतु आसन बनाते हैं, वो गरीब जो जगह की तलाश में बाघ के ठि‍कानों के आसपास झोपड़ि‍यां बना लेते हैं और वो हम शहरी लोग - जो सलाखों के पीछे जू में इसकी मजबूरी का तमाशा देखते हैं।

मैंने वर्ष 2009 में दिल्ली यात्रा के दौरान राष्ट्रीय प्राणी उद्यान ‘‘जू’’ में में बाघों और सिंह को दयनीय हालत में देखा। ऐसा लगा खुजली खाये कुत्तों से गई बीती हालत में हैं। यही हालत कई प्रकार के दुर्लभ जीवों की थी। कोई भी संस्थान या सरकारें भ्रष्टाचार, मंहगाई और आम आदमी के जीवन को और मुश्किल बनाने में ही सहायक होती हैं। अतः कुछ करना है तो प्रत्येक व्यक्ति यथासार्मथ्य अपने व्यक्तिगत स्तर पर जो भी छोटा या क्षुद्र सा भी बन पड़े वो करें, क्योंकि यही अत्यंत महत्वपूर्ण है।

”रात बितायी सोय के दिवस बितायो खाय, हीरा जनम अमोल था, कौड़ी बदले जाये।“ संतों की उक्तियों में वर्णित, अपने दो कौड़ी के जीवन को ईश्वरीय सौगातों से भरें। विविध जैव प्रजातियों को बचाइये, अपना जीवन समृद्ध कीजिये, पुण्य लाभ लीजिये।