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बुधवार, 11 सितंबर 2013

जिंदगी को यूं ही व्यर्थ गुजारना


सबसे ज्यादा दु:ख निरन्तर मानवता में हो रहे ह्रास को वहाँ देखकर होता है... जहाँ लोग उन नौकरियों से जकड़े बैठे हैं जो उन्हें पसंद नहीं हैं लेकिन क्योंकि उनमें भय है कि कहीं इनसे भी घटिया नौकरी ना करनी पड़े. लोग दिमाग से खाली हो गये हैं. वो कांपते हुए जिस्म भर हैं जिनमें डरा हुआ और आज्ञाकारी मन है. उनकी आंखों से रंगत चली गई है. उनकी आवाज भरभराई हुई है और भद्दी है.. यही हाल उनके शरीर, उनके बालों, उनके हाथों के नाखूनों, उनके जूतों और यही हाल उनके सारे किये गये कामों का भी है.

तो मेरी किस्मत थी कि अंतत: मैं इन जगहों से बाहर निकल गया, इस सब में कितना समय लगा... ये बात बेमायनी है.. यह सब जान मुझे एक तरह का आनंद महसूस होता है, किसी चमत्कार को देखने जैसा आनंद. अब मैं एक पुराने मन और पुरानी देह से लिख रहा हूं.. उस पुराने समय के बहुत परे से..जबकि आज भी कई आदमी उसी पुराने ढर्रे.. उन्हीं सब चीजों पर ही निरन्तर चलने की सोचते हैं.. जब जबकि मैंने बहुत देरी से शुरू किया.. मेरी खुद की इच्छा है कि अब में इसी राह पर चलूं..अब जबकि शब्द लड़खड़ाने लगे हैं.. मुझे सीढ़ियां चढ़ने के लिए रेलिंग की मदद लेनी पड़ती है.. अब मैं एक पेपरक्लिप की मदद से चिढ़िया नहीं बना पाता, मैं अभी भी महसूस करता हूं कि मुझमें कुछ यादें अभी भी बाकी हैं.. ये मुद्दा नहीं कि में अब मैं उस सबसे कितनी दूर आ गया हूं... मैं अपनी हत्या होने से बच पाया हूं.. कई ​उलटफेर गड़बड़ियों और कड़ी मेहनतों से गुजरा हूं और उस रास्ते पर आ पाया हूं कि एक भली मौत गले लगा सकूं.

जिंदगी को यूं ही व्यर्थ गुजारना भी मूल्यवान है, यदि यह सब स्वयं मेरे लिए ही हो.. मैं अपने लिए ही करूं...

Author Charles Bukowski in a letter to a friend about finally “breaking free” of his job and being able to write :
And what hurts is the steadily diminishing humanity of those fighting to hold jobs they don’t want but fear the alternative worse. People simply empty out. They are bodies with fearful and obedient minds. The color leaves the eye. The voice becomes ugly. And the body. The hair. The fingernails. The shoes. Everything does.

So, the luck I finally had in getting out of those places, no matter how long it took, has given me a kind of joy, the jolly joy of the miracle. I now write from an old mind and an old body, long beyond the time when most men would ever think of continuing such a thing, but since I started so late I owe it to myself to continue, and when the words begin to falter and I must be helped up stairways and I can no longer tell a bluebird from a paperclip, I still feel that something in me is going to remember (no matter how far I’m gone) how I’ve come through the murder and the mess and the moil, to at least a generous way to die.

To not to have entirely wasted one’s life seems to be a worthy accomplishment, if only for myself.

रविवार, 3 मार्च 2013

गुलाब, कैक्टस और बाबू मद्रासी का कुत्ता


बाबू मद्रासी सरकारी दफ्तर में दफ्तरी था। रामखिलावन की पत्नी ने पूछा-दफ्तरी क्या होता है? रामखिलावन ने बताया था - दफ्तरी होना एक मुगालता होता है। दफ्तरी मतलब ‘कुछ’ होने का भाव। दफ्तरी स्वयं को सारे दफ्तर की गतिविधियों का केन्द्र मानता है, वो चौराहे पर बैठा वो कुत्ता होता है जिस पर से नए-नए मेट्रो हुए शहर की बस गुजर जाती है और वो समझता है कि बस ने उसके चौराहे पर फैले होने का ध्यान रखा और बाकायदा बड़ी सटीकता से उसकी पूंछ के बालों का भी बांका किये बगैर गुजर गई। खैर हमें इस दफ्तरी और कुत्ते की तुलना से कुछ आगे बढ़ना है। 

निराला की एक कविता है- गुलाब और कैक्टस। गुलाब विशिष्ट पूंजीपति शासक अभिजात्य वर्ग का प्रतीक है और कैक्टस दबे-कुचले शासित श्रमिक वर्ग का। रामखिलावन ने बताया कि निराला भी उस वर्ग को बिसरा गये जो असली संसारी है। ना इधर का ना उधर का.. मध्यम वर्ग। 

रामखिलावन के हिसाब से बाबू मद्रासी कन्वर्टड ईसाई था। कन्वर्ट होने, बदलने की जरूरत किसे थी? कोई ब्राम्हण क्यों कन्वर्ट होगा? कोई क्षत्रिय भी क्यों कन्वर्ट होगा? कोई वैश्य भी क्यों कन्वर्ट होगा? कन्वर्ट वो होगा जो कुछ है ही नहीं... जो किसी सूची में अनुसूचित है या जो अभी भी जंगलीपन से उबरा नहीं है..जनजातीय है.. पता नहीं अनुसूचित जाति और जनजाति का अर्थ क्या है? या शायद चालाकों को हरिजन में भी भेद दिखा कि वो तो हरि के जन और हम...? तो अब आप भी जानते हैं रामखिलावन चलने से पहले ही भटक जाता हैं।

‘बाबू मद्रासी’ उस दफ्तरी को दिया गया सरल नाम था। सारे मुहल्ले के लोग उसे इसी नाम से जानते थे पर बुलाते नहीं थे। दरअसल हमारा असली नाम वो होता है जिसे हमारे पीछे लोग एकदूसरे से बातचीत में इस्तेमाल करते हैं। बाबू मद्रासी को कहीं से पता चला कि उसके अफसर की कुतिया ने पिल्ले जने हैं। तो बाबू ने दफ्तरी.. दफ्तर और अफसर की कडि़या जोड़ते हुए कुत्ता प्राप्त कर लिया। कुत्ता देखने में साधारण था वैसे ही जैसे हमारे मोहल्ले में पाये जाने वाले.. पैदा होते वक्त ठीक ठाक और बाद में साधारण से अतिसाधारण होते जाने वाले और अंततोगत्वा खुजली खाकर मर जाने वाले कुत्ते। 

छोटा सा कुत्ता, सर्दी के दिन, वो कुत्ता अक्सर सोसायटी का चैकीदार के पास दिखता। शायद बाबू मद्रासी को लगा कि इतना साधारण सा कुत्ता लेकर उसने ठीक नहीं किया. बाबू को लगा कि उसके अफसर ने कुतिया का ध्यान नहीं रखा। कालान्तर में खिलाने-पिलाने पर कुत्ता अच्छा खासा दिखने लगा। बाबू के बच्चे उसे उठा-उठा कर घूमने लगे। धीरे-धीरे बाबू मद्रासी ने महसूसा कि कुत्ता अब ऐसा हो चला है कि सुबह सुबह-साथ ले जाया जा सकता है। घरवाली के पेटीकोट के महंगे नाड़े से बंधा मोटा सा पिल्ला सोसायटी के गेट पर जाकर अटक जाता, तो बाबू को समझ नहीं आता कि क्या करे? खैर घसीट-घसाट के कुत्ता मोहल्ला दर्शन या मोहल्ले की सड़कों के किनारे गंदगी फैलने जाने लगा। रामखिलावन कहते थे कि मोहल्ले के कुत्ते, पालतुओं से ज्यादा प्राकृतिक और समझदार होते हैं... वो मूत्र और पखाने के बाद धूल उड़ा कर ढंक दिया करते हैं, इन पालतुओं में वो तमीज भी नहीं होती।

खैर कुत्ता धीरे-धीरे बाबू मद्रासी का हो गया और बड़ा होता गया। पहले माले पर स्थित फ्लैट की बालकनी में बंधा कुत्ता कूंकियाता रहता। कुत्ते का बाबू के परिजनों यानि मनुष्यों में रहना था। पिछली टांगों के बल खड़े होने पर बालकनी से उसकी अपनी प्रजाति से लगते कुत्ते मोहल्ले भर में दिखते, उनसे उसके वही संबंध थे जो बाबू मद्रासी होने देता। जब मोहल्ले के कुत्ते भौंकते तो उसे समझ में नहीं आता और जब बाबू मद्रासी का कुत्ता भौंकता तो मोहल्ले के कुत्ते बिना उस ओर ध्यान दिये अपनी गतिविधियों में लगे रहते। रहने, खाने-पीने, दिन में दो एक बार टहलने को मिलता। धीरे-धीरे कुत्ता विचारक होता गया। रोटी-कपड़े-मकान के बेसिक इंतजाम के बाद मध्यवर्गीय भी अक्सर विचारक हो जाते हैं। कुत्ता अपने जैसे अन्य पालतू और मोहल्ले में आवारा विचरते कुत्तों के बीच तुलना करने लगा। क्या उसकी जिंदगी अच्छी है या ये जिंदगी ही नहीं है? या मोहल्ले के आवारा कुत्तों का जीना नर्क है उसकी ही जिंदगी स्वर्ग है? कुत्ता मनुष्यों के बीच था, वो कुत्ता था और मनुष्य मालिक थे। हालांकि भोजन में कुछ तो उसे कुत्ते होने के हिसाब से मिलता, पर कुछ मालिकों के खान-पान के हिसाब से भी ग्रहण करना पड़ता। जब उसे बाहर जाने की तलब होती तो मालिकों को फुर्सत ना होती और जब वो नहीं जाना चाहता मालिक टहलने की औपचारिकता को पूरा कर फ्री होने के लिए उसे घसीटते। धीरे-धीरे उसे अपने हिसाब से ना चलने देने का मनुष्यों का व्यवहार अत्याचार लगने लगा। इंसान होता तो वो इसे ‘आजादी’ शब्द से व्यक्त करता। 

मोहल्ले के कुत्ते आजा़द थे, वो जब चाहे भौंकते, जब चाहे छाया में रहते, जब चाहे धूप में, जब चाहे बारिश में भीगते। रात को कुत्ते के भौंकने से सारा मोहल्ला गूंज जाता। उसे जरूरत ही नहीं पड़ती। उसे समझ ही नहीं आता था कि वो इंसानों के बीच ही क्यों है? क्यों उसे पाला गया है? क्यों उसका इतना ध्यान रखा जाता है? क्यों नहीं उसे मोहल्ले में आजाद छोड़ दिया जाता? धीरे-धीरे उसने तुलना करनी शुरू कर दी। वो जहां था सुरक्षित था, सर्दी-गर्मी, धूप-बरसात से बचा हुआ था, खाने-पीने और वातानुकूलन के इंतजाम थे। बीमार पड़ने, खुजली होने पर उपचार की व्यवस्था थी। गली के कुत्तों का जीवन भी क्या जीवन था? एक तो ढेर-से पैदा होते? उसने ही बालकनी से देखा था कि एक कुतिया ने सड़क किनारे 7 पिल्ले जने थे। दो-चार दिन में 1-2 सड़क पर गुजरती कारों तले आते गये... एक आध ही बचा था जो महीने भर की उम्र पार कर सका। कुछ बड़े हुए कि खुजली हो जाती है? और लाख तरह की बीमारियाँ... समय पर भूख का निपटारा नहीं होता, बासा-सड़ा गला खाना, पीने को गंदा पानी? फिर अपने अपने इलाकों के लिए लड़ाई-झगड़े? किसी की टांग इंसानों ने तोड़ दी तो किसी के कान को प्रतिद्वंद्वी ने काट खाया, किसी के शरीर का एक भाग ही शरीर से बाहर है? किसी के बाल खुजली से पूरे झड़ गये हैं, पूरी तरह नग्न। एक 4 माह के पिल्ले को तो एक मोटा-सा सुअर जिंदा खा गया था। आज़ादी इतनी आसान नहीं होती। 

लेकिन दूसरी तरफ यह जीवन भी तो कितना ऊब भरा था। भूख नहीं है पर सामने भोजन पानी। ना खाओ तो बीमार समझा जाता। दिन भर पट्टे से बंधे रहो, टहलने भी जाओ तो मालिक के हिसाब से। ना मां बाप का पता ना कोई किसी यार दोस्त की खबर। मालिकों के तलवे चाटकर निज’कुत्तापन और गुलामी ही झलकती? मोहल्ले के कुत्तों की उसकी रिरियाहट समझ नहीं आती। यहां तक कि ना तो मोहल्ले के कुत्ते उसके पास फटक पाते ना ही उसे किसी को संूघने दिया जाता। कुत्ते होकर कुत्ता’इतर किसी प्रजाति मनुष्य में जीवन गुजारना... इसमें कहाँ की समझ थी।

रामखिलावन बोला - दफ्तरी और पालतू कुत्ते में ज्यादा अंतर नहीं होता, बस ये कि... शायद कुत्ता ये सारी बातें कभी सोच भी लेता हो।

बुधवार, 7 दिसंबर 2011

शादी करनी चाहिए या नहीं?


शादीशुदा और बाल-बच्चों वालों से विवाहयोग्य-अयोग्य लोग पूछा करते हैं, भैया जी! शादी के बारे में आपका क्या ख्याल है? शादी करनी चाहिए या नहीं? ये पूछताछ उन सर्वोत्कृष्ट औपचारिकताओं में होती है जो आदमी अपनी जिन्दगी में कर सकता है। क्योंकि ये प्रश्न अक्सर वो लोग करते हैं - जिनके मन में शादी के लड्डू फूट रहे होते हैं... जो इन भावनाओं के मजे ले रहे होते हैं और कहीं ना कहीं, नये रिश्ते का इंतजार भी कर रहे होते हैं... यानि ये प्राणी निश्चित ही शादी की तारीख तय कर चुके होते हैं। जिनको शादी से कोई मतलब नहीं, वो किसी तरह के प्रश्न क्यों करेगा ?

दरअसल शादीशुदा से यह प्रश्न करने का अर्थ ही समझ नहीं आता। क्योंकि यदि वह कहे कि ”नहीं करनी चाहिये“ तो यह उसका अनुभव है, और कहे कि ”करनी चाहिए“ तो यह भी उसका निजी अनुभव है.... आपके बारे में भविष्यवाणी कैसे की जा सकती है। आप किसी संबंध को शारीरिक, मानसिक रूप से कैसे निभाते है.. नहीं निभाते हैं यह आप पर निर्भर है ना कि किसी शादीशुदा पर। निजी जीवित संबंधों का सामान्यीकरण कैसे किया जा सकता है?

लेकिन इसके उत्तर के बारे में सोचते हुए याद आया कि - कहीं पढ़ा था ...
आप जिससे प्यार करते हो उससे शादी मत करो .... शादी उससे करो जो आपसे प्यार करता है।
ये वाक्य सरलता से समझ नहीं आता, पर जिन्दगी के सच ऐसे ही होते हैं।

साथ ही किस उम्र में शादी करनी चाहिए, इसके लिए... ये पंक्तियां भी।
कुरकुरा टोस (तोस) खाना हो
तो तोस ही खाओ
ब्रेड को महीनों ना सुखाओ

बहुत ही नर्म ब्रेड खानी हो तो
ताजा ब्रेड ही खाओ
तोस को नमी में ना डुबाओ

वैसे आजकल असल जिन्दगी में वो युवक-युवतियां निश्चित ही प्रेरक हैं जो शादी को नौकरी-धंधे के बाद प्राथमिकता दे रहे/रही हैं या शादी को किसी तरह की प्राथमिकता ही नहीं दे रहे। जीवन के चरण और लक्ष्य कुछ और रख रहे हैं।

बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

बहुत तेज जि‍न्‍दगी में जब वक्‍त मि‍ले... सोचि‍ये

भारतीय त्यौहारों का शुभारंभ मुख्यतः रक्षाबंधन से होता है, फिर जन्मअष्टमी, गणेश चतुर्थी, पितृपक्ष, ईद, नवरात्रि, दशहरा, दीवाली, क्रिमसम, नया साल, 26 जनवरी, होली तक कहानी जारी रहती है।

नवरात्रियों में आखिरी, आज नवमीं तिथि थी। मिश्रा जी की दो बेटियों के सुबह उठने से पहले ही 4 जगह से बुलौवा आ चुका था। बेटियां नहा धोकर तैयार किये जाने के बाद शर्मा जी के यहां जाने के लिए निकलीं तो श्रीमती रामचंदानी उन्हें हाथ पकड़ कर अपने घर घेर ले गईं। घंटे भर बाद बेटियां शर्मा जी के यहां से निकलीं तो घर वापिस नहीं पहुंची, चैहान जी अपने घर ले गये। दोपहर के तीन बजे जब मिश्रा जी की बेटियां घर पहुंचीं तो 5 घरों से कन्याभोज करवाया जा चुका था। बेटियां थकी हुई, खुश थीं कि उन्हें चाॅकलेट, छोटे पर्स, सिक्के और नोट, कुरकुरे आदि मिले थे। कन्याभोज का सिलसिला अष्टमी से ही शुरू हो जाता है और दशमी तक चलता है। इन्हीं तीन दिनों में सभी देवीभक्तों को कन्यापूजन, भोजन करवाना होता है। इन्हीं तीन दिनों में कन्याओं की जरूरत पड़ती है।  साल के बाकी 362 दिन कन्याओं की जो पूछपरख होती है, किसी से छिपी नहीं। नवरात्रि के पूर्व पितृपक्ष में बुजुर्गों के दर्शन, उनके हालचाल जानने, पूछपरख का भी यही हाल है।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने बेटियों के संरक्षण, उनकी तरक्की के बारे में जोर शोर से बहुत कुछ कहा है, योजनाएं लाएं हैं। उनमें से एक है लाडली लक्ष्मी योजना इसमें, चुनी गई निर्धन नवजात शिशु कन्याओं का पंजीकरण कर उन्हें वार्षिक आधार पर अच्छी खासी आर्थिक सहायता 5000 वार्षिक (उनके नाम बैंक में जमा कर दी जाती है) दी जाती है। कन्याओं की उम्र के पड़ावों पर जब जब उन्हें आवश्यकता होगी ये राशि काम आयेगी। भली योजना है।

पर सभी कन्याओं को जन्मदाता माता पिता इतने भले नहीं हैं। हमारी सोसायटी के एकबोटे साहब के यहां कन्या ने जन्म लिया। एकबोटे ने उसका नाम सुषमा रखा। एकबोटे कस्ट्रशन में काम आने वाला आयरन, सरिया आदि का काम चलाते हैं। ऊपरी कमाई इतनी कि 5 वर्ष में दो प्लाॅट, दस एफडी, सोने चांदी, कार जैसी चीजों से अमीर हो गये। एकबोटे की बहन एक आंगनवाड़ी में काम करती हैं। उन्होंने अपने भाई की कन्या का पंजीयन लाडली लक्ष्मी योजना में करा दिया, लाडली लक्ष्मी सुषमा को राशि मिलने लगी। एक योग्य जरूरतमंद निर्धन कन्या योजना का लाभ पाने से वंचित रह गई। यही एकबोटे साहब नवरात्रि को कन्याभोज करवाते हैं, कन्याओं के भले की बात करते हैं...तो इसे क्या कहें?

हमारे सभी काम इसी तरह से औपचारिक हैं, साल के विशेष दिनों में पूजे गये पितरों, कन्याओं, देवी देवताओं, ईश्वर... को वर्ष भर बिसराये रखा जाता है। जैसे जीवन का इनसे कोई सबंध ही ना हो।

सब कुछ एक फैशन और सामाजिक भेड़चाल का हिस्सा है। रीति-रिवाजों, कर्मकाण्डों का मात्र एक ही उद्देश्य होता है - धनधान्य की आवक निर्बाध बनी रहे। इस धन से समस्त सुविधाओं, इन्द्रिय भोगों का लक्ष्य पूरा होता रहे। ईश्वर से की जाने वाली यही असली प्रार्थनाएं, अपेक्षाएं और दूजों को दी जाने वाली शुभकामनाएं हैं, बाकी सब औपचारिकताएं हैं।

हमारे पूर्वजों, पंचांग बनाने वालों ने प्रत्येक दिन का एक महत्व देखा था और उस दिन को किये जाने वाले कर्म भी पहचाने थे। ये कर्म एक व्यक्ति को अन्य व्यक्ति से, प्रकृति से और ईश्वर से जोड़ते थे।

लेकिन आज, लोगों का आजीवन एकमात्र ध्येय धन रूपी ईश्वर कमाना ही होता है। धन के लिए समय देना होता है, तो लोग 16 घंटे जुते हुए हैं। नौकरी करने वाले छुट्टियों को भूल गये हैं, नियोक्ता प्रसन्न है...कि अच्छे से अच्छे कम्प्यूटर भी घंटों लगातार चलाये जाने पर हैंग होने लगते हैं...पर इन्हें चलाने वाले आदमी या गुलाम, मशीन से कई गुना ज्यादा मशीनी हैं.... ये रविवार को भी, ईद, दशहरे दिवाली को भी चलते है।

धन एक छद्म लोक का निर्माण करता है। इसे अर्जित करने के लिए लम्बे घंटों वाली, महीनों तक लगातार बिना छुट्टियों की नौकरी है और एक मोटी तनख्वाह है। इस तनख्वाह को पिछले लोन, शाॅपिंग माॅल, बर्थडे या डेट और नये इलेक्ट्रानिक गैजेटस पर खत्म हो जाना हैं। कभी फुर्सत ने आ घेरा तो एलसीडी होम थियेटर, कम्प्यूटर-फेसबुक... इस छद्मलोक में आपको बनाये रखते हैं। उम्र होती जाती है, खोती जाती है.... आपके साक्षात जीवित मित्र ना के बराबर और इंटरनेट पर फोलोअर्स की संख्या बढ़ती जाती है।

कभी-कभी चिंता आ घेरती है कहीं ”कंधे ही कम ना पड़ जायें‘‘ और लोग पिकनिक, पार्टी, कथा, जगराता रख लेते हैं, शादी-ब्याह में शामिल हो जाते हैं।

तो चलिये इस भाग दौड़ में कभी ठहरने का मौका मिले तो देखें कि किस दिन, किस समय, क्या किया जाना जरूरी है...जो किया जाना ही जिन्दगी है। ना कि 24 गुणा 7 गुणा 365 दिन धन का इंतजाम किया जाना। अगर आपने ठहर के पढ़ा है तो बताओ ना मि‍त्र साक्षात कब मि‍ल रहे हो ?

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

महात्मा गांधी ने संसद और मनमोहन सिंहों के बारे में क्या कहा?

1909 में जब अंग्रेज हम पर राज कर रहे थे, तब भी संसद वगैरह थी और महात्मा गांधीजी ने संसदीय लोकतंत्र के बारे में लिखा था -
" जिसे आप पार्लियामेंटों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेंट (संसद) तो बांझ और बेसवा (वैश्या) है... मैंने उसे बांझ कहा क्योंकि अब तक इस संसद ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया... संसद सदस्‍य दिखावटी और स्वार्थी हैं। यहां सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं। सिर्फ डर के कारण ही संसद  कुछ करती है। आज तक एक भी चीज को संसद ने ठिकाने लगाया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती... बड़े सवालों की चर्चा जब संसद में चलती है, तब उसके मेंबर पैर फैला कर लेटते हैं या बैठे बैठे झपकियां लेते रहते हैं.. या फिर इतने जोरों से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं... जितना समय और पैसा संसद खर्च करती है उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाये । संसद को मैंने वैश्या कहा क्योंकि उसका कोई मालिक नहीं है, उसका कोई एक मालिक नहीं हो सकता। लेकिन बात इतनी नहीं है। जब कोई उसका मालिक बनता है, जैसे प्रधानमंत्री, तब भी उसकी चाल एक सरीखी नहीं रहती। जैसे बुरे हाल वैश्या के होते हैं, वैसे ही हमेशा संसद के होते हैं.. अपने दल को बलवान बनाने के लिए प्रधानमंत्री संसद में कैसे-कैसे काम करवाता है, इसकी मिसालें जतिनी चाहिए उतनी मिल सकती हैं... मुझे प्रधानमंत्रियों से द्वेष नहीं है लेकिन तजुर्बे यानि अनुभव से मैंने देखा है कि वे सच्चे देशाभिमानी नहीं कहे जा सकते... मैं हिम्मत के साथ कह सकता हूं कि उनमें शुद्ध भावना और सच्ची ईमानदारी नहीं होती.. "

क्या यही सब, आज, भारत की संसद और प्रधानमंत्री की भी कहानी नहीं है?

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

भोपाल में प्री-पेड स्मार्ट मोडम डिवाइज टाटा फोटोन विज

भोपाल शहर में टाटा इंडिकॉम के आउटलेट्स की कार्यप्रणाली

इंटरनेट तक घर पर ही पहुंच के उद्देश्य से इस बार टाटा के प्रीपेड कनेक्शन ”फोटोन विज“ को चुना ताकि कामचलाऊ विकल्प घर पर भी रहे। इसके लिए हम टाटा इंडिकॉम आउटलेट नं. 1 पर गये जहां पर यह प्लान समझाया गया। 1399 की यूएसबी मोडम डिवाइज है+रू 100 की एक्टिवेशन किट+रू 300 रू. का प्रारंभिक रिचार्ज जिसमें आपको एक महीने अनलिमिटेड नेट एक्सेस मिलेगा।

लेकिन भाई ने बताया कि फोटोन विज डिवाइज नहीं है दूसरे आउटलेट से मंगा कर रखते हैं, आप कल फोन सम्पर्क करें। दूसरे दिन कहा गया फोटोन विज डिवाइज तो आ गई है पर इन दिनों इस डिवाइस का एक्टिवेशन कार्य तकनीकी कारणों से बंद है (सर्वर संबंधित)। आप यदि कल फोन लगायेंगे तो हम बता पायेंगे कि क्या स्थिति है। तीसरे- चैथे दिन फोन लगाने पर पता चला की स्थिति अभी भी ज्यों की त्यों है।

आखिकर कार 5वें दिन हमने आउटलेट नं. 2 का रूख किया। जहां बैठी मोहतरमा ने बताया कि उन्हें तो इस प्लान का पता ही नहीं जिसमें 1 महीने अनलिमिटेड एक्सेस का प्रावधान है। लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें अभी अभी पता चला है अब कोशिश कर के देख लेते हैं। खैर डिवाइज भी थी, एक्टिवेशन भी हो रहा था तो हमने 1800 रू दिये डिवाइज हमारे नाम पर रजिस्टर कर दी गई पर आधे घंटे तक कोशिशों के बाद भी 300 रू. का प्रारंभिक रिचार्ज जिसमें आपको एक महीने अनलिमिटेड नेट एक्सेस मिलेगा, ये रिचार्ज नहीं हो सका। खैर वक्त की कमी के कारण हमें आउटलेट से घंटे बाद निकलना पड़ा।

6ठे दिन फोन करने पर भी तकनीकी समस्या। सातवें दिन फोन करने भी यथा स्थिति। आठवें दिन परेशान होकर कहा गया कि आप 224 में माह भर सीमित घंटों का रिचार्ज ही करवा लें। करवा लिया गया। हमने इसकी रसीद मांगी तो फिर वही तकनीकी समस्या। रसीद आज तक नहीं मिली है। टाटा इंडि‍कॉम के कस्टमर केयर सेंटर पर बताया गया कि हमारे आईडी का कोई कनेक्शन है, यह रिकार्ड में ही नहीं है।

अब समस्या यह कि डिवाइज की स्पीड इतनी भी नहीं कि सुविधापूर्वक मेल चेक कर सकें। पर इस खरीद की रसीद भी नहीं दी गई है। पता चला है कि 15-20 दिनों से चल रही तकनीकी समस्या ज्यों कि त्यों है।

तो लेपटाप डेस्‍कटॉप धारक, प्री-पेड स्मार्ट मोडम डिवाइज फोटोन विज के प्रत्याशियों को उपरोक्त कथा सनद रहे कि‍ टाटा की सेवा के दौरान कोई तकनीकी खराबी महीने भर तक संभव है।