Wednesday, 7 December 2011

शादी करनी चाहिए या नहीं?


शादीशुदा और बाल-बच्चों वालों से विवाहयोग्य-अयोग्य लोग पूछा करते हैं, भैया जी! शादी के बारे में आपका क्या ख्याल है? शादी करनी चाहिए या नहीं? ये पूछताछ उन सर्वोत्कृष्ट औपचारिकताओं में होती है जो आदमी अपनी जिन्दगी में कर सकता है। क्योंकि ये प्रश्न अक्सर वो लोग करते हैं - जिनके मन में शादी के लड्डू फूट रहे होते हैं... जो इन भावनाओं के मजे ले रहे होते हैं और कहीं ना कहीं, नये रिश्ते का इंतजार भी कर रहे होते हैं... यानि ये प्राणी निश्चित ही शादी की तारीख तय कर चुके होते हैं। जिनको शादी से कोई मतलब नहीं, वो किसी तरह के प्रश्न क्यों करेगा ?

दरअसल शादीशुदा से यह प्रश्न करने का अर्थ ही समझ नहीं आता। क्योंकि यदि वह कहे कि ”नहीं करनी चाहिये“ तो यह उसका अनुभव है, और कहे कि ”करनी चाहिए“ तो यह भी उसका निजी अनुभव है.... आपके बारे में भविष्यवाणी कैसे की जा सकती है। आप किसी संबंध को शारीरिक, मानसिक रूप से कैसे निभाते है.. नहीं निभाते हैं यह आप पर निर्भर है ना कि किसी शादीशुदा पर। निजी जीवित संबंधों का सामान्यीकरण कैसे किया जा सकता है?

लेकिन इसके उत्तर के बारे में सोचते हुए याद आया कि - कहीं पढ़ा था ...
आप जिससे प्यार करते हो उससे शादी मत करो .... शादी उससे करो जो आपसे प्यार करता है।
ये वाक्य सरलता से समझ नहीं आता, पर जिन्दगी के सच ऐसे ही होते हैं।

साथ ही किस उम्र में शादी करनी चाहिए, इसके लिए... ये पंक्तियां भी।
कुरकुरा टोस (तोस) खाना हो
तो तोस ही खाओ
ब्रेड को महीनों ना सुखाओ

बहुत ही नर्म ब्रेड खानी हो तो
ताजा ब्रेड ही खाओ
तोस को नमी में ना डुबाओ

वैसे आजकल असल जिन्दगी में वो युवक-युवतियां निश्चित ही प्रेरक हैं जो शादी को नौकरी-धंधे के बाद प्राथमिकता दे रहे/रही हैं या शादी को किसी तरह की प्राथमिकता ही नहीं दे रहे। जीवन के चरण और लक्ष्य कुछ और रख रहे हैं।

Wednesday, 23 November 2011

जस्ट डायल डॉट कॉम धोखाधड़ी, लूट खसोट Just Dial.com Scam/ Fraud


मोबाइल फोन नं. एक सुविधा है लेकिन साइड इफेक्ट्स की तरह इसके साथ कई असुविधाएं जुड़ी हैं, जिन्हें लोग नजरअंदाज करते हैं। संचार सुविधाओं की तरह ही इंटरनेट एक मायावी और अविश्वसनीय माध्यम हैं। अक्सर भीड़, शोरशराबे और तन्हाईयों की गलियों से बचने वाले इंटरनेट के जंगल में आसानी से खो जाते हैं।
अगर आपके इर्द-गिर्द मौजूद करोड़ों लोग इंटरनेट का इस्तेमाल कर रहे हैं तो आप अपवाद रहें, यह एक सामाजिक प्राणी तो पसंद नहीं ही करता।

इंटरनेट पर आते ही आपका वास्ता गूगल से पड़ेगा। लोगों को विन्डो एक्सप्लोरर से ज्यादा गूगल का होम पेज इंटरनेट का पर्याय लगता है। गूगल के मंच से ही आप अन्तरजाल के मायावी जगत में विचरते हैं। अगर इस मंच से आपका वास्ता रोज पड़ता है तो आपको कुछ वेबसाईटस की आदत या लत पड़ जाती है.... ये वो वेबसाइर्टस होती हैं जो इंटरनेट पर काम करते समय आपकी सुविधा या पसंद नापसंद होती हैं। आप रोज अपनी इच्छाओं से उपजे शब्दों को गूगल पर डालते हैं और तत्संबंधित ढेरों वेबसाईटें आपके दृष्टिपटल पर बिछ जाती हैं।

पहले, विभिन्न उत्पादों और सेवाओं के नाम, पते, फोन नं दर्शाने के लिए येलो पेजेस डायरेक्ट्रीज हुआ करती थीं। अब इंटरनेट है तो ऑनलाइन ऐसी वेबसाईट्स हैं जिनसे आप अपनी गली मोहल्ले से लेकर देश भर के महानगरों, नगरों और उनकी गलियों में स्थित दुकानों, सेवा केन्द्रों के पते ठिकाने जान सकते हैं। ये लाभकारी सुविधा है। ऐसी ही वेबसाईट्स में मानो ना मानो जस्ट डायल डॉट कॉम प्रमुख है। इसके ब्रांड एम्बेसेडर अमिताभ बच्चन हैं, इस वेबसाईट के विज्ञापन हम टीवी के प्रमुख चैनल्स और इंटरनेट पर देख सकते हैं।
अब कृपया इस पोस्ट की सारी पाठ्य सामग्री पढ़ें, पूरी तरह अवश्य पढ़ें। हो सकता है कोई चूना आपको भी लगने वाला हो, और आप बच जायें या अपने किसी परिचित को बचा लें।

हम पिछले वर्षों से नाम पते ठिकानों की तलाश में जस्ट डायल डॉट कॉम का उपयोग करते आ रहे हैं। वर्ष 2009 में इनकी वेबसाईट्स पर देखा कि ये मेहनती लोगों को बिजनेस का एक विकल्प भी देते हैं- ये है जस्ट डायल डॉट कॉम  की री-सेलरशिप। कुछ राशि लेकर ये आपका पंजीकरण अपनी साईट पर एक वर्ष के लिए करते हैं (2009 में ये राशि शायद 2500 या 3000 रू थी ) और आपको एक लॉग इन आईडी और पासवर्ड देते हैं। आपको ये करना होता है कि इनकी वेबसाईट में आपको अपने शहर के उन उत्पाद, सेवा प्रदाताओं के नाम जोड़ने होते हैं जो इनकी वेबसाईट में नहीं हैं इसके बदले में ये आपको प्रति नाम, पता, फोन नं और फोटो इत्यादि का डाटा एड करने पर रू. 50/- तक देते हैं (इसकी भी कई विस्तृत शर्तें हैं।)। इसके अलावा, यदि आपके शहर का कोई ग्राहक इनकी वेबसाईट की प्रायरोटि कैटेगिरी लिस्टिंग या स्मार्ट लिस्टिंग में आना चाहता है तो उससे ये वर्ष 2011 में रू. 3000/- लेते हैं। इस कस्टमर को अटेंड करने की काम ये रिसेलकर को देते हैं और इस राशि का 33 प्रतिशत रिसेलर यानि आपको दिया जाता है। ये सारी कहानी आपको इस लिंक पर समझ आ जायेगी http://reseller.justdial.com/reseller.php#who

साल दो साल पहले जब जस्टडायल डॉट कॉम की ओर से किसी एक्जीक्यूटिव का कॉल आया। उस समय किसी व्यक्ति के रीसेलर बनाने के लिए जस्टडायल डॉट कॉम वाले हमारे शहर में 3000/- रू ले रहे थे। हमने पहले तो सारी जानकारी ली, पर लगा इंटरनेट का मामला है, ये लोग भरोसेमेंद हैं या नहीं? पर फूटी किस्मत कि गूगल पर ”जस्ट डायल स्कैम्स“ टाईप करके नहीं देखा। खैर उस समय भी हमने इनकी रीसेलरशिप के बारे में गंभीरता ने नहीं सोचा था, तो बात आई गई हो गई।

अब वर्ष 2011 की बात है - 1 नवम्बर को हमने इनकी वेबसाईट का फीडबैक फार्म भर कर भेजा कि हम इसमे रूचि रखते हैं। उसी दिन शाम को जस्टडायल डॉट कॉम के एक्जीक्यूटिव संदीप (फोन नं ...........) का फोन आया और उसने लम्बी चैड़े वार्तालापों से (जिसे आज की तारीख में फंसाना) कह सकते हैं, से प्रभावित किया। ये पूछने पर कि हमारे शहर में आपका कोई रीसेलर है। संदीप ने एक दो लोगों के नंबर दिये,  जिनसे फोन पर जानकारी ली तो पता चला कि वो एक दो वर्ष से काम कर रहे हैं ... पर अब उन्हें बहुत कम पैसे मिल रहे हैं। हमारे शहर में 3 रीसेलर पहले ही हैं यदि आप बन जायेंगे तो कमाई का बंटवारा होकर ये और कम हो जायेगी। पर बंदे ने यह नहीं बताया कि अब तो सारा काम डूबने वाला हो गया है। हमारे शहर में जस्ट डायल के रीसेलरों से ली जानकारी से लगा कि - हो ना हो कुछ तो कमाई हो ही रही है, हो सकता है भोपाल स्थित रीसेलर ही काम ना कर रहे हों और दोष कंपनी का बता रहे हों।

1 से 8 नवम्बर 2011 तक जस्ट डायल के कार्यकर्ता संदीप के निरंतर फोन आते रहे। ये सारे फोन रीसेलर के लिए 5515/- की राशि जमा कराने बाबत थे। (हमारी याददाश्त में ये राशि 5000/- थी) हमने एक दो तीन दिन टाला, बीच में 6 नवम्बर को रविवार आ गया। 7, 8, 9 को बैंकों की हड़ताल थी जो 8 को ही खत्म हो गई। इस बीच शनि भी तुला राशि में आने वाला था या आ गया था। आखिरकार 8 नवम्बर को हमने अपना नाम पता फोटो, आईडी और 5000/- का चेक तैयार कर लिया। चेक अपने शहर के एक्सिस बैंक में जमा करना था। 8 नवंबर 2011 को संदीप का फोन आया तो हमने बताया कि हमने सबकुछ तैयार कर लिया है, चेक 5000/- का बनाया है, तो वो बोला कि चेक 5515/- का ही बनाना होगा। वो बोला कि कैश भी जमा कर सकते हैं। बैंक में जमा कराने पर आपके पास उसकी रसीद तो रहेगी ही। और हमने 8 नवम्बर को ही 5515/- नगद जस्टडायल लिमिटेड के एक्सिस बैंक के एकाउंट नं 21901 02000 0587 में जमा कर दिये। उसके बाद संदीप का फोन आना बंद हमारा, फोन लगाना शुरू। संदीप को उसी दिन फोन करके बताया कि भई राशि जस्टडायल के एकाउंट में जमा कर दी है, दस्तावेज स्केन करके भेज दिये हैं। संदीप बोला कि बस सर! निश्चिंत रहें, अब आपका रीसेलर लॉग इन  आईडी और पासवर्ड सप्ताह भर के अंदर ही मिल जायेगा। सप्ताह बाद जब 14 नवम्बर को संदीप को फोन लगाया तो बोला कि बस आजकल में ही आ जायेगा। 16 नवम्बर को फोन लगाने पर कहा गया कि कल आ जायेगा। 17 तारीख को बताया गया कि लागइन आईडी पासवर्ड क्रियेट करने वाली मोहतरमा नहीं आईं। 18 नवम्बर को संदीप ने फोन उठाना ही बंद कर दिया। 19 नवम्बर को दसियों बार काॅल करने पर फोन किसी आशीष नाम के व्यक्ति ने रिसीव किया। उसे सारी कहानी सुनाई तो वो बोला- आपका आईडी पासवर्ड सोमवार यानि 21 नवम्बर को बन ही जायेगा। उसने यह भी कहा कि - सर अब कोई दिक्कत हो तो मुझे इस एक्सटेंशन पर फोन करें। 21 नवम्बर भी निकल गई। 22 नवम्बर को आशीष के दिये नम्बर पर भी कोशिश की पर ये नम्बर ही गलत निकला। 22 नवम्बर को सुबह जस्ट डायल की वेबसाईट पर उपलब्ध सारे नम्बर डायल किये पर कोई नम्बर नहीं लगा।

23 नवम्बर को सुबह जस्ट डायल की वेबसाईट पर उपलब्ध सारे नम्बर डायल किये पर कोई नम्बर नहीं लगा। और नम्बर तलाशे तो जिसे शायद जस्टडायॅल काॅम की रिसेप्शन एक्जीक्यूटिव ने उठाया। उससे जस्ट डायल का एकाउंट नम्बर कनफर्म करना चाहा तो उसने मनोज नाम के व्यक्ति को ट्रांसफर कर दिया। मनोज एकांउटस विभाग में है। मनोज को पूरी कहानी बताई तो उसने कस्टमर केयर में ट्रांसफर कर दिया। जब कस्टमर केयपर पूरा किस्सा वर्णन किया तो रीसेलर विभाग की एक्जीक्यूटिव रूचिका को फोन ट्रांसफर कर दिया गया।  एक्जीक्यूटिव रूचिका से पता चला कि पैसा जस्ट डायल लि के एकाउंट में पक्का जमा हुआ है। हमने कहा - महोदया, हम आपकी कंपनी के सद्व्यवहार से काफी त्रस्त हो चुके, क्या किसी तरह 5515/- हमारे खाते में दुबारा नहीं लौट सकते। रूचिका जी ने कहा नहीं, अब तो यह संभव नहीं। रूचिका नाम की एक्जीक्यूटिव ने आज 23 तारीख को आश्वासन दिया कि आज आपका रीसेलर लॉग इन  आईडी और पासवर्ड दे दिया जायेगा। लेकिन कुछ घटे बाद जब इन महोदया द्वारा दिया गये नम्बर पर कॉल किया तो वो नम्बर ही गलत निकला।
ये लोग आज दिनांक 29 नवम्बर तक निरंतर टालते रहें हैं और हमारे एसटीडी के पैसे खर्च होते रहे हैं, अब आप ही बतायें क्या 6000 रू. की राशि के लिए मुम्बई जाकर इनके खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई जाये या क्या किया जाये .. अब सब पढ़ने वालों से निवेदन हैं कि इनसे व्यवहार करते समय ये सब ध्यान में रखें!
भाई लोग, 
जस्ट डायल लिमिटेड, जिसके रचियता श्रीमान मनी महोदय, चैन्नईवाले हैं। जिन्होंनें ये कंपनी 50 हजार की लागत से शुरू की थी! उनका लूट खसोट का कारोबार सैकड़ो करोड़ रूपये में पहुंच चुका है। अमिताभ बच्चन इसके ब्रांड एमबेसडर हैं। प्रचार प्रसार में कंपनी करोड़ों लगा रही है, इससे किसी भी आम आदमी का भ्रमित हो जाना बहुत ही सहज है। लेकिन इस सहज ही प्रभावित हो जाने में हजारों लाखों लोगों के कई करोड़ों रूपये का नुक्सान है। तो सभी पढ़ने वालों से निवेदन है कि वो चेतें, अन्यों को चेताएं।

निम्नलिखित लिन्क्स से समझ में आया कि ये लिन्कस हर जस्ट डायल से व्यवहार करने वाले व्यवसायी को हर लेन-देन से पहले देखने चाहिए। क्योंकि जैसा आप लिन्क्स में देख ही सकते हैं, जस्ट डायल द्वारा रीसेलरशिप के लिए उपलब्ध कराये गये लाग इन आईडी पासवर्ड से आपके पैसे तो लौटने वाले नहीं। ऊपर दी गई लिन्क्स में आप देख ही सकते हैं, आपके शहर के वो नाम पते जो इनकी वेबसाईट में ना हों, सैकड़ों की संख्या में ऐसे पते ढूंढने में, टाईप कर अपलोड करने में आपकी मेहनत ही जाया होनी है। ये लोग ऐसे पतों को फर्जी बताते हैं लेकिन शामिल जरूर कर लेते हैं और कहते हैं कि ये तो उनकी वेबसाईट में पहले से ही थे। स्मार्ट मैम्बरशिप के लिए की जाने वाली दौड़धूप के बाद जिनका 50 हजार या लाख रूपये में से 33 प्रतिशत का हिस्सा बनता है उन्हें भी 500/- हजार के चेक मिल रहे हैं।

कई लिन्कस सूत्र देखने पर स्मार्ट लिस्टिंग सब्सक्राइब करने वाले ग्राहकों से किये गये फर्जीवाड़े की जानकारी भी मिलती है। क्योंकि इनका पंजीकरण हर वर्ष री-न्यू करवाना पड़ता है। फोन, मेल पर दुहाईयां देते-देते और यहां वहां कहानियां सुनाते-सुनाते साल भर कब निकल जायेगा पता नहीं चलेगा। लेकिन एसटीडी पर लगाये गये काल्स का बिल तो आपको भरना है, सारा दिन इनकी झंझट में पढ़कर सिरदर्द, ब्लड प्रेशर बढ़ने, चिंतित रहने दुष्परिणाम भी आपको भोगने होंगे। 

इस ब्लागपोस्ट के माध्यम से यह भी निवेदन है कि जस्ट डायल डॉट कॉम वालों की धोखाधड़ी के शिकार व्यक्ति सम्पर्क करें ताकि एकजुट होकर इनकी धोखाधड़ी, लूट खसोट का जवाब तैयार किया जा सके। 
तो साफ साफ शब्दों में निवेदन है कि जस्ट डायल से लेन देन का व्यवहार, एक जुए की तरह है।  आप पांडव हुए और श्रीकृष्ण साथ हुए तो ही यह महाभारत जीती जा सकती है। यदि आप सुग्रीव हैं और राम और हनुमान के बल पर रावण पर चोट करने का माद्दा रखते हैं तो ही इनसे व्यवहार करें।
यदि आपके पास रखे 5, 10, 50 हजार या लाख रूपये उछल रहे हैं तो उन्हें शासकीय बैंक, पोस्ट आफिस में जमा कर 9.5 प्रतिशत वार्षिक ब्याज पायें।
यदि आपको जोखिम ही उठाना है तो शेयर मार्केट में अन्य कंपनियों में लगायें, जस्ट डायल में ही क्यों?
मेहनत करनी है तो अपने शहर में ही पार्ट टाईम काम ढूंढे, या नये काम रचे, जस्ट डायल जैसी फर्जी कंपनियों में आपकी मेहनत का सिला नहीं मिलने का।
इस बीच आज की तारीख तक ढेरो लिंक देखे जिनमें निम्नलिखित शामिल हैं -
ठगे गये दो चार लोगों के नाम पते :
Subject - JustDial Reseller Payment Done but No id password is been provided
Hello Sir,
My name is Abhinav Singh and I have done my payment to JUSTDIAL for becoming a reselller of 4999 Rs. on 1 Dec 2010 and after that i didnt got any id and passwords.I asked to ICICI bank and confirmed from the customer care they told me that payment was clear to JUSTDIAL on 2 Dec 2010.I have got my Payment ID from ICICI bank i.e. MICI0125078415. I have talked to JUSTDIAL and they are denying of any payment. Please look into this matter and take some appropriate action.
Thanks & regards
Abhinav Singh Mob No - 09999047518 e-mailid - abhinavsinghtwo@gmail.com
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अखिलेश ने ब्लाग भी बनाया है। अखिलेश ने ऐसी ही कई वेबसाईटस पर अपनी भड़ास निकाली है।
http://wwwfraudjustdialcom.blogspot.com/2011_06_01_archive.html
http://www.indiaconsumerforum.org/?p=12916
JUST DIAL YOU GO TO HELL ONE DAY OR ELSE RETURN MY 5 thousand rs.
Thanks !!!
Akhilesh Singh, Noida Gijjhaur, UP, Email: akhileshtomar62@gmail.com, Contact No.: 9971053854
जस्ट डायल की धोखाधड़ी जानने के लिए गूगल पर ये पेस्ट करें - justdial reseller scam
और भी लिंक देखें - 
http://www.consumercomplaints.in/complaints/just-dial-c60676.html
http://www.grahakseva.com/complaints/8993/just-dial-fraud-by-the-name-of-service
http://www.publiccomplaints.in/f12/http-www-justdial-com-index-php-fraud-scam-1229/
http://econsumercomplaints.in/2011/04/14/justdial-scam-with-just-dial-reseller-program/
http://www.pluggd.in/justdial-reseller-program-data-entry-job-297/
http://www.consumercourtforum.in/f10/justdial-reseller-payment-done-but-no-id-password-been-provided-34810/
http://www.consumercourt.in/product-services/74741-totally-fruad-cheated-reseller-justdial.html
http://www.mouthshut.com/product-reviews/Justdial-Yellow-Pages-Bombay-Mumbai-reviews-925096569
http://www.worstscams.com/beware/just-dial-fraud-ltd-is-minting-money-by-justdial-fraud-services
http://www.complaints-india.com/complaints/22223/DATA-FUARD.html
http://www.reviewcentre.com/review684336.html
http://www.complaints-india.com/companycomplaints/8715/Just-Dial-Pvt-Ltd.html
http://www.consumercomplaintsindia.org/category/news-media/
http://www.indiastudychannel.com/resources/91861-Review-fraud-company-Justdial-com.aspx
http://www.mouthshut.com/review/Justdial-Yellow-Pages-Bombay-Mumbai-review-lltsnllpnn
http://www.grahakseva.com/complaints/23911/just-dial-cheating
http://boardreader.com/thread/complaint_registration_against_Just_Dial_cfhdeXav.html
http://174.132.132.135/JUST_Dial_Reseller-Complains-18397-SC.html
http://wardno27.lawyersclubindia.com/experts/Cheated-by-JUSTDIAL-155441.asp
http://www.icomplaints.in/just-dail-mumbai-unathurised-withdrwan-rs.11592-though-ecs-02006.html
http://66.7.221.226/~consumer/?p=12916
जस्ट डायल वेबसाईट्स की प्राथमिक जानकारी के बारे में ढेरो लिंक हैं तो ये देखें:
http://www.articlesnatch.com/Article/Just-Dial-The-Way-To-Success--/2176479
दरअसल दिक्कत ये है कि ऐसे ही किसी एक लिंक्स पर इस कंपनी और इसके बनाने वाले का यशगान भी होता है और नीचे इससे लुटे-खसोटे-पिटे जा चुके लोगों का रोना धोना भी होता है।
http://dare.co.in/people/featured-entrepreneur/vss-mani-just-dial/Page-2.htm
इसके लिए किसी ने एक ब्लाॅगस्पाट पेज भी बनाया है।
http://justdialsucks.blogspot.com/
और किसी ने इसे फ्राड डायल डाट काम भी कहा है, ये लिन्क देखें।
http://frauddial.blogspot.com/

Monday, 21 November 2011

परिंदे की मौत

जिन्दगी एक खुजली का नाम है। जब आत्मा को खुजली होती है तो वो किसी गर्भ में उतरती है और जिन्दगी की नौटंकी शुरू होती है। करोड़ों योनियां (जून या जन्म) हैं, करोड़ों भूमिकाएं। मुझे याद नहीं कि, यह तय करना अपने हाथ में या नहीं कि आप कौन सी भूमिका चुनेंगे। दुनियां में कुछ लोग तो ऐसे दिखे जो भूमिका उन्हें मिली वो भी नहीं निभाते, हद ये कि.... कुछ अपनी भूमिका और चरित्र से दुखी होकर आत्महत्या कर लेते हैं। कुछ जो भूमिका मिली है उससे इतर भी फटे में टांगें डालते रहते हैं, ऐसे लोगों की हाथों में 11 अंगुलियां होती हैं। एक अतिरिक्त उंगली अतिरिक्त जगहों पर डालने के लिए, जो शरीर पर नजर नहीं आती पर उनके चरित्र का अभिन्न अंग होती है। खैर मैं शायद भटक रहा हूं, मुझे आपको कुछ पलों का छोटा सा किस्सा सुनाना है, कहानी नहीं। कहानी की परिभाषा ये है कि - वो किस्सा जो लम्बा लगने लगे उसे कहानी कहते हैं। कब कैसा लगता है इसे मापने के लिए आपका जिन्दा होना जरूरी है। यह किस्सा जिन्दा रहने का ही है।
 
एक समय रामाधार नाम का एक आदमी बेचैन था, या बेचैन होने का दिखावा करता था। क्योंकि उसके पास आधारभूत रूप से... बेसिकली वो सब था जो किसी दुनियांदार के पास होता है। मां बाप बीवी बच्चे, इन सबके लिए पैसा और कभी कभी फैशन में आ रही चीजों... जैसे पिज्जा बर्गर का स्वाद लेने का हौसला। रामाधार को खुजली हुई कि उसकी छोटी बिटिया 4 की एक छोटा सा पंछी पालने की मांग जायज है। उसकी छोटी बिटिया को पड़ोस का पंचू चिढ़ाता था क्योंकि उन्होंने एक तोता पाल रखा था, इसलिए वो रामाधार को पंछी लाने को कहती, और बड़ी बिटिया मीतू 10 उसकी मांग का समर्थन करती।
दरअसल यह बात बड़ी उलझी है कि आदमी में होने वाली कौन सी खुजली, किस खुजली से जुड़ी है। रामाधार ने बचपन में एक कुत्ता पाला था, और कबूतर पाले थे। कुत्ते को उसके पिताजी ने घर से निकलवा दिया था। रामाधार खुद उसे एक सुनसान में, भरी सर्दी के दिनों में एक पुलिया के नीचे छोड़ आया था। उसके पाले कबूतरों को उसकी अनुपस्थिति में एक बड़ा सा बिल्ला खा गया था।
शायद इस वजह से उसने अब 40 बरस की उम्र में दो परिंदे खरीद लिये। बड़े दिनों की टालमटोल के बाद एक दिन बाजार जाकर एक नीली और एक हरी चिडि़या जिसे अंग्रेजी में लवबर्डस कहते हैं का जोड़ा खरीद लिया। उसका खयाल था कि कुछ दिन बाद जब छोटी बिटिया गुन्नी का दिल बहल जायेगा तो चिडि़यों को पार्क में ले जाकर उड़ा देंगे। इससे परिंदे पालने की खुजली दूर हो जायेगी, परिंदे सैयाद से छुड़ाकर उड़ा देने पुण्य भी मिलेगा। जब चिडि़यों का जोड़ा घर लाये तो गुन्नी बहुत खुश हुई, बड़ी मीतू को भी मजा आया। बीवी को लगा कि बहुत पैसे खर्च कर दिये इतने में तो एक अच्छा पर्स आ जाता। खैर दिन निकलना शुरू हो गये।
रामाधार ने इंटरनेट पर देखा कि लवबर्डस कैसे पालते हैं, उनकी जरूरते क्या होती हैं। पर सबसे बड़ी जरूरत रामाधार जानता था (उन्हें पिंजरे से उड़ा कर मुक्त हवा में छोड़ देना) जो इंटरनेट पर लवबर्डस को पालने वाली वेबसाइट्स में कहीं नहीं लिखा था।
सप्ताह बाद रामाधार को लगा कि पिंजरा छोटा है, अगर कुछ सप्ताह या महीनें इन्हें घर पर ही रखना है तो पिंजरा बड़ा होना चाहिए ताकि ये एक मीटर लम्बी छोटी सी उड़ान भर सकें। दूसरा पिंजरा खरीदने में इतने ही पैसे और लगने थे जिनमें ये दो परिंदे और पिंजरा आ गया था। दो हफ्तों बाद गुन्नी का लगाव परिंदों से बहुत बढ़ गया था। रामाधार की बीवी को परिंदों के लालनपालन, ध्यान रखने से खीझ थी। बड़ी मीतू के लिए सब ठीकठाक था, वो चाहती थी कि अब बड़ा पिंजरा ले ही लिया जाये।
तीसरे सप्ताह में पिंजरे लाने का विचार अमल में आना शुरू हुआ। रामाधार ने जाकर पिंजरे वाले से बात की तो उसने जो दाम बताये वो ज्यादा लगने लगे। रामाधार ने सोचा वो खुद ही पिंजरा बना लेगा। इन सबकी जुगाड़ में आज और कल के दिन निकल रहे थे।
एक दिन रामाधार दोपहर के भोजन के समय दफ्तर से घर आया तो उसकी बीवी ने बताया कि हरे रंग वाला परिंदा उड़ गया है। रामाधार को भला ही लगा कि चलो अच्छा हुआ। फिर उसे लगा कि अब नीला पंछी अकेला ही रह गया है, ये उदास हो जायेगा। उसने घर में मौजूद बीवी और बड़ी मीतू को बुलाया कि चलो इस नीले पंछी को भी उड़ा देने का मजा लें। उसने पिंजरे का दरवाजा खोला, और अन्य सब तरफ से पंछी को दरवाजे की ओर जाने को प्रेरित किया। पर पंछी नहीं उड़ा वो दरवाजे से बाहर गर्दन निकालता और वापस पिंजरे की जाली से चिपट जाता, पिंजरे में ही घूमने लगता।
काफी देर बाद जब पाया कि वो अपने आप नहीं निकलेगा तो रामाधार ने सोचा कि जैसी कि उसने कल्पना की है, उसे पकड़कर फिल्मी स्टाईल में हवा में छोड़ दे। उसने पंछी को पकड़ा, पंछी ने छोटी सी चोंच से उसे काटा... उसे मजा आया। बीवी और मीतू के सामने उसने पंछी को हवा में लहराया। पंछी ने पर मारे पर वो 45 डिग्री का कोण बनाते हुए तीसरे माले के फ्लैट से नीचे बिछी कांक्रीट रोड़ पर धड़ के बल जा गिरा। उसके गिरते ही अचानक कहीं से एक कुत्ता आया और उसे मुंह में दबाकर चलता बना। तीसरे माले के फ्लैट की बालकनी में खड़े रामाधार को अब महसूस हुआ कि वो तीसरे माले के फ्लैट से फिल्मी स्टाइल में छलांग नहीं लगा सकते। वो चप्पल पहनकर नीचे दौड़े। जब तक नीचे पहुंचते, कुत्ता उस पंछी को दबाकर कुछ दूर ले गया था। रामाधार जब तक कुत्ते के पास पहुंचते रामाधार को लगा... वो उसके प्राण ले चुका था। रामाधार ने एक बड़ा सा पत्थर उठाकर दे मारा... पर वो कुत्ता पंछी को मुंह में दबाकर दूसरी ओर भागा। और एक कार के पीछे जाकर छुपकर उसे खाने लगा। जब तक उस कार के पीछे पहुंचते, रामाधार ने देखा, पंछी की एकडेढ़ सेमी बड़ी गर्दन निपट चुकी है। या शायद रामाधार ये सब देखना ही नहीं चाहते थे। उस परिंदे के रंगीन पंख जिनकी सुंदरता के आधार पर रामाधार ने खरीदने के लिए उसे चुना था...  बिखर गये थे। रामाधार ने सोचा, अगर अब कुत्ते को एक बड़ा सा पत्थर दे मारें तो यह कुत्ते का भोजन छीनना और एक और पाप का भागी बनना होगा। होनी हो चुकी है। इस सब नौटंकी के बाद रामाधार जब घर लौटे तो मीतू रो रही थी। रामाधार बीवी पर बिफरने ही वाले थे कि यदि उसे कमरे में ही उड़ा कर उसकी उड़ान की क्षमता या इच्छा देख लेते तो अच्छा रहता। वैसे पता तो किसी को भी नहीं था कि पंछी के पंखों में उड़ने लायक शक्ति नहीं थी।
रामाधार को हरे वाले पंछी के उड़ जाने की खुशी थी और नीले परिंदे के इस दुखद निधन का अफसोस। रामाधार की उसे उड़ाने की कोशिश में परिंदा मौत के मुंह में गया। सबसे बड़ा दुख ये था कि उसके, बीवी और बेटी मीतू के सामने वो कमीना कुत्ता उस परिंदे को उनके सामने ही दबोच ले गया जिसे 3-4 हफ्ते से पाल रहे थे।

Wednesday, 16 November 2011

बड़बड़ाना छोड़ दो

बड़बड़ाना छोड़ दो, क्या पता, तुम्हें भी पता ना चले कि तुमने क्या कह दिया है...और दुनियां वाले क्या-क्या समझ लें। बड़बड़ाना छोड़ दो, सबको खबर हो जायेगी - कि तुम सोचते कैसे हो? किन वजहों से, किन बातों का समर्थन करते हो, किन वजहों से... किन बातों के सख्त खिलाफ हो।

बड़बड़ाना छोड़ दो, सबको पता चल जायेंगे...तुम्हारे भय। बड़बड़ाना छोड़ दो, तुमने सुना नहीं- जिसे, दूसरों से छिपाना चाहते हैं, उसे, खुद से भी नहीं कहते।
बड़बड़ाना, अनजाने ही नंगे होने के तरह है। तुम्हें बड़बड़ाने से बचना चाहिये, क्योंकि तुम तो दीवारों और दरवाजों से बंद बाथरूम में भी कपड़े पहनकर नहाते हो।

बड़बड़ाना छोड़ दो- सबको पता चल जायेगी... तुम्हारे पागलपन की मात्रा।
बड़बड़ाना छोड़ दो, किसी भी रिश्ते से... सीधे-सीधे सपाट शब्दों में कहो। इससे दिल के दौरों से बचा जा सकता है।
बड़बड़ाना छोड़ दो - जो होना है, होगा ही... चाहे तुम बड़बड़ाओ या, चुप रह जाओ।

तुम परिणाम नहीं बदल सकते। ना शामिल होने से बचे रह सकते हो, इसलिए भी...बड़बड़ाना छोड़ दो। सीधे सपाट कहना भी छोड़ दो, अपने हाथों होनी को देखो। क्योंकि तुम ही जिम्मेदार हो अगर तुमने सच को छोड़ा, और किसी तरह तुम्हारी सांसें चलती रहीं और तुम उस तरह बचे रह गये, जिसे तुम जिन्दगी कहते हो।

रामकृष्ण परमहंस जी का अद्भुत दृष्टांत

धर्मोपदेशक, धर्म गुरू की समस्याएं


Ek tha DIya - Ek Baati एक था दिया एक बाती


कहानियां सुनाती है
पवन आती जाती
एक था दिया
एक बाती

बहुत दिनों की है ये बात
बड़ी सुहानी थी वो रात
दिया और बाती मिले
मिल के जले एक साथ
ये चांद ये सितारे बने
सारे बराती
एक था दिया
एक बाती

उठाई दोनों ने कसम
जले बुझंगे साथ हम
उन्हें ये खबर ना थी मगर
खुशी के साथ भी है गम
मिलन के साथ-साथ ही
जुदाई भी है आती
एक था दिया
एक बाती

एक दिल गली गली
ऐसी कुछ हवा चली
आया एक झोंका
दे गया जो धोखा
जोत को चुरा के
ले गया उठा के
दिल दिये का बुझ गया
हो गई बाती जुदा
फिर भी उसने ये कहा
जोत को दी ये दुआ
तुझको कोई गम ना हो
रौशनी ये कम ना हो
तू किसी के घर जले
खुश रहे फूले फले

कहानियां सुनाती है
पवन आती जाती
एक था दिया
एक बाती

Film : Rajpoot
Singer : Md. Rafi
Picturised on : Dharmendra-Hema

Wednesday, 9 November 2011

आखिरकार

कल एक अवसर था श्मशान जाने का। पर एक नहीं 4-5 चिताएं एक साथ सजाई जाती हुई, जलती और राख होती देखीं। अगर मौत दुर्घटना नहीं है और इतनी अचानक ना आये तो हमें तैयारी करनी चाहिए। सांसे छूटने से कुछ साल पहले से अन्न त्यागना चाहिए, कुछ महीने पहले शाक आदि पेय, और आखिर जल पर निर्भर रहना चाहिए। इससे देह में रासायनिक क्रियाएं कम होंगी। देह हल्की रहेगी और चार कंधे देने वालों को सुविधा होगी। जगह और लकड़ी भी कम लगेगी। जीते जी भले ही आप एक सुन्दरतम हीरो या हीरोइन हों, मृत देह को छून से सब हिचकते हैं। इसलिए देह पर प्राकृतिक सुगंध जैसे चन्दन आदि का लेप भी लगाना चाहिए। अपने मित्रों की टेलीफोन, मेल लिस्ट भी किसी विश्वस्त व्यक्ति को देनी चाहिए कि टाईम पर लोगों को सूचित कर दे। श्मशान जाकर खुद ही अरेंजमेंट कर देने से घर वालों को सुविधा होगी।

कभी-कभी हमें जो महसूस हुआ वह लिखा नहीं जाया जाता। ये एक झूठी कोशिश है -

जिन्दगी है क्या देखो
जलती हुई चिता देखो

कैसे आती है मौत की खबर
क्या होता है दिल पे असर
क्यों झूठा जिन्दगी का समर
क्या खोया क्या मिला देखो
जलती हुई चिता देखो।

पल में सब छूटता है कैसे
सारा भरम टूटता है कैसे
मैं, मेरा, मुझे लूटता है कैसे
क्या रहा, क्या मिटा देखो
जलती हुई चिता देखो।

कैसे लकडि़यां सजाते हैं,
कैसे देह लेटाते हैं,
कैसे आग लगाते हैं,
आखिरी सफर है क्या, देखो
जलती हुई चिता देखो।

आग देह से लिपटे कैसे
उठती हैं लपटें कैसे
राख कर देने सब झपटे कैसे
सबकी नजर है क्या देखो
जलती हुई चिता देखो।


Wednesday, 2 November 2011

बदल गया है बस आदमी ही।

अभी भी चिडि़या आती है
करोड़ों इंसानों के
करोड़ों मकानों के आंगन में

अभी भी तकरीबन सारे बीज
धरती की किसी भी जमीन पर
आसानी से उग आते हैं

अभी भी मछलियां
रहने के लिए
जहरीले नदी नालों या
अनछुए सागरों में
फर्क नहीं करतीं

अभी भी
अधिकतर शेर जानवरों को ही खाते हैं
आदमियों को नहीं

अभी भी सांप बिच्छू चमगादड़
खडहरों जंगलों और वीरानों में ही रहते हैं
आदमी की रोज रहने वाली जगहों पर नहीं

कभी भी जंगल, जानवरों ने
कुदरत ने
आदमी से कुट्टी नहीं की


कभी भी शेर, चीते, भालू
चिडि़या, बाज, गिद्ध,
मछली, सांप, चमगादड़
इतनी संख्या में नहीं हुए
कि आदमी की प्रजाति को ही खत्म कर दें

अभी भी
सब कुछ कुदरती है
लाखों सालों पहले जैसा

क्यों बदल गया है
बस
आदमी ही।

Tuesday, 25 October 2011

Sabko ho Bhali.... Shubh DeePaWali

कसाब और जुम्मन एक कार में बम फिट कर रहे थे।
कसाब बोला - अगर इस समय ही यह बम फट जाये तो?
जुम्मन - कोई बात नहीं, मेरे पास दूसरा है ना।
Khud roshan khyaal rahe, sab taraf roshni failaye... Geet gaye, deep jalaye..

Saturday, 22 October 2011

मैं तो बाबुल तेरे आँगन की चिड़िया

ऐ बाबुल मेरी विदाई का दिन आया
बरसों खुशियों से तेरा आंगन महकाया
बजी शहनाईयां अब चारों ओर
मुस्कुराते चेहरे और आंसुओं का जोर

पर ऐ बाबुल ये कैसी कहानी
पल में ही कैसे हो गई मैं बेगानी
कल तक तो थी तेरी आंखों का सपना
करता पराया, रिश्ता कैसा ये अपना ?

याद आयेगा अब, तेरा पलकों पर बैठाना
मेरा रूठना और तेरा मनाना
गलतियों पर तेरा सहज हो समझाना
पोंछ के आंसू गले से लगाना

जब आई मेरी सेवा करने की बारी
लोग खड़े थे द्वारे, ले डोली की सवारी
जितनी भी मिन्नते कर ले तेरी दुलारी
चिडि़या उड़नी ही है अब तेरी प्यारी

आशीषें लेकर चली हूं, किसी घर अब पराये
उन रास्तों पर चलूंगी जो तूने दिखाये
कुछ इस तरह अपने फर्जों को निभाउंगी
सबके सम्मान को चार चांद मैं लगाऊंगी

रहें सदा आबाद, बेटियां, बाबुल की कलियां
रहें सदा ही शाद, बेटियां चिडि़यां भलियां
मेरी सारी ही उम्रें, बेटियों को लग जायें
जब जिस उम्र में देखूं सदा मुस्कायें

Wednesday, 5 October 2011

बहुत तेज जि‍न्‍दगी में जब वक्‍त मि‍ले... सोचि‍ये

भारतीय त्यौहारों का शुभारंभ मुख्यतः रक्षाबंधन से होता है, फिर जन्मअष्टमी, गणेश चतुर्थी, पितृपक्ष, ईद, नवरात्रि, दशहरा, दीवाली, क्रिमसम, नया साल, 26 जनवरी, होली तक कहानी जारी रहती है।

नवरात्रियों में आखिरी, आज नवमीं तिथि थी। मिश्रा जी की दो बेटियों के सुबह उठने से पहले ही 4 जगह से बुलौवा आ चुका था। बेटियां नहा धोकर तैयार किये जाने के बाद शर्मा जी के यहां जाने के लिए निकलीं तो श्रीमती रामचंदानी उन्हें हाथ पकड़ कर अपने घर घेर ले गईं। घंटे भर बाद बेटियां शर्मा जी के यहां से निकलीं तो घर वापिस नहीं पहुंची, चैहान जी अपने घर ले गये। दोपहर के तीन बजे जब मिश्रा जी की बेटियां घर पहुंचीं तो 5 घरों से कन्याभोज करवाया जा चुका था। बेटियां थकी हुई, खुश थीं कि उन्हें चाॅकलेट, छोटे पर्स, सिक्के और नोट, कुरकुरे आदि मिले थे। कन्याभोज का सिलसिला अष्टमी से ही शुरू हो जाता है और दशमी तक चलता है। इन्हीं तीन दिनों में सभी देवीभक्तों को कन्यापूजन, भोजन करवाना होता है। इन्हीं तीन दिनों में कन्याओं की जरूरत पड़ती है।  साल के बाकी 362 दिन कन्याओं की जो पूछपरख होती है, किसी से छिपी नहीं। नवरात्रि के पूर्व पितृपक्ष में बुजुर्गों के दर्शन, उनके हालचाल जानने, पूछपरख का भी यही हाल है।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने बेटियों के संरक्षण, उनकी तरक्की के बारे में जोर शोर से बहुत कुछ कहा है, योजनाएं लाएं हैं। उनमें से एक है लाडली लक्ष्मी योजना इसमें, चुनी गई निर्धन नवजात शिशु कन्याओं का पंजीकरण कर उन्हें वार्षिक आधार पर अच्छी खासी आर्थिक सहायता 5000 वार्षिक (उनके नाम बैंक में जमा कर दी जाती है) दी जाती है। कन्याओं की उम्र के पड़ावों पर जब जब उन्हें आवश्यकता होगी ये राशि काम आयेगी। भली योजना है।

पर सभी कन्याओं को जन्मदाता माता पिता इतने भले नहीं हैं। हमारी सोसायटी के एकबोटे साहब के यहां कन्या ने जन्म लिया। एकबोटे ने उसका नाम सुषमा रखा। एकबोटे कस्ट्रशन में काम आने वाला आयरन, सरिया आदि का काम चलाते हैं। ऊपरी कमाई इतनी कि 5 वर्ष में दो प्लाॅट, दस एफडी, सोने चांदी, कार जैसी चीजों से अमीर हो गये। एकबोटे की बहन एक आंगनवाड़ी में काम करती हैं। उन्होंने अपने भाई की कन्या का पंजीयन लाडली लक्ष्मी योजना में करा दिया, लाडली लक्ष्मी सुषमा को राशि मिलने लगी। एक योग्य जरूरतमंद निर्धन कन्या योजना का लाभ पाने से वंचित रह गई। यही एकबोटे साहब नवरात्रि को कन्याभोज करवाते हैं, कन्याओं के भले की बात करते हैं...तो इसे क्या कहें?

हमारे सभी काम इसी तरह से औपचारिक हैं, साल के विशेष दिनों में पूजे गये पितरों, कन्याओं, देवी देवताओं, ईश्वर... को वर्ष भर बिसराये रखा जाता है। जैसे जीवन का इनसे कोई सबंध ही ना हो।

सब कुछ एक फैशन और सामाजिक भेड़चाल का हिस्सा है। रीति-रिवाजों, कर्मकाण्डों का मात्र एक ही उद्देश्य होता है - धनधान्य की आवक निर्बाध बनी रहे। इस धन से समस्त सुविधाओं, इन्द्रिय भोगों का लक्ष्य पूरा होता रहे। ईश्वर से की जाने वाली यही असली प्रार्थनाएं, अपेक्षाएं और दूजों को दी जाने वाली शुभकामनाएं हैं, बाकी सब औपचारिकताएं हैं।

हमारे पूर्वजों, पंचांग बनाने वालों ने प्रत्येक दिन का एक महत्व देखा था और उस दिन को किये जाने वाले कर्म भी पहचाने थे। ये कर्म एक व्यक्ति को अन्य व्यक्ति से, प्रकृति से और ईश्वर से जोड़ते थे।

लेकिन आज, लोगों का आजीवन एकमात्र ध्येय धन रूपी ईश्वर कमाना ही होता है। धन के लिए समय देना होता है, तो लोग 16 घंटे जुते हुए हैं। नौकरी करने वाले छुट्टियों को भूल गये हैं, नियोक्ता प्रसन्न है...कि अच्छे से अच्छे कम्प्यूटर भी घंटों लगातार चलाये जाने पर हैंग होने लगते हैं...पर इन्हें चलाने वाले आदमी या गुलाम, मशीन से कई गुना ज्यादा मशीनी हैं.... ये रविवार को भी, ईद, दशहरे दिवाली को भी चलते है।

धन एक छद्म लोक का निर्माण करता है। इसे अर्जित करने के लिए लम्बे घंटों वाली, महीनों तक लगातार बिना छुट्टियों की नौकरी है और एक मोटी तनख्वाह है। इस तनख्वाह को पिछले लोन, शाॅपिंग माॅल, बर्थडे या डेट और नये इलेक्ट्रानिक गैजेटस पर खत्म हो जाना हैं। कभी फुर्सत ने आ घेरा तो एलसीडी होम थियेटर, कम्प्यूटर-फेसबुक... इस छद्मलोक में आपको बनाये रखते हैं। उम्र होती जाती है, खोती जाती है.... आपके साक्षात जीवित मित्र ना के बराबर और इंटरनेट पर फोलोअर्स की संख्या बढ़ती जाती है।

कभी-कभी चिंता आ घेरती है कहीं ”कंधे ही कम ना पड़ जायें‘‘ और लोग पिकनिक, पार्टी, कथा, जगराता रख लेते हैं, शादी-ब्याह में शामिल हो जाते हैं।

तो चलिये इस भाग दौड़ में कभी ठहरने का मौका मिले तो देखें कि किस दिन, किस समय, क्या किया जाना जरूरी है...जो किया जाना ही जिन्दगी है। ना कि 24 गुणा 7 गुणा 365 दिन धन का इंतजाम किया जाना। अगर आपने ठहर के पढ़ा है तो बताओ ना मि‍त्र साक्षात कब मि‍ल रहे हो ?

Monday, 26 September 2011

कब होंगे पूरे हम?



जन्म से अधूरे हम, लाख मांगी मनौतियां,
कब होंगे पूरे हम?

जिस मां से जन्म थे, वह भी तो सहमी थी
बीते कल में डूबी, आज से तो वहमी थी
सोचें क्या अब हट के, जड़ता के बूरे हम
जन्म से अधूरे हम, कब होंगे पूरे हम?

अपने ही हाथों से, भय को सजाया है,
पाया जो, उस पर भी, जोखिमों का साया है
आशंका की छत के, ऊपरी कंगूरे हम
जन्म से अधूरे हम, कब होंगे पूरे हम?

कोई, कैसी हो सांत्वना, रास नहीं आती है
मिटने की अभिलाषा, फि‍र-फि‍र सिर उठाती है
जन्मते ही खोया सब, विषफल के चूरे हम
जन्म से अधूरे हम, कब होंगे पूरे हम?

Wednesday, 21 September 2011

जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?



जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

जन्म के ही संग मिलीं हैं,
इच्छा की विषधर फुफकारें
उम्रों रही सिखाती जिन्दगी
आभावों को कैसे बिसारें
अपना किया ही सबने पाया
फिर लगता बेमजा क्यों है
जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

माई-बाप की अपनी उलझन
बचपन के रहे अपने बन्धन
जवानी ने बेईमानी दिखाई
उम्र गई, राग रहा ना रंजन
लगे अब, सब बेवजा क्यों है?
जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

जितनी भी सुविधायें पाईं
सत्पथ पर बाधायें पाईं,
चुनौतियों से जितना भागे,
उतनी ही मुंह-बाये आईं
दिल दिमाग का द्वंद्व क्षय है
फिर ये क्षय ही बदा क्यों है?

जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?


क्‍या करना है, क्‍या नहीं करना
लगा रहा उम्रों यही डरना
बीतें जन्‍म की बि‍सरी यादें
क्‍या कि‍या? कि‍ पड़ेगा भरना
सच और झूठ का एक तराजू
सदा सि‍र पर लदा क्‍यों है

जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

Monday, 19 September 2011

वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था

काग़ज की कश्ती, पानी का किनारा था
मन में मस्ती थी , दिल ये आवारा था
आ गये कहां से, ये समझदारी के बादल
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था

वो कंचों की खन-खन में दिन का गुजरना
यारों का झुण्डों में, मुहल्लों में टहलना
साईकिल पर मीलों तक, वो शाम की सैरें
उन सुबह और रातों का, मोहब्बत में बहलना
हैं यादें वो शीरीं, वो दिल की अमीरी
जेबों से फक्कड़ था, हिसाब में नाकारा था
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था


वो मीनू से यारी, वो सोहन से कुट्टी
वो मोहन से खुन्नस, वो गोलू की पिट्टी
था कौन सा काम? कि ना हो पहला नाम
पतंग उड़ानी हो या गढ़नी हो मिट्टी
अजब थी अदा, थे सबसे जुदा
कहते सब बदमाश, और सबसे न्यारा था
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था

फिर कहानियों से यारी,, फिर इश्क की बीमारी
दिन रातें खुमारी,, फिर सपनों की सवारी
नहीं जानते थे कि ऐसा, ना रहेगा हमेशा
बेफिक्री की सुबहें, रातें तारों वाली
लगता वहीं तक बस, जीवन सारा था
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था
- राजेशा


मूल पंक्तियाँ-
कागज की कश्ती थी पानी का किनारा था, खेलने की मस्ती थी दिल ये आवारा था
कहां आ गए इस समझदारी के बादल में, वो नादान बचपन ही कितना प्यारा था
- यश लखेरा, मण्डला, मप्र

Saturday, 17 September 2011

Tuesday, 13 September 2011

क्‍या जि‍न्‍दगी एक अधूरा शॉट है ?

फिल्मी कलाकार, अक्सर इतने मंजे हुए अभिनेता होते हैं, या इतने सौभाग्यशाली कि उन्हें स्वयं पता नहीं होता।  जिनका एक शॉट पहली बार में ही ओ.के. हो जाता है। या दूजी बार,- या तीजी बार, या दसवीं, या पचासवीं या सौंवी..बस दो-चार सौंवी बार... और अभिनेता की किस्मत देखिये कि यदि शॉट ओ.के. नहीं हो पा रहा, तो डुप्लीकेट तैयार होता है, शॉट ओ.के. करने के लिए।
पर आम आदमी. और मुझ जैसे लोग. क्लर्क, मोची, धोबी, भंगी, या किसी नौकरी पर जाने वाले नौकर कहाने वाले। जि‍न्‍दगी भर मजबूरन कि‍सी तयशुदा काम या धंधे पर जाने वाले लोग। किसी काम के साथ में "वाला" जोड़कर पुकारे जाने वाले. दूधवाला, प्रेसवाला, किरानेवाला, पानवाला, सब्जीवाला, या मजदूर सड़क खोदकर फिर से बनाने वाला .. 50-60-70 बरस, जब तक हाथ पैर हिलें उसे बस एक तयशुदा शॉट ओ.के. करवाने में सारी जिन्दगी निकल जाती है.। और बावजूद इसके कोई अदृश्य ईश्‍वर या डायरेक्टर कभी भी आकर नहीं कहता कि ठीक है, शॉट ओ.के. है, तुम्हें अब कोई जन्म नहीं लेना। 


मेरा हर जन्‍म, कोई पूरा सीन या कहानी नहीं होता। वह पूरा शॉट भी नहीं होता। मेरी सारी जि‍न्‍दगी अधूरा शॉट होती है, जिसे मैं अनवरत रोज रीटेक करता हूँ। टूटकर गि‍र जाने तक।

एवंई, Misc, जो कि‍ बहुत जरूरी होता है Very Important

Thursday, 8 September 2011

इसे चिराग क्यों कहते हो?

ये बुझा हुआ है। 
रौशनीना तो बाहर हैना ही अन्दर
औरइसे जलना भी नहीं आता।
इसे चिराग क्यों कहते हो?

Friday, 2 September 2011

मेरा आपसे रि‍श्‍ता


"मैं" कुछ पढ़ूं और
अगर, वो
बहुत ही विस्मयकारी,, रूचिकर और बेहतरीन हो
तो "मैं" सोचता हूँ, "मैं" तो कभी भी ऐसा उत्कृष्‍ट नहीं सोच पाऊंगा
और मुझे ग्लानि होती है
कि कितनी साधारण है मेरी सोच
कि क्या मुझे अपनी ‘सोच’ को, सोच कहना भी चाहिए?
ऐसी हीनभावना उठाने वाली किताब
"मैं" पटक देता हूं।

"मैं" कुछ पढ़ूं
और वो साधारण हो
तो "मैं" सोचता हूँ,
लो, इससे बेहतर तो "मैं" लिख सकता हूं!
"मैं" लिखता ही हूं।
"मैं"  इस तरह की चीजें क्यों पढ़ूं?
और "मैं" किताब पटक देता हूं।

फिर
"मैं" ने कुछ लिखा,
और किसी ने नहीं पढ़ा
तो भी "मैं"
अपनी किताब उठाता हूं
और पटक देता हूं।
इन लोगों की समझ में कुछ नहीं आयेगा।


फिर मैंने
दूसरों का लिखा पढ़ना,
खुद लिखना,
और अपना लिखा दूसरों को पढ़ाना
छोड़ दिया।

अब मुक्त हूं,
हर तरह  के
"मैं"  पन से।
 


Kavita, Ego, Read-Write, Poetry, Rajeysha पढ्ना-लि‍खना, कवि‍ता, अहं


इस लि‍न्‍क पर देखें 
कैसे दुख से मुक्त हुआ जाये

Monday, 29 August 2011

कविता का विषय


कविता का विषय या मुद्दा
फंफूद से जन्में
किसी मौसमी कुकुरमुत्ते की तरह हो सकता है

कवि,
फफूंद को सहेजता है
वैसा ही मौसम बनाता है
जिसमें फफूंद बढ़ती है
हजारों रंग और किस्मों के,
हजारों कुकुरमुत्ते पैदा हो जाते हैं।
अब सहूलियत रहती है कि कवि,
कुकुरमुत्ते की तुलना
गुलाब से करे।


कवि,
अंधेरी गुफाओं, दरारों, सीलन भरी, दबी-ढंकी,
सढ़ती हुई, दलदली जमीनों में रहतें है।
और लोग कहते हैं,
(जहां ना पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि)।

कवि,
राई बराबर संकरी नली के आगे
राई का दाना रखता है
दृष्टि को, नली से भी संकरा करता है
और फिर कहता है
राई पहाड़ भी होती है।

कवि,
मां-बहन की गालियों के अर्थ देखता है
रिश्तों में उत्तेजनाओं के अनर्थ देखता है
कवि परिभाषित करता है
अश्लीलता और उसके फलित,
शून्य के ईर्दगिर्द के गणित।

कवि,
तुक मिलाता है,
शब्द खाता है, अर्थ खाता है।

कवि,
शब्दों के बंदी हैं।
दुनियां भर की भाषाएं,
गूंगों अहसासों के खिलाफ साजिश हैं।
कवियों की कलम,
रक्त रंगी है।
शब्द ना हों तो
कवि, गूंगे के स्वाद से
ज्यादा बेचारा है।

कवि
अहसासों का संग्रहकर्ता है
अतीत बनाता है, स्मृति गढ़ता है

कवि
शेर के शिकार पर (साक्षात संवेदन पर)
सियारों की दावत है।
वह खाता है
अहसासों का बची-खुची खुरचन।


कवि
निःशब्द के सामने निरूपाय है।

कवि‍
तुम एक गहरी सांस लो
उसे रोके रहो, अपनी क्षमता तक।
फिर नाभि तक, सब खाली कर दो।
और अब बताओ,
कौन सी कविता लिखागे?
मौत पर।

Saturday, 27 August 2011

झूठ के जलवों में खोना क्यों?

झूठ के जलवों में खोना क्यों?
खुदा का दोषी होना क्यों?

सब विधना की मर्जी है,
फिर तकदीर का रोना क्यों?

सब कुछ यहीं रह जाना है,
पाप-पुण्य का ढोना क्यों?

दर्द भी उसकी रहमत है,
पल-पल आंख भिगोना क्यों?

दसों दिशा वहीं मुस्काये,
जप तप जादू टोना क्यों?

उससे जनम उसी में मरण

पाना क्‍या  क्या और खोना क्यों?

अन्तर क्षीर है, अमृत है,
बाहर नीर, बिलौना क्यों?

अन्दर खोज खजाने पगले,
बाहर पकड़े दोना क्यों?

पत्थर छोड़ दे इगो का,
खुद ही खुद को डुबोना क्यों?

मौत अचानक आती है,
घोड़े बेच के सोना क्यों?

सपनों में भी ना आये,
उसका दर्द संजोना क्यों?

यूं तो दुनियां भूल गये,
आंखों में वो सलोना क्यों?


Latest Gazal, Sher-O-Shayri,  Spiritual, Love, Passion, Dohay, दोहे, शेर ओ शायरी, गजल, हि‍न्‍दी गजल, आधुनि‍क गजल,

Thursday, 25 August 2011

महात्मा गांधी ने संसद और मनमोहन सिंहों के बारे में क्या कहा?

1909 में जब अंग्रेज हम पर राज कर रहे थे, तब भी संसद वगैरह थी और महात्मा गांधीजी ने संसदीय लोकतंत्र के बारे में लिखा था -
" जिसे आप पार्लियामेंटों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेंट (संसद) तो बांझ और बेसवा (वैश्या) है... मैंने उसे बांझ कहा क्योंकि अब तक इस संसद ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया... संसद सदस्‍य दिखावटी और स्वार्थी हैं। यहां सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं। सिर्फ डर के कारण ही संसद  कुछ करती है। आज तक एक भी चीज को संसद ने ठिकाने लगाया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती... बड़े सवालों की चर्चा जब संसद में चलती है, तब उसके मेंबर पैर फैला कर लेटते हैं या बैठे बैठे झपकियां लेते रहते हैं.. या फिर इतने जोरों से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं... जितना समय और पैसा संसद खर्च करती है उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाये । संसद को मैंने वैश्या कहा क्योंकि उसका कोई मालिक नहीं है, उसका कोई एक मालिक नहीं हो सकता। लेकिन बात इतनी नहीं है। जब कोई उसका मालिक बनता है, जैसे प्रधानमंत्री, तब भी उसकी चाल एक सरीखी नहीं रहती। जैसे बुरे हाल वैश्या के होते हैं, वैसे ही हमेशा संसद के होते हैं.. अपने दल को बलवान बनाने के लिए प्रधानमंत्री संसद में कैसे-कैसे काम करवाता है, इसकी मिसालें जतिनी चाहिए उतनी मिल सकती हैं... मुझे प्रधानमंत्रियों से द्वेष नहीं है लेकिन तजुर्बे यानि अनुभव से मैंने देखा है कि वे सच्चे देशाभिमानी नहीं कहे जा सकते... मैं हिम्मत के साथ कह सकता हूं कि उनमें शुद्ध भावना और सच्ची ईमानदारी नहीं होती.. "

क्या यही सब, आज, भारत की संसद और प्रधानमंत्री की भी कहानी नहीं है?

पानी में क्‍लोरीन कि‍तनी जहीन

आदमी को बनाने वाले पंचतत्‍वों में जल भी शामि‍ल है। लेकि‍न वि‍चि‍त्रता यह है कि जल से इंसान के रि‍श्‍ते बड़े ही नाजुक हैं। हम जानते हैं हर पानी पीने लायक नहीं होता तो हम जल को पेयजल बनाने के लि‍ये कई उपाय अपनाते हैं। 
पि‍छले 30 दि‍नों से पहले तो बुखार, फि‍र बुखार से नि‍जात पानी के लि‍ये खाई गई दवाईयों के साईड इफेक्‍ट स्‍वरूप पेट की खराबी की समस्‍या से गुजरना पड़ा ! कि‍सी भी बीमारी की मूल समस्‍या हमारा रहनसहन और खानपान यानि‍ क्‍या खाते और क्‍या पीते हैं ! महंगाई की वजह से खाना तो नि‍यंत्रण में है पर पानी ?  क्‍या करें पानी आज भी बहुत कम कीमत पर मि‍ल जाता है। लेकि‍न साफ, स्‍वच्‍छ पानी जरूरी नहीं कि‍ पीने लायक भी हो। तो हम में से कई लोग बाजार में मौजूद कई वाटर प्यूरीफायर कम्पनियों द्वारा किये जा रहे 100प्रतिशत शुद्ध पानी देने वाले वाटर प्यूरीफायर के आकर्षक विज्ञापनों के प्रभाव में आ जाते हैं जो यह दावा करती हैं कि वही सुरक्षित पेयजल उपलब्ध कराती हैं। लेकि‍न क्या आपने कभी सोचा कि पानी को शुद्ध करने के लिए आपके वाटर प्यूरीफायर में कौन सी प्रक्रिया प्रयोग में लाई जा रही है, किन रसायनों का प्रयोग किया जा रहा है और आखिरकार जो पानी हम पीते हैं वो वास्तव में सुरक्षित है भी या नहीं।
अभी तक पानी को कीटाणुमुक्त करने के लिए, अधिकतर वाटर प्यूरीफायर्स में क्लोरीन नामक रसायन को एक किफायती, प्रभावी और स्वीकार्य कीटाणुनाशक के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। मगर विचारणीय क्लोरीन का उपयोग नहीं बल्कि क्लोरीन के उप-उत्पाद हैं, जिन्हें क्लोरीनेटेड हाइड्रोकार्बन्स या ट्राईहैलोमीथेन के नाम से भी जाना जाता है। स्वास्थ्य अधिकारियों के अनुसार इनमें से कई म्यूटेजेनिक और या कार्सिनोजेनिक हैं। कुछ वाटर प्यूरीफायर टीसीसीए जनरेटेड क्लोरीन का इस्तेमाल करते हैं। यह क्लोरीन लम्बे समय तक पेयजल को कीटाणुमुक्त करने वाले प्राथमिक कीटाणुनाशक की तरह प्रयोग में लाये जाने हेतु इन्वार्यरमेन्टल प्रोटेक्शन एजेन्सी (ईपीए) द्वारा मान्य नहीं है। इस रसायन का इस्तेमाल अधिकतर स्वीमिंग पूल्स और जकूजी के पानी को कीटाणुमुक्त करने के लिए किया जाता है।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार तो भारत में वर्ष 2010 तक जल शुद्धिकरण में जहरीली गैस क्लोरीन का प्रयोग बंद कर दिया जाना था। विकसित देशों में यह पांच साल पहले ही बंद कर दिया गया था। क्‍लोरीन पानी में मिलाने से माइक्रो बैक्टीरिया एवं कैलीफाम बैक्टीरिया तुरंत मर जाते हैं। दूसरी ओर क्लोरीन का जल में घोला जाना गॉल ब्लेडर में कैंसर जैसी बीमारियां भी परोस रहा है। यमुना जल में अनेक अमोनियम कंटेंट क्लोरीन से मिलकर तमाम तरह के क्लोराइड सल्फेट एवं बाई प्रोडक्ट पैदा कर रही है। क्लोरीन टरबिटी, सस्पेंडेंड मैट्स एवं आर्गेनिक मैटल आदि पर पूरी तरह प्रभावकारी नहीं है। क्लोरीन से शोधित होकर पाइप लाइन में जाने वाले पानी के बैक्टीरिया इनमें जमा हो जाते हैं।

वर्षों से क्लोरीनीकृत जल के जोखिमों के बारे में से इस विषय के विशेषज्ञ क्या कहते हैं-
वे लोग जो क्लोरीनीकृत पेयजल पीते हैं उनमें कैंसर होने का जोखिम 93 प्रतिशत अधिक होता है बनिस्बत उनके जिनके पानी में क्लोरीन नहीं है।
- डॉ जे एम प्राइज
अथेरोस्केलेरोसिस और उसके परिणामस्वरूप हार्ट अटैक और स्ट्रोक्स का कारण कोई और नहीं वह क्लोरीन ही है जो हमारे पेयजल में उपस्थित होता है।
- साइंस न्यूज वोल्यूम 130 जेनेट रेलोफ
क्लोरीनयुक्त पानी आपकी सेहत को खोखला कर सकता है
- डॉ एन डब्ल्यू वाकर, डीसी
क्लोरीन आधुनिक समय का सबसे बड़ा अपाहिज करने वाला और हत्यारा कारक है। यह एक बीमारी से बचाता है तो दूसरी को पैदा करता है। दो दशक पूर्व 1904 में जब से हमने पेयजल का क्लोरीनीकरण शुरू किया तभी से दिल की बीमारियां, कैंसर और असमय बुढ़ापे जैसी बीमारियां पनपने लगीं।
- यूएसकाउन्सिल आफ इन्वायरमेन्टल क्वालिटी
कैसे नुकसानदेह है क्लोरीन ?
भारत में सबसे ज्यादा लोग जलजनित बीमारियों के शिकार होते हैं। जलजनित रोगों की मुख्य वजह उसमें पाए जाने वाले कोलीफार्म बैक्टीरिया होता है। इसको नष्ट करने के लिए पानी में क्लोरीन मिलाया जाता है। पानी में क्लोरीन की स्थिति की जांच टेल पर पहुंचने वाले पानी के जरिए की जाती है। टेल पर ओटी टेस्ट पॉजिटिव मिलने पर ही माना जाता है कि सही मात्रा में क्लोरीन मिली है। टेल तक क्लोरीनयुक्त पानी पहुंचाने के लिए जल संस्थानों में जगह-जगह क्लोरीन मिलाने वाले डोजर लगा रखे हैं। सबसे पहले निर्धारित मात्रा में क्लोरीन जल संस्थान में मिल जाती है। उसके बाद हर मुहल्ले में जलापूर्ति करने वाले पंपों से भी क्लोरीन मिलाकर आगे भेजा जाता है। पाइपलाइन पुरानी होने के कारण जगह-जगह उसमें गंदगी मिलती है। इसके लिए निर्धारित मात्रा में कईं गुना ज्यादा क्लोरीन पानी में मिलाई जा रही है।

काशी हिंदू विश्वविद्यालय के चिकित्सा विज्ञान संस्थान के गैस्ट्रोइंटेराटिस विभाग के डॉ. सुनीत कुमार शुक्ला ने बताया कि पानी में कैल्शियम हाइपो क्लोराइड मिलाई जाती है जो नुकसानदेह साबित होता है। यह शरीर के ऑक्सीजन के फ्री रेडिकल को समाप्त करता है। पानी में कैल्शियम हाइपो क्लोराइड की वजह से पानी रखने वाले बर्तनों में कैल्शियम की सफेद पर्त जमा हो जाती है। इसकी वजह से जलापूर्ति के पाइपों में कैल्शियम के कण जमा हो जाते हैं। 
इंडियन मैडिकल एसोसिएशन के डॉ. अरविंद सिंह का कहना है कि कैल्शियम हाइपो क्लोराइड एक साल्ट है और उसका साइड इफेक्ट होता है। उसकी अधिक मात्रा गैस्ट्रिक म्युकोसा (पेट की लाइनों) को एरिटेट करता है। इससे एसिड का स्राव बढ़ जाता है। कम सोना, फास्ट फूड का इस्तेमाल और अव्यवस्थित खान-पान जैसे कारकों के चलते आदमी पहले से ही संवेदनशील हैं। ऐसे में एसिड के बढ़ने से गैस बनने, अल्सर, बालों के झड़ने, त्वचा के बेरौनक होने के मामले सामने आ रहे हैं।
पानी पीने से त्वचा में नमीं रहती है, ब्यूटीशियन की यह सलाह बेमानी है। ज्यादा पानी पीने से अब त्वचा बेरौनक हो रही है। पानी मे झौंकी जाने वाली क्लोरीन के चलते बाल झड़ने और गैस्ट्रिक की समस्या पैदा हो रही है। क्लोरीन पानी के कोलीफार्म बैक्टीरिया को भी नष्ट करता है लेकिन उसका अधिक इस्तेमाल सेहत के लिए नुकसानदेह भी है।
- क्लोरीन युक्त पानी में बहुत ज्यादा देर तैरने या नहाने से मूत्राशय के कैंसर होने की संभावना बढ़ जाती है।
- स्पेन के वैज्ञानिकों के एक दल ने पाया है कि इस कैंसर का कारण रसायन ट्राईहैलोमिथेन (टीएचएम) है जो त्वचा के माध्यम से शरीर के भीतर प्रवेश कर सकता है। टीएचएम पानी में क्लोरीन मिलाने पर बनता है।
- डेली मेल के रिपोर्ट अनुसार, क्लोरीन युक्त पानी में जो लोग बहुत ज्यादा देर तक तैरते हैं अथवा नहाते हैं वे वास्तव में बहुत ज्यादा टीएचएम लेते हैं। इससे उनमें कैंसर होने की संभावना बहुत बढ़ जाती है।
- इस अनुसंधान के लिए अनुसंधानकर्ताओं ने 1270 लोगों पर अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि जो लोग पानी से होने वाली परेशानियों से बचने के लिए तो बोतल बंद पानी पीते हैं, लेकिन नहाते वक्त अथवा तैरते वक्त क्लोरीन युक्त पानी की परवाह नहीं करते उन्हें टीएचएम के सम्पर्क आने का खतरा रहता है।
- स्पेन के कैस्टेला ल माशा में स्थित ‘सेंटर फॉर रिसर्च इन एनवायरमेंट एपीडेमिओलॉजी’ के डॉक्टर जीमा कैस्टाओ-विन्याल्स का कहना है कि ज्यादा पैसे वाले लोग अथवा शिक्षित लोग सोचते हैं कि वे बोतल बंद पानी पी कर पानी से होने वाली परेशानियों से बच जाते हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि क्लोरीन युक्त पानी में लंबे वक्त तक तैरने और नहाने से वे ज्यादा मात्रा में टीएचएम अपने भीतर लेते हैं।

पानी में क्लोरीन कम होने के प्रभाव -
कम मात्रा डालने से बैक्टीरिया नहीं मरते और कई तरह की जलीय अशुद्धि‍यों से सेहत को नुक्‍सान होने का खतरा रहता है।
पानी में क्लोरीन ज्‍यादा होने के दुष्‍प्रभाव -
•  ज्यादा मात्रा होने से स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उल्टियां हो सकती हैं, फेफड़े खराब हो सकते हैं पेट संबंधी वि‍कार भी हो सकते हैं।
•  पानी में कई बार अधिक मात्रा में क्लोरीन मिलाने से लोग उल्टी दस्त की गिरफ्त में आ जाते हैं।
•  फेफड़ों को खराब करने में पानी में क्लोरीन की अधिक मात्रा सर्वाधिक जिम्मेदार है।
•  क्लोरीनीकृत जल पीने वालों में भोजन नली, मलाशय, सीने और गले के कैंसर की घटनाएं ज्यादा पाई गई हैं।
•  क्लोरीन का प्रयोग विश्व भर में सार्वजनिक पेयजल संयत्रों में क्लोरीन का उपयोग नुक्सानदायक कीटाणुओं कोलीफार्म पर एक जहरीले रसायन के रूप में किया जाता है, जिससे मानव शरीर दुष्प्रभाव डालने वाली जलजनित बीमारियों से बच सके। लेकिन बहुतेरे वैज्ञानिक शोध यह कहते हैं कि पेयजल में क्लोरीन का होना बहुतेरे दीर्घकालीन दुष्प्रभाव डालता हैं, बनिस्बत पानी को किटाणुमुक्त करने के।
•  नैशनल कैंसर इंस्टीटयूट द्वारा प्रकाशित जरनल के अनुसार - लम्बे समय तक क्लोरीनीकृत जल पीने से किसी व्यक्ति में ब्लाडर कैंसर के विकसित होने का जोखिम 80 प्रतिशत तक बढ जाता है। वैज्ञानिकों के अनुसार समस्या क्लोरीन नहीं, समस्या है क्लोरीन की पानी में पाये जाने वाले प्राकृतिक तत्वों और प्रदूषकों से होने वाली प्रतिक्रियाओं से। इसके परिणामस्वरूप रसायनों का वह समूह बनता है जिनसे मूत्राशय का कैंसर हो सकता है।
क्लोरीनीकृत जल के उप-उत्पादों से मूत्राशय का कैंसर, उदर, फेफड़ों, मलाशय, दिल की बीमारियां, धमनियों का सख्त होना, एनीमिया, उच्च रक्तचाप और एलर्जी आदि बीमारियां जन्म ले सकती हैं।
•  यह प्रमाण भी मिले हैं कि क्लोरीन हमारी शरीर में प्रोटीन को नष्ट कर सकती है, जिससे त्वचा और बालों पर दुष्प्रभाव पड़ते हैं। पानी में क्लोरीन होने से क्लोरोमाईन्स (क्लोरीन के उपचार के बाद पैदा होने वाले किटाणु) बनते हैं, जिससे स्वाद और गंध जैसी समस्याएं जन्म लेसकती हैं।
  क्लोरीन गैस की अधिकता और निरंतरता सीधे फेफड़ों फाड़ती है, समूचे श्वसन तंत्र को जख्मी कर देती है, इसके कहर से आंखे भी अछूती नहीं रहतीं।
•  क्लोरीन से जल शोधन धीमे जहर को लेने की तरह है।
कोटा के एक जलापूर्ति‍ करने वाले संयत्र से प्रति 10 लाख लीटर पानी में 2 किलो से लेकर 4 किलो तक क्लोरीन गैस डाली जाती थी। वह भी अंदाज से। इस प्रक्रिया में प्लांट के चैंबर्स पर लगे लोहे के गेट और चद्दरें तक गल गई। यहां तक कि क्लोरीन के असर से एक स्वच्छ जलाशय की छत तक खत्म हो गई। इस मामले में कोटा मेडिकल कॉलेज के चेस्ट एवं टीबी रोग के विभागाध्यक्ष डॉ. बीएस वर्मा का कहना है - फेफड़ों को खराब करने में पानी के साथ क्लोरीन की अधिक मात्रा सर्वाधिक जिम्मेदार है।  
पहुंच मार्ग भी नि‍यंत्रि‍त करता है क्लोरीन की मात्रा - यहां पानी में क्लोरीन की मात्रा 2 से 4 पीपीएम तक डाली जाती थी जो कि‍ अंतिम छोर के इलाकों में पानी के पहुंचने तक क्लोरीन की मात्रा स्वत: ही कम हो जाती थी।
पानी में कलोरीन का मात्रा कैसे जाने : पानी में क्लोरीन की मात्रा को जांचने के लिए क्लोरोस्कोप का प्रयोग होता है। इससे पानी में क्लोरीन की मात्रा कितनी कम और कितनी अधिक है इसका पता आसानी से चल जाता है। आईपीएच विभाग पानी की सप्लाई देने से पहले उसमें क्लोरीन मिलाता है। स्वास्थ्य महकमा भी अपने स्तर पर प्राकृतिक जलस्रोतों में क्लोरीन डालता है।
पानी को अशुद्धि‍यों  से मुक्‍त करने के उपाय :
पानी को अशुद्धि‍यों से और कीटाणुओं से मुक्‍त करने के लि‍ये सर्वाधि‍क सरल उपाय पानी को उबालकर पीना है। 
 कई देशों में पानी को बैक्टीरियामुक्त करने के लिए क्लोरीन का प्रयोग प्रतिबंधित कर दिया गया है। अब वहां अल्ट्रावॉयलेट किरणों से पानी साफ करने की तकनीक अपनाई जा रही है। इसके अलावा सोडियम हाइड्रोक्लोराइट से पानी को साफ किया जाता है।
आयोडीन मि‍लाकर भी पानी को पेयजल हेतु तैयार कि‍या जाता है पर जि‍न्‍हें एलर्जी है, गर्भवती महि‍लाओं और थायराईड की समस्‍या से ग्रस्‍त व्‍यक्‍ि‍तयों को इस तरीके का इस्‍तेमाल डॉक्‍टर की सलाह पर करना चाहि‍ये।

उपभोक्‍ता संरक्षण कार्यकर्ता और द हैल्‍थी यू फाउण्‍डेशन के संस्‍थापक इंडीब्‍लॉगर बेजान मि‍श्रा क्‍लोरीन वाले प्‍यूरीफायर्स के खतरों के खि‍लाफ कैम्‍पेन चला रहे हैं। अधि‍क जानकारी हेतु हेल्‍पलाईन नं 1800-11-4424 पर संपर्क कि‍या जा सकता है।
इस सूचनालेख हेतु इन लिन्‍क्‍स की सहायता ली गई*
http://cricketwise.blogspot.com/2011/05/is-your-drinking-water-safe-many.html
http://www.hindi.indiawaterportal.org/content नुकसानदेह-है-क्लोरीन

Saturday, 20 August 2011

अन्‍ना हजारे के आगे ....


चित्र http://wethepeople-barakvalley.com/ से साभार

मुझे भोपाल से बनारस जाना है। 8 दिन पहले जब रिजर्वेंशन करवाया, 96 वेटिंग थी। आज जब ट्रेन में सवार हुआ तो वेटिंग 76 तक पहुंची थी। जैसे तैसे आरक्षित बोगी में जगह मिली। एक घण्टा हो गया है, एक मानुष ने तरस खाकर मुझे टिकाने की जगह दे दी।

टीटी आया, उसके साथ ट्रेन में घुसते से ही कुछ लोग मानमुनौव्वल करते चल रहे थे। प्लीज... देख लीजिए.... लम्बा सफर है... अकेले होते तो कोई बात नहीं थी फैमिली है.... एक दामादनुमा आदमी बोला-माँजी बीमार है जरा..... बस एक ही सीट दे दीजिए हम दोनों एडजस्ट कर लेंगे... इस तरह के वाक्यों का हुजूम टीटी के प्रभामण्डल के चारों ओर मंडरा रहा था। वो जरा भी कदम आगे-पीछे करता, आगे-पीछे मुड़ता ये वाक्य उसके साथ ही खिसकते...। टीटी इन वाक्यों से निरासक्त श्रवणेन्द्रिय का स्तंभन कर अपनी आंखों की सारी ऊर्जा उन प्राणियों के चेहरे, और भावभंगिमाओं के विवेचन में लगा रहा था जो काम के दिख रहे थे। कुछ ऐसे लोग जो बारगेन-मोलभाव में दिलचस्पी रखते थे वो उन्हें मक्खियों की तरह फटकार रहा था। चारों ओर मांग-ही-मांग सूखी धरती थी और पूर्ति के बादलों के छींटे, कैसे, किस पर डालने हैं यह टीटी की कुशलता थी।

भोपाल से बनारस का सफर न्यूनतम 22 23 घंटे या भारतीय रेल का अपना उन्मुक्त समय लेता है। कई लोग अपने को परखने के लिए संकल्प लेते हैं कि बिना आरक्षण के ही वो लम्बी दूरी, लम्बे समय की यात्रा करके दिखायेंगे पर क्या ये उतना ही आसान होता है, जितना संकल्प लेना? बोगी में मनुष्यों की भौतिक, रासायनिक, मनोवैज्ञानिक गतिविधियां आपके संकल्प का पल पल इम्तिहान लेती हैं।

अब भोपाल से ट्रन में बैठे हुए मुझे ढाई घंटे हो चुके। भीड़ में सीट से उठने का मतलब है आपने सीट पर से अधिकार खो दिया। बोगी का अपना वायुमण्डल होता, दबाव होते हैं है। अगल-बगल सामने पीछे से लोग भिंच जाने, कुचले जाने की हद तक दबाव बनाते हैं। पानगुटखाबीड़ी, पसीने-खाने-पीने, सिर-बदन पर चुपड़े तेल, डियो स्प्रे इत्रफुलेल, मोजों की बदबू... इन सबकी मिश्रित गंध से आपकी नाक को नहीं सूझता कि क्या करे पर चलने पर बोगी के हिलने के साथ ही आपके मूलाधार या नाभि के आस पास से गले की तरफ लावे का ज्वार भाटा सा उठता और गिरता है। मुद्रा कोई भी हो, यदि जगह मिल जाये, आपको पुट्ठों के बल ही बैठना होता है। कभी दाएं पुट्ठे पर पूरे शरीर का भार दिये, कभी बायें पुट्ठे पर, अगर दोनों पर समान भार डालने का विकल्प है तो कमर अकड़ सकती है। लेकिन सर्वाधिक परेशानी कानों और आंखों को होती है... आसपास बैठे सारे यात्रियों के अन्दरूनी-बाहरी किस्से-कहानियां गाने-रोने-धाने, चाहे-अनचाहे सुनने ही पड़ते हैं। इसी तरह आंखों से उन यात्रियों की ठसक झेलनी ही है जिनका रिजर्वेशन कन्फर्म है, जो दिन दहाड़े स्लीपर सीट नहीं बिछाकर आप पर अहसान किये हुए हैं। सीट पर बैठे हुए आपकी लटकती टांगें, पिचके पुट्ठे, अकड़ी कमर, नाक, आंख, कान सब दुविधा में रहते हैं। इसके साथ ही दिमाग में पसरने की गं्रथियां पसरने लगती हैं। कितनी ही भीड़ हो आदमी वो जगहें ढूंढने लगता हैं..जहां सिकुड़ी या एक ही स्थिति में फंसी टांगे घुसेड़नी या टिकानी हैं। मगर इन जगहों के मिल जाने पर... व्यक्ति में वह गं्रथि जिससे पसरने की वृत्ति वाले हार्मोन का स्राव होता है, ये स्राव बड़े ही वेग से होने लगता है। आदमी का सिर पीछे सीट पर टिक जाता है, कमर मुड़ जाती है, टांगे फैलने लगती है... कहने का मतलब ये कि अब वो चाहता है कि किसी तरह शवआसन लगाने का मौका मिले। कई पतले लोगों को मैंने इन लक्षणों के चरम पर लगेज रखने वाले रैक पर पसरा पाया। वो महानतम योगी होते हैं। 8 इंच चैड़ी जगह पर वो दायीं-बायीं-उध्र्व-अधो किसी भी ओर चित कर शरीर को फैला सकते हैं।

मुझे अब पौने चार घंटे हो चले और अब मस्तिष्क में उस हार्मोन के स्राव का वेग बहुत बढ़ गया जिससे शरीर में फैलने-पसरने की वृत्ति गतिवान होती है। मुझे भी सफेद पेंटशर्ट, काले कोट, पीतल के बिल्ले वाले टीटी की याद आई। इकलौता ट्राॅलीबेग उठाकर टीटी की तलाश में निकले तो वो अगले स्टेशन पर एक डिब्बे के बाहर निकला दिखा। मैंने वहां पहुंचकर कुछ भी नहीं किया। फैलने पसरने वाले हार्मोन ने मेरे चेहरे पर सीट की मांग के सारे भाव ला दिये थे। मेरा पर्स निकल-निकल कर हाथों में खेलने लगा, टीटी ने मुझे उपकृत करने के लिए सर्वथा उपयुक्त पाया। अभी तो मात्र चार घंटे हुए थे और मेरी हालत कितनी पतली थी ये मैं ही जानता हूं या बस मैं। 400 रू में वेटिंग टिकिट खरीदा था, टीटी ने हजार रू. कहा, मैंने कहा कि आप ही पसारनहार हैं... कलियुग है पर हे कलिराज कृपा.. 800 रू में कृपा की गई। टीटी ने कहा थर्ड एसी में सीट नं. 23 पर टिक जाओ, वो व्यक्ति आधे घंटे बाद आने वाले स्टेशन पर उतर जायेगा। मैंने प्रभु के वचन का तथास्तु भाव से तुरन्त पालन किया। आज तक ऐसी में यात्रा नहीं की थी... पहले तो ए.सी. यान का इंटीरियर देखा, साधारण स्लीपर कोच की सीटें थीं... बस परदे और लगे थे... आध घंटे बैठने के बाद ही दम घुटता सा लगा.. लगा कि एक बंद जगह पर सैकड़ों लोगों की सांसें हवा में तैर रही हैं... उनमें तरह तरह के कीटाणु थे, गैसें थीं, वायु दाब थे.. कुछ देर बाद ही 23 नं. सीट खाली हो गई और मैंने जीवन की पहली सर्वाधिक महंगी यात्रा का पहला सुविधाभरा खालिस्थान देखा। एसी बोगी में घुसते ही सांझ हो गई थी, ऊंघ भरे खयाल आने लगे। मैं बैठा, फिर लेट कर देखा.. और टीटी को आता देख फिर अधलेटा सा हो गया...टीटी ने जैसे लाड लडाते हुए कहा - आराम से लेट जाओ। मैंने खुद से कहा देखा 800 का कमाल, लोरी भी सुनने को मिलेगी। लाड में आते हुए मैं लेट गया। यात्रा में वैसे ही उपवास का मन करता है। गाड़ी रूकी तो शीशे से देखा कुछ जवान लड़के लड़कियां, ”मेरी भी वही तमन्ना है, जो सब कहता अन्ना है।“, अन्ना हजारे संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ हैं... नारों के साथ ट्रेन में चढ़े। पता नहीं चला, वो चढ़े कहां होंगे? जनरल बोगी ठसाठस भरी थी। आरक्षित शयनयानों में भी पर्याप्त भीड़ थी। कुछ और करना था नहीं, पर क्या ”सोचना“ कुछ करना होता है, तो मैं ऊंघते हुए 5 घंटे की असुविधापूर्ण यात्रा की ताजी-ताजी यादों में झपकी में झूलने लगा।
 
मैंने देखा, एक लड़की मेरे सामने वाली सीट पर आकर लेट गई। उसने कोई अंग्रेजी मैगजीन निकाली और उसे चेहरे पर लेकर फैल सी गई, उसने करवट ली और मैग्जीन नीचे जा गिरी। पता नहीं मेरी बाहें इतनी लंबी कैसे हो गईं, मैंने मैगजीन उठाकर उस लड़की को दे दी। वो लड़की धन्यवाद बोली। उसने पानी की बोतल उठाई और ढक्कन खोलने को ही थी कि पाया घूंट भर ही पानी है। ट्रेन अपनी ही रफ्तार से चली जा रही थी, ए.सी. में ट्रेन की रफ्तार का भी पता नहीं चलता।  मैंने उसकी प्यास को महसूस किया और उसकी ओर अपनी बोतल बढ़ा दी। उसने फिर थेंक्स कहा। उसने जिस तरह अपनी मैग्जीन को उल्टा पलटा, लगा वो उसे 7 बार पढ़ चुकी है। उसे नींद नहीं आ रही थी। उसने अबकी मेरी तरफ करवट ली और बोली - क्या आप मुझे वो जे कृष्णमूर्ति की बुक दे सकते हैं? मैं ज्यादा बातचीत के मूड में नहीं था मैंने किताब उठाकर उसे दे दी। उसने किताब को फिर मुंह पर फैला लिया और शायद वो डूब गई। 
वो फिर पलटी और बोली - आपको नहीं लगता जनलोकपाल बिल से जैसा कि अन्ना कह रहे हैं 65-75 प्रतिशत अन्तर आयेगा व्यवस्था में? 
मैंने कहा - लोग 65 वर्ष बाद फिर जागे हैं।
वो- क्या रिश्वत लेना ही भ्रष्टाचार है, या देना भी?
मैं- मैंने तो अभी 800/- देकर टिकिट खरीदा है।
वो- अगर आप ईमानदार होते तो शयनयान में ही भीड़ के बीच सफर करते।
मैं- कैसे? सिकुड़ी टांगों, पिचके पुट्ठों, अवसाद-विशाद से भरे लोगों की अपानवायु, शौचालय की बदबू, उबकाईयों के साथ, वहां तो उल्टी करने की जगह भी नहीं थी? सफर ना करता तो 7वीं नौकरी की तलाश में चौथा इंटरव्यू छूट जाता। वैसे भी अगर टीटी ना लेता, तो मैं उसे कैसे देता? ठीक है, मैं अपनी धुली चादर बिछाकर भिखारियों के बीच ही बिछाकर शौचालय के पास ही लेट जाता, पर अगर आप होतीं...
वो लड़की थोड़ी देर चुप रही।
वो- तो क्या जनलोकपाल भ्रष्टाचार के बाद की बीमारियों के समाधान की कोशिश है?
मैं- हां, जरूर। ”भ्रष्टाचार के पहले“ के बारे में भी तय होना चाहिए। वेटिंग नहीं होनी चाहिए, या तो टिकिट रिजर्वेशन होना चाहिए या गाड़ी में बैठने ही ना दिया जाय। वेटिंग ही भ्रष्टाचार है। अंधेर करने की जरूरत नहीं... बस जितनी हो सके देर कीजिए, आदमी खत्म हो जाता है। वेटिंग में धंुधलापन है, अनिश्चितता है...असुविधा है, डर है। ”तय होना“ ही नियम और कानून है, व्यवस्था है। संविधान व्यवस्था की एक कोशिश है। मनुष्य रोज बदलता है, व्यवस्था भी व्यक्ति के साथ ही रोज बदलनी चाहिए, संविधान नदी की तरह होना चाहिए.... कुंए या तालाब की तरह नहीं। अंधों के लिए वेद कुरान ही काफी हैं... संविधान को एक धार्मिक ग्रंथ बनाने की क्या जरूरत है। संविधान बदलना वैसे ही होना चाहिए जैसे हम दूसरे दिन कपड़े बदलते हैं, क्योंकि वो गंदे हो जाते हैं। नये अपराधियों के लिए पुराने कानूनों की क्या जरूरत? कसाब नया आदमी है।
 
मैं प्रलाप सा करने लगा था - 200 रूपये चुराये वो चोर, 5 साल का इंतजार, एक साल की सजा। जो 2000 करोड़ चुराये उसके लिए जेल में महल के इंतजाम, और बरस दो बरस में जनता सब भूल जाती है। एनडीतिवारी, कई सारे कातिल मुसलमानगुंडे, कई सारे हत्यारे हिन्दू साधु  संसद में  बैठते हैं... स्वर्णमन्दिर परिसर में आतंकवादियों को शहीद बताती तस्वीरें, कश्मीरी अलगाववादियों से पाकिस्तानी मंत्री को मिलाना, इन्हें क्यो रखा है? संविधान अपडेट करने के लिए? ये कानून बाद में बनायेंगे, उनके तोड़ पहले निकालेंगे।

अचानक टीटी ने झिंझोड़ा, मुझे अचकचाकर उठ बैठना पड़ा। मैंने सेलफोन देखा, रात के 2 बज रहे थे। टीटी बोला - आप एस3 में 37 पर चले जाईये। मैंने बोझिल तनमन से अपना ट्राली बैग उठाया और एस3, 37 तलाशने लगा। वहां एक मोटा सा आदमी घर्राटे मारते हुए सो रहा था, मुझे बुल्लेशाह की काफी याद आयी... जागो... घुर्राटे मार कर मत सोओ, मौत सर पर खड़ी है।
 
मैंने फिर एयरपिलो सिर के नीचे रखा, ट्रालीबैग में चेन बांधी, और पिछली झपकी की दृश्यावली को याद करते हुए, ऊंघने लगा... मैंने पिछले 18 घंटे से कुछ भी नहीं खाया था.... मुझे लगा मैं अन्ना के साथ हूं। मुझे वो नारा साफ-साफ याद आया ”मेरी भी वही तमन्ना है, जो सब कहता अन्ना है।“ मैंने खुद से कहा- ”सब“ क्या होता है, कुछ दिन और देखते हैं। संसार तो हमेशा ही अधूरा होता है, उसमें सुधार की गंुजाईश बनी रहती है, या नदी बहती है। कभी भी ठहरे पानी की सड़ाध झेलने की क्‍या जरूरत है।

Thursday, 18 August 2011

शुक्र मनाने की वजह


शुक्र मनाओ
कि आज सुबह सुबह
बिना कोई गोली-चूरन लिये
भली-भांति पेट साफ हो गया।

शुक्र मनाओ
कि कोई नौकरी या धंधा है
और तुम्हें पहुंचना है वक्त पर
नहीं सोचना है कि
कि सारा दिन घर पर क्या करना है।

शुक्र मनाओ
घर से निकले तो टूव्हीलर पंचर नहीं हुआ
पंचर हुआ भी तो
एक आध किलोमीटर पर ही पंचर बनाने वाला मिल गया
और उसने तुम्हारी लाचारी के ज्यादा रूपये नहीं लिये।

शुक्र मनाओ
सड़क पर पीछे से किसी 4 व्हीलर ने नहीं ठोका।
गड्ढो से सकुशल निकल गये।
किसी गड्ढे में नहीं गिरे,
गिरे भी तो
नहीं गिरा, तुम्हारे ही ऊपर, तुम्हारा टूव्हीलर
और तुम्हारा टूव्हीलर तुम्हारे ही ऊपर गिर भी पड़ा तो
पीछे से आती बस तुम्हें,
तुम्हारे टूव्हीलर सहित रौंदती नहीं चली गई।

शुक्र मनाओ
सड़क पर धूल धुआं गड्ढे और ट्रेफिक के बीच
बिना हेलमेट, मुंह पर कपड़ा लपेट कर चलते हुए
किसी पुलिसिये ने नहीं रोका
तुम्हारी जेब को नहीं लगा
दो चार सौ का धोखा


शुक्र मनाओ
दफ्तर या धंधे पर
रोज की बोरियतभरी जिन्दगी की
खुन्नस और चिड़चिड़ापन नहीं भड़का
तुम्हारी नौकरी बची रही।
तुम्हारा धंधा चलता रहा।

शुक्र मनाओ
जिन्दगी के चार पहर और
जैसे तैसे कट गये।

शुक्र मनाओ
जब नौकरी धंधे से लौटे
तो तुम्हारी बीवी भागी नहीं
घर पर ही मिली
बच्चे कुछ नया नहीं सीख रहे थे तो क्या हुआ
किताबों से देख देख कर
कॉपि‍यां तो भर रहे थे।

शुक्र मनाओ
मां का कान नहीं बह रहा
बाप की डायबिटीज कंट्रोल में है
तुम्हारा अपना पेट
नई दवाईयों से संतुष्ट है
बीवी का पीठ दर्द; बाम से ही ठीक हो जाता है

शुक्र मनाओ
पड़ोसी नहीं खरीद पाया है कार
और वो जगह अभी भी खाली है जिस पर
तुम खड़ी किया करोगे वो कार
जो पिछले 10 बरस से नहीं आई।

शुक्र मनाओ
इसलिए नहीं कि
कोई भगवान या खुदा
"होता है" या "नहीं होता है"

शुक्र मनाओ
बस इसलिए कि
तुम शहर में हो
और सपरिवार सांस ले पा रहे हो
हजारों बीमारियों सहित।

Saturday, 6 August 2011

मैं चल भी सकता हूँ।

आज
पुराने ओमपुरी के चेहरे से भी ज्यादा
कुरूप है

कल की
कोई कल्पना नहीं है।
कल की आशंकाएं हैं।

क्योंकि पंख ना हों,
पंखों में जान ना हो,
तो गिरता है आदमी।

कल के डर से
मेरे पंख गिर गये हैं
इसलिए
मेरा आज
पुराने ओमपुरी के चेहरे से भी ज्यादा
कुरूप है

क्या मुझे किसी भी कल के लिए
अमर पंख चाहिए ?
या
मुझे याद करना चाहिए
कि मैं चल भी सकता हूँ।
एक उम्र तक
दौड़ भी सकता हूँ।

Tuesday, 26 July 2011

सुना है .... वहां पर पत्थर तो हैं ही।

यूं ही दुख रहेगा
यूं ही संघर्ष रहेगा
यूं ही टूटता रहेगा
हर आदमी

यूं ही बंटेगा आदमी
यूं ही कटेगा आदमी
हिन्दू में
मुसलमान में
सिख में
ईसाई यहूदी में
और
जो आदमी बंटेगा
जो आदमी कटेगा
वो आदमियों को और बांटेगा
वो आदमियों को और काटेगा
हिन्दू में
मुसलमान में
सिख में
ईसाई यहूदी में

दुख, संघर्ष और टूटन से
भ्रम का धुंआ उपजता है
और जन्मा डर
हमेशा बना ही रहता है।

और किसने कहा?
कि मुसलमान
हिन्दू, ईसाई, यहूदी
या सिख हो जाने से
डर खत्म हो जाता है

डर फिर भी नहीं जाता
डर बचाता है एक दूजे से
डर हदों को मान्यता दिलवाता है
डर बनाता है
भंगी चमार (शूद्र)
साहूकार (वैश्य)
फौजी हवलदार (क्षत्रिय)
बाबा के चमत्कार (ब्राह्म्ण)
मुहाजिर, कैथोलिक, प्रोस्टेंट
नेता, अफसर, जनता
आम आदमी

डर बनाता है
डर सपने दिखाता है
सफल निडर
लोकतंत्र में भीड़ की स्वतंत्रता के
समाजवाद में भीड़ की व्यवस्था के
राजतंत्र की एक सर्वोच्च सत्ता के

आदमी
यूं ही डरेगा
झुण्ड बनायेगा
झुण्ड में रहेगा
और सामने वाले से पहले
वार कर बैठेगा
इस तरह एक झुण्ड
अन्य झुण्ड से लड़ेगा
और
ऐसा तो पत्थर युग में होता है ना

तो
आदमी के क्लोन बनाने वाला
रोबोट और ड्रोन बनाने वाला
अन्य ग्रहों तक पहुंचा आदमी
पर, झुण्डों में रचा-बसा आदमी
(अगर अपने ही बमों से बच गया)
तो फिर से तैयार है
पत्थरों से लड़ने के लिए
अन्य ग्रहों पर।
जहां सांस रहने की जगह हो ना हो
सुना है
पत्थर तो हैं ही।

जो समस्याएं ही गिनाता रहे उसे अच्छा आदमी नहीं माना जाता। हल यह है कि “हमको भी गम ने मारा, तुमको भी गम ने मारा” तो आओ ये करें कि इस “गम को मार डालें”। तरीके गौतमबुद्ध ने बताये हैं कि पहले तो समझ लो कि दुख है, इसका हल है। ये कि, ये सब कुछ हमारे मन की भूमि पर ही उगा, पला, बड़ा और जंगल की तरह खड़ा है। ये सीखना बहुत जरूरी है कि हम अपने आपको ऐसे बच्चे की तरह महसूस करें जिसे उसकी मां ने जंगल में एक नदी पार करते हुए जन्मा और बह गई। ये बच्चा बंदरिया के दूध से पला, भालू के शहद से पोसा और जंगली कंदमूल और बेर खाकर बढ़ा है। जिसके दिमाग के कम्प्यूटर में हिन्दू-मुसलमान, ईसाई-यहूदी, एससी-एसटी, नेता-जनता, मर्द या औरत, भले या बुरे होने के साफ्टवेयर नहीं दौड़ रहे हैं। क्योंकि यहीं से इस दुनियां को बचाने की शुरूआत की जा सकती है। ये दुनियां, जो कितने ही वैज्ञानिक विकास के बाद नर्क बन पाये, चुटकियों में स्वर्ग जैसी बन सकती है।

Monday, 18 July 2011

सच से भटकने के, जन्‍मों हि‍साब होते हैं

बेईमान इश्क बार-बार सिर उठाता है
लोग कहते हैं, घर बार द्वार उम्र देखो
लोग, घर बार द्वार उम्र में बंधे हैं
मुझे सबके नीचे दिखते चार कंधें हैं
क्या इश्क की जात, उम्र, समाज और लिहाज होते हैं

अजीबोगरीब तरीकों से लोग जिन्दा हैं
कोई किताबों में, कोई चरण पादुकाओं में बिछा है
इन्हें देख कर, मेरा ”होना“ शर्मिन्दा है
इन धुओं का, यूं ही हवाओं में मिलना दिखा है
तय में रहने के, तय भविष्य, रीति-रिवाज होते हैं

ढंके छुपे अंगों की तरह, छुपा लिया है
हर एक ने, खुद को, फलां-फलां घोषित किया है
हर एक तन्हा है, फलां फलां हो जाने से
क्यों सबने, ‘‘जो नहीं है’’, उसे पोषित किया है
सब जानते हैं, सच से भटकन के,  जन्‍मों हि‍साब होते हैं

Friday, 15 July 2011

अनायास, बि‍ना स्‍ट्रगल कि‍ये... सब मि‍लना

चलो आज तुम्हारी तरह दुनियां भर से सारे खयाल बाँटूं। दरअसल मुझे मजा आता है ईश्वर की बातें करना, हालांकि तुम्हारे या किसी और की तरह, मैं भी उसके बारे में कुछ नहीं करता। लेकिन पीछे इतना कुछ पढ़ा-सुना है कि मुझे वही चीज सबसे महत्वपूर्ण लगती है। मुझे कुछेक वाक्य बार-बार अच्छे लगते हैं जैसे ”प्रभु से लगे रहो रे भाई, बनत बनत बन जाई“, ”होते-होते होता है“ आदि आदि। ऐसा नहीं है कि डर नहीं कचोटता कि बिना कुछ हुए ही मर गये तो, तो क्या होगा? वैसे भी इस जिन्दगी का कोई खास मतलब नहीं होता, सिवा इसके कि मरने के पहले ये जान लिया जाये कि जिन्दगी क्या है? कुछ लोग ये भी जानना चाहते हैं कि मरने से पहले ही, ऐसा कुछ जान लिया जाये कि कभी मौत ही ना हो, शरीर की भी। दो-चार सौ साल जिया... कोई शरीर तो कहीं दिखता नहीं, सो लोग किसी और सूक्ष्म रूप की कल्पना करते हैं और सोचते हैं वो ये सच हो जाये। खैर! मुझे ऐसी ही बातें करने में मजा आता है।
 
तुम यह जानते ही हो कि मुझे घुमा फिरा के बात करना अच्छा नहीं लगता मैं चाहता हूं कि सब साफ साफ रहे,
धुंधला-धुंधला, भ्रमित नहीं। जरूरत होने पर भी दुनियां की तरह वक्री चलने में मुझे बहुत तकलीफ होती है।
हालांकि हर वक्त परेशानी सताती है कि करूं तो क्या करूं। कुछ सूझता नहीं है और बरसों बरसों निकल गये हैं। ये बरसों बरसों का निकलता जाना भी दुख देता है। जवानी पक चली है, और बरस निकल रहे हैं। लगता है कि कुछ महत्वपूर्ण होना चाहिए पर सब महत्वरहित निकलता है... लगता है ”महत्वपूर्ण क्या है“, यह तय करने वाले हम नहीं हैं। ऐसा भी हो सकता है कि सारी दुनियां की तरह, मैं कुछ महत्वपूर्ण करना, चाहता ही ना होऊं और अपने आप को ही बना रहा होऊं। कौन अपने सुविधाओंभरे कोकून से निकलना चाहता है। कुछ चीजों की बातें करने में ही ज्यादा मजा है, बनिस्बत की वो हो जायें, शायद मैं ऐसे ही ना-सूझने में उलझा हूं। जो भी हो बड़ी बंधी-बंधाई सी है जिन्दगी... बरसों बरस से, मैं उकता चुका हूं.. उकताना बड़ा बुरा हो सकता है। मैंने सुना है-उकताने वाले लोग मानवबम बन जाते हैं। क्या किसी को इतना बोर किया जा सकता है कि वो मरने को तैयार हो जाये? योग, ध्यान, जप, तप, भक्ति..... हो सकता है ये सब बोर करने के ही तरीके हों, इतना बोर हो जाये कि मौत आये ना आये कोई फर्क ना पड़े बल्कि और सुभीता रहे कि चलो अब कोई अहसास नहीं रहा। अहसास का होना ही सबसे बड़े बीमारी है, अहसास जन्मजात रोग है.... आजन्म रहने वाला। 

 
दरअसल यह सब वो हकीकत है...जो मैंने सपने में देखी, मेरा कोई दोस्त परसों हुए बम विस्फोट में मारा गया वो अच्छा खासा भोपाल में जॉब कर रहा था, बीवी दो बच्चियां, मां बाप...सब हैं। कहता था बड़ा बोर हो गया है छोटे शहर की नौकरी से, उसका ग्राफिक्स डिजाइनिंग का काम औसत था। उसे उम्मीद थी कि मुम्बई में उसे किसी 5 दिन वर्किंग डे वाले अच्छे से आफि‍स में काम मिल जायेगा.. वो कहता था उसने जिन्दगी में कभी स्ट्रगल नहीं की। पढ़ाई के साथ ही नौकरी, नौकरी के साथ ही छोकरी, छोकरी के साथ ही बच्चे सब अनायास ही होता चला गया और.... आजकल वो बहुत बोर हो रहा था रोज 10 से 7
आफि‍स रूटीन से... सालों साल वैसी ही होली दिवाली... बीवी बच्चे मां बाप। मुझे लगता है वह नई नौकरी नहीं चाहता था क्योंकि भोपाल हो या मुम्बई... वहां पर भी तो यही सब होता.... शायद कुछ और झंझटें बढ़ जाती। मेरे ख्याल से वह इस तरह जिन्दा रहने के ख्याल से दुखी था। वह नहीं चाहता था कि उसे "कुछ ऐसा बोरियत सा, रूटीन सा महसूस हो" वो अहसास की कैद से रिहा होना चाहता था, हो गया... और इस बार भी... बिना कोई संघर्ष किये... बिना कोई स्ट्रगल किये... मुम्बई जाने के दो दिन बाद ही अनायास ही मौत भी मिल गई। 
मेरे पास वो बहुत सारे सवाल छोड़ गया है - क्या वो बम विस्फोट से मरा?  क्‍या आदमी को बोर नहीं होना चाहि‍ये? क्‍या बीवी-बच्‍चे-मां-बाप से बोर हुआ जाता है ? जि‍न्‍दगी में नयापन और अबोरि‍यतभरा क्‍या है? क्‍या वो वाकई ईश्‍वर की तलाश में था ?

Monday, 11 July 2011

गरीबि‍याँ

तीन लड़कियां थीं, तकरीबन 5, 8 और 10 बरस कीं। सुबह का वक्त था जब बच्चे स्कूल बसों-वैनों में ठुंसे जा रहे होते हैं। वो शहर की पॉश ऐरिये में कचरे की टंकी के पास बरसाती मक्खियों, गाय, कुत्तों के साथ पन्नियां तलाश रहीं थीं। अंकल चिप्स और चाकलेट खाने की बातें करते-करते वो एक अच्छे घर के गेट पर जाकर खड़ीं हो गईं। उनमें से एक जोर-जोर से पुकारने लगीं ... आंटी खाना दे दो....आंटी खाना दे दो....पता नहीं घर पर कोई सुन रहा था या नहीं, सुनना चाह रहा था या नहीं...सुनकर सोच रहा था या नहीं। वो लड़की निरंतर पुकारती रही .. आंटी खाना दे दो....आंटी खाना दे दो.... तभी उसकी साथ वाली सबसे बड़ी लड़की उसको समझाते हुए बोली... देख ऐसे बोल.. और उसने धीरे से उसके पास उसने कुछ बोलकर दिखाया.. इस बीच ही उस घर में एक प्रौढ़ व्यक्ति दिखा तो वो छोटी लड़की पुकारने लगी... अंकल खाना दे दो....अंकल खाना दे दो....पर वो व्यक्ति ओझल हो गया और लड़की फिर से टेक लगाकर पुकारने लगी आंटी खाना दे दो....आंटी खाना दे दो....  
आज कोई दिन त्यौहार नहीं था, ग्रहण नहीं था, दीवाली-दशहरा नहीं था... हो सकता है जिस घर के पास वो बच्चियां खड़ीं थी, उसमें रहने वालों ने कि‍सी न्यूज चैनल पर आज सुबह भविष्यफल सुना, ना सुना हो। उसमें वो दान पुण्य वाले उपाय बताते हैं... जिनसे देने और मांगने वालों के अपेक्षित कर्म पूरे होते हैं।
शहरी गरीबी, गांव की गरीबी से अलग होती है। वो रोटी, कपड़े और रहने के लिए झुग्गियां या किराये के मकान मिलने के बाद जन्म लेती है। शायद सारी दुनियां में दो ही तरह के लोग हैं... अभाव पैदा करने वाले और अभावग्रस्त।

Saturday, 9 July 2011

तुम ही प्रेम हो...


बहुत सारी बातें हैं
जिन्हें मेरा अहं
समझ नहीं पाता
जैसे नभ का फैला विस्तार
और समय
जिनका अंत नहीं है।

कई चीजें
अहं
अपने हाथों से पकड़ नहीं पाता
बहती बयार का संगीत,
सुबह की धूप,
पुष्प की सुगंध,
और भिगोकर छोड़ गई लहर

पर इनके बाद भी
हमेशा,
मैंने बहुत कुछ सहेज रखा है
वो सब, जो मुझे भला और प्रिय है

मैंने सहेजा है इन्हें,
संदेहों से भरे सिर में नहीं
जिसके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता
पर
दिल में,
जहाँ मुझे सुकून का अहसास होता है
जहाँ अन्तरतम तक भेदती है तुम्हारी नजर
जहाँ तुम्हारी सूरत में
प्रेम रहता है।

दरअसल कि‍ताब में कुछ लि‍खा हो
या कि‍ताब कोरी हो
दो मुड़े़ हुए पन्‍ने
कुछ तो कहते हैं ना 

Friday, 8 July 2011

अपने अपने काश।


एन्तोन शेपेलेव ने उम्र को परिभाषित करने की कोशिश की है,
जवानी:  जबकि आप खूब धूम्रपान करते हैं, शराब पीते हैं और सारी रात अय्याशियाँ करते हैं तो भी दूजे दिन सुबह आपके व्यवहार से ऐसा कुछ भी जाहिर नहीं होता।
प्रौढ़ावस्था: जबकि आप धूम्रपान करते हैं, शराब पीते हैं और सारी रात अय्याशियाँ करते हैं तो दूजे दिन सुबह आपके व्यवहार से ये सब जाहिर भी हो जाता है।
बुढ़ापा: जबकि ना तो आप धूम्रपान करते हैं, ना शराब पीते हैं और ना ही रात को आपने किया होता है तो भी दूजे दिन सुबह आपके व्यवहार से ये जाहिर होता है कि पिछली रात आपने गांजा चढ़ाया है, शराब पी है और तरह-तरह की अय्याशियां कर करके थक चुके हैं।
अब बताईये आपकी उम्र क्या है?