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सोमवार, 25 नवंबर 2013

अज़ब सी कैद है..


अज़ब सी कैद है..
अंदर हूं तो भी डर लगता है
और बाहर जाने के ख्याल से भी
कि भला होता नहीं
और सकुचा हूं
किसी बुरे के मलाल से भी

अज़ब सी कैद है..
चुकानी हैं अभी
पालने—झूलने--
कच्ची उम्र की यादों की
किश्तें
कि.. और संजो लिये
नर्म रूई.. फाहे से रिश्ते
बुलाए हैं निर्दोष फरिश्ते

अज़ब सी कैद है..
एक—एक सलाख
बड़े जतन से बनाई है
लोहे,सोने—चांदी की जंजीरे सजाई हैं

अज़ब सी कैद है..
कि आजादी में
किसी तरह की कमी नहीं है
फिर भी हर सांस
अपनी मर्जी नहीं है


अज़ब सी कैद है..
कि चाहें ही नहीं है...
...ना आहें ही सहीं है
रंग भटके हुए हैं
बस वही कुछ काला है
कुछ सफेद है

अज़ब सी कैद है..
कि जिन्दगी की सजा
एक जुर्म है
कैद के बाहर 
और भी जोखिम है..
जिस्म की मुसीबतें हैं
बेपर्दा ख्वाहिशों की 
नापाक हकीकते हैं..

अज़ब सी कैद है..
हर याद और
हर रिश्ता एक दौलत है
इन पहाड़ों सी दौलत का बोझ
बस यही है
जो 'मैं' हूं
इनके सिवा
और कुछ भी नहीं हूं
किसी आजादी में
और
हर पल चाबुक हैं
संसार निभा!
संसार निभा!

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

जो अभी चल रही है..

बस यही दुख था...
कि मैं जब भी... जहाँ था
वहाँ मुझे कुछ घंटे या...
महीने भर ही सुख था

मैं वहां सालों रुका रहा
मुझे वहां सालों रूकना पड़ा
और आज मैं
बीता हुआ
बड़ा ही गया...और बीता हुआ
महसूसता हूं...
कि मैं ठहरा ही ठहरा
चला ही नहीं..भटका ही नहीं..
ना मेरे खयाल में कोई मंजिल आई
ना मुझे कोई राह सुझाई

तो क्या वक्त के मुताबिक चलने का मतलब
ठहरना कदापि नहीं होता?

या ठहरने का
वर्ष नाम की इकाई से कोई संबंध नहीं?

कितना चलना चाहिए?
कितना रूकना चाहिए?
कितना अकड़ना चाहिए?
कितना झुकना चाहिए?
कितना रूपये काफी होते हैं...जीने के लिए?
कितना रूपया काफी होता है...मरने से बचने के लिए?
क्या 'रोजी—रोटी' भर..जीवन का लक्ष्य हो सकते हैं?
या किसी दुनियां भर का एक चक्कर लगा लेना...
दुनियां भर की यादों से अपना इतिहास सजा लेना
यही जीवन का चरम है...
और अगर ऐसा नहीं..
दुनियां कभी भी कुछ खास होती नहीं...
इसके बकवास और निरर्थक होने में कभी कोई कमी नहीं होती
तो वैसी ही सटीक है..
जो अभी चल रही है..

सोमवार, 2 जनवरी 2012

पिछली सदी में.. और इस पल


 सदी नहीं, बरस महत्वपूर्ण होता है
बरस नहीं,  महीना खास होता है
महीना नहीं, हफ्ता विशेष होता है
हफ्ता नहीं, कोई दिन होता है बहुत जरूरी
दिन नहीं, किसी पहर को महसूसना स्पेशल है
किसी पहर में भी..
कोई पल ही चरम होता है...
इसलिए मुझे अच्छी नहीं लगती
किसी बीते या आने वाले बरस की बात

तुम अतीत से संचालित हो
तुम मुझसे वैसा ही व्यवहार करोगे
जैसा तुमने मुझे
किसी बीते पल महसूसा।
अभी बीते पल जैसा या
सदियों पहले जैसा।

आता कल तुम देख नहीं सकते
और इस पल के हिसाब से व्यवहारना
सच,
सदियों में कोई 'एक' ही सीख पाता है।
सच,
'एक' होना बहुत मुश्किल है।

सोमवार, 29 अगस्त 2011

कविता का विषय


कविता का विषय या मुद्दा
फंफूद से जन्में
किसी मौसमी कुकुरमुत्ते की तरह हो सकता है

कवि,
फफूंद को सहेजता है
वैसा ही मौसम बनाता है
जिसमें फफूंद बढ़ती है
हजारों रंग और किस्मों के,
हजारों कुकुरमुत्ते पैदा हो जाते हैं।
अब सहूलियत रहती है कि कवि,
कुकुरमुत्ते की तुलना
गुलाब से करे।


कवि,
अंधेरी गुफाओं, दरारों, सीलन भरी, दबी-ढंकी,
सढ़ती हुई, दलदली जमीनों में रहतें है।
और लोग कहते हैं,
(जहां ना पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि)।

कवि,
राई बराबर संकरी नली के आगे
राई का दाना रखता है
दृष्टि को, नली से भी संकरा करता है
और फिर कहता है
राई पहाड़ भी होती है।

कवि,
मां-बहन की गालियों के अर्थ देखता है
रिश्तों में उत्तेजनाओं के अनर्थ देखता है
कवि परिभाषित करता है
अश्लीलता और उसके फलित,
शून्य के ईर्दगिर्द के गणित।

कवि,
तुक मिलाता है,
शब्द खाता है, अर्थ खाता है।

कवि,
शब्दों के बंदी हैं।
दुनियां भर की भाषाएं,
गूंगों अहसासों के खिलाफ साजिश हैं।
कवियों की कलम,
रक्त रंगी है।
शब्द ना हों तो
कवि, गूंगे के स्वाद से
ज्यादा बेचारा है।

कवि
अहसासों का संग्रहकर्ता है
अतीत बनाता है, स्मृति गढ़ता है

कवि
शेर के शिकार पर (साक्षात संवेदन पर)
सियारों की दावत है।
वह खाता है
अहसासों का बची-खुची खुरचन।


कवि
निःशब्द के सामने निरूपाय है।

कवि‍
तुम एक गहरी सांस लो
उसे रोके रहो, अपनी क्षमता तक।
फिर नाभि तक, सब खाली कर दो।
और अब बताओ,
कौन सी कविता लिखागे?
मौत पर।

शनिवार, 9 जुलाई 2011

तुम ही प्रेम हो...


बहुत सारी बातें हैं
जिन्हें मेरा अहं
समझ नहीं पाता
जैसे नभ का फैला विस्तार
और समय
जिनका अंत नहीं है।

कई चीजें
अहं
अपने हाथों से पकड़ नहीं पाता
बहती बयार का संगीत,
सुबह की धूप,
पुष्प की सुगंध,
और भिगोकर छोड़ गई लहर

पर इनके बाद भी
हमेशा,
मैंने बहुत कुछ सहेज रखा है
वो सब, जो मुझे भला और प्रिय है

मैंने सहेजा है इन्हें,
संदेहों से भरे सिर में नहीं
जिसके पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता
पर
दिल में,
जहाँ मुझे सुकून का अहसास होता है
जहाँ अन्तरतम तक भेदती है तुम्हारी नजर
जहाँ तुम्हारी सूरत में
प्रेम रहता है।

दरअसल कि‍ताब में कुछ लि‍खा हो
या कि‍ताब कोरी हो
दो मुड़े़ हुए पन्‍ने
कुछ तो कहते हैं ना 

बुधवार, 30 मार्च 2011

तुम्‍हें फुर्सत नहीं है....


कोई बात
कभी भी
इतनी सीधी-साधी नहीं होती
कि
सहमत या
असहमत होकर
ठहर जाया जाये।
और तुम्हें
इससे ज्यादा
फुर्सत नहीं है
मेरे लिये।

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सारा जिस्म
स्खलित हो जाने के बाद भी
बहुत कुछ बचता है
अनुभव करने जैसा।
अगर तुम
मेरी मौत में शामिल होना चाहो।
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चारों तरफ विकिरण फैला है
तुम चाहे सांस लो या ना लो।
मौत सरक ही रही है।
और कुछ है भी नहीं धरती के अलावा।
और तुम कहते हो
कहीं दूर जाकर मरोगे।

गुरुवार, 17 मार्च 2011

आपके और मेरे जीवन में सूनामी




बहुत सारे
बौद्ध, हिन्दू, ईसाई, मुसलमान, सिख
अपनी सबसे बड़ी किताबें पढ़ रहे थे
मंत्र जप रहे थे, प्रार्थनाएं कर रहे थे
और अचानक सूनामी आ गया
बिना किसी बुद्ध, ईश्वर, अल्लाह की परवाह किये



बहुत सारे लोग
रोजाना के
खुद ही तय किये धंधों में लगे थे।
अक्षर मात्राएं गिन कर
कविताएं गजलें कर रहे थे।
लोग व्यस्त थे-
विचित्र भावों और
अनुभवों के संचारक लेख और
ब्‍लॉग्‍स पर पोस्ट्स लिखने में।
जो नहीं लिख पा रहे थे,
वो कमेंटस करने में।
और सुनामी आ गया
बिना इसकी परवाह किये
कि इंसान नाम की चीज
कितने जरूरी काम कर रही थी




बहुत सारे
आठ दस घंटे दफ्तरों में बिताने वाले लोग
दफ्तरों में बैठे
दुनियां भर की बतौलेबाजी कर रहे थे
और सुनामी आ गया
बिना तर्क दिये।


बहुत बड़ा अमीर और
बहुत बड़ा गरीब भी
झोंपड़ी और महल बनाने में लगे थे
पता नहीं किन उम्रों के लिए।
और सुनामी आ गया
हर झूठी सुविधा और स्थिरता भंग करने।


बहुत सारे वैज्ञानिक
रियेक्टरों को चला रहे थे
कि किसी बिजली से
दुनियां भर की तकनीकी चलती रहे
वो तकनीक
जिसके बल पर
आदमी इस पृथ्वी का सबसे बड़ा पशु है।
और सुनामी आ पहुंचा
आदमी की अपनी ही कुल्हाड़ी से
उसकी जाति काटने के लिए।


बहुत सारे वैज्ञानिक
अत्याधुनिक जल, थल, वायु पर चलने वाले
जहाज बना रहे थे
ऐसी कारें बन रही थी
जिनमें लेटे लेटे
जल थल आकाश भर में घूमते फिरते
ऐय़याशियां की जा सकें।
और सुनामी आ गया
सब कुछ बहा ले जाने के लिए
थल को आकाश में
आकाश को पाताल में
और पाताल को अधर में।


लेकिन आदमी बाज नहीं आयेगा
वो ये सब सहता हुआ, सीखना चाहेगा-
जल थल और आकाश के प्रलय से निपटना।
मिली हुई चीजों को भूल कर
उन सब चीजों को खोजेगा,
जो नहीं मिलीं।


वो कभी नहीं चाहेगा
कि जितनी भी उसकी उम्र है
उसे ही जश्न की तरह मना ले
ये महसूस करते हुए
कि बिना इंटरनेट के भी
सारी धरती पर रहने वाले इंसान
जु़ड़े हुए हैं आपस में
रोटी कपड़े मकान जैसी
निहायत ही बहुतायत से मिलने वाली
चीजों की प्रचुरता में
आकाश पर सूरज चांद के नजारों में
धरती आग हवा पानी की जादूनगरी में
प्रेम-हंसी-खुशी के रसों और
नृत्य-गान सौन्दर्य के अलंकारों के
खजानों के साथ।


क्या इंसान को
किसी सूनामी से निपटने के
उपाय ढूंढने चाहिये
या फिर से जानना चाहिए
कि
जीना किसे कहते हैं?
(पल में परलय होयगी फेर करेगा कब?)



क्योंकि हर आदमी की जिन्दगी में
साठ सौ साल बाद, आती ही है सूनामी
जिसकी हमारे पास पुख्ता पूर्व सूचना है।
जौ हर आदमी को पक्का बहाकर ले ही जायेगी।
जिसका कोई अपवाद नहीं।



जिसे आप और मैं
‘‘मौत’’ के नाम से भी जानते हैं।