Tuesday, 29 June 2010


तन्हा लहर है, तन्हा किनारे,
सारे सागर हैं तन्हा
हम ही उसकी यादों की भीड़ में
सारे नजारे हैं तन्हा

जलाती है जुदाई की आग
हम दीवाने परवानों को
शमां को कोई खबर ही नहीं
सारे शरारे हैं तन्हा

चांद ना जाने कहां गया है
चातक की सारी रात गई
सारे बादल भटक रहे हैं
सारे सितारे हैं तन्हा

तुम जो हमसे पराये हुए
पराये सारे साये हुए
मौत जिन्दगी में फर्क खत्म है
हम बेचारे हैं तन्हा

Friday, 25 June 2010

प्रीत नगर की कठिन डगर जिंदगी कैसे तय कर पायेगी

पंजाबी साहि‍त्‍य में "वि‍रह के सम्राट" कहे जाने  वाले
शि‍व कुमार "बटालवी"  के काव्‍य का हि‍न्‍दी अनुवाद
कडी : 1

जब  दूर चला जाऊंगा कहीं
अपने बेगाने ढूंढेगे
आज मुझे दिवाना कहते हैं
कल हो दीवाने ढूंढेगे

मुझे जानने पहचानने वालों से जब
लोग, मेरी बर्बादी का पूछेंगे
इक भेद छुपाने के लिए
वो क्या क्या बहाने ढूंढेगे

जब मस्त हवा ने खेल किकली
किसी शोख घटा का घूंघट उठाया
उस वक्त किसी की मस्ती को
रो रो मस्तान ढूंढेंगे

किकली: एक खेल है जिसमें लड़कियां एक दूसरे के हाथ हाथों में लेकर पैरों को केन्द्र बनाकर वृत्ताकार घूमती हैं।

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मित्रों को पत्र

पूनम के चांद को कोई अमावस
क्योंकर अर्ध्‍य चढ़ायेगी
क्यों कोई डाची सागर खातिर
मरूस्थल को तज जायेगी
डाची-ठेठ पंजाबी भाषा में ऊंटनी को कहते हैं।

कर्मो की मेंहदी का सजना
रंग किस तरह चढ़ पायेगा
जो किस्मत, मीत की पाती को
पैरों तले रौंदती जायेगी

गम का मोतिया उतर आया है
मेरे संयम के नैनों में
प्रीत नगर की कठिन डगर
जिंदगी कैसे तय कर पायेगी

कीकर के फूलों की मेरे मीत,
कौन करता है रखवाली ?
कब किसी माली की इच्छा
हरीतिमा बंजर को ओढ़ायेगी

प्रेम के धोखे खा खा कर
हो गये गीत विष से कड़वे
पतझड़ के आंगन में जिंदगी
सावन के गीत कैसे गायेगी

प्रीत के गले छुरी फिरती है
पर कैसे मैं रो पाऊंगी
मेरे गले में चांदी के हार
यही चंद कौढ़ियां फंसायेंगी

तड़प तड़प के मर गई है
तेरे मिलन की हसरत अब
इश्क की जुल्मी अदायें अब
विरह के बाण चलायेंगी

Thursday, 24 June 2010

एक नशीला पंजाबी गीत हि‍न्‍दी में


पंजाबी संस्‍करण:
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा, रंग गोरा गुलाब लै बैठा
किन्नी पीती ते किन्नी बाकी ए, मैंनू ए हो हिसाब लै बैठा
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा, रंग गोरा गुलाब लै बैठा

मैंनू जद वी तुसी हो याद आये, दिन दिहाड़े शराब बैठा
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा, रंग गोरा गुलाब लै बैठा

चंगा हुंदा सवाल ना करदा, मैंनू तेरा जवाब लै बैठा
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा, रंग गोरा गुलाब लै बैठा
 
जब कदी वेल मिली फर्जा तों, तेरे मुख दी किताब ले बैठा
मैंनू तेरा शबाब लै बैठा, रंग गोरा गुलाब लै बैठा


हिन्दी अनुवाद :
मुझे तेरा शबाब ले बैठा, 
रंग गोरा गुलाब ले बैठा

कितनी पी ली ओ, कितनी बाकी है
मुझ को ये ही हिसाब ले बैठा।
मुझे तेरा शबाब ले बैठा......


मुझको जब भी कभी तुम याद आये
भरी दुपहरी शराब ले बैठा।
मुझे तेरा शबाब ले बैठा......

अच्छा होता सवाल ना करता
मुझको तेरा जवाब ले बैठा।
मुझे तेरा शबाब ले बैठा......
 
जब कभी वक्त मिला फर्जों से,
तेरे मुख की किताब ले बैठा
मुझे तेरा शबाब ले बैठा......




गीतकार: शिव कुमार "बटालवी"
गायक: ये गीत जगजीत सिंह की आवाज में यू टॅयूब पर उपलब्ध है। 
वैसे इसे आसा सिंह मस्ताना और महेन्द्र कपूर ने भी गाया है।

Tuesday, 22 June 2010

अकल को नकल में नहीं, नव सृजन में लगायें


हमारी परीक्षा प्रणाली याददाश्त पर आधारित है। साल भर पाठ्यक्रम में उल्लिखित हर प्रश्न का उत्तर अपने दिमाग में डाल लो और परीक्षा वाले दिन चुने हुए प्रश्नों के उत्तर उत्तरपुस्तिका पर उगल आओ। जो प्रश्न पूछा गया है यदि आपको उसका किताब में लिखा गया उत्तर शब्दशः याद है तो आपको पूरे अंक मिलेंगे यानि यहां आपकी याददाश्त के ही अंक दिये जाते हैं। यहां तक कि भौतिक, गणित जैसे विषयों के संबंध में भी ये बात सही है। गणितीय सवालों जवाबों, को भी छात्र रटकर परीक्षा देने जाते हैं और अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होते हैं। हम यह कहना चाह रहे हैं कि आपके बुद्धिमत्ता-स्तर से भारतीय शिक्षाप्रणाली का कोई सरोकार नहीं है।

अगर हमने जो याद किया है वो प्रश्न पत्र में पूछा गया है तो बल्ले बल्ले वर्ना आपकी हालत पतली हो जाती है। प्रश्नपत्र सामने होता है, जाने पहचाने इसी वर्ष पढ़े हुए प्रश्न हैं, पर उनके उत्तरों के बारे में हमें कुछ नहीं सूझता। यदि परीक्षक उदार है तो फिर परेशान आदमी अपने अगल-बगल, आगे-पीछे नजर डालता है। आगे पीछे कोई अपना ही राशि-भाई या बहन मिल जाये तो उसकी किस्मत में लिखा हुआ हम अपने पेपर में उतार कर, जो वो हो सकता है वही हम भी हो सकते हैं। यानि जिसकी उत्तर पुस्तिका से नकल की जा रही है वो पास तो हम भी पास वो फेल तो हम भी फेल। इसे सारे कुकर्म को नकल कहा जाता है।

छात्र के दिमागी, शारीरिक लक्षणों के अनुसार नकल के अनेक प्रारूप हैं। संबंधित विषय की सम्पूर्ण किताब, कॉपि‍यों को ले जाना अधोगति प्रदान करने वाला पाप है इसमें छात्र और परीक्षक दोनों फंसते हैं। किताबों कॉपि‍यों के लघु संस्करणों गाईड, 20 से लेकर 40 प्रश्नमाला तक को ले जाना भी डूबो सकता है। प्रश्न उत्तरों के संक्षिप्त और सूक्ष्म संस्करण काम आते हैं, पार लगाते हैं, अगर आप बच पाते हैं।

मेधावी छात्र आधा याद करते हैं, चैथाई भाग अगल-बगल या आगे पीछे वाले से कन्फर्म कर लेते हैं और चैथाई भाग के अपनी मेहनत से सूक्ष्म संस्करण तैयार करते हैं।

आप ये ना समझें कि यह ”भारतीय परीक्षा प्रणाली में नकल के तरीके“ विषय पर लेख है। यह सब आपको यह बताने के लिए था कि परीक्षा के दौरान नकल का क्या अर्थ है।  इस लेख का आशय उस मानवीय वृत्ति का उदघाटन करना है, जिसमें बचपन में जो सामने वाला कर रहा है वही प्रतिक्रिया उसे देना, यह तोता-रटन्तपना या बन्दरपन, हमारी सारी जिन्दगी पर फैल जाता है।

वानर आदमी के पूर्वज हैं ऐसा ही नहीं है। ये भी सत्य है कि अभी भी वानरजाति मौजूद है। अपने बचपन को देखें हम मां-बाप, भाई बहनों या अपने ही परिवेश में रहने वालों के हाव-भाव अपना लेते हैं। हमारे माता पिता और अन्य लोग भी यह जान देखकर खुश होते हैं कि हम उनकी नकल कर रहे हैं। स्कूल में प्रवेश लेते ही सहपाठी के पास उपलब्ध परिधान, जूते, बैग, पानी की बोतल, बरसाती आदि हम भी चाहने लगते हैं। तथाकथित पढ़ने में अच्छे बच्‍चों की कॉपि‍यॉं घर लाकर उतारने का उपक्रम शुरू हो जाता है।

स्कूली पढ़ाई खत्म होते होते, उम्र 18-20 वर्ष पार कर जाती है पर इन वर्षों में हम अनुकरण-वृत्ति में किसी ना किसी तरह निष्णात हो चुके होते हैं। पेंट शर्ट के पहनावे से लेकर अगले 5 से 10 वर्ष तक पढ़े जाने वाले विशिष्ट विषयों के चयन पर भी हमारे सहपाठियों या परिवेश का प्रभाव हम पर पड़ता है। यानि सहेली ने बायो लिया तो मुझे भी बायो लेना है और दोस्त ने विज्ञान विषय लिया तो अपन भी विज्ञान विषय ही लेंगे। कैरियर के मामले में भी हम बाजार की हवा में बह जाते हैं, जिस नौकरी धंधे में उठाव चल रहा हो उसी में हम भी तैरने लगते हैं। गजब तो तब होता है जब आदमी अपनी जिन्दगी भर के लिए लिये जाने वाले फैसले भी देखा-देखी करता है यानि प्रेम, शादी विवाह जैसी बातें। गौर से देखने पर आप पायेंगे कि जिन्दगी से मौत तक आदमी एक भेड़चाल में चला जा रहा है। उसे पता ही नहीं कि कहानी कहां से शुरू हुई और कब्र का ये गड्ढा कब आ गया।

नकल क्या है?
नकल एक विवशता है: जब जिन प्रश्नों के उत्तर हमें नहीं सूझते, उन दुर्बोध प्रश्नों के उत्तरों के लिए हम नई, पुरानी किताबों, गुरूओं या दूजों के विचारों, धारणाओं में उनके उत्तर ढूंढते हैं। यानि ये हमारी प्रश्न का उत्तर ना पा पाने की अक्षमता है। इसलिए हम दूसरों का कहा हुआ मान लेते हैं, हकीकत वही रहती है कि हम उस विषय के बारे में जानते नहीं है। ये सब हमारे बचपन में किया जाने वाला वो काम है जिसके तहत जब हमें कुछ समझ नहीं आता तो हम प्रतिक्रिया में वही करते हैं जो सामने वाला कर रहा है।

नकल अक्षमता है: नकल करने का यह भी मतलब है कि आप मौलिक सोच-विचार करने में अक्षम हैं। आपका विषय विशेष के बारे में कोई समझ, अनुमान या ज्ञान नहीं है, आपका दिमाग उस विषय या कार्य को नये तरीके से देख ही नहीं पा रहा। सामने क्या क्रिया हो रही है उसे हम पहचान ही नहीं पा रहे हैं।

नकल मूढ़ता है: यदि आप शेव बना रहे हैं तो आपकी देखा-देखी बन्दर उस्तरे से अपने गाल छील लेगा। इसी तरह दूसरे की गतिविधियों की नकल उतारना आपकी जिन्दगी में खतरनाक हो सकता है। आपको याद है दिल्ली में रेडियोएक्टिव पदार्थ पकड़ा गया था, उसकी चपेट में आने वाले ऐसे ही लोग थे जिनको उसकी कोई जानकारी, ज्ञान नहीं था। या उन्हें यही पता हो कि यह कीमती चीज है पर कितनी खतरनाक इसका अंदाजा ही नहीं था।

हम नकल क्यों करते हैं?
सुविधा: क्योंकि इसमें हमारे दिमाग पर जोर नहीं पड़ता। हमें सब पका पकाया मिल जाता है, दूसरों का लिखा, पढ़ा या सुना देखा हुआ। हमें बस यंत्रबद्ध होकर वही करना है जो पहले भी हो चुका है। यानि लकीर का अनुसरण ही तो करना है। इससे मार्ग पर आने वाले विध्न बाधाओं की आशंका भी नहीं रहती। पर इन सभी आसानियों और सुविधाओं के कारण किसी भी विषय या कार्य में सामान्य और विशिष्टता का भेद पैदा होता है। अर्थात् एक ही तरीके से करने वालो को असफलता ओर संघर्ष तथा अपने विशेष गुणों से किसी कार्य को खास तरीके से करने वाले को अभूतपूर्व सफलता व समृद्धि मिलती है।

विषय के सच झूठ में अन्तर कर पाने की असामर्थ्‍य : जब हम किसी विषय या कार्य की असलियत से वाकिफ नहीं होते तब भी हम अनुसरण या नकल की वृत्ति की चपेट में आ जाते हैं। हमारे एक मित्र थे। अपने दफ्तर के सामने ही बन रही इमारत में लगे एक ठेकेदार को देखा कि साल भर में ही उसने एक खुदाई मशीन से कमाई करके दूसरे खुदाई मशीन भी खरीद ली है। तो हमारे मित्र ने भी अपनी बरसों की जमा पूंजी से एक खुदाई मशीन खरीद ली। अब इस ठेकेदारी क्षेत्र के उतार चढ़ाव से तो वो परिचित नहीं थे। 2 - 4 महीने मशीन किराये पर रही, निश्चित आमदनी देती रही फिर महीनों बेकार पड़ी रही, समय समय पर ड्राइवर भी नहीं मिलते थे। डेढ़ साल बाद ही उन्हें वह मशीन बहुत ही घाटे में बेचनी पड़ी, फिर तो किसी भी अनजाने क्षेत्र में प्रवेश से या अन्धानुकरण से तौबा कर ली।

यथार्थ या सत्य से पलायन : क्योंकि यथार्थ और सत्य बड़ा ही अनिश्चित, भलाई या बुराई से परे, सुविधा असुविधा से परे होता है इसलिए इन सब बातों से बचने का हम एक आसान सा शार्टकट ढूंढते हैं। हम सड़क पर पड़े पत्थर की पूजा करने लगते हैं, अपने ही भावों और भजनों से उसमें प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। वो पत्थर हमारी ही पूजा, भक्ति, श्रद्धा के अनुसार हमारे ही चेतन-अचेतन द्वारा तय परिणाम देने लगता है। ईसाई को पूजा पाठ में सफल होने पर गणेश जी नहीं दिखते ईसा ही नजर आते हैं। मुसलमान को बन्दगी सफल होने पर आयतें सुनाई पड़ती हैं, ना कि गीता के श्लोक। यह पत्थर प्राचीन हो यानि कोई मन्दिर, मस्जिद जितना ही पुराना हो, पुरानी शराब सा वह उतना ही मादक होता है। कहने का मतलब ये कि जिस रास्ते पर करोड़ों लोग गयें हों उसी रास्ते पर चलने में ज्यादा मजा आता है, बनिस्बत कांटे हटाकर, गड्ढे भरकर, खाईयां पार कर, पहाड़ चढ़कर नये रास्तों पर जिन्दगी के सच देखने के।

स्वाभिमान का अभाव : जब किसी में स्वाभिमान का अभाव होता है तो वो ऐसे सारे कार्यों में आसानी से संलग्न हो जाता है जो दूसरे कर रहे हों, भले ही वो कार्य सही हों या गलत। किसी कार्य को अपनी विशिष्ट शैली में करने में जो आनन्द है उसका मुकाबला कोई भी ईनाम नहीं दे सकता। जब हम खुद में कुछ खास नहीं होते तभी हम दूसरों की तरह बनना चाहते हैं। अगर हम में कुछ खास है और उसे हम पहचान नहीं पा रहे तो भी हम दूसरों द्वारा किये जाने वाले, श्रेष्ठ घोषित कामों, चीजों की नकल करते हैं।

सुनिश्चितता: हम इस बारे में आसानी से सुनिश्चित हो जाते हैं कि ऐसा तो हो ही चुका है। हमें तो बस तयशुदा प्रक्रिया अपनानी है परिणाम भी वही होंगे जो तय हैं। ये वाक्य हमी ने तो गढ़ा हुआ है कि ‘‘इतिहास अपने को दोहराता है’’ जबकि इस इतिहास का आधार हम ही होते हैं ये आसमान से नहीं टपकता। हम खुद को दोहराते हैं। अनिश्चय के रोमांच में मजा है, पर ये बेहद तनाव भरा है इस तनाव में ना उतरने वाले भी तयशुदा यांत्रिक क्रियाओं में लगे रहते हैं।

प्रत्याशा: हम नकल इसलिए भी करते हैं क्योंकि अन्य को जो करने से लाभ हुआ होगा वही हमें भी होगा। उदाहरण तो सामने ही होता है, हमें बस वैसा का वैसा ही आचरण करना होता है। हम यह नहीं जानते कि किसी की देखा देखी किया गया कार्य वह परिणाम नहीं देगा जो हमारी शारीरिक मानसिक सामथ्र्य अनुसार कुदरती, स्वाभाविक, सहज प्रेरणा से किया जाने वाला काम।

लोभ: हममें यह लोभ होता है कि दूसरे ने उस कार्य को किया तो उसे बहुत मजा आया वही मजा हमें भी आयेगा जबकि ऐसा हो सकता है कि उस व्यक्ति ने कुछ ऐसे बिन्दुओं को बड़े ही मजे से पार कर लिया, या उसमें कुछ ऐसी जन्मजात विशेषताएं हों जो जिन्हें तय करने में आपकी उम्र ही निकल जाये। दूसरी बात यह भी है कि यदि एक बार हमें किसी काम को करने में बड़ा मजा आया तो वही मजा हम बार बार चाहते हैं पर हो सकता है वक्त के साथ बदले घटकों से वही खुशी दोबारा प्राप्त ना हो। हमारे जीवन में आनन्द हमेशा एक अलग अंदाज में आता है, जिससे पहचानना जरूरी है। इस प्राकर अतीत के अनुभवों का लोभ भी हम से नकल करवाता है।

संपूर्णतत्व का बोध: हमने ही एक और सिद्ध वाक्य बनाया हुआ है प्रैक्टिस मेक मेन परफेक्ट अर्थात ”अभ्यास से कार्य सिद्ध और व्यक्ति कुशल हो जाता है।“ लेकिन हम यह नहीं जानते कि हम उसी में संपूर्णत्‍व प्राप्त करते हैं जो हम कर रहे होते हैं और एक समय बाद यंत्र की तरह हमारी आदत भी घिसते घिसते क्षरण को प्राप्त होती है। यानि यदि आप कोई गलत कार्य कर रहे हैं तो गलती ही बढ़ते बढ़ते भयंकर परिणाम को प्राप्त होती है, अभ्यास से गलत काम सही नहीं हो जाता। क्या आपने ऐसे कारीगर नहीं देखे जो अपनी सारी उम्र एक ही काम करते रहे हों पर उन्हें उस कार्य की पृष्ठभूमि का ही ज्ञान नहीं। इसलिए भी लोग उम्र भर वह काम करते हैं जिसमें उन्हें भले ही रस ना हो। आपने ऐसे दसियों बरसों से चल रहे रेस्टोरेंट नहीं देखे जिनके आगे नया-नया आया खोमचे वाला महीनों में ही शहर वालों का दिल जीत कर होटल मालिक की ईष्र्या का कारण बन जाता है।

असंवेदनशीलता, आलस या झंझट में ना पड़ने की आदत: यानि जैसे कोई काम किया जाता है उसे वैसे ही जैसे-तैसे सम्पन्न कर के पिंड छुड़ाना। किसी कार्य की जटिलता, या उसके सत्य से, असलियत से पलायन करना। किसी भी कार्य को उसकी संपूर्णता में ना करने से उसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। पानी को उबलने की अवस्था में आने के लिए 100 डिग्री तापमान की जरूरत होती है इससे कम पर पानी नहीं उबलता। इसी तरह मनुष्य को नये विषय पर काम करने के लिए 100 प्रतिशत समर्पण चाहिये होता है पर अनमनापन, फुर्ती का अभाव और कठिनाईयों से जूझने की अनिच्छा आदमी को अतीत का अनुकरण कराती है। किसी कार्य मंे संपूर्णता या नवीनता के लिए अथक परिश्रम और बुद्धिमत्ता की आवश्यकता होती है। इन सब से बच के, केवल धकमपेल से, हम अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते।

लोकोपवाद: हमें यह संकोच और भय भी रहता है कि किसी कार्य को नई तरीके से सोचने-करने पर लोग क्या कहेंगे? हम असफल हो गये तो लोग कहेंगे कि देखो ये अपनी ही राह बनाने चले थे जब कि पारंपरिक रास्ता तो था ही। इसलिए भी हम रीति-रिवाजों, परपंराओं का अनुसरण करते हैं। पारंपरिक मार्ग की नकल या लोगों का अनुसरण करने पर लोग कुछ नहीं कहते और एक छद्म सपोर्ट मिलता है। पर बने बनाये रास्तें से आप नई मंजिलें नहीं तय कर सकते, नयी अछूती मंजिलों के लिए आपके कदमों को नयी राहों पर ले जाना होगा।

नकल के दुष्परिणाम:
हम वही गाना गाने लगते हैं जो पड़ोसी गा रहा है: पूंजीवाद, समाजवाद जैसे वादों के बारे में हम आसपास के लोगों की सुनी सुनाई बातों पर विश्वास कर लेते हैं। कभी कभी तो हमारे निर्णय बड़े ही बचकाने होते हैं। यदि हमारा कोई शासकीय काम कोई रिश्वत लेकर कर दे तो हम निकटवर्ती चुनाव में उसी पार्टी को वोट देंगे जिसने हमारा काम कर दिया। यदि हमें संस्थान की लेबर यूनियन में कोई पद मिल जाये तो हम समाजवादी या माक्र्सवादी हो जाते हैं। आपके सरकारी काम अटकने लगें, आपसे हुई लूट को थाने में दर्ज नहीं किया जाता तो हम नक्सली भी हो सकते हैं। लेकिन हम क्यों नहीं देखते कि इन सब बातों मंे हम अनायास ही किसी की नकल कर रहें या एक ढांचाबद्ध प्रक्रिया में लगे हुए हैं।

हम अंधविश्वास और विश्वास शब्द का प्रयोग भिन्न भिन्न अर्थों में करते हैं पर क्या कभी आपके मन में यह प्रश्न उठा कि इन दो शब्दों अंध-विश्वास और विश्वास में आखिर फर्क क्या है? रास्ते में बिल्ली रास्ता काट जाती है तो इसे आप अंधविश्वास कहते हैं पर यदि आप अपने किसी मित्र या रिश्तेदार के भरोसे थे कि वो आपकी आकस्मिक विशेष परिस्थितियों में मदद करेगा और वो ऐन वक्त पर फैल जाता है तो इसे आप विश्वास का टूटना ना कहकर अंधविश्वास क्यों नहीं कहते? आपके पीर फकीरों देवी-देवताओं के बारे मंे तो यह बात और भी भयानक साबित होती है। दोस्त नकारा निकल जाये तो आप उसे विश्वासघात कहते हैं पर देवता मनौती पूरी ना करे तो भय के कारण विश्वासघात जैसा इल्जाम नहीं लगाते बल्कि आसपास के लोगों की या बाजार में आजकल जिसकी मांग है उस परंपरा की देखा-देखी किसी दूसरे देवता की शरण ले लेते हैं। देवी देवता भी आपके अपने तय किये हुए नहीं बल्कि आपकी अपूर्ण इच्छाओं या दूसरे के सुझाये-दिखाये हुए हैं।

हमारे एक परिचित की बिटिया कि 12-14 वर्ष की अल्पायु में कैंसर से मृत्यु हो गई। उस समय वो जिन बाबा को मानते थे उनके कहे कर्मकाण्ड आदि करने, आशीर्वाद लेने के बाद भी यह सब हुआ तो उन्होंने उनको मानना छोड़ दिया... वापिस अपने देवी देवता की शरण में आ गये। फिर बरसों बाद उनके बेटे का विवाह के बाद नई बहू घर आयी तो समधियों के गुरू के वचनों में ही उन्हें मजा आने लगा। तो यह सब एक ‘‘मानने’’ कि प्रक्रिया है, जानने की नहीं।

दरअसल हम जानने से ज्यादा मानने में सुविधा पाते हैं। क्योंकि किसी भी विषय के बारे में जानने, समझने, बूझने में शारीरिक मानसिक श्रम लगता है, जो हम कदापि नहीं चाहते। मानने में ना कुछ लगता है ना जाता है, मुफत में कुछ उपलब्ध हो जाने या किसी तरह का संतोष या आशा मिल जाती है। जबकि ये मानने की प्रक्रिया एक तरह का पूर्वाग्रह है यानि जैसा आप चाहते हैं या मानते हैं वैसा मिल जाये तो उसकी शरण में बने रहना। हमारे मन को पंरपरा, रीति-रिवाजों, संस्कृति आदि में इस कारण ही रस आता है क्योंकि इन सबकी पूर्वनिर्धारित या ढांचागत प्रक्रिया है। नकल करने की वृत्ति इतनी गहरी है कि अपनी उम्र के बाद के वर्षों में हम अपनी ही पुरानी होती आदतों की नकल या अनुकरण में एक झूठा सुख हासिल करने लगते हैं। यदि इस सारी प्रक्रिया के बारे में हमें कोई बताये समझाये तो हम कहते हैं हम क्या करें, सारी उम्र तो यह किया अब फिर से कुछ नया समझें, तलाशें, करें अब नहीं होगा.... आदि आदि।

भौतिक जगत में अपने जीवन में व्यवस्था, शारीरिक सुविधा के लिए हमने यंत्र और अन्य साधन बनाये हैं जिनकी तयशुदा या ढांचागत, प्रतिक्रियाएं, गतिविधियां होती हैं -ये ठीक हैं, लेकिन हम मन की उड़ान को भय, अनिश्चितता, कठिनाइयों, नये अनुभवों से बचाकर तयशुदा राहों पर चलेंगे तो कहीं नहीं पहुंचेंगे। मजे मंजिलों पर नहीं, उन कदमों में होते हैं जो मंजिल तक पहुंचने के लिए हम तय करते हैं।

Friday, 18 June 2010

अध्ययन के समय ध्यान केन्द्रित करने के 7 तरीके


1. सभी कार्य अधिक ध्यानपूर्वक करें उदाहरणतः जब आप पढ़ रहें हो तो ‘‘केवल पढ़ें’’, कोई वाहन चला रहें तो ‘‘केवल वाहन चलायें’’। खुद से कहें कि आप ही को किसी विषय विशेष पर ध्यान केन्द्रित करना है और आप ही खुद को भटकने दे रहे हैं।
 2. प्रत्येक कार्य और कोई भी कार्य करते हुए उसमें अपना पूरापन उड़ेल दें, कुछ भी करते समय उसमें गलती की संभावना को न्यूनतम करते हुए शून्य पर लायें।
 3. विचारों को स्पष्ट रखें। लिखकर मिटाना या कागज फाड़ कर फेंक देना एक गंदा व्यवहार है। किसी बात को उसकी पूरी स्पष्टता से सोचें, शब्दों को आप अपनी विशिष्ट शैली में अनुक्रम दें, वाक्य बनायें और लिख डालें। किसी शब्द की संरचना के लिए डिक्शनरी की मदद लेने में संकोच ना करें।

4. अपनी पठन क्षमता या पढ़ने की सामथ्र्य बढ़ायें। प्रत्येक वाक्य का अर्थ समझते हुए ज्यादा से ज्यादा तेजी से पढ़ने की कोशिश करें, ताकि पूरे पैराग्राफ का एक निचोड़ वाक्य स्पष्ट रहे। जितना ही समय कम लगेगा, दिमाग ज्यादा केन्द्रित होगा।

5. किसी भी चीज का गहराई से विश्लेषण करें। हम किसी भी बात को गंभीरता, गहराई से नहीं देखते, यहां तक कि हम कार्य करते वक्त परिवेश का भी ध्यान नहीं रखते। तो किसी भी चीज पर ध्यान केन्द्रित करते समय समग्रतापूर्व दृष्टि रखें।

6. अपने आसपास घट रही घटनाओं, चीजों पर नजर रखें कि कब, कहां, कैसे, क्या हो रहा है पर उन्हंे अपने वर्तमान काम के आड़े ना आनें दें और वर्तमान विषय को ही प्रमुखता दें। देखें कि व्यवधान, बाधा क्या है, ध्यान भटकने के क्या कारण हैं।

7. किसी बड़े और कठिन लक्ष्य को सामने रखने पर घबराहट के कारण मन भटकता है, नकारात्मक विचार आते हैं। तो अपने बड़े लक्ष्य के छोटे छोटे हिस्से करें, इतने छोटे कि कुछ मिनटों या घंटों में उस लक्ष्य के प्रति कुछ कार्य कर सकें। उन छोटे-छोटे कार्यों को सम्पन्न करते जायें, यही जुड़कर उस बड़े लक्ष्य को सम्पन्न कर देंगे। याद रखें समतल रास्ते तय करने हों या एवरेस्ट हम एकत्र-एक कदम चल कर ही दूरी तय कर सकते हैं।

पढ़ते समय ध्यान केन्द्रित करने के तीन चरण
1. पता लगायें कि कारणों से आपका ध्यान भटक रहा है, ना तो बार-बार उठ जायें ना ही जम कर बैठ जाने का संकल्प लेकर खुद से जबर्दस्ती करें।
2. भटकाने वाले विचारों को देखते चले जायें और इस बात को समझें कि आप इन कारणों को दूर करने की बजाय वर्तमान विषय का अध्ययन कितना महत्वपूर्ण है।
3. किसी विषय पर पूर्वधारणा बनाने, स्वीकारने या नकारने की बजाय उस सारी बात को समझ लेने की आदत बना लें।

अन्य कारणों और उनके निवारण हेतु यह महत्वपूर्ण चार्ट देखें:

Thursday, 17 June 2010

कहीं इलाज ही आपको बीमार ना कर दे?


सावधानी प्रत्येक उपचार की माँ है परन्तु आज के आदमी की सबसे बड़ी तकलीफ - वो इतना व्यस्त है कि सावधान या होश में रहने में उसे बड़ी तकलीफ होती है। वो चाहता है कि सारे समाधान पके-पकाये उसकी जद में आ जायें। लेकिन यदि आप चाहते हैं कि आप स्वस्थ, सकुशल जिन्दा रहें तो आपका सावधान रहना ही किसी भी युग या काल में आपकी हर समस्या का समाधान हो सकता है।

क्या आपको कभी सिरदर्द हुआ तो आपने झट उस प्रचलित ब्रांड की गोली नहीं ले ली जो बचपन से दिन में कई बार रेडियो, टीवी, अखबारों में गूंजती रही है। पेट, दांत, बदन दर्द, जुकाम-बुखार, खांसी जैसे आम रोगों पर हम झट अपने आत्मविश्वासपूर्ण ज्ञान के हिसाब से एलोपैथिक गोलियां या कैप्सूल्स गटक जाते हैं। ऐसा भी होता है कि पिछली बार जिस बीमारी के लिए डॉक्‍टर ने जो दवाईयां लिखीं थी हफ्तों, महीनों या साल बाद पुनः उसी बीमारी की चपेट में आने पर हम डॉक्‍टर के पर्चे में लिखी वही दवाईयां लेने कैमिस्ट की दुकान पर पहुंच जाते हैं। ये समझदारी है या नादानी?

कभी कभी हम डॉक्‍टर के मुंह से ये भी सुन लेते हैं कि खुद ही डॉक्‍टर  ना बनें, पर इसमें क्या बुरा मानने जैसी बात है? हम अपनी ही एक भूतपूर्व सहकर्मी को जानते हैं जो केवल साक्षर थीं, उनको उनके ही किसी संबंधी ने एक पुस्तक भेंट दी थी जिसमें सामान्य रोगों की जानकारी और उनके एलोपैथिक उपचार स्वरूप ली जाने वाली औषधियों का वर्णन था। वो हिन्दी-साक्षर महिला जिसे अंग्रेजी की दवाईयों के लिखे हुए नाम भी पढ़ने नहीं आते थे वो अपने सिर, पेट, बदन दर्द का इलाज उसी किताब में लिखी दवाईयों से कर रही थी। मैंने उन्हें इसकी गंभीरता और भयावहता को समझाने की कोशिश की परन्तु... असर तो वही होता है जिसकी इजाजत हम स्वयं खुद को दें।

आजकल इंटरनेट पर दवाइयों की जानकारियां देने वाली साईटों की संख्या बढ़ती जा रही है। इनमें कुछ साईट्स दवा कंपनियों की होती हैं, कुछ चिकित्सा संस्थानों की... और आप जानते हैं कि कोई भी दवा निर्माता कंपनी दवा विशेष के उपयोग के 36 कारण गिना सकती है, इनमें आप किस वजह से ये दवा खायेंगे और आपके शरीर के इतिहास के हिसाब क्या असर होगा यह कहीं नहीं लिखा, इस बारे में एक जिन्दा और योग्य चिकित्सक ही कुछ समाधान दे सकता है। जब आप दवा खाने जा रहे हैं तो यह इन सवालों के बारे में सोचें -

- क्या ऐसा नहीं हो सकता कि आपको बुखार, दस्त या पेट, बदनदर्द तो हो पर उसकी वजह वो ना हो जो पहले कभी थी?
- क्या ऐसा नहीं हो सकता कि इस बार हुआ रोग या जुकाम बहुत ही साधारण हो और आप जुकाम की दवाई की भारी खुराक ले रहे हों?
- सीने में उठ रहे दर्द की वजह गैस का बनना है, सीने में कफ जमना है, दिल की धमनियों में अवरोध है, या दमें के कारण.... क्या ये सब आप ही तय कर ले रहे हैं?
- एक ही समय में उभरे दो रोगों के लक्षणों में से किसका प्राथमिक रूप से निदान करना है ये कौन तय करेगा?
- हो सकता है कोई दवाई तत्‍कालि‍क रूप से आपको आराम दे पर बाद में बुरे साइड इफेक्‍टस।

ये सारे प्रश्न इस बात की ओर इशारा करते हैं कि अपनी किसी बीमारी के बारे में हम पूर्वधारणा बनाकर, खुद अपनी तीमारदारी के चक्कर में खुद को किसी रोग की गंभीर अवस्था में तो नहीं डाल रहे?

किसी रोग के बारे में हमारी सोच सकारात्मक हो या नकारात्मक .... हमें कई तरह के जैसे आर्थिक, सामाजिक, मानसिक, शारीरिक दुष्परिणाम दे सकती है। ये भी हो सकता है कि रोग छोटा सा हो पर आप उसे पढ़ी-सुनी बातों के आधार पर बड़ा कर डालें। जैसा कि मेरे एक मित्र के साथ हुआ। मामूली सिरदर्द था जो कि नियमित नहीं था। पर किसी फिल्म का प्रभाव था या किसी निकट संबंधी से प्राप्त किसी बीमारी की जानकारी। मेरे मित्र ने अपने सिर को तीन बार स्केन करवाया। एक डॉक्‍टर ने कहा कि कुछ नहीं है तो उस पर उन्हें विश्वास नहीं हुआ, दूसरी बार लेब टेक्नीशियन ने उन्हें कन्फर्म किया कि परिणाम कुछ अनियमित हैं (जो कि प्रत्येक व्यक्ति के हिसाब से अलग अलग हो सकते हैं) तीसरी बार डाॅक्टर ने भी  मित्र की हां में हां मिलाई। कुछ दिन दवाईयां खाईं फिर लगा कि कोई पाजीटिव या निगेटिव असर नहीं है तो खुद ही छोड़ छाड़ दीं। पर इस बीच ही उन्होंने अपने दिमाग का रोना रो रोकर लोगों के मन में शक पैदा किया, जांचों डॉक्‍टरों की फीसों में हजारों के नोट गंवाए अपने जिस्म में जो रसायन डाले उनका असर क्या हुआ ये भगवान ही जाने। तो ये मुद्दा बड़ा ही संवेदनशील है।

एक बार हमें पेट में दर्द रहने लगा, हफ्ते दस दिन की निगरानी के बाद भी सामान्यीकरण के आसार ना देख घर के ही निकट रहने वाले एक अविख्यात से डॉक्‍टर वर्मा जी के पास गये। पर क्‍लीनि‍क  के अंदर जाने पर दिखा कि नजारा कुछ और ही था। बरसों पहले के अनाम से डॉक्‍टर वर्मा जी तो वी सुमित वर्मा जी निकले जिनका शहर के बीचों बीच बड़ा उदररोग अस्पताल है। क्‍लीनिक पर सामान्य 100-150 के स्थान पर फीस 400 रू. की फीस से झटका लगा, वर्मा जी ने कि कहा कि हम उनको अस्पताल में मिलें वो जांच वगैरह करेंगे। अस्पताल में लम्बी लाईने लगीं थी। पूरा दफ्तरी माहौल था। जब डॉक्‍टर का पर्चा हमने वहां मौजूद एक अधिकारीनुमा व्यक्ति को दिखाया तो वो बोला कि आपको कुल जमा 5000 रू कि जांचे करवानी हैं उसके बाद ही डॉक्‍टर के पास जाना/मिलना हो पायेगा क्योंकि तभी वे कुछ बता पायेंगे। हमारी सिट्टी पिट्टी गुम, हमने अस्पताल के बाहर आकर डॉक्‍टर को फोन लगाया कि सर गरीब आदमी हैं हमारी तो एक तनख्वाह ही आपकी जांचों में निकल जायेगी, कृपया उचित दवाई गोली लिख दें फिर जो होगा भगवान पर। डॉक्‍टर को शायद रहम आया उन्होंने तुरन्त आने को कहा। हमने अधिकारीनुमा व्यक्ति को जाकर कहा कि डॉक्‍टर ने खुद बुलाया है वो कैबिन में गया और पूछकर हमें साथ ले गया। डॉक्‍टर ने ऊपर से नीचे तक देखा और शोषण के अयोग्य पाकर हमारे अस्तित्व के नकारापन को लानत देते हुए उस रोग का सामान्योपचार लिख दिया। ईश्वर की कृपा से 4 दिन में में सुखद परिणाम रहे और फिर सालों बाद तक सकुशल रहे।

तो बीमार होने इन बातों का ख्याल रखना बेहतर हो सकता है?
- बीमारी के बारे में अपने कहीं से लिखे, पढ़े या सुने मुताबिक कोई पूर्वधारणा ना बनायें। यानि कि ना तो बीमारी को हल्का लें ना ही इतना गंभीर कि आपकी सोच ही अमल में आने लगे।
- खुद दवाईयां लेना किसी भी परिस्थिति में गंभीर हो सकता है, इस बारे में तो महंगे या सस्ते किसी योग्य डॉक्‍टर का परामर्श ही आधार हो सकता है।
- बच्चे हों या बड़े,  कुछ बीमारियों के घंटों मिन्टों में ही मिजाज बदलते देर नहीं लगती, तो सावधानी में ही सलामती है। हमारा जरूरत से ज्यादा आलस्य या फुर्ती दोनों नुक्सानदायक हो सकते हैं। क्योंकि हो सकता है कि आलस्य से बीमारी बढ़े या फुर्ती दिखा कर हम तीन दिन में 2 डॉक्‍टरों की दवाईयां खा लें और चौथे दिन बीमारी अपने आप ही ठीक हो सकती हो।

हमारा अपना बड़ा दुराग्रह था आयुर्वेदिक चिकित्सा को लेकर। एक बार पीलिया हुआ, जांच में मात्रा 7 बिन्दु तक पाई गई। निकट के रिश्तेदारों के सुझाव पर, उनके पुत्र के इसी रोग का निदान करने वाले, एक आयुर्वेदिक चिकित्सक कमाल पाशा के पास गये। उन्होंने एलोपैथिक डॉक्‍टरों की तरह ही 40 दिनों में 4 बार रक्त की जांच करवाई दवाईयां बदल बदल कर देते रहे। हालत ये हो चली की जिंदगी में पहली बार दुबलेपन और शारीरिक अशक्तता का क्या अर्थ होता है समझ में आ गया। थक हार कर, शहर में अपोलो अस्पताल की नई नई खुली ब्रांच में गये जहां कि महज 3 दिन की खुराक से जिस्म पटरी पर लौट आया। तो हमने जाना कि आयुर्वेदिक, ऐलोपैथिक, हौम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति तो अपनी जगह है डॉक्‍टर ही योग्य ना हो तो क्या कर लोगे। मुझे अपने ग्रामीण रिश्तेदारों की स्थिति का भान हुआ। पिछले 30 वर्षों से गांव में (शहर में झोलाछाप डॉक्‍टर कहे जाने वाला) एक डॉक्‍टर कुनैन की कड़वी गोली और लाल शर्बत या सामान्य मलहमों से ही सारे ग्रामीणों का इलाज करता आया है ऐसी नौबत कम ही आयी कि स्थिति उस झोलाछाप डॉक्‍टर के वश से बाहर हो गई हो।

कुछ बातें डॉक्‍टरों के बारे में भी खयालों में आती हैं-
- प्रत्येक उपचार के लिए किसी ना किसी तरह की जांच ही आजकल के डाॅक्टरों के उपचार का आधार है, क्या पिछली सदियों में जो डॉक्‍टर अनुमान से कर रहे थे वो सब गलत था या मजबूरी थी ? या आयुर्वेदिक डॉक्‍टरों की तरह ही एलोपैथिक वैज्ञानिक डॉक्‍टर भी तुक्के लगाकर ही काम चला रहे थे।

- एक्स-रे, सीटी स्केन जैसी जांचें मनुष्य के शरीर के लिए आज तक भी पूर्णतः सुरक्षित नहीं हुई हैं। डॉक्‍टर सलाह देते हैं कि इस तरह की जांचें एक अंतराल के बाद ही और सकुशल तकनीशियन से ही, कराया जाना उचित है। अंग विशेष के अनुसार भी इन विकिरणों के दुष्प्रभाव आम या खास होते हैं। जांच प्रयोगशालाओं से सेटिंग के कारण कई डॉक्‍टर अक्सर जांचें लिखने में तत्परता दिखाते हैं जो कि कई बार अनावश्यक होती हैं।

- कुछ दवाईयां एक रोग के निदान के लिए तो पूरी तरह समर्थ होती है पर कुछ समय लेकर भयंकर परिणामों का कारण भी होती है। कुछ दवाईयां बहुत ही जरूरी होती हैं पर आम आदमी को जिन्दगी के दर्दों से छुटकारा दिलाने में प्रवृत्त सरकारों की अनुमति और दवा कंपनि‍यों के लालच से ये दवाईयां अपने साइड इफेक्टस की अपूर्ण जानकारी के ही बाजारों में प्रसारित हो जाती हैं। इसलिए अपडेटेड डॉक्‍टर के पास ही जायें, जिसे इस बात की जानकारी हो कि कौन सी दवाईयां किस कारण, किस देश में प्रतिबंधित हो चुकी हैं। पुराने इलाजों से ही काम चला रहे डॉक्‍टर पुरानी दवाईयों के जाहिर हो चुके दुष्परिणामों से बेखबर होकर रोगी को साईड इफेक्ट दे रहे होते हैं।

मानसिक, मौसमी और एलर्जिक रोगों के बारे में रोगी ज्यादा बता सकता है कि किन चीजों या परिवेश से वह कितना प्रभावित होता है। इसी तरह कुछ बातें पूरी तरह रोगी की ओर से स्पष्ट होना जरूरी हैं, क्योंकि हो सकता है समयाभाव या किन्हीं कारणों से डॉक्‍टर कुछ प्रश्न पूछे ही ना। किसी भी रोग के बारे में बिना मान अपमान की चिंता, शर्म लिहाज किये हमें चिकित्सक को सारा अतीत जाहिर कर देना चाहिए। हमारी समझदारी किसी भी डॉक्‍टर के अचूक निदान का कारण हो सकती है। अतः जरूरी है हम खुद से ही ये प्रश्नों के उत्तर पूछकर डॉक्‍टर के समक्ष उपस्थित हों।

- हम रोग के प्राथमिक लक्षणों को किस गंभीरता से ले रहे हैं?
- पिछली बार रोग के लक्षणों, आक्रमण की क्या स्थिति थी?
- अपने पुश्तैनी रोगों के बारे में हमें कितनी जानकारी है?
- अपनी मानसिक, शारीरिक प्रकृति और रोग के इतिहास को हम डॉक्‍टर को कितना स्पष्ट कर पाये हैं?
- पहले कभी किन दवाईयों के हमारे शरीर पर क्या साइड इफेक्ट रहे?
- खान पान की मात्रा और कि‍न चीजों को हमारा शरीर आसानी से स्‍वीकार कर लेता है और कि‍न आम चीजों से ही तकलीफ या समस्‍याएं खड़ी होने लगती हैं।

एलोपैथि‍क डॉक्‍टर अक्‍सर खानपान से संबंधि‍त कि‍सी खास परहेज की बात नहीं करते दि‍खते, वहीं हौम्‍योपेथि‍क चि‍कि‍त्‍सक का बुनि‍यादी परहेज ही ये है कि‍ मीठी गोलि‍यों के 30 मि‍नि‍ट पहले और बाद  में क्‍या खाना है और क्‍या नहीं। आयुर्वेदि‍क चि‍कि‍त्‍सक भी तेल, खटटा और तीखे खाद्य से दूर रहने की समझाइश देते हैं लेकि‍न ये तो हम ही अपने बारे में बता सकते हैं कि‍ हमारी जुबान पर हमारा कि‍तना वश चलता है। डॉक्‍टर खुदा तो नहीं पर खुदा से कम भी नहीं, अगर ये वि‍श्‍वास मरीज ही डॉक्‍टर को दि‍ला सके तो दोनों के लि‍ये भला ही होगा।

हमने देखा कि किस तरह रोग कोई हो... चाहे दैविक या दैहिक, हर कदम पर सावधान रहने की जरूरत है। रोगी यानि हम स्वयं, दवाई, और डॉक्‍टर इन सबसे पहले यदि ‘‘सावधानी’’ रहे तो रोग पैदा होने से पहले ही खत्म हो सकता है, पैदा हो गया है तो शीघ्र खत्म हो सकता है और लाइलाज है तो हम अपनी पूरी उम्र तक पूर्ण सक्षमता से जिन्दगी के मजे ले सकते हैं।

Tuesday, 15 June 2010

उस मिट्टी में सौन्दर्य की प्रवाहना सी है


मेरी काया में जो आत्मा सी है
उसके लौट आने की संभावना सी है


वो बदल ले मार्ग या सम्बंध बदल ले
वही रहेगी, जो प्रेम की भावना सी है

मैं पानी की तरह पटकता रहूंगा सर
उस पत्थर में विचित्र चाहना सी है

मैं क्यों उस मौन को नकार मान लूं
उस मौन में मेरी सराहना सी है

छानूंगा, गूंथूंगा, गढूंगा, कभी तो संवरेगी
उस मिट्टी में सौन्दर्य की प्रवाहना सी है

Monday, 14 June 2010

तुम कहती हो - ना डरा डरा सोचूं जो भी सोचूं हरा भरा सोचूं


तुम कहती हो ना
ना डरा-डरा सोचूं
जो भी सोचूं हरा-हरा सोचूं
तुम्हीं बताओ कैसे?

तुम बस एक ही बार मिली थी
मुझे साफ-साफ दिखा था
कि अब कोई मंजिल बाकी नहीं
पर तुम चलीं गयीं
अब सब बाकी है तुम्हारे सिवा
डर, घृणा, झूठ, बेबसी, अफसोस
और रोतले गीत, सिसकती गजलें

और अब फिर
क्या पता तुम हो भी कहीं?
वैसे ही जैसे कि
महसूस होती हो मेरे आसपास
तुम कहती हो - ना डरा डरा सोचूं
जो भी सोचूं हरा भरा सोचूं
तुम्हीं बताओ कैसे?
कि गांव खत्म हो गये हैं?
जहां बिना मतलब के बात करने वाले लोग थे
अब तो मुझे खुद
किसी से बेमतलब शब्द कहे या सुने
बरसों हो गये हैं

तुम थीं,
तुम कुछ भी नहीं थीं, ...
फिर भी तुम्हारा इंतजार रहता था
मैंने अजनबी होते हुए भी
तुमसे सबकुछ कहा था
यहां तक कि
वो सच भी
जिसे कहा नहीं जाता
‘‘कि मैं तुमसे प्यार करता हूं’’
पर तुमने सुना ही नहीं।
तुमने बरसों फैले
रेगिस्तान पर छोड़ दिया है रेत सा
और अब लौटी हो
एक मरीचिका बनकर
और कहती हो
कि जो भी सोचूं हरा हरा सोचूं।

पता नहीं तुम धोखा हो
या मेरा बुना हुआ सच
या पता नहीं किया
तुम बोलती हो मुझमें
या तुम्हारे बहाने में खुद से ही
बातें करने लगा हूं।
रेगिस्तानी सन्नाटे,
खुद से ही बातें करते हैं।

और देखो ना
कितना गहरा रेगिस्तान है
सीमेंट की इमारतें
लोहे की रेलिंग्स
गलतफहमियों की तरह
उस राह के हर ओर सजी हैं
जिस पर हजारों लाशें बिछीं हैं
जिन लाशों को
जिन्दा से दिखते लोग
रेत का भाव भी नहीं देते।

तड़क-भड़क-हवस से भरे माॅल
और अजनबी सी अंगे्रजी में
किसी भी उम्र की भीड़ में
तुम कहीं नहीं दिखती
ना मैं ही लायक रहा हूं
कि कॉल सेन्टर में काम कर सकूं

मेरे जिस्म में कुछ ढल सा गया है
जानबूझकर गलत अंजामों को जानते हुए
अब लड़ा सा नहीं जाता

बस कभी कभी
यही उम्मीद चमकती है
कि तुम थके हुए पार्कों में
कहीं मिल जाओ
अपने खेलते हुए बच्चों के किनारे
उस सुलझी हुई जिन्दगी से उदास
जिसके लिए
तुमने किसी भी प्रेम की आवाज
नहीं सुनी थी।

जो रहस्यमयी ऊर्जा से भरी आवाज
बहुत मंद हो कर
दुनियां के नक्कारखाने में
जब तब होती मौतों पर
अकेली ही गूंजती रहती है
जिसे कमउम्र लोग
निपट लीचड़पना और बोरियत
या राशिफल में लिखे
किसी आशंका सा
अपशकुन समझते हैं।

क्या पता तुम हो या नहीं ?
क्या पता मैं कितना बचा हूँ?

Monday, 7 June 2010

अब कोई नहीं लौटेगा वहां


कहीं मिलते कभी, कुछ कही, कुछ सुनी होती
कभी दीवानों की कोई याद ही बुनी होती
यूं तो सबने ही चले जाना है
इस दुनियां से किसी अजनबी सा
किसी के ख्यालों की कोई राह ही चुनी होती

तुम तो बेगाने रहे, बेगाना ही हमको जाना
ना कभी शिकवा किया, ना कभी मारा ताना
ख्वामखा ख्यालों में जवानी का मौसम गुजरा
कुछ एक पल के धागे, हमको भी दिये होते
सासें भी ली हैं, आहें भी जी हैं और हर पल मरें हैं
कि उम्रें गुजरीं, हम भी कभी जिए होते

अफसोस ज्यादा है उस गम से, जो मिला ही नहीं
हमको गिला यही कि, तुमसे कोई गिला ही नहीं
कोई वादा नहीं किया, कोई रिश्ता नहीं बना
ना मुड़के देखा तुमने, कारवां तन्हाईयों का
हम ही अन्जान रातों में उस चांद से बातें करते हैं
उस चांद का जो अपना कभी रहा ही नहीं

उस चांद का तो पता नहीं, किस आसमान में खो गया है
बस काले दिन हैं, और जलन भरी राते हैं
चांदनी डसती है, दीवानाघर की दीवारें तरसती हैं
कि कभी तो आयेगा हकीकत-सा, कोई मिलने वाला
वैसे साये सा नहीं, जो खुद ही कोई बुन लेता है।

Friday, 4 June 2010

ऐसा भी हुआ


नहीं ऐसा भी नहीं, कि हम खाली हाथ लौटे
उसके दर से लौटे हम, नई हसरत लिये हुए

Tuesday, 1 June 2010

ये ख्याल कब तक


इस सफर से,
मेरी मर्जी ना पूछ।
हवाओं से मजबूर तिनकों की,
क्या कोई मर्जी होती है?

जो भी अपना है,
बस उतना ही अपना है,
जितनी की मेरी गलतफहमी।

पता नहीं वक्त क्या होता है,
मंजिल क्या होती है।
ये ख्याल कब तक पलता है,
ये जिस्म कहां ढलता है।