Saturday, 24 July 2010

यदि‍ आप पेस्‍ट करना नहीं जानते तो कॉपी ना करें


शहर के एक प्रतिष्ठित सभागृह में एक प्रसिद्ध धुरंधर दार्शनिक-वक्ता अपने श्रोताओं से घिरा हुआ था।
वह बोला: वह मेरी जिन्दगी के बेहतरीन साल थे जो मैंने एक ऐसी औरत की बाहों में बिताये जो कि मेरी पत्नी नहीं थी।
उस प्रसिद्ध वक्ता के इस वाक्य से सारे हॉल में सन्नाटा छा गया, लोग स्तब्ध थे।
तभी वक्ता ने अपने वाक्य में जोड़ा ”और वो थी मेरी माँ।“
चारों ओर हर्ष छा गया। हॉल दार्शनिक की उच्च नैतिकता की प्रशंसा में तालियों से गूंजने लगा।

एक सप्ताह बाद की बात है। इसी प्रसिद्ध वक्ता के एक शिष्य ने उपरोक्त रोमांचक वाक्यों से अपनी भली छवि गढ़ने के लिए, इन्हें घर में अपनी पत्नि के साथ आजमाना चाहा।

महाशय आज की शाम को दोस्तों के साथ बार में बिता कर आये थे, हल्का-हल्का सा नशा चढ़ा हुआ था, पत्नी किचन में चावल उबलने रख रही थी।

तभी बड़े दार्शनिक अंदाज में पति के मुंह से निकला - वह मेरी जिन्दगी के बेहतरीन साल थे जो मैंने एक ऐसी औरत की बाहों में बिताये जो मेरी पत्नी नहीं थी।

पत्नी ने यह सुना तो दुख और क्रोध से थर थर कांपने लगी।

पति यह वाक्य कहने के बाद पत्नि के हाव भाव देखने लगा, पर मिनिट भर के अंतराल के बाद नशे में उसे खुद याद नहीं रहा कि आगे कौन सा समापन वाक्य कहना है, या वह औरत कौन थी।
पर समय गुजरने के बाद जब पति महाशय होश में आये वो किसी अस्पताल के एक बेड पर थे। सारे शरीर पर उबलता हुआ पानी डाल देने से बने फफोलों का इलाज चल रहा था।

शिक्षा: यदि हम यह नहीं जानते कि कहां, क्या और कब पेस्ट करना है तो हमें कॉपी नहीं करना चाहिये, कम्प्यूटर पर भी ...... जिन्दगी में भी।

Friday, 23 July 2010

भारत की सांस्‍कृति‍क वि‍रासत


दृश्य एक:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं तीसरा आता है, उन्हें लड़ते हुए देखता और चला जाता है।
जी हॉं यह मुम्बई है।

दृश्य दो:
दो व्यक्ति लड़ते लड़ते अचानक चले जाते हैं और अपने दोस्तों यारों को ले आते हैं इस प्रकार एक जगह पर 50 लोग लड़ते-भिड़ते हुए मारकाट मचा देते हैं।
जी हॉं यह पंजाब है।

दृश्य तीन:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं तीसरा आता है और बीच बचाव करने की कोशिश करता है। इस पर लड़ने वाले दोनो लोग बीच बचाव की कोशिश करने वाले को ही पीटने लगते हैं।
जी हॉं यह दिल्ली है।

दृश्य चार:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं और तमाशा देखने के लिए काफी भीड़ इकट्ठी हो जाती है। तभी एक व्यक्ति आता है और चुपके से चाय का ठेला लगा कर चाय बेचना शुरू कर देता है।
जी हॉं यह अहमदाबाद है।

दृश्य पांच :
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं और एक तीसरा व्यक्ति उन्हें लड़ते हुए देखता है, वो अपना लेपटाॅप खोलता है और लड़ाई से बचने के लिए एक साफ्टवेयर विकसित करता है। लेकिन लड़ाई नहीं रूकती क्योंकि साफ्टवेयर में वायरस होता है।
जी हॉं यह जगह बैंगलोर है।

दृश्य छ:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं और भीड़ इकट्ठी हो जाती है। तभी एक व्यक्ति आता है और कहता है अम्मा को यह सब पसंद नहीं है, इस पर लोग तितर बितर हो जाते हैं।
जी हॉं यह जगह चैन्नई है।

दृश्य सात:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं तभी एक तीसरा व्यक्ति आता है और बताता है कि सही कौन है, इसी तरह दो चार और लोग आते हैं और सभी बतातें हैं कि कौन किस तरह सही है, जबकि कोई किसी की नहीं सुन रहा।
जी हॉं यह जगह कोलकाता है।

दृश्य सात:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं तभी एक तीसरा व्यक्ति आता है और कहता है मेरे घर के सामने मत लड़ो, लड़ो पर कोई और जगह तलाश कर लड़ो।
जी हॉं यह जगह केरल है।

दृश्य आठ:
दो व्यक्ति लड़ रहे होते हैं तभी एक तीसरा व्यक्ति बियर की बोतलों की पेटी लेकर आता है। सभी एक दूसरे को गालियां बकते हुए बियर पीतें हैं और दुबारा मिलने का वादा कर अपने अपने घर चले जाते हैं।
जी हॉं यह जगह गोवा है।

Saturday, 17 July 2010

फिर से गलत अनुमान था मेरा।


तुमको अपना समझ लिया था,
फिर से गलत अनुमान था मेरा।

इन्‍कार उन्‍होंने नहीं कि‍या था

बस इतना सम्मान था मेरा।

सारे सितम हँस के सहता था
ये किस पर अहसान था मेरा?

जीते-जी कभी नहीं मिला था,
हाँ! वही तो भगवान था मेरा।

बरसों पहले भूल गया था,
क्या पहला अरमान था मेरा।

रोता और भड़क जाता था,
अभी जिन्दा इंसान था मेरा।

घुड़की-गाली सुन लेता था,
अहं नहीं परवान था मेरा।

Monday, 12 July 2010

तुम्‍हारे लि‍ये ही......


मुझे तुम्हारा बहुत ही इंतजार था
मैंने तुम्हारे सपने देखे
मैं दुनियां की भीड़ में अकेला
तुम्हारे लिये तरसता रहा
ऐ मेरे दोस्त
मुझे रोजी-रोटी और बोटी से फुरसत ही नहीं मिली
कि उन लम्हों का आयोजन कर पाता
जिनसे मेरी जिन्दगी कहे जाने वाले लम्हे
कुछ और लम्बे हो जाते
बच अचानक
कभी पान की दुकान पर,
कभी पंचर बनाते हुए,
कभी चैराहे पर लालबत्ती के ट्रेफिक में ठहरे हुए
कभी बाजार में सब्जी खरीदते वक्त
या
बिजली का बिल जमा करते हुए
या
नेट पर कभी कभार!
तुम्हारे साथ
गंदे थियेटरों में देखी फिल्में
पार्कों में खाई मूंगफली
दोराहों पर पी काॅफी
और खड़कती बसों में किया गया सफर
सब बड़ा सुहाना था
उन दिनों भी
जब बारिश के दिनों में
पानी नहीं बरसता था।
या
सर्दियों में भी
हम गले में स्वेटर नहीं लटकाते थे
कि गर्मी लगती थी।
चिलचिलाती, उमस भरी
या अनचाही गर्मियों में भी
बस तुम्हारा साथ
बहुत ही सुहाना
फुहार सा
और गुनगुना लगता।
हर बार
बहुत अचानक तुम मिले हो
बस कुछ गिने चुने पलों के लिए।
मुझे अक्सर अफसोस रहा
उन व्यस्तताओं से
जो तुम्हारे साथ के बहानों को
खा जाती।
बस मैंने अपशकुन के डर से
तुमसे कभी भी
फिर से मिलने का वक्त नहीं तय किया
कि तुम्हारा अचानक मिलना
बड़ा ही सुकून देता
सांसों की वीरान बस्ती में।
कभी कभी बड़ा ही भाया मुझे
बदकिस्मत होना
क्योंकि ऐसी ही उलझन भरी उदासियों में
कभी नेट पर बैठे
या कभी ताल के किनारे पर
या सारे संसार से रूठकर
किसी अन्जान पार्क में
तुम अनचाहे ही आ गये हो।
कभी कभी तो लगा
कि मेरी उदासियों और
तुम्हारे आने में
शायद कोई सम्बंध हो
पर मैं खुद से भी छुपाता रहा
ऐसी किन्हीं भी उदासियों में
तुम्हारा इंतजार।
आज मैंने सोचा
कि कुछ पल हैं
तो तुम्हारे लिए
संदेश लिख छोड़ूं
कि तुम कभी कहीं खोलो
कोई मेल
तो उसमें दर्पण की तरह
तुम्हारी चाहतें भी
मेरी अनाम आशाओं के
दर्पण में नजर आयें।
----------------------
उन सभी लोगों के नाम
जो मुझे जिन्दगी में
कभी कहीं मिले थे और
जिनके साथ बिताये
कुछ लम्हों ने
मेरी मौत की तरफ बढ़ती उम्र से बचकर
एक उम्र को
जिन्दगी का नाम दिया।

Wednesday, 7 July 2010

आज का फैशन क्‍या है ?


मनुष्य से जुड़े किसी भी विषय से संबंधित किसी विशेष समय के रूझान को फैशन कहते हैं। ये रूझान नवीनता की अनुभूति की प्रेरणा से संचालित होते हैं लेकिन पीढ़ियों के अन्तर के कारण पुराने चीजें ही वर्तुल बनाती हुई फैशन में आती-जाती रहती हैं।

फैशन के प्रसिद्ध या प्राथमिक विषय निम्नलिखित हैं:
साजसज्जा और पहनावा - वस्त्र, जेवर, घड़िया, केशविन्यास , सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री, जूते-चप्पलें आदि।
विचार - पुरातनवादी, नूतनतावादी, समाजवादी,, पूंजीवादी, फक्कड़तावादी, अहंवादी, पर्यावरण समर्थक, क्रांतिसमर्थक आदि।
जीवन शैली - सामान्य, रफ एंड टफ, कूल, अल्ट्रामार्डन आदि।

इस लिंक पर देखि‍ये फैशन डि‍जाइनर की कुशलता क्‍या चीज है।



संगीत और नृत्य: संगीत और नृत्य में फैशन प्रेरित शब्द हैं - क्लासिक, मार्डन और फ्यूजन। इन्हीं से निकला संवर्धित, परिष्कृत या संकर, कोई अन्य प्रकार भी फैशन में हो सकता है।

फैशन के अन्य विषयों में कला, विज्ञान के वे सभी क्षेत्र आतें हैं जिनमें मनुष्य कार्यरत रहता है, जो बहुत तेजी से फैलते हैं और अपनी विशेष वृत्तियों से मनुष्य की संवेदनाओं को संतुष्ट करते हैं।

फैशन के निर्धारक तत्व:

अदृश्य सौन्दर्य मानदण्ड: ये मानदण्ड समाज में व्यक्तियों द्वारा धीरे-धीरे स्थापित किये जाते हैं, कालांतर में इनका अनुकरण अपरिहार्य सा हो जाता है। यही नहीं विशेष समयों में इन मानदण्डों को तोड़ना भी फैशन का ही एक अंग है। जूतों के साथ जुराबें पहनना एक नियमित फैशन है पर बिना जुराबों के जूते पहनने का अंदाज नया है।

परिस्थति विशेष की मांग: जैसे बीच पर बिकनी पहनना सामान्य है पर शहर के चैराहे पर नहीं। रात के समय आप चड्डा पहनकर मोहल्ले में निकल सकते हैं पर 12 बजे इसे अच्छा नहीं माना जायेगा। इसी प्रकार मोहल्ले के आसपास आप घरेलू वस्त्रों में निकल सकते हैं, पर शहर के प्रसिद्ध चैराहे पर आपसे सलीकेदार परिधान की अपेक्षा की जाती है।

संस्कृति: किसी देश की संस्कृति वहां के किसी भी फैशन पर आधारभूत प्रभाव डालती है। गहराई से अन्वेषण करें तो हम पायेंगे कि समय समय पर बदलता हुआ फैशन अपने पीछे जो मूल तत्व छोड़ जाता है वही संस्कृति के अंग बन जाते हैं और भविष्य में खुद को दोहराते हैं।

आर्थिक स्थिति: कोई व्यक्ति फैशन के किस रूप को अंगीकार करता है यह उसकी आर्थिक स्थिति पर निर्भर करता है।

सामाजिक माहौल: किस समय कितनी जनसंख्या किस प्रकार के विचारों को पुष्ट कर रही है, या किस प्रकार के विचारों को अनदेखा कर रही है इससे भी फैशन निर्धारित होता है। जैस वर्तमान में ‘‘प्रकृति मित्र’’ नेचर फ्रेंडली शब्द आज के समाज के प्रकृति के प्रति संरक्षणवादी नजरिये के फलस्वरूप उपजा है।

कुशलता: किसी कार्यक्षेत्र में कुशलता प्राप्त व्यक्ति भी उस क्षेत्र में फैशन के निर्धारक होते हैं। ये कुशल या गुरू व्यक्ति ही किसी फैशन के उच्च मानकों को स्थापित कर उसे परिवर्धित करते हैं और उनके संरक्षण के उपाय करते हैं।

आधुनिक वैज्ञानिक खोजें: कोई भी नई खोज पहले पहल फैशन सी लगती है, आम होने पर जरूरत बन जाती है। उदाहरण के लिए मोबाइल, लेपटाॅप, महंगी घड़ियां, नयी तकनीक के टीवी, कम्प्यूटर आदि।

किसी व्यक्ति की एक विशेष अभिनव जीवन शैली ही बाद में फैशन बन जाती है- साईं बाबा के सिर पर बंधा विशेष तरह का साफा, उनकी नकल करने वाले बाबाओं का फैशन है। माइकल जैक्सन के अनुकरण करने वाले उन्हीं की तरह के कपड़े पहनते हैं। हो सकता है पहले भी कई लोगों ने उस शैली को अपनाया हो पर राजीव गांधी की शाॅल धारण करने की शैली बाद में उन्हीं के नाम हो गई। फैशन कभी तो शौक होता है, कभी मजबूरी। इसका सुविधा असुविधा से बहुत लेना देना नहीं। अब देखिये ना तंग जींस पहनने में बहुत मर्दों को असुविधा होती है पर फैशनपरस्त पहनते हैं। ऊंची हील के सेंडल्स पहनने के साइड इफेक्ट इसे पहनने वाली महिलाओं को इनसे दूर नहीं करते। काजल, लिपिस्टिक, सुर्खी, पावडर, क्रीम, तेल, ब्लीच महिलाओं की लगभग समस्त सौन्दर्य प्रसाधन सामग्री उनके स्वास्थ्य के लिए हितकर है या अहितकर ये विवाद का विषय रहा है, लेकिन ये निर्विवाद है कि हर काल की महिलाओं का ये अभिन्न अंग रहा है।

इस प्रकार संवेदना-उन्मुख जीवन की विशिष्ट शैली यानि फैशन, किसी विशिष्ट व्यक्ति से होता हुआ करोड़ों व्यक्तियों तक या एक बहुत बड़े समूह से किसी व्यक्ति के निज-जीवन की ओर निरन्तर एक प्रवाह की तरह है। इस संसार में रहता हुआ कोई भी मनुष्य इससे अछूता नहीं रहता, अब देखिये ना हो सकता है सलवार कुर्ते पर बुर्का कभी फैशन रहा हो पर अब मल्‍लि‍काएं कुछ उलटी ही हवाएं बहा रही हैं।

Tuesday, 6 July 2010

असल में हमारा जीवन क्‍या है ?

मौत को महसूस कि‍ये बि‍ना, जि‍न्‍दगी क्‍या है ? इस सवाल का जवाब नही मि‍ल सकता
http://jkrishnamurthyhindi.blogspot.com/

Saturday, 3 July 2010

हर तरफ, तेरी याद बिखरती देखी

जब कभी, कहीं, बारिश बरसती देखी
हर तरफ, तेरी याद बिखरती देखी

यूं तो मेरे दिल सा, बुझदिल कोई ना था
तुम मिले, इसी दिल से, दुनिया डरती देखी

तेरी याद के गहरे सन्नाटे में अक्सर
इक हूक सी उठती-उभरती देखी

कि हमने ख्वाहिशों को पालना ही छोड़ दिया
तेरी जुदाई में, ख्वाहिशें सभी, मरती देखी
_________________________________________________________________________
d

Friday, 2 July 2010

अपने अंदर झांकता, तू भी नहीं मैं भी नहीं

तू मुझे और मैं तुम्हें इल्जाम देता हूं मगर
अपने अंदर झांकता, तू भी नहीं मैं भी नहीं

वक्त ऐसा बन पड़ा कि जुदा से लगते खयाल
वैसे कुदरत का बुरा, तू भी नहीं मैं भी नहीं

अजब सी दिशाओं में, दोनों का सफर जारी रहा
एक लम्हें को रूका तू भी नहीं मैं भी नहीं

चाहते हैं हम दोनों ही, एक दूजे को टूटकर
पर कभी जताता हकीकत, तू भी नहीं मैं भी नहीं



सूचना - भाई लोग ऊपर लि‍खा ये लाईन्‍स अपना नहीं है, अपने दोस्‍त ने बोला तो रि‍फाइन कर लि‍खा है। 

रोचक तथ्‍य : 


  • पतंगे की 6 टांगे होती हैं पर वह चल नहीं सकता।
  • एल्कोहल की छोटी सी मात्रा से ही बिच्छु पागल हो उठता है और खुद को ही डंस कर मार डालता है। खुद में ही जहर की प्रतिरोधक शक्ति के ना होने पर बिच्छु अपने ही डंक से स्वयं मर सकता है।



  • मेंढक कभी कभी इतने जुगनु खा लेते हैं कि वो खुद भी जगमगाने लगते हैं।
  • जिराफ खांस नहीं सकता।
  • चीलें हवा में ही संभोग करती हैं।
  • गोल्ड फिश धुंधले स्थान या बहते पानी में रहने पर अपना रंग खो देती है।
  • शार्क अपना आहार बनने वाली मछलियों को उनके दिल की धड़कन सुनकर तलाश कर लेती है।
  • लकड़बग्घा निरंतर अन्य जानवरों की विष्ठा खाता रहता है।
  • अगर कोई मेंढक चल फिर नहीं सकता, तो वो देख नहीं सकता और यदि वह देख नहीं सकता तो वह खा नहीं सकता।
  • गोह या गोधा के दो लिंग होते हैं।
  • मनुष्य के पिछले चार हजार वर्षों के इतिहास में आज तक किसी नये पशु को पालतू नहीं बनाया जा सका है।
  • शारीरिक संरचना के कारण, किसी भी सुअर के लिए यह असंभव है कि वो आकाश की ओर देख सके।

Thursday, 1 July 2010

और कोई नई ताजी ?


चि‍त्र : गूगल से साभार

जब भी घर पर होते हैं या घर से बाहर निकलते हैं किसी व्यक्ति से हैलो, हाय करने के बाद हमारे मुंह से एक ही सवाल निकलता है, और कोई नई ताजी ? लोगों को इस ‘सवाल’ की आशंका नहीं होती। तो लोग इस सवाल के जवाब में या तो बगले झांकने लगते हैं या कहते हैं ‘‘बस कट रही है,’’ आप सुनाओ? बूमरेंग की तरह अपने पर ही लौट के आया यह सवाल बड़ा ही परेशान करता है। जिन्दगी फिल्म थोड़ी ना है कि हर सीन में कहानी आगे बढ़े। जिन्दगी के सीन फिल्मों से ज्यादा लम्बे होते हैं। रिटेक के ज्यादा मौके होते हैं पर आदमी पर आदर्श भूमिका का नशा चढ़ा होने के कारण वह ‘‘बुरा’’ करे या ‘‘अच्छा’’, रिटेक नहीं करता। दूसरे शब्दों में इस को ही अहंकारी होना कहते हैं क्योंकि आदमी जिन्दगी और फिल्म में अंतर करता है। फिल्म फिल्म है, असल जिन्दगी असल जिन्दगी। पर कब्रों में समाये लोगों से पूछिये फिल्म और जिन्दगी में क्या अन्तर है या उस आदमी से फिल्मों और जिन्दगी में अंतर पूछिये, जिसकी फिल्म जिन्दगी के टाॅकीज से उतर गई है या फ्लाॅप रही है। आप कहेंगे कि हम फिर फिलासफी पर उतर आये... पर क्या किया जाये, इस कहानी को समझना फिलासफी की श्रेणी में ही आता है।

जब तक अर्थी तक नहीं पहुंचते, लोग अपने ही अर्थ निकालते रहते हैं। हकीकत को जानना या देखना, समझना ही नहीं चाहते। रामलुभाया की वसासम्पन्न 75 किग्रा के दो पहलवानो के वजन को मात करती बीवी ने हांफते हुए घर में प्रवेश किया और बोली, - ”सुनिये जी खिड़की दरवाजे बंद कर लीजिये, मैंने अभी अभी बाजार में सुना कि सर्कस से एक शेर भाग निकला हैं। मैंने सुना है कि वो हमारे मोहल्ले के आस-पास ही है।
इस पर रामलुभाया अपने ख्यालों में खोई निश्चिंत मुद्रा में बड़बड़ाये - चिंता क्यों कर रही हो दुर्भाग्यवती, शेर सर्कस से क्रेन लेकर थोड़ी ना भागा है कि तुम्हें ले उठा जायेगा। ऐसी सोच ने हमें सदा ही प्रभावित किया है जो घिसी पिटे अर्थों से भिन्न अर्थ प्रदान करती हों।

फलौदी जी तीन चीजों का एकसाथ उपयोग कर गर्भनिरोधक अभियान चला रहे हैं। पहली बात मोबाईल फोन जेब में रखो, दूजी बात नीम की दातुन करते समय 5 6 पत्तियां नियमित रूप से खाओ, तीसरा किराना इकट्ठा ना खरीद कर हर दिन किसी ना किसी चीज खरीदने के बहाने डिपार्टमेन्टल स्टोर जाओ और बिल जरूर लो इस बिल को अपने हाथों और मुंह के संपर्क में जरूर लाओ।

अब आप कहेंगे कि इन उपायों का वैज्ञानिक आधार क्या है? जी इनका वही वैज्ञानिक आधार है जिन आधारों पर विचार ना किया गया और आप पैदा हो गये। जी हां यह सब विज्ञानसम्मत तथ्य हैं। मोबाइल फोन से होने वाला विकिरण, नीम में मौजूद रसायन, और छोटे छोटे प्रिन्टरों में इस्तेमाल होने वाली स्याही इन सब से नंपुसकता का खतरा है। खतरा ही कभी-कभी वरदान भी साबित होता है यह हमें फलौदी जी ने ही बताया। वह स्लोगन तो आपने ही सुना होगा कि ‘‘डर के आगे जीत है।’’ इसलिए डर से डरने की नहीं, उसे समझने की जरूरत है। डरना खतरनाक है क्योंकि डर के ही मर गये तो समझेगा कौन - कि डर के आगे कौन से मजे थे।

डर से नहीं डरना चाहिये किन्तु ऐसे खयाल नहीं पालने चाहिए कि कयामत आ जाये, हमारे बाप का कुछ नहीं बिगड़ना है। अब यह वाकया ही लीजिए।

जिस दिन 9/11 को वल्र्ड ट्रेड सेन्टर पर हमला हुआ, उस दिन की बात है। सुबह कार्यालयीन समय में एक व्यक्ति अपनी पुरानी पत्नि के चंगुल से निकल, प्रेमिका के घर पहुंचकर स्वर्गीय नजारे ले रहा था। व्यवधानों की संभावनाओं को कम करने के लिए दरवाजे और टीवी, रेडियो बन्द थे।
अचानक विमान इमारत में घुस गया, उस व्यक्ति की पत्नि का टीवी चालू था, जिसमें ये भयावह वीडियो दिखाये जा रहे थे। घबराई, पगलाई बीवी ने पति को फोन लगाया, पूछा - आप कहां हो? पति का वही आम सा जवाब था - श्योरली डियर ऑफि‍स में। पत्नि सारा माजरा समझ गई और उसी दिन पत्नि ने तलाक के कागजात बनवाये और प्रेमिका के घर भिजवा दिये।

तो डर से आंख फेरना और डर के आगोश में जा समाना, यानि डर से पलायन और डर के स्वीकार के अलावा हमारे पास ये रास्ता है कि हम डर को समझें कि वो आखिर है क्या। इसी में सारा नयापन है ना कि रोजाना की ताजा जिन्दगी को बासी पुराने दृष्टिकोण की फफूंद लगाकर, फफूंदों का पहाड़ पालते रहना। विचार शब्द की मजबूरियों से परे, विचारातीत सोचना इसमें नयापन है। यही उस सवाल का जवाब है, जब मैं आपसे पूछूं कि ‘‘और कोई नई ताजी?’’