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बुधवार, 19 जून 2013

लगभग कुछ सालों बाद ...





लगभग कुछ सालों बाद
समन्दर के किनारों पर सूनामी जैसे भयंकर तूफान आने चाहिए

लगभग कुछ सालों बाद
नदियों के किनारे झुग्गियों.गांव.शहरों में बाढ़ आनी चाहिए

लगभग कुछ सालों बाद
पहाड़ी और रेगिस्तानी इलाकों में भूकम्प आने चाहिए
लगभग कुछ सालों बाद
जंगलों में आग लगनी चाहिए

लगभग कुछ सालों बाद
किसी तरह की कोई उथल-पुथल तो होनी चाहिए
लगभग कुछ ही सालों बाद
आदमी के बसाये गांव और शहर
बड़ा बोर करने लगते हैं

लगभग कुछ सालों बाद :
... समन्दर और नदियां प्रदूषित हो जाती हैं
... पहाड़ों पर ढेर सारा कचरा जमा हो जाता है
... बासे जंगलों में फंफूंद उग आती है
लगभग कुछ ही सालों बाद
आदमी के बसाये गांव और शहरों में
संस्कृति सड़ जाती है।

लगभग कुछ सालों बाद
कोई क्रांति तो होनी ही चाहिए,
आदमी में ना सही,
अकेले-अकेले पंचतत्वों:
आग.हवा.पानी.धरती. और आकाश में सही।
ताकि आदमी 
इन शब्दों के अर्थ से वाकिफ रहे :

"ओम शांति शांति शांति..."

- राजेशा

बुधवार, 2 नवंबर 2011

बदल गया है बस आदमी ही।

अभी भी चिडि़या आती है
करोड़ों इंसानों के
करोड़ों मकानों के आंगन में

अभी भी तकरीबन सारे बीज
धरती की किसी भी जमीन पर
आसानी से उग आते हैं

अभी भी मछलियां
रहने के लिए
जहरीले नदी नालों या
अनछुए सागरों में
फर्क नहीं करतीं

अभी भी
अधिकतर शेर जानवरों को ही खाते हैं
आदमियों को नहीं

अभी भी सांप बिच्छू चमगादड़
खडहरों जंगलों और वीरानों में ही रहते हैं
आदमी की रोज रहने वाली जगहों पर नहीं

कभी भी जंगल, जानवरों ने
कुदरत ने
आदमी से कुट्टी नहीं की


कभी भी शेर, चीते, भालू
चिडि़या, बाज, गिद्ध,
मछली, सांप, चमगादड़
इतनी संख्या में नहीं हुए
कि आदमी की प्रजाति को ही खत्म कर दें

अभी भी
सब कुछ कुदरती है
लाखों सालों पहले जैसा

क्यों बदल गया है
बस
आदमी ही।

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

इतनी जल्‍दी में .... हम बस वहीं पहुंचेंगे


लोग बहुत जल्‍दी में हैं
आंखे होते हुए भी देखना नहीं चाहते
कान होते हुए भी सुनना नहीं चाहते
और इसी तरह
लोग अपने जि‍स्‍म की ताकतों से भी दूर होकर
लोग बस भाग रहे हैं
यहां तक कि‍ उन्‍हें यह भी नहीं पता
कि‍ वो कब उड़ने लगे हैं

लोग बहुत जल्‍दी में हें
झूठ की फि‍सलन भरी राहों पर
जैसे हवाई जहाज से
आत्‍म हत्‍या के लि‍ये कूदा हुआ कोई आदमी
कि‍सी के भी हाथ में नहीं आये
यहां तक की सच के भी

लोग बहुत जल्‍दी में हैं
बटोर ले जाना चाहते हैं
धन दौलत, और
अपनी हवस के सारे अनुभव
इस धरती के पार तक
कि‍सी अनजान ग्रह पर

लोग बहुत जल्‍दी में हैं
इतनी जल्‍दी में
कि‍ उन्‍हें खुद नहीं मालूम
कि‍ वो कि‍स राह पर हैं

और उस राह की
कोई मंजि‍ल है भी या नहीं

लोग बहुत जल्‍दी में हैं
और जि‍से वो जि‍न्‍दगी की जुगाड़ कहते हैं
उस इंतजाम में खोये हुए
वो बस अचानक
खुद ही
वहां पहुंच जाते हैं जि‍ससे बचते हुए
लोग बहुत जल्‍दी में होते हैं हर वक्‍त


लोग बहुत जल्‍दी में हैं
और अचानक अपने आपको पाते हैं उस शै के सामने 
जि‍से 'अचानक' शब्‍द का पर्याय कहते हैं।

लोग बहुत जल्‍दी में हैं
कि‍सी के भी हाथ नहीं आते
सि‍वा मौत के।

शनिवार, 14 अगस्त 2010

सुकून का घर


मैं सालों से सोचता हूं
पर मैं जाना ही नहीं चाहता
हालांकि मुझे मालूम है
सुकून का घर

सुकून के घर में
रहती है
मौज और आनंद की धुंधली किरणों के साथ
ऊर्जा के सूर्यों की गर्मी
और चांदनी का पागलपन।

भ्रम है कि सुकून के घर में
रहती है
बेकारी, असफलता, आलस्य
सभी सफल, मशहूर, अमीर
कटते हैं
ऐसी बोर और मनहूस कही जाने वाली जगहों से


सुकून के घर में निवास करने वाले पर
लोग लानते भेजते हैं

सुकून के घर के बारे में
लगभग रोज ही
तकरीरें- कविताएं
लिखी और पढ़ी जाती हैं
गली-गली चैराहे-चैराहे पर
इस तरह ही लोगों को लगता है
कि वो जानते हैं
‘‘सुकून’’ शब्द का अर्थ
वरना वो कैसे
लोगों को समझा लेते,
कविता लिख लेते
गीत गा लेते।

यूं तो बहुत से लोग
सुकून के घर की तलाश करते हैं
क्योंकि
सुकून के बारे में सोचना, तलाश करना
हर जमाने का फैशन रहा है।
पर सुकून के घर में रहना
दुनियां में हमेशा नासमझी रहा है।

लोग ऐसा भी कहते हैं कि
सुकून के घर में
उम्र भर की हम्माली है
रोटी कपड़े मकान के लिए
दर-दर की भटकन है

सुकून के घर में
साथ ही रहता है
सर्दी जुकाम बुखार जैसी छोटी सी बीमारियों से
मर जाने का खतरा भी।

पर फिर भी
सुकून के बारे में लिखे हुए मंत्र
हर सुबह या शाम को
दीपक की लौ और अगरबत्तियों के धुंए में
खूब जपे जाते हैं
गाई जाती हैं आरतियां
ताकि
सुकून की चाह की तकलीफ से
बचा जा सके।

पता नहीं क्या है हकीकत
या जानते समझते हुए....
या कि हम समझना ही नहीं चाहते
कि पढ़ना, सुनना,
कहना, या लिखना
या सुकून के घर में रहने जैसा दिखना
सुकून नहीं लाता।

सुकून से रहने के लिए
जरूरी है
कि हम सुकून के घर में रहें।

सोमवार, 12 जुलाई 2010

तुम्‍हारे लि‍ये ही......


मुझे तुम्हारा बहुत ही इंतजार था
मैंने तुम्हारे सपने देखे
मैं दुनियां की भीड़ में अकेला
तुम्हारे लिये तरसता रहा
ऐ मेरे दोस्त
मुझे रोजी-रोटी और बोटी से फुरसत ही नहीं मिली
कि उन लम्हों का आयोजन कर पाता
जिनसे मेरी जिन्दगी कहे जाने वाले लम्हे
कुछ और लम्बे हो जाते
बच अचानक
कभी पान की दुकान पर,
कभी पंचर बनाते हुए,
कभी चैराहे पर लालबत्ती के ट्रेफिक में ठहरे हुए
कभी बाजार में सब्जी खरीदते वक्त
या
बिजली का बिल जमा करते हुए
या
नेट पर कभी कभार!
तुम्हारे साथ
गंदे थियेटरों में देखी फिल्में
पार्कों में खाई मूंगफली
दोराहों पर पी काॅफी
और खड़कती बसों में किया गया सफर
सब बड़ा सुहाना था
उन दिनों भी
जब बारिश के दिनों में
पानी नहीं बरसता था।
या
सर्दियों में भी
हम गले में स्वेटर नहीं लटकाते थे
कि गर्मी लगती थी।
चिलचिलाती, उमस भरी
या अनचाही गर्मियों में भी
बस तुम्हारा साथ
बहुत ही सुहाना
फुहार सा
और गुनगुना लगता।
हर बार
बहुत अचानक तुम मिले हो
बस कुछ गिने चुने पलों के लिए।
मुझे अक्सर अफसोस रहा
उन व्यस्तताओं से
जो तुम्हारे साथ के बहानों को
खा जाती।
बस मैंने अपशकुन के डर से
तुमसे कभी भी
फिर से मिलने का वक्त नहीं तय किया
कि तुम्हारा अचानक मिलना
बड़ा ही सुकून देता
सांसों की वीरान बस्ती में।
कभी कभी बड़ा ही भाया मुझे
बदकिस्मत होना
क्योंकि ऐसी ही उलझन भरी उदासियों में
कभी नेट पर बैठे
या कभी ताल के किनारे पर
या सारे संसार से रूठकर
किसी अन्जान पार्क में
तुम अनचाहे ही आ गये हो।
कभी कभी तो लगा
कि मेरी उदासियों और
तुम्हारे आने में
शायद कोई सम्बंध हो
पर मैं खुद से भी छुपाता रहा
ऐसी किन्हीं भी उदासियों में
तुम्हारा इंतजार।
आज मैंने सोचा
कि कुछ पल हैं
तो तुम्हारे लिए
संदेश लिख छोड़ूं
कि तुम कभी कहीं खोलो
कोई मेल
तो उसमें दर्पण की तरह
तुम्हारी चाहतें भी
मेरी अनाम आशाओं के
दर्पण में नजर आयें।
----------------------
उन सभी लोगों के नाम
जो मुझे जिन्दगी में
कभी कहीं मिले थे और
जिनके साथ बिताये
कुछ लम्हों ने
मेरी मौत की तरफ बढ़ती उम्र से बचकर
एक उम्र को
जिन्दगी का नाम दिया।

सोमवार, 10 मई 2010






 



 उमाकांत मालवीय

झण्डे रह जायँगे, आदमी नहीं,
इसलिए हमें सहेज लो, ममी, सही ।

जीवित का तिरस्कार, पुजें मक़बरे,
रीति यह तुम्हारी है, कौन क्या करे ।
ताजमहल, पितृपक्ष, श्राद्ध सिलसिले,
रस्म यह अभी नहीं, कभी थमी नहीं ।

शायद कल मानव की हों न सूरतें
शायद रह जाएँगी, हमी मूरतें ।
आदम के शकलों की यादगार हम,
इसलिए, हमें सहेज लो, डमी सही ।

पिरामिड, अजायबघर, शान हैं हमीं,
हमें देखभाल लो, नहीं ज़रा कमी ।
प्रतिनिधि हम गत-आगत दोनों के हैं,
पथरायी आँखों में है नमी कहीं ?




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राजेशा 

पता नहीं क्यों लोग
किस लिए जिन्दा रहना चाहते हैं
हमेशा के लिए

पता नहीं लोग
किस उम्मीद में जिये जाते हैं
बरसों-बरस नौकरी, बीवी, बच्चे
ढेरों रिश्ते। ..........

जिनकी चुगलियां
अक्सर वो अपने
बहुत करीबी रिश्तों से करते हैं
जो नितान्त-जिस्मानी-रूहानी-करीबी रिश्ते
मौत के वक्त किसी काम नहीं आते।

पता नहीं लोग
क्या सोचकर अमर होना चाहते हैं
नौकरी करने के लिए?
बीवी बच्चे पालने के लिए?
ब्‍लागि‍न्‍ग करने के लिए?

और तो और
झोपड़पट्टियों की नालियों
और सफेद कालरों की सजी मैल में
पले रहे कीटाणु भी
हर सुबह दिये और अगरबत्तियां जलाते हैं
पता नहीं
किसी चीज का शुक्रिया अदा करने के लिए
या किस डर से
क्या और भी कुछ निकृष्टतम होता है
कीच में जिन्दा रहने से।

कितनी अफसोसजनक है ये बात कि
बेहद नाकुछ लोग
जो इस बात का जश्न मना सकते हैं,
अफसोस जाहिर करते हैं ...
कि हाय! वो ‘‘कुछ’’ नहीं है।

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

लोग चुप नहीं बैठते


लोग चुप नहीं बैठते

उन दिनों भी
जब नर्क की यातनाएं भोगते हैं।

जब मुंह अंधेरे, रोज सुबह शाम
किसी काली पैसेंजर ट्रेन में डेढ़ घंटे तक
अपने ही जिस्म से बलात्कार करते हैं।

और फिर दसियों घंटे
किसी बनिये की दुकान पर
सामान यहां से वहां रखते हुए
गंध छोड़ते हुए बोरों,
मर्तबानों, तेलों के कनस्तरों को ढंकते हुए

किये ही जाते हैं
नजरों, इशारों, मजबूरियों,
जरूरियों और अन्य
तरह तरह के विकट आसनों में
बनिये से, ग्राहक से
और जब कानों से सब चुप हों
तो खुद से ही
बड़ बड़ बड़ बड़

कभी अभाव
कभी महंगाई
कभी मिलन की ऊब
कभी जुदाई
और जब सब सटीक हो
सब ठीक हो
तब भी
... कुछ और भी.... की हवस बयान करते हुए
करे ही जातें हैं
बड़ बड़ बड़ बड़

ग्लोबल वार्मिंग की
एक वजह ये भी है
आदमी के जिस्म से निकली ऊर्जा
कहीं नहीं खप रही
सुखा रही है
धरती का पानी
पिघला रही है ग्लेशियर
खा रही है सारे दृश्य-
आदमी से बाहर के,
आदमी के भीतर के।

क्या आपने नहीं देखा
अकेले होने पर भी
कुर्सी या जहां आप बैठे हैं
वहां से लटके हुए पैर
हिलते रहते हैं
यहां वहां चलते रहते हैं
हाथ
उंगलियां
कभी कान में
कभी नाक में
जुबान से नहीं तो
अन्य अंगों से
बड़ बड़ बड़ बड़

कोई भी उम्र फरेब से नहीं बची है
कभी बचपन का खेल
कभी जवानी की बेहोशी
कभी प्रौढ़ता की पशुता
कभी बुढ़ापे की बेचारगी
हर सांस में
मैंने सब कुछ किया है
मौत की तैयारी के सिवा

बरसों बरस
दिन ब दिन करीब आती मौत का
इश्तहार करते हुए
सारी इंसानि‍यत को बीमार करते हुए
लोग चुप नहीं बैठते
ब्लॉगिंग
बज्जिंग करते हैं।

नहीं नहीं जनाब
हम आपकी बात नहीं कर रहे
आप मुझे ही लो ना।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2009

सब चलता रहता है


मि‍त्र संतोष श्रीवास नहीं रहा


कोई रहे न रहे
सांसों के संजाल में

कोई रहे न रहे
स्मृतियों की परिधि में
क्षणिक हंसी मुस्कानों की अवधि में
ऐसा जाये कि
अब कभी लौट के न आये
समय की नदी में

स्मृतियों में कथा बन
निवर्तमान-सी व्यथा बन
पलता रहता है

जो जिया संग
अब अतीत हुआ है
बीत गया है
क्या रह गया है मेरे दिल में
छल सा
भरता है सांसों में निर्बलता
इन्द्रियों के अनुभवों के उत्सवों को झुठाता
बन आकुलता रहता है

कोई रहे न रहे
दृष्टि की सृष्टि में
अश्रुओं की वृष्टि में
ह्रदय में
सतत तरलता रहता है

कोई रहे न रहे
सांसों के संजाल में

सब चलता रहता है

शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

हमारा हदय उपवन

हमारा मन
परमात्मा रूपी परमरमणीय
आनन्द स्थली तक
पहुंचने वाला पथ है

हमारा मन, सावन की वह फुहार है
जो अपने भाव-अश्रुओं से
परमात्मा को अंकुरित करती है

परमात्मा के मधुमय अहसास से भरा हमारा मन
वह सुरभित पुष्प है
जिससे सारा उपवन महकता है

अपने मन से शोक का संहार करो
अपने मन को शुद्ध और दृढ़ बनाओ
जहाँ केवल परमात्मा फल फूल सके

अपने ह्रदय उपवन के चहुं ओर
दीवारें मत उठाओ
क्योंकि परमात्मा संकुचितता में
कुम्हला जाता है, मर जाता है

अपने ह्रदय के उपवन के द्वार खोलो
आने दो परमात्मा को भीतर
क्योंकि -
वही परम स्निग्ध छाया है
जिस तले जीवन के अंकुर फूटते हैं
वही हिमालयों से आई वह शीतल उर्वर पवन है
जिसमें उल्लासों की फुन्गियां लहलहाती हैं

अपने ह्रदय उपवन को
परमात्मा ही हो जाने दो
जिसका आदि ओर अंत न मिले

सोमवार, 27 जुलाई 2009

तुम भी बेबस - मैं भी मजबूर, और कोई खुदा कहीं नहीं बचा

कांग्रेस हो या बीजेपी हो, या हो कोई दल
आम आदमी की बेबसी का नहीं है कोई हल
नहीं है कोई हल, सबके अपने धंधें हैं
आम आदमी की सांसों पर कई फंदे हैं

मुद्रा स्फीति क्या है बीमारी, मुझे क्या इससे लेना
रोटी, दाल भात ही मेरे पेट का गहना
मेरे पेट का गहना मँहगा हो गया है
मंहगाई की घुटन में ये दिल रो गया है

चांद पर अम्बानी टाटा बिरला की बस्ती है
हवाई जहाज की टिकटें, टेम्पो से सस्ती हैं
टिकटें सस्ती हो गई, रिश्ते दूर हुए हैं
अपने ही खून से दूर रहने को मजबूर हुए हैं

क्या होते माँ बाप? बीवी और बच्चा क्या है?
रंग बिरंगे नोटों से अलग, कुछ भी अच्छा क्या है
कुछ भी अच्छा नहीं, अगर ये नोट नहीं हैं
‘बे-नोट’ जो, उस में सबसे बड़ी खोट यही है।

किसान भी भूखों मर रहा, शहरी ग्राहक बेहाल
और सारे मजे ले गये सारी दालों के दलाल
सारी दालों के दलाल, दलाल स्ट्रीट चलाते हैं
पहली और पिछड़ी दुनियां की खाई गहराते हैं

दाल भी मंहगी सब्जी भी मंहगी, मंहगे आग और पानी
मंहगे कपड़े मंहगे मकान, महंगी सांसों की कहानी
महंगी सांसों की कहानी, अब कहो कैसे जीएं
कब तक घुटन मजबूरी के प्याले भर भर पीएं


सुबह से सांझ तक नौकरी, रात को चिंता ओढ़ो
बेबसी घुटन बेहोशी में, गिरते-गिरते दौड़ो
गिरते-गिरते दौड़ो, पीछे भीड़ का बड़ा सा रेला
कुचले जाओगो जो ठहरे पल भर समझने झमेला


जिन्दा रहने का एक उपाय, सांस लेना छोड़ दो
आशाओं उम्मीदों सपनों से रिश्ते तोड़ दो
रिश्ते तोड़ दो, अब इन्सान-सा कुछ भी बचा नहीं है
मशीनों में हो मशीन आदमी, सबको बस जंचा यही है

परमाणु बमों का इंतजाम है बहुत ही अच्छा
काश कि अब अहसान करे कोई अक्ल का कच्चा
अक्ल का कच्चा फोड़ दे, काश दो चार बमों को
कर दे दूर छः अरब लोगांे के दिवा-भ्रमों को

प्रलय का इंतजार, जाने क्यों अब अच्छा लगता है
किसी भी झूठे ज्योतिषी का कहना सच्चा लगता है
कहना सच्चा लगता है, कहो ये किसी बहाने से
दुनियां जाने वाली है, पाप के घड़े भर जाने से

सोमवार, 6 जुलाई 2009

फर्क तो पड़ता है

फर्क तो पड़ता है

हो सकता है जीते हुए हमें
निरे आदमियों के बीच रहना पड़े

हो सकता है हम सांसें लें
इंसानों के बीच

हो सकता है हम
बेहतर इंसानों के बीच रहें
जरा-सा..खुद की तरफ.. या,
खुदा की तरफ भी बढ़ें

फर्क तो पड़ता है

आदमियों को भी,
इंसानों को भी,
बेहतर इंसानों को भी,
और खुद हमें भी


कबीरे ने कहा था
कि मेरे मरने पर
मोहल्ले वाले तेरहवीं तक मुझे याद रखेंगें या, मृत्युभोज तक
बीवी कुछ बरस...और
माँ-पिता कुछ बरस और

पर यदि मैं जिंदा रहूं
तो फर्क तो पड़ता है
उन्हें भी,
मुझे भी...


फर्क तो पड़ता है
मैं सांसें खुलकर और आसानी से ले सकता हूँ
गीत भी गुनगुना सकता हँू
देख सकता हूं
पहरों का बीतना बातों ही बातों में
काली रातों को गुजार सकता हूं
चांदनी के झांसे में
कल...
आने वाली सुबह का इंतजार भी कर सकता हूं...मस्ती में
बेशक उम्र से दिन-दिन
पत्ते पत्ते सा झड़ता है

फर्क तो पड़ता है...
मेरे हर रिश्ते को
यदि मेरे पास खुशी होगी
तो कहां नहीं पहुंचेगी उसकी खुशबू

और मेरा दुख
कितना मुझ तक रह पाएगा
सड़ांध को कहां छिपा लूंगा मैं

फर्क तो पड़ता है
कुछ मिला हुआ खो जाए तो
लाख ...बहुत कुछ मिल जाने पर भी

क्योंकि वो एक बार ही बनाता है
तुम्हें भी,
मुझे भी, किसी को भी

तो...फर्क तो पड़ता है
किसी के नहीं जाने पर
किसी के चले जाने पर

बुधवार, 24 जून 2009

बरस जा बादल

बरस जा बादल
सूरज की आग भरी अंगड़ाई
दुपहरी के तपते तवे को
डूबो दे मिट्टी की खुशबू में
रच जा रूह के नथनों में
कर दे पागल

बरस जा बादल
अब नहीं नहायेगी
सूखे पोखर की दरारों में
कोई अविछिन्नयौवना
न चलायेगी हल
यूं ही यूं ही तरस न बादल

बीज हैं जिंदा
धरती की कब्रों में
बन जल कर दे हल
लहरा जाने दे नभ तक
कोमल कोंपलों का बल

कुओं की गहराई
नदियों के कछार
तालों सागरों का विस्तार
मानव मन भी हार
हुआ है आकुल
बरस जा बादल

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