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गुरुवार, 30 जून 2011

क्‍या संकल्प करना बेवकूफी है ?

संकल्प शब्द का अर्थ है दृढ़ निश्चय, प्रण, जिद्द, प्रतिबद्धता, डटे रहना। संकल्प शब्द को समझने के लिए यदि इसे ‘सम’ और ‘कल्प’ में तोड़ें तो यह अर्थ मिलते हैं - सम का आशय है समान.. कल्प के अर्थ हैं - एक कल्प तो ‘दीर्घकाल’ वाला, दूसरा ‘कल्प’, कल्पना से जुड़ा है। इस प्रकार संकल्प के अर्थ निकले ”कुछ ऐसा उपलब्ध करने का निर्णय जो हमारी कल्पना में है या जिसे दीर्घकाल तक डटे रहने पर प्राप्त कर लिया जायेगा।“
अनेक भौतिक समस्याओं का हल संकल्प से संभव है जैसे पहाड़ को समतल कर देना, समन्दर के किसी हिस्से को सुखाना, किसी ग्रह पर जीवन खोज लेना। लेकिन संकल्प से हमारी अंर्तवस्तु, मन की समस्याएं हल करने का विचार... क्या यह संभव है? दरअसल यह नितांत ही अव्यावहारिक उपाय है क्योंकि किसी भी समस्या का निराकरण पूर्वाग्रह, जबर्दस्ती, जिद, मुर्गे की एक टांग जैसे हठ द्वारा नहीं किया जा सकता...और संकल्प और इनके अलावा क्या है? दृढ़ निश्चय से भी ऐसा प्रतीत होता है कि कमजोर निश्चय भी होते हैं, ऐसा है क्या? जिद्द भी बचकाना शब्द है। प्रतिबद्धता भी बंधन की तरह लगता है, किसी पर निर्भरता सा। डटे रहना मुर्गे की एक टांग सा है।
संकल्प के निकट ही एक शब्द है ‘कसम’। लेकिन कसम उतना अच्छा शब्द है नहीं जितना दिखता है। कसम खाने का आशय ही यह है कि आप किसी को यकीन दिलाना चाह रहे हैं और आपको एक पुष्ट आधार की तलाश है। कसम से यह साबित होता है कि जो व्यक्ति कसम खा रहा है उसकी अपनी तो कोई बिसात है नहीं... अब उसे ‘किसी की कसम खा के‘, ‘अपने कहे पर‘ भरोसा चाहिए। यहां तक कि खुद की कसम खा के भी वो यही करने की कोशिश करता है।
संकल्प शब्द का प्रयोगकर्ता अपने व्यक्तित्व को दो भागों में तोड़ता सा लगता है- यानि उसका एक हिस्सा वो ”जो काम में बाधा है“ और दूसरा ”उसके करने में प्रवृत्त।“ इस प्रकार संकल्प द्वंद्वात्मक अभिव्यक्ति देता है, जबकि द्वंद्व का कारण व्यक्ति ही है। यह द्वंद्व इसलिए पैदा होता है क्योंकि व्यक्ति किसी झूठे अहं को पुष्ट करना चाहता है, इसी अहं को पुष्ट करने का साधन है संकल्प। संकल्प शब्द यह कहता है कि कुछ है जो आप खुद ही नहीं करना चाहते पर अब आप खुद को ही ”जुबान दे रहे हैं“ और जुबान पर कायम रहेंगे, इस प्रकार संकल्प शब्द का प्रयोगकर्ता स्वयं से ही भयभीत होता है।
संकल्प के समानर्थकों में प्रण शब्द कुछ भिन्न है। प्रण - प्राण से निकला लगता है और अक्सर “प्राण-पण” के रूप में प्रयुक्त किया जाता है... ये भाव कि... कोई ऐसी बात जिसके जिए प्राण भी अर्पित किये जा सकें.. या प्राणों से निकला भाव। यानि प्राणों की समग्रता से किया जाने वाला कर्म। लेकिन इस सुन्दर शब्द को भी गलत तरीके से प्रयोग में लाया जाता है। जैसे;- मैंने प्रण किया है कि मैं यह काम सम्पन्न करके दिखाऊंगा। इस वाक्य में किसी अहंकार द्वारा; संकल्प, कसम और किसी फल के प्रति प्रतिबद्धता से भरे दुराग्रह की गंध आती है। जबकि ”मैं इस कार्य को प्राण-पण से करूंगा” इस वाक्य में प्राणों से कर्म करने का आश्वासन तो है पर फल के प्रति आसक्ति नहीं।
अब आप कहेंगे संकल्प का विकल्प क्या है? संकल्प ना करें तो क्या करें? सीधी सी बात है खुद को समझने की कोशिश करें, तथ्यपरक बनें, समस्या को गहराई से समझने की कोशिश करें, मूल प्रश्न तक जाने की कोशिश करें... क्योंकि यदि सही प्रश्न मिल गया तो उत्तर की आवश्यकता नहीं रहेगी।

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2010

मनुष्य का मशीनीकरण

 
जब रेडियो, टी.वी., सिनेमा, कम्प्यूटर आदि दृश्य-श्रव्य के मनोरंजन के साधन नहीं थे आदमी के पास मनोरंजन शब्द के क्या अर्थ थे? यह प्रश्न आज के प्रत्येक मनुष्य को सोचना चाहिये। क्योंकि इसी प्रश्न के उत्तर में मनुष्य के सामने आ खड़ी हुई कई समस्याओं का हल है। सोचिये ? क्या तब आदमी के पास “बोर होना” जैसी शब्दावली थी। क्या वह उस तरह की जिन्दगी से बोर होता था? या क्या उसके पास बोर होने का समय था?
आज के आदमी के पास चमत्कारी साधन मोबाइल फोन है, वह 25 घंटे 365 दिन अपने सम्बन्धियों के सम्पर्कों में रह सकता है। पर हुआ उल्टा है उसके सभी जिन्दा सम्बंध मुर्दानगी में बदल गये हैं। पड़ोसी से भी वह सेलफोन पर ही बात कर पाता है, यहां तक कि माँ-बाप-बीवी-बच्चों से भी दो साधारण बोल बोलने का मौका मोबाइल फोन पर ही मिल पाता है। और इन दो बोलों के अर्थ भी कितने सतही हैं, सब जानते हैं। वजह? वजह है आदमी का मशीनीकरण।

उस जमाने में आदमी के पास सुबह उठकर रेडियो, टीवी, आईपॉड का बटन ऑन कर या इन्टरनेट पर बैठ जाने के विकल्प नहीं थे, तो क्या यह उसके लिये मुश्किल पैदा करता था कि अब वो क्या करे? नहीं। आदमी के पास भरपूर समय था। आलसी से आलसी आदमी के पास भी सुबह उठकर सैर, कसरत, दातुन-स्नान, शौच के बहाने दूर निकल जाने की नैसर्गिक प्रेरणाएं थीं। उसके बाद काम धंधे पर लग जाने में भी आदमी दिन भर अपनी ही तरह की अन्य आदमजात प्राणियों के सम्पर्क में रहता था। शाम को भी गलियों, चौराहों, बाजारों, दुकानों पर मेल मुलाकातों के दौर चलते थे।

आज का आदमी देर रात तक कामधंधे या नौकरी से लौटता है, सुबह देर से उठता है और फिर सारा दिन वाहनों, कम्प्यूटरों, रेडियो, टी.वी., मोबाइल फोन के कृत्रिम सम्पर्कों में उलझा रहता है। कोशिश करके जिम वगैरह जाकर सेहत बनाने की कोशिश करता है तो भी सांस तो इसी वातावरण में लेनी है। जितना धुंआ उसकी कार फेंकती है उतना ही धुंआ प्रतियोगिता में उसके पड़ोसियों के वाहन, इस तरह आज के मनुष्य ने अपने लिए नर्क खुद ही गढ़ रखा है।

उस समय की कल्पना कीजिये जब आदमी के घर में मां-बाप, भाई बहन के रिश्ते थे और दो चार बाल बच्चे। आवागमन के साधन के रूप में पशुओं द्वारा खींचे जाने वाले वाहन थे। आदमी सुबह उठता और यदि उसका कहीं आने जाने का इरादा है तो उसे अपने गधे, घोड़े या बैल की सेहत, हाल-चाल पूछना जानना बहुत जरूरी थे क्योंकि उसके बिना किसी लम्बी यात्रा की कल्पना करना फिजूल था। इस प्रकार विभिन्न प्रकार के सरोकारों से सुअर, गाय घोड़े, गधे, कुत्ते, चिड़िया, कौए, गिद्ध आदि की देखरेख अपने आप ही हो जाया करती थी, ये नगर-निगम के संभालने के चीजें नहीं थे। अब दूसरी बात ये कि क्या आपने इतिहास में कोई ऐसी घटना पढ़ी है - जब अनायास किसी राहगीर की मौत  घोड़ा, बैल या गधे से चलने वाली गाड़ी से कुचल जाने से हो गई हो? जबकि आज देश में प्रत्येक दिन, हर घंटे सैकड़ो वाहन दुर्घटनाओं में हजारों लोग काल कवलित हो जाते हैं। सुबह आदमी घर से निकलता है तो शाम को तय नहीं होता कि वह घर सकुशल पहुंच ही जायेगा और इसी को हम, आदमी की तरक्की कहते हैं।
आज के आदर्श जीवन जीने वाले आदमी की यथार्थ स्थिति देखिये।
देर रात गये वह घर लौटता है। रातभर ए सी, पंखे कूलर या हीटर की हवा में सोता है। देर सुबह उठकर वह एक मशीन के अलार्म से जागता है, जिम जाता है यानि मशीनों से कार्यव्यवहार। घर में ड्राइंगरूम, बेडरूम, बाथरूम, रसोई, छत, आंगन, लॉन सब जगह यहां वहां खड़े बिजली से चलने वाले उपकरणों से उसका वास्ता पड़ता है। आदमी का काम होता है बटन दबाना बाकी सब चीजें अपने आप काम करती हैं। इस तरह इन उपकरणों ने आदमी से उसके आदमजात प्राणियों के संबंध छीन लिये हैं या कहें कि उनका स्थान इन मशीनों ने ले लिया है। अब आदमजात प्राणी इस आदमी को और ये आदमी उनको, हर क्षण प्रभावित करते थे, लेकिन ये मशीने? इन्हें आदमी क्या प्रभावित करेगा, इनसे ही आदमी प्रभावित रहता है। इन मशीनों का प्रभाव ये होता है कि उसके शरीर के ही कुछ अंग इन मशीनों के पुर्जों जैसे काम करने लगते हैं। यानि शरीर को पंखे, गीजर, टोस्टर, मिक्सर, ग्रांइन्डर, एसी कूलर, हीटर, हीट आयरन, कार, कम्प्यूटर, फोन इन सबकी जरूरत अपरिहार्य अंगों जैसे ही पड़ने लगी है। इनमें से यदि कुछ भी खराब होता है तो आदमी के शरीर की हालत तुरन्त पतली हो जाती है। आदमी की बेचैनी देखते बनती है। ऐसा लगने लगता है कि आदमी के प्राण तो इन मशीनों में हैं। जबकि पिछले हजारों साल आदमजात ने इन मशीनों की कल्पना से भी अजनबी रहते हुए बिताये हैं। ये मशीने तो उस जिन्न की तरह हो गई हैं जि‍न्‍हें पैदा होने के बाद कुछ ना कुछ करना ही है और आदमी इस कुचक्र में फंस गया है कि इनके लिए कोई ना कोई काम तलाश कर के रखे वर्ना ये मशीने उसे ही निगल जायेंगी।

अब इस लेखनुमा निवेदन का आशय यह नहीं कि पुराने पत्थर युग में लौट जाने की गुजारिश की जा रही है और मशीनीकरण से निजात पाने की जुगत सोची जाये.... कहना यह है कि आदमी, आदमी रहे इसकी कोशिश की जा सकती है।
यदि मौका और मौसम मिले तो रात को पंखे, एसी, हीटर की हवा के बगैर सोने  में क्या बुराई है? सुबह उठकर पार्क में जाकर सबके साथ योग, नृत्य या मार्शल आर्टस जैसे किसी साधन या घर में ही शरीर को हिलायें डुलायें ना कि मशीनों का सहारा लें। यदि दोपहिया वाहन से काम धंधे नौकरी पर जा रहे हैं तो किसी ऐसा ही मक्सद रखने वाले व्यक्ति को साथ ले लें। सामान ढोने जैसी वजह या 4-5 आदमियों के बगैर कार से यात्रा का क्या मजा हो सकता है? 24 घंटे मोबाइल फोन पास रखने से इसके विकिरण के दुष्प्रभावों का प्रसाद लेने से अच्छा है एक नियत समय पर ही इसका प्रयोग हो। यदि यात्रा आदि में ना रहना पड़ रहा हो तो, तो इसका प्रयोग लेंडलाईन फोन जैसा किया जाना... बेहतर विकल्प नहीं है क्या? यानि कि मोबाइल फोन से यह मुसीबत हो गई है कि आप शौचालय में भी दो घड़ी चैन से बैठकर निवृत्त नहीं हो सकते।
तो जो जि‍सकी जगह है वो उसकी जगह रहे। आदमी अपनी जगह, मशीन की उपयोगि‍ता अपनी जगह। यंत्र से यंत्र की तरह व्‍यवहार कि‍या जाये और इंसान से इंसान की तरह। एक जगह खबर पढ़ी कि‍ अब इंसान यंत्रों से भी काम संबंध स्‍थापि‍त कर पायेगा, क्‍या हालात इतने बदतर हो चुके  हैं? पहले हम धरती के अन्‍य जि‍न्‍दा लोगों से तो प्रेमपूर्ण रहना सीख लें। कभी कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि‍ पत्‍थर युग में आदमी ज्‍यादा संवेदनशील रहा होगा बनि‍स्‍बत आज के आदमी के। उस समय के आदमी ने पत्‍थर से आग नि‍कालने की कोशि‍श की पर आज का आदमी जि‍न्‍दा चीजों को जड़ वस्‍तुओं में बदलने पर तुला है, पॉलीथीन के प्रयोग की ही बात लें। ये ऐसी चीज है जो प्रयोग के बाद जहां भी अपनी अंत अवस्‍था में पहुंचती है खुद तो नष्‍ट नहीं होती, पर जहां ये खत्‍म होने के लि‍ये छोड़ दी जाती है, अपने सम्‍पर्क में आने वाली हर चीज को नष्‍ट भ्रष्‍ट कर देती है। आदमी का व्‍यवहार भी क्‍या ऐसा ही नहीं होता जा रहा है ?
हमें अपने जीवन में मशीनों की भूमि‍का के बारे में एक बार फि‍र सोचना पड़ेगा, क्‍या आपको ऐसा नहीं लगता ???

बुधवार, 30 दिसंबर 2009

नये साल के मतलब



नये साल के मतलब सबके लिये अलग-अलग हैं। वैसे ही जैसे हर त्यौहार का मतलब उसके मनाने वाले पर निर्भर करता है। एक हिन्दू के लिए ईद या क्रिसमस का क्या मतलब है? एक मुसलमान के लिए दीवाली का क्या मतलब है?
यदि आप हिन्दू हैं और किसी पोंगापंडित ज्योतिषी के घर पैदा हुए हैं तो आपका नया साल तो हिन्दू कैलेण्डर के हिसाब से शुरू होना है यानि इस 1 जनवरी वाले दिन का आपके लिए क्या मतलब?
रामू एक छोटा सा बच्चा है 5 साल का, खेलकूद उसे पसंद है। उसके घर में रहने वाले चाचा की नई-नई नौकरी लगी है और अखबार मैगजीन्स पढ़कर, दोस्तों से सुनकर, और टीवी चैनल्स इंटरनेट पर देखकर.. उसके चाचा पर नये साल का बुखार भी चढ़ा है। पर रामू को 30 तारीख को बुखार था वह ढंग से खेल नहीं पाया 31 को वो ठीक हो गया और दोस्तों के साथ गलियों में खेला, दरअसल 1 तारीख के लिए उसमें अभी कोई उत्तेजना नहीं है क्यों? समयबोध न होने के कारण। वह 1 तारीख को एक सामान्य दिन की तरह जिएगा हो सकता है वो पढ़े, खेले, सोये। न पिछले सालों को याद करेगा न पिछले महीने को न पिछले हफ्ते को... यहां तक कि वो पिछले दिन को भी याद नहीं करेगा।
ऐसा तथाकथित पढ़े लिखे सभ्य शहरी लोग के साथ नहीं होगा, दरअसल ये लोग भी पिछली जिन्दगी की तरह ही 1 तारीख को भी कुछ खास नहीं करने वाले, ये भी एक आम दिन की तरह ही जिएंगे पर नये साल के बारे में उन्हें बहुत गलतफहमियां हैं। मुझे मालूम है आप नये साल को क्या करने वाले हैं:
1 आप पिछले सालों को पलट कर देखेंगे और रूंआसे होंगे या खुश होंगे, जबकि ऐसा करने से या ना करने से आप जो हैं उसमें अंतर नहीं पड़ने वाला।
2. आप यह कहेंगे कि मैं 1 तारीख को सामान्य दिन की तरह ही मनाएंगे और कोई महत्व नहीं देंगे, इससे भी कुछ नहीं होगा क्योंकि ये वैसे ही एक सामान्य दिन है, आपके सामान्य तरह जीने से ये सामान्य नहीं हो रहा।
3. आप नये साल की रात यारों दोस्तों संग दारू डांस पार्टी में मनायेंगे ये सब भूल भाल कर कि पिछले साल भी आपने ऐसी पार्टी में दारू पीकर एक लड़की को छेड़ा था और आपके भयंकर जूते पड़े थे। उसके बाद घर जाकर उल्टियाँ की थीं और उनमें खून भी देखा था। इसके बाद कयामत तो तब हुई थी जब पता चला कि वो असल में लड़की थी ही नहीं।
4. नये साल पर कुछ नये संकल्प करेंगे, जबकि पिछले साल जो संकल्प लिखकर किये थे वो चौथे दिन ही टूट गये थे... तो ऐसा करने से फायदा। पिछले सालों में ऐसा कई बार हुआ है।
5. आप कुछ भला करेंगे, राम नाम का कीर्तन करवायेंगे या उसमें शामिल होंगे या अनाथाश्रम में बूढ़ों या बच्चों के बीच दिन बितायेंगे और फिर महीनों तक अपने इस कृत्य का चाहे अनचाहे, प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से चहुं ओर बखान करेंगे, यूं आपका अहं आपको बिना खबर किये छल जायेगा।
5. आप कहेंगे कि आखिर करें क्या? कुछ करने की जरूरत क्या है? आप इसे 3 फरवरी जैसे एक अनाम दिन की तरह मनाएं जिससे कोई भी पुण्यतिथि, जन्मतिथि, वर्षगांठ या कोई स्मृति जुड़ी नहीं होती एक ऐसे दिन की तरह जब सब कुछ नियमित अनियमित सा....आम सा हो खास होने की इच्छा किये बिना.... या अचानक ही खास हो गया हो।
नये साल में यांत्रिक शुभकामनाओं के साथ, निजी वैयक्तिक रूप से जिन्दा लोगों से मिलने के लिए समय निकालना और बिना कारण मिलना ज्यादा बेहतर हो सकता है। नये अंग्रेजी साल की हार्दिक शुभकामनाएं।

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2009

बुरा क्‍यों देखन मैं चला



लाईने तो पुरानी भी ठीक थीं और इतनी ठीक थीं कि इन पर लोगों ने भरपूर किताबें लिखीं। कभी-कभी जिन चीजों का अर्थ जल्दी समझ में आ जाता है वो काम की नहीं रह जातीं। आदमी का भी यही हाल है जो आदमी समझ में आ जाये वो काम का नहीं - सीधा, झल्ला, पगला, गेला...अन्यान्य सम्बोधनों से टाल दिया जाता है। कौए-लोमड़ी सा तिकड़मी, घाघ, चालू, चलता पुर्जा, स्मार्ट, ऐसे शब्दों को अर्थ देने वाले व्यक्तित्व ही आदमी कहलाते हैं।
तो लाइने ये थीं -

बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोय।
जो दिल देखा आपना मुझसे बुरा न कोय।।

इन पंक्तियों का सीधा अर्थ जो भी हो, निकाला ये जाने लगा कि मैं बुरा देखने निकला तो मुझे कोई भी बुरा न मिला लेकिन अंदर झांका तो मुझमें ही सारी बुराईयां थीं।
ईसाइयों के चर्च़ में लोग कन्फेशन यानि स्वीकारीकरण करते हैं, यानि व्यवस्था ये कि यदि पाप किया है तो इस बात को स्वीकार कर लो। तद्-भांति एक व्यवस्था जैनों में भी है वो साल में एक बार क्षमा-दिवस मनाते हैं। मैंने एक विज्ञापन एजेंसी में अपनी सेवाएं दी, दुकान मालिक जैन थे वो क्षमा दिवस के दिन एक बड़ा- सा विज्ञापन अखबारों में प्रकाशित करवाते थे, जिसमें ये लिखा होता था कि चाहे-अनचाहे हुई गलतियों/पापों के लिए वे क्षमा माँगते हैं। यह विज्ञापन साल दर साल हर साल छपता था। यानि ये निश्चित था कि जब जब उन्होंने विज्ञापन छपवाया, पक्के तौर पर पाप किया होगा। ये विज्ञापन अखबारों वाले इसलिए छापते थे क्योंकि वो जानते थे कि विज्ञापन एजेंसी के मालिक का ‘क्षमा माँगने का विज्ञापन’ न छापना कितना अक्षम्य हो सकता है, अन्य कमाऊ विज्ञापन नहीं मिलेंगे।
मुझे ये कन्फेशन और क्षमा माँगना एक पाप के भार से मुक्त होने और अन्य के लिए प्रशस्त होने का चरण बन जाता दिखा। पाप किया इससे निपटने की विधि स्वरूप क्षमा मांगी। इससे हुआ ये कि आपने पाप की कोंपले छांट दी। पूरा दरख्त और शाखाएं हरियाए हुए मजे से झूमते रहे।
कुछ लोग अपने बारे में ही कि वे इतने बुरे कि उन्होंने ये किया ....ये किया और वो किया ......जो नहीं किया वो भी गिना देंगे। लेकिन इस स्वीकारीकरण का फल ये नहीं निकलता कि वे उन दोषों से दूर हो जाते हैं जिनको वे स्वीकार कर रहे हैं। इस स्वीकारीकरण से वे उन्हीं दोषों से दूर होने ...उन दोषो से निवृत्त होने को एक प्रक्रिया बनाते हुए, टालते हुए लगते हैं।
मनुष्य योनि में जन्म लेने के बाद प्रत्येक भाषा में दिये शब्दों के नये अर्थ किये जाना, पालन करने वाले परमात्मा का परमगुण है। इस दोहे का अर्थ है कि बुराई देखने की वृत्ति एक भारी बुराई है न कि.. ये कि मैं सबसे बुरा हूं, मुझसे पंगा लेकर तो देखो... मुझसे बुरा कोई नहीं (धमकाने वाले अंदाज में)। एक सफल बलात्कारी के ये कहने का क्या अर्थ कि जिस लड़की से उससे कुकर्म किया, उससे शादी कर लेगा।
कुछ अन्य सकारात्मकता से देखने के हितैषी लोग कहते हैं ‘पॉजीटिव थिंकर बनो‘।



जे कृष्णमूर्ति कहते हैं कि ‘क्या’ और ‘क्यों’ को भलीभांति देख लेने पर, ‘कैसे’ की समस्या नहीं रहती। आप ने यह देखा कि ‘आपका बुरा देखना, एक बुराई है’ तो उसके बाद देखना चाहिए कि ऐसा क्यों है, मुझसे बुरा क्यों हो रहा है, मैं क्यों बुरा देख रहा हूं, बुराई क्यों है... इस तरह देखने पर सारा परिदृश्य साफ हो जाता है, साफ करना नहीं पड़ता। आपने देखा कि बुरा क्या है, क्यों है... एक समझ आती है और बुरा करने की वृत्ति और मूल कारण तुरंत विदा हो जाते हैं।

अगर आप पाप करने और उसके बाद पश्चाताप करने की कहानी में यकीन करते हैं तो आप निश्चित ही उलझन में हैं। क्योंकि असली पश्चाताप यह है कि वो अब वो पाप अपने आप ही... आपसे न हो। अगर आप इतनी सरलता से नहीं देख रहें हैं तो अवश्य ही आपका मन कोई न कोई कलाबाजी कर आपको ही उल्लू बना रहा है, आप अपने से ही छल कर रहे हैं।
''पुर्नप्रेषि‍त''

शनिवार, 12 दिसंबर 2009

क्‍या आपने कामधंधे, कैरि‍यर और जीवन को इस नजरि‍ये से देखा है ???



दो सौ साल पहले व्यापारी अपने संस्थानों यानि कंपनियों की औसत उम्र पीढ़ियों में गिना करते थे। आज एक संस्थान की औसत उम्र 30 वर्ष मानी जाती है, और भविष्य के अनुमान कहते हैं कि अगले 20 सालों में यह उम्र घटकर 5 वर्ष रह जायेगी। यह आंकड़े हम में से प्रत्येक व्यक्ति के जीवन पर गहरा असर डालते हैं क्योंकि एक आम आदमी की नौकरी धंधे की उम्र औसतन 50 साल होती है।

आधुनिक व्यावसायिक इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ है कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति पर यह दबाव है कि वो इस हकीकत के प्रभाव जाने कि हम अपने ही व्यापार यानि अपने आपको ही बेचने खरीदने में लगे हुए हैं। हालांकि अपने को ही खरीदने बेचने के व्यवसाय में सीधे-सीधे न लगे होकर.... हम अपना समय बेचते हैं, इस समय की कीमत हमारी उत्पादकता - यानि हमारी कुशलता या ज्ञान की गुणवत्ता द्वारा निर्धारित होती है। हम अपने ज्ञान को कितने प्रभावकारी ढंग से क्रियान्वित कर पा रहे हैं यही तथ्य हमारी काम धंधे की आयु में हमारे बाजार मूल्य को ऊंचाईयों की ओर ले जा सकता है।

आपके ज्ञान के उत्पाद की गुणवत्ता अकेले आप के निष्पादन में पर्याप्त नहीं क्योंकि आप के संभावित ग्राहकों में वे कम्पनियां हैं जो अपनी प्रकृति से ही लोगों की टीमों द्वारा बनी हैं। ऐसे लोगों की टीमों से जिनके पास विविध प्रकार का ज्ञान और कौशल होता है। इसलिए आपके उत्पादता के मूल्य की असली माप सीधे सीधे इस बात से जुड़ी है कि आप उस समय कितनी सक्षमता, प्रभावपूर्ण तरीके से योगदान कर सीधे परिणाम दे रहे हैं या एक अर्थवान सहभागिता उस टीम में करते हैं जिसके अंतर्गत आप संचालित किये जा रहे हैं।
अक्सर उस उम्र से जब हम अपने आप से यह कहना शुरू करते हैं कि ”अब कुछ करना चाहिये " हम उस परिवेश में चले जाते है, जहाँ हम अपना आकलन करना शुरू कर देते हैं कि अब ”हम यह करने के लायक हो गये हैं“ और इसके बाद हमें यह भी दिखना शुरू हो जाता है कि हमारी प्रगति के लिए वह क्या प्रभावी योगदान हैं जो हम इन टीमों में कर सकते हैं। इन वास्तविकताओं का मतलब यह भी है कि एक वैयक्तिक व्यवसायिक योजना के तहत हम अपनी जिम्मेवारी, अपनी ही जागरूकतापूर्वक देखभाल, समय के साथ समायोजन और समय-समय पर अपना मूल्यांकन कर इनमें बदलाव की भूमिका निभायें। कोई भी कंपनी आपके कैरियर की योजना नहीं बनाती, आपको अपने लिए जो जरूरी है वो खुद ही योजनाबद्ध कर क्रियान्वित करना होगा।

यही वह जगह है जहां असली चुनौती है, क्योंकि हमें अपना जीवन योजनाबद्ध करने, अपनी व्यावसायिक योजना बनाते समय यह साफ होना चाहिए कि हम कौन है - हमें अपने बारे में समझपूर्ण होना होगा। हम सब चाहते हैं कि हम खुश रहें, स्वस्थ रहें, हम प्यार करें, लेकिन हमारा मन बहुत ही अशांत रहता हैं और इन सब के बीच हमारा शरीर इतना क्लांत रहता है कि हम अपने अस्तित्व के उस भाग पर ध्यान देने में सफल ही नहीं हो पाते जो कि हमारे जीवन की सारी बातों की नींव है और हमें हमारे उद्देश्यों के निर्धारण और जीवन को दिशा देने में सहायक होता है, वह है - हमारी आत्मा।

अपने आपको जानने समझना का पहला चरण है कि ”हम कौन है?“ इसके तीन आयामों को समझें। यह हैं - पहला आपका शरीर, दूसरा मन, तीसरा आत्मा।
- आपका शरीर अणुओं का संग्रह है जो आपको संसार का अनुभव कराने में सक्षम है। आपके शरीर में वो संवेदनशील अंग शामिल हैं जो आपको वातावरण से सम्बन्धित करते हैं (सुनना, महसूस करना, देखना, चखना और सूंघना आदि) और संचालन तंत्र (आपका बोलना, हाथ और पैर इत्यादि) आपको कार्य करने में सक्षम बनाता हैं। हर दिन आपके संवेदन अनुभव आपके तंत्रिका तंत्र में कई प्रकार के रासायनिक एवं वैद्युतीय परिवर्तन करते हैं जो आपके शरीर के हर अणु और प्रत्येक अवयव के गुण और संरचना को बदलते हैं। इस प्रकार आपके अनुभव आपको जैविक रूप से प्रभावित करते हैं।
- आपका मन विचारों का क्षेत्र है जो सदा इस वार्तालाप में संलग्न रहता है कि क्या हुआ, क्या हो रहा है और आपके साथ आगे क्या होगा? आपके सतत प्रत्येक अनुभव से ही भावनात्मक प्रतिक्रियाओं से रंगे आपके मत, विचार, मान्यताएं, मूल्यांकन और निर्णय आकार लेते हैं। आपके विचार, स्मृतियां, इच्छायें और अहसास मन की ही विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं।
- आपकी आत्मा, आपके शरीर और मन की तटस्थ प्रत्यक्षदृष्टा है। आप यह देखें कि 10 वर्ष पूर्व आपका रूप रंग आकार कैसा था और अब कितना बदल चुका है। इस प्रकार आपका शरीर बदलता रहता है। अपने और संसारे के बारे में आपके विश्वास भी पहले के समय से ही नहीं रहते। पर इन सबको आपकी आत्मा सतत देखती रहती है, आपकी पहचान को निरंतरता देते हुए, एक धुरी देते हुए ताकि आप संतुलित रह सकें।
जब आप आत्मा का अवलोकन करते हैं, विचारों से मन बनता है और भौतिक शरीर तद्नुरूप समायोजित होता है, आप अपने इरादों को पसंद में जाहिर करते हैं जिनसे परिणामस्वरूप आपकी इच्छाएं बनती हैं। यह आपकी आत्मा का ही निर्णय होता है जो परिवर्तन के द्वार में आपको इस प्रकार प्रशस्त करता है, आप इससे गुजरते हुए समय में दुबारा वापस लौटने का इरादा नहीं रखते। यही संकल्प या प्रतिबद्धता कहलाता है, जिसमें अपनी जिम्मेदारी हम खुद लेते हैं।

अपने जिन्दगी और कैरियर की जिम्मेदारी लेते समय भी आपको इसी प्रकार की प्रतिबद्धता और संकल्प की आवश्यकता होती है। प्रतिबद्धता में आपका कर्म क्रियान्वित होता है जिसे एक निरंतरता में करना होता है। इन्हीं नियमित कर्मों से आपकी अच्छी और बुरी आदतें बनती हैं जिनके द्वारा आप आपने जीवन को एक (ऑटोमेटिक मोड) ‘‘अपने आप चलने वाले निकाय’’ में डाल देते हैं।
यहाँ आपको तीन मार्गदर्शक सिद्धांत अपनाने होंगे:
1. आप जो सोचते हैं, वही हो जाते हैं।
अपनी आत्मा की गहराई में आपको संदेह रहता है कि आपने अभी भी अपनी पूर्ण सामथ्र्य को नहीं पहचाना है। आप अभी भी और अधिक के योग्य हैं। आपको अपने प्रति ईमानदार रहते हुए अपने मन को इस संदेह के विश्लेषण में लगाना होगा क्योंकि यह चेतन मन ही जो आपको प्रशस्त करता है और सामथ्र्यवान बनाता है कि आप अब एक बेहतर अध्याय रच सकें, उस सब से अप्रभावित रहते हुए जो कि आज की तारीख तक हुआ। अब आपकी प्राथमिक आवश्यकता यह होती है कि आप की जाने वाली चीजों को एक अलग नजरिये से देखें ताकि आप नये नतीजों को पहचान कर उन्हें प्राप्त कर सकें।
2. अपने अतीत से मुक्त हो जायें!
हम सभी के पास मुश्किलें और समस्याएं होती हैं। हम समस्याओं से निपटने की कोशिश में, उनकी जड़ तक जाने के लिए सालों का समय और अमूल्य ऊर्जा लगाते हैं। इस प्रकार समस्या को हल करने के लिए भी, समस्या को प्रमुखता देना अत्यंत सफल रणनीति नहीं है। यह स्पष्ट रूप से समझना संभव है कि हम क्यों नाखुश हैं, लेकिन इसके बाद भी हम खुश क्यों नहीं होते? यह संभव है कि आप जान जायें कि आपने अतीत में गलत चुनाव और निर्णय किये, लेकिन ये ज्ञान आपको वर्तमान को बेहतर बनाने में सक्षम नहीं बनाता। सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि हम अतीत को देखें, जाने दें और बदलने के लिए प्रतिबद्ध हों। हमें अपनी जिन्दगी बदलने के लिए, खुद को बदलना होगा।
3. असीखा होना या बने बनाये सांचों और ढाँचों से निकलना।
आपको यांत्रिक जीवन से बाहर निकलना होगा। हम में से बहुत से लोग अपनी जिन्दगी उस सीखे-सिखाये जानवर जैसे जीते हैं जिसे यह पता होता है कि किन परिस्थितियों, हालातों या लोगों से मिलने पर, किस तरह की प्रतिक्रिया देनी है। क्योंकि उन्हीं चीजों और बातों को दोहराने में सुरक्षितता होती है, लोग उन रिश्तों में भी बने रहते हैं जो उनके लिए भले नहीं होते, उन कामधंधों में भी लगे रहते हैं जिनमें उनकी आत्माभिव्यक्ति की कम ही गुंजाइश होती है और उस दिनचर्या को भी निरन्तर बनाये रखने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं जिनसे वो अपने आस-पास ही हमेशा मंडरा रहे अवसरों के प्रति सुन्न और असंवेदनशील हैं। आप यह सुनना पसंद करें या ना करें पर यह सच है कि आप आदतों के गुलाम हो गये हैं या रोबोट से हो गये हैं। आप वो खेत हैं जिनको बागड़ ही निगल गयी है। यदि आप को जीवन में वो चाहिए जो आपको नहीं मिल रहा है तो आपको इन आदतों को पहचानना, इनसे मुक्त होना और इनको पार करना होगा। क्योंकि आप आदतों को बनाने वाले हैं, ना कि आदतों के द्वारा बने हैं। आपको जानना ही होगा कि आप वास्तव में क्या हैं?
यह आपका कर्म है जो जिन्दगी में वहां ले जाता है जहां आप जाना चाहते हैं न कि आपकी या किसी अन्य की पुष्टि। सफल लोग कभी भी अपने आपको निरन्तर यह नहीं कहते रहते कि ‘‘मैं एक शक्तिशाली व्यक्ति  हूँ’’ बल्कि वो यह अपने कर्मों से सिद्ध करते रहते हैं कि वो उससे अधिक के योग्य हैं, जो वो अभी हैं।
चुनौती अभी और यहीं है। आपके पास चुनने के लिए अन्य कोई मार्ग नहीं है सिवा इसके कि आप अपने जिन्दगी और कैरियर की बागडोर अपने हाथ में ले लें क्योंकि अन्य कोई व्यक्ति आपके लिए ऐसा नहीं करने वाला है। अन्य लोग भी आपकी ही भांति भ्रमित हैं। यह निर्धारित करें कि कौन सा ज्ञान है जो आपको प्राप्त करना है, यह जाने कि कैसे और कहाँ से ये ज्ञान मिलेगा, वहां जायें और इसे प्राप्त करें और प्रयोग में लायें। अपने आपको अपनी विशेषज्ञता के क्षेत्र में सर्वोत्तम उत्पाद बनायें।
इन बातों के लिए प्रतिबद्ध हों:
1. आपको कौन सा, किस चीज का ज्ञान चाहिए
2. इस नये ज्ञान को पाने के मार्ग निर्धारित करें।
3. इस नये ज्ञान को व्यावहारिकता में उतारते समय अपने प्रति ईमानदार रहें। याद रखें आपके अन्दर से आये गलत फैसले, आपको असफल बनाने में बाहरी तथ्यों से 6 गुना ज्यादा बड़ा कारण बनते हैं।
व्यवसाय में सफलता, जीवन में सफलता प्राप्त करने की तरह ही है और दोनों में बुनियादी बातें समान हैं कि अपने कब, कहाँ, क्या किया? क्या यह विचारणीय नहीं है?

शुक्रवार, 16 अक्टूबर 2009

दीवाली और दि‍ल की बात












दीवाली और मेरा दिलबर

हम कैसे मनाएँ दीवाली,

सब उजाले उनके साथ हैं,
उनका हर दिन पूनम सा,
अपनी तो अमावस रात है।

हैरान हैं उनके इशारों से,
हाँ-ना के बीच ही झूलते हैं,
अब दीवाना करके छोड़ेंगे,
जो उलझे से जज्बात हैं।

रंगीन बल्बों की जो लड़िया,
उनकी मुंडेर पर झूलती हैं,
उनके जलने बुझने जैसे,
अपने दिल के हालात हैं।

सुना! आयेगा घर दिवाली पर,
दिल में फुलझड़िया छूटती हैं,
मेरी दीवाली से पहले ही,
जगमग-जगमग हर बात है।

वो जब भी मुझसे खेलता है,
बस मैं ही हमेशा जीतता हूं,
वो है मेरे सामने जीत मेरी,
मेरी खुशी कि मेरी मात है।

वो खुदा तो हरदम संग मेरे,
दीवाली हो या दीवाले
वो आंसू में, मुस्कानों में,
वो ही सारी कायनात है।






आदरणीय मित्रजनों,
आप सबको दीपावली पर्व की हार्दिक बधाईयाँ।
सर्वे वे सुखिनः सन्तु , सर्वे सन्तु निरामयः
सर्वे भद्राणि पश्यंतु , मा कश्चितदुखभागभवेत
इस श्लोक का अर्थ आधुनिक दीपावली पर्व के रूप में किया जाना चाहिए।
सर्वे वे सुखिन: सन्तु का अर्थ है कि सभी सुखी हों। लेकिन यदि दुनियां में पांच अरब तरह के लोग हैं तो सुखों की संख्या उसकी पांच अरब गुना ही होगी। सबके अपनी-अपनी तरह के सुख हैं।
जो भूखा है वो सोचता है कि मरा जा रहा हूं, कुछ खाने-पीने को मिले तो शरीर में जान आये और चलफिर फिर पायें।
जो पैदल चल रहा है वो सोचता है साईकिल मिल जाये तो किलोमीटर्स का सफर मिनटों में तय कर डालूं।
जो साईकिल से सफर करता रहा है, वो मोटरसाईकिल वालों को देखता है कि यार कब तक मैं मोटरसाईकिलों कारों के पीछे धुंआ निगलता हुआ पैडल मारता रहूंगा, मोटरसाईकिल मिले तो मैं भी हवा-हवाई सफर करूं।
मोटरसाईकिल वाला ज्यादा मुश्किल में होता है- क्योंकि कार आती है लाख रूपये की, कई लोगों का तो जन्म निकल जाता है लाख रूपये कमाते-कमाते। फिर कार खरीद कर गैरेज में खड़ी करने से तो और भी दुख होगा न, चलाने के लिए 50 रू प्रति 10-15 किमी पेट्रोल का प्रबंधन आसान खर्च थोड़े ही न है।
कारधारक हवाई जहाजों के किराये देखता है और यह कि फलां दोस्त कितना अक्सर हवाई यात्राओं का कहां कहां सफर कर चुका है।
जो हवाई जहाज से उड़ रहा है वो भी चांद की यात्रा के सपने पाल रहा है।
तो कहने का मतलब साफ होता है कि सुख अपनी-अपनी औकात के हिसाब से होते हैं।
लेकिन इस श्लोक में शायद उन सुखों की नहीं असली सुख की बात कही गई है असली सुख है, कि सुख को भोगने वाला शरीर, मन निरोग रहें, निरामय रहें।
कोई स्वस्थ रहे इससे बड़ी कोई अमीरी नहीं है।
अस्वस्थ हैं, कोमा में पड़े हैं, शरीर की गतिविधियां मशीनी हो गई हैं, रोज लाखों- करोड़ों रू फंुक रहे हैं लेकिन कानूनी वैज्ञानिक रूप से से आप जीवित हैं, तो आप इसे जीवित रहना या सुख कहेंगे?
इससे भला तो वो बीमार अच्छा है इलाज न करवा पाने के कारण परमात्मा को पुकार ले, देहत्याग दे।
तो निरामयता सुख है।
साथ ही कहा गया है - सर्वे भद्राणि पश्यंतु। अब आप अकेले स्वस्थ सबल छुट्टे सांड की तरह इधर-उधर सींग मारते घूम रहे हों तो इसमें निरामयता का सुख नहीं है।
श्लोक के ऋषि कहते हैं - सर्वे भद्राणि पश्यंतु। मैं अकेला ही नहीं सभी लोग स्वस्थ हो जायें। सभी लोग तन मन से यथार्थतः स्वस्थ सुंदर दिखने वाले हो जायें।
यह बात ही है जो हर दीवाली पर सबको विचारनी चाहिए।
आपके घर पर रंग बिरंगों बल्बांे की लड़ियाँ जगमगा रही हैं, दिये जल रहे हैं, मिठाईयों पकवानों का आदान प्रदान चल रहा है इसी बीच आपके द्वार पर कोई कंगला पुकारता है और आप उसे लक्ष्मी के स्वागत में तैयार द्वार से हट जाने के लिए दुत्कार देते हैं, यह दीवाली का सच्चा भाव नहीं!
आज तक का इतिहास और आपकी उम्र भर का होश गवाह रहे हैं कि कभी कोई लक्ष्मी सजधजकर आपके द्वार पर आपको अमीर करने नहीं आ गई। परमात्मा की शक्लें पहचानने में नादानी नहीं करनी चाहिए।
श्लोक में तो इससे भी आगे की बात कही गई है कि सब लोग सुखी, स्वस्थ और संुदर ही न हों बल्कि किसी को किसी तरह का कोई दुख न हो।
पिछली दीवालियों के पन्ने पलट कर देखिये क्या सारी पिछली दीवालियों पर आपके सम्पर्क में या आपका कोई रिश्तेदार या अन्य, क्या ऐसा हुआ है कि कोई बीमार हो और आप दीवाली के पूजा-पाठ छोड़कर उसकी पूछ परख करने गये हों।
दीवाली पर यह श्लोक बांचना ही नहीं, अपनी सामथ्र्य भर किसी छोटे से छोटे रूप में इसे अमल में लाने पर ही दीवाली, दीवाली होगी।
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जैसे ही गर्मी बीतती है और बारिश का मौसम शुरू होता है या जैसे ही बारिश का मौसम गुजरता है और सर्दियों का आगमन होता है - इस संचरण काल में हमें सांस की तकलीफ होने लगती है।

दीवाली की सफाईयाँ-पुताईयाँ शुरू हुईं तो उठे धूल और चूने, पंेट्स, तारपीन के तेल की गंधों से सांस भारी भारी चलने लगी। दवाईयों के नियमित खानपान के बावजूद हमारी, रात की नींद पिछले 7 दिनों से गायब है। दमे, सांस की तकलीफ झेल रहे लोगों के लिए दीवाली एक दर्दभरा त्यौहार है।

आज अखबार में पढ़ा कि दीवाली पर लगभग 40 प्रतिशत लोग जलते झुलसते हैं। धूल धुंए, शोर को झेलते नवजात बच्चों, शिशुओं और वृद्धों, अबोले वृक्ष, पशु, पक्षियों की विवशता की भी कल्पना करें।

जब फुलझड़ियां, अनार या चकरियां चलती हैं तो उठते धुंए का किस पर क्या प्रभाव पड़ता होगा ये सोचें। राॅकेटों से परेशान कबूतरों, बम पटाखों की लड़ियों से सताये गये गली के कुत्तों, गायों या अन्य प्राणियों का दुख समझें। पटाखों का शोर कानों के पर्दे फाड़ने के लिए जरूरत से ज्यादा है।

पिछली दीवाली पर घर के सामने ही खड़ा, बारह महीनों पानी से भरे नारियल टपकाने वाला हरा-भरा और प्रातः उठकर देखने पर अपनी हरियाली से हिल हिल कर गुडमार्निंग करने वाला नारियल का पेड़, अपने शीर्ष पर जा घुसे राकेट से धू-धू कर जल गया। जब तक फायर बिग्रेड वाले आते कोंपले निकलने वाला स्थान राख हो चुका था। आज वर्ष भर बाद भी कोंपले उठकर संभलती दिखाई नहीं देतीं।

माना की दुनियां भर की मंदी में आपकी अमीरी दिन दुगुनी रात चैगुनी बढ़ रही है पर इसका उन्मादपूर्ण प्रदर्शन क्या जरूरी है? गरीब तो वैसे ही परेशान है कि पटाखे खरीदेगा या खुद एक पटाखे, फुस्सीबम सा बिना चले झुंझलाया सा खत्म हो जायेगा।
वृद्धगृहों, विवश महिला सरंक्षणगृहों, अनाथालयों, अस्पतालों, जेलों, सीमा पर विषम परिस्थितियों में तैनात सैनिकों की परिस्थितियों को याद करें, फिर दीवाली मनायें।
पटाखे फुलझड़ियां चलाने के लिए घर, संकरे स्थानों कि प्रयोग से बचें, खुले मैदानों का प्रयोग करें। इंटरनेट अखबारों पत्रिकाओं के इस संबंधी ज्ञानवर्धक लेखों को पड़े होश में आयें। क्योंकि होश से बड़ा कोई पुण्य, त्यौहार नहीं है। बेहोश होकर बम पटाखों से हिंसाभाव, रोमांचपूर्ण पागलपन फैलाने से बड़ा कोई पाप नहीं।



सोमवार, 5 अक्टूबर 2009

उम्र के तकाजे

उम्र शब्द आते ही लगता है कि कोई कमउम्र या हमउम्र, हमसे असली उम्र का सवाल ही न कर बैठे। आजकल प्रचलित है कि महिलाओं से उम्र और पुरूषों से सेलरी नहीं पूछनी चाहिए क्योंकि हमारे समाज के किसी महिला और पुरूष संबंधी यही प्राथमिक मापदंड हैं। यानि समाज भी और स्वयं स्त्री भी स्वीकार कर रही है कि प्रथमदृष्टया कोई स्त्री देह (16 वर्षीय या कम या ज्यादा) के अलावा कुछ नहीं और पुरूष पैसे कमाने वाली मशीन है।

समय के मार्ग पर कोई कितना चला है यही उसकी उम्र होती है। देह समय के साथ ढलती है और दिमाग में अनुभव इकट्ठा होते हैं। देह और दिमाग की उम्र की चाल अलग-अलग होती है। सामान्य लोगों का शरीर, दिमाग से ज्यादा तेजी से बढ़ता, फैलता है। कुछ लोगों के दिमाग जल्दी विकसित होते हैं बनिस्बत देह के। देह की उम्र से आदमी के दिमाग की उम्र का अंदाजा लगाना ठीक नहीं। आपने भी देखा होगा कुछ बच्चे ज्यादा समझदार लगते हैं।

आदमी की उम्र को मुख्यतः तीन भागों में बांटा जाता है, बच्चा, जवान और बूढ़ा। किशोर, प्रौढ़ इनके मध्य की स्पष्टीकरण अवस्थाएं हैं। हर उम्र की अपनी अपेक्षाएं, इच्छाए और विवशताएं होती हैं। ‘‘जनरेशन गेप’’ इन्हीं अपेक्षाओं, इच्छाओं और विवशताओं से उपजता है।

सामान्यतः लोग अपनी उम्र के अनुसार आचरण को ठीक मानते हैं। जैसे एक बच्चा बचकानी हरकतें, एक जवान गलतियां करें या एक बूढ़ा चिढ़चिढ़ाये ये असामान्य नहीं माना जाता। इसके विपरीत यदि कोई बच्चा बूढ़ों सा गंभीर, एक वीतरागी युवा और एक दिलफेंक बूढ़ा दिखे तो सामाजिक लोग इसे अच्छा नहीं समझते। जबकि किसी भी उम्र में कोई व्यक्ति कैसा होगा यह ढर्रा बनाया जाना ही सामाजिक दुराग्रह है। खैर समाज ढर्रे बनाता है और आयु के इन ढर्रों के पार गये संबंधों को चटखारे लगाकर सुनता-सुनाता और कमरे बंद कर नेट, डीवीडी डिस्‍प्लेयर्स पर देखता है।

पुरूष और महिला के उम्र संबंधी अनुभव भिन्न-भिन्न होते हैं। महिलाओं की आयु को नापने का पैमाना सामान्य से हटकर होता है। 16 वर्ष तक तो उनकी उम्र वर्षों के हिसाब से ही नापी जाती है पर 16 के बाद यह स्थिर हो जाती है। पुरूषों की चाहिए कि किसी महिला की इसके बाद के वर्षों की उम्र को उदाहरणतः 21 वर्ष को 16+5 आदि कहकर दर्शांए। इससे महिलाओं का षोड्षपने से जुड़ाव भी नहीं टूटता और जो बात आगे बढ़ चुकी है वह भी स्पष्ट हो जाती है। पुरूषों को किसी महिला संबंधी कल्पना में भी यह गणित अच्छा सहायक हो सकता है।

हमें यह तो पता है कि वैज्ञानिकों ने मनुष्य की दिमागी उम्र नापने के मानदण्ड विकसित कर लिये हैं पर यह ज्ञात नहीं कि इन मानदण्डों का व्यावहारिक इस्तेमाल कहाँ किया जा रहा है। कल्पना करें कि वह कितना बेहतर कर्मस्थल होगा जहां पर दिमागी उम्र से समान पर शारीरिक आयु से असमान बच्चे, किशोर, युवा, प्रौढ़ और वृद्ध सभी एक ही जगह, एक ही मंच पर आयुभेद के दुराग्रहों से रहित होकर सक्रिय रूप से कार्य सम्पन्न करें। इससे निश्चित तौर पर जनरेशन गेप गायब होगा.. बच्चों और युवाओं, युवाओं और बूढ़ों के बीच समझ बनेगी और वृद्धावस्था में अलगाव और अकेलेपन की बीमारी से भी बचा जा सकेगा।

वैसे देखा जाये तो इन्टरनेट पर यह अप्रत्यक्ष रूप से हो ही रहा है। लेकिन ये अप्रत्यक्ष होना बड़ी ही मायावी अवस्था है। प्रोफाईल फोटो में 16 बरस की बाली उम्र को सलाम किया जा रहा होता है और असलियत ये होती है कि रिटायरमेंट के बाद के अपने बेदर्द फुसर्तियापन को अपनी किशोरावस्था के जज्बातों के इजहार द्वारा काटा जा रहा होता है। लड़कों द्वारा लड़की बनकर लड़की से दोस्ती और एक सुन्दर लड़की की फोटो लगी प्रोफाइल में हजारो की संख्या में मित्रों और स्क्रेप या कमेंट्स आम बात है।

इंटरनेट जैसे प्रभावी माध्यम का उपयोग देशी-विदेशी, जाति, धर्म, सम्प्रदाय, वर्ग, लिंग, आयु, समाज-साम्य-पूंजी जैसे वादों को बढ़ावा देने में हो रहा है। जबकि इंटरनेट पर अप्रत्यक्ष रहकर आयु, लिंग, वर्ग, जाति, धर्म, वाद आदि सभी प्रकार के भेदों का उन्मूलन आसानी से किया जा सकता है। इसके लिए ”वसुधैव कुटुम्बकम“ की समझ होना अपरिहार्य है।

जैसे महिलाओ की उम्र उनकी कमर से जुड़ी है वैसे ही पुरूष की उम्र उनके गंज के परिवेश से। दिमागी मामलों में पुरूषों द्वारा सफलता या किसी बुद्धिमानी की तारीफ होने पर ”बाल धूप में ही सफेद नहीं किये“ .... 60 होने पर भी स्वस्थ और हष्टपुष्ट होने पर ”साठे में पाठा“ .... और अधिक उम्र में भी बचकानी बातों में संलग्न होने पर ”बंदर बूढ़ा हो जाये पर कुलाटी मारना नहीं छोड़ता“ जैसे कहावतों मुहावरों का आश्रय लिया जाता है। ”जो जाके न आये वो जवानी देखी, जो आ के न जाये वो बुढ़ापा देखा“ उम्रों के सत्य को कहने वाली बड़ी ही कीमती कहावत है।

सत्य सनातन होता है, उसका उम्रों से कोई लेना देना नहीं होता। कई महान चरित्र इसी बात का जीता जागता उदाहरण हैं। आदि शंकराचार्य, स्वामी विवेकानंद आदि जैसे कई महापुरूष कम उम्र में ही अपने सारे महान कर्म सम्पन्न कर देह से निवृत्त हो गये। इसलिए धार्मिक उत्कर्षों, सनातन मूल्यों और सिद्धानों के पालन में हमें उम्र का तकाजा नहीं करना चाहिए।

ये उम्रों का अंदाज था
कुछ पहले, तो कुछ बाद था

ये उम्र था या रूह था
सांसों के नद के बहाव को देखता हुआ
प्रवासी पक्षियों का वह समूह था
जो सागरों, पर्वतों, शहरों और देशों की हदों से परे
अपनी पूरी जिन्दगी में
दो-चार सफर करता है।

ये उम्रों का अंदाज था
कुछ... बंध गया था मौत में
कुछ... सारी जिन्दगी आजाद था।

रविवार, 13 सितंबर 2009

विजय के बाद विराम

12 तारीख को अखबार में पढ़ते हैं कि ‘‘टीम इंडिया’’ दुनिया में नं 1 क्रिकेट टीम बन गई है और उसी रात रात 10 बजे भारतीय टीम के बारह बज जाते हैं। विश्व की नं 1 भारतीय क्रिकेट टीम को श्रीलंका द्वारा 139 रन से रौंद दिया जाता है।
क्रिकेट की तरह हाॅकी, लाॅन टेनिस, बाक्सिंग, कुश्ती, बेडमिंटन, स्कवैश, गोल्फ, शतरंज जैसे खेलों में भी भारतीय खिलाड़ी फाइनल -सेमीफाइनल तक पहुंचते हैं और ढेर हो जाते हैं।

एक अरब की रिकार्ड संख्या, भारतीय जनता को यह अनुभव उसी तरह लगता है जैसे एक स्वादिष्ट भोजन के बाद भयंकर खट्टे और गंदे अहसास वाले डकार का आना। खाया गया पूरा का पूरा गले तक आ जाता है, पानी और पेट में बनी गैस, नाक से उफन दिमाग तक चढ़ जाते हैं।

हमारा इतिहास इस दर्दनाक अहसास का कई बार गवाह रहा है।

महाराणा प्रताप ने साम्राज्यवादियों को कई बार मुँह तोड़ जवाब दिया पर आखिरकार अपनी ही आंखें निकलवा बैठे।

विदेशी आक्रांताओं का कई बार मुँह तोड़ देने के बावजूद एक लुटेरा हमारी समृद्धि के प्रतीक सोमनाथ मन्दिर को लूट ले जाता है और उसमें हम पर शासन की सामथ्र्य के बीज अंकुरित होने लगते हैं।

हमारे देश की आजादी का पकवान अभी एक रात दूर ही था कि पाकिस्तान के जन्म के गंदे डकार ने उम्र भर के लिए सड़ांध हमारे जहन में भर दी।

आजादी मिलने के पकवान की सुगंध से अभी हमारे नथुने पूरी तरह भरे नहीं थे कि किसी ने सत्य के प्रयोगों की राह चलने वाले हमारे महात्मा, गांधी को गोलियों से निकले शब्द ‘‘हे राम’’ बोलने को विवश कर दिया गया।

श्रीलंका में तमिल आतंकियों का जोर चरम पर था और कभी भी एलटीटीई चीफ प्रभाकरन श्रीलंका का सर्वेसर्वा बन सकता था, राजीव गांधी ने भारतीय सेना भेजी और श्रीलंका को पुनः सुरक्षित शांत क्षेत्र बनाया। मालदीव मंे तख्ता पलट की घटनाओं को भी हमारे सैनिकों ने रोका।
आईटी क्षेत्र के बीजों और पौध के पोषक युवा शक्ति के प्रतीक राजीव गांधी 21वीं सदी के सपनों को उतारने की ओर कुछ कदम चले ही थे कि तमिल आतंक रूपी नागों को कुचल कर छोड़ देने का खामियाजा भुगतना पड़ा। राजीव गांधी की देह की तरह हमने अपने सपनों के चिथड़े उड़ते देखे।

पोकरण परीक्षण की उपलब्धि की गलतफहमी से अभी पूरी तरह उबरे नहीं थे कि भारतीय वैज्ञानिकों ने ही उसे एक नाटक की तरह पेश करना शुरू कर दिया। हमारी परमाणुशक्ति सामथ्र्य पर फिर सवाल हैं?

बंगाल की खाड़ी को अपनी आत्महत्या का तीर्थ बनाने वाले भारत के फोकस-फुस्सी राॅकेटों की लीक से हटकर एक चन्द्रमा की ओर बढ़ गया तो भारतीय वैज्ञानिकों ने इसे चन्द्रयान अभियान का नाम दे दिया। विश्व के वैज्ञानिक ऐसे किसी भी अभियान की आयु 12 या 14 महीने से ज्यादा नहीं मानते पर भारतीय वैज्ञानिकों ने इसके 2 साल तक सफलता का स्वाद देने की भविष्यवाणी कर 1 अरब जनों में स्वादिष्ट खाद्य की स्वाद की लार को आधार दिया। पर इस बार भी हमें खट्टे, बदबूदार और गंदे डकार का शिकार महज 10 महीने बाद ही बना दिया गया। चन्द्रयान खत्म।

दरअसल हमारे देश की कोई फिल्मी हीरोइन विश्व मंच पर बाद में आती है चुम्मा कोई पहले ही ले लेता है। या जुम्मे से पहले ही चुम्मे की ताक में कोई न कोई खड़ा ही रहता है।

तो क्या सफलता या विजय को पाना और सतत बनाये रखना भारत के सन्दर्भों में प्रासंगिक नहीं?
विश्व में हम जब भी ऊंचाइयों को प्राप्त करें जाने कौन या किसकी नजर लग जाती है?

पता नहीं हम दुष्टों के हाथ-पाँव तोड़ कर या नागों के सिर कुचल कर छोड़ क्यों देते हैं, अग्नि संस्कार क्यों नहीं करते? ये सर या धड़ कटे राहू केतु या कुचले हुए काले शनि हमारी शांति की कुण्डली में बार-बार उठापटक करते रहते हैं।

दूसरी बात, राम ने रावण का अंतिम संस्कार तो किया पर सोने की लंका विभीषण को दे दी। अब विभीषण शब्द के अर्थ तो आप भली भांति जानते ही हैं। रावण को कैसे मारा जाय यह विभीषण ही जानते हैं और ज्यादा सच ये है कि विभीषण जिसका भाई या दोस्त हो उसे प्राणों की चिंता तो हमेशा ही करनी चाहिए। विभीषण का मतलब ये भी है कि वो आपका अपना ही रिश्तेदार है, प्रिय संबंधी है और यह भी जानता है कि आपके सर्वनाश के श्रेष्ठ उपाय क्या हैं?

भारत में रामराज्य के समय से विभीषणों को आश्रय दिया गया है। विभीषणों की पीढ़ियां की पीढ़ियां पलती रही हैं और भारत में भी कई सोने की लंकाएं खड़ी हो गई हैं। महाराणा प्रताप की आंखों को निकलवाने वाला जयचंद, विभीषण की पीढ़ियों से ही था। भारत में अंग्रेजों का सैकड़ों वर्षों का कार्यकाल ऐसे कई विभीषणों की सक्रिय उपस्थिति का जीता जागता सुबूत था।

आज भी भारत इन विभीषणों से परेशान है। पाकिस्तान की ओर से आते हैं तो इन्हें आतंकवादी कहा जाता है। बांग्लादेश से आएं तो शरणार्थी कहलाते हैं। भारत के अंदर नक्सलियों के रूप में सक्रिय रहते हैं।
ये किसी भी सोने की लंका को नेस्तनाबूद करने में अपने पूर्वज से कई गुना शक्तिशाली हैं। अस्त्रों शस्त्रों से लैस होनेके अतिरिक्त इनके अन्य रूप भी हैं।

भारतीय सेना सहित कौन सा ऐसा मंत्रालय है जिसमें भ्रष्ट विभीषणों की प्रभावी पकड़ नहीं हो। कई भारतीय विभीषणों का धन स्विस बैंकों मंे जमा है। विभीषण जेलों में हैं, जेलों से बाहर हैं। राम का नाम लेकर विभीषण चुनाव लड़ते हैं पर असली मक्सद तो सोने की लंका खड़ी करना होता है।

लेकिन भारतीयों की उदारता की कोई हद नहीं। विभीषण का चरित्र इतना पसंद है कि इटली से विभीषण का स्त्री संस्करण आयात किया गया। क्वात्रोची से साक्षात जीवंत संबंध पाये जाने के बावजूद भारतीय कानूनों की धुंध भारतीयों के मानस को ठंडा और अस्पष्ट करने में हर बार सफल रहती है। कानून गरीब और अक्षम के लिए हैं।

भारत देश के संदर्भ में एक ही चीज निरंतर सफल और सतत जारी रही है। विषम वितरण व्यवस्था और दलाली धर्म के अनुयायियों की बढ़ती जनसंख्या ने अन्य सारे वर्गों को अल्पसंख्यक कर दिया है। आत्महत्या कर रहे कंकालनुमा किसानों की तस्वीरें मिल जाती हैं, इथियोपिया की भुखमरी की तस्वीरें भारत में भी आम मिल जाती हैं। सपेरों और भुखमरों के देश के रूप में ही पहचाने जाने में विदेशियों को आज भी सफलता मिलती है। पराजय हो या दास बनकर जीना, वर्षाें हम आकंठ अलाली में डूबे रहना चाहते हैं। क्या विजय के बाद विराम हमारी नियति बन गई है?

शनिवार, 29 अगस्त 2009

मनुष्य जाति की शर्मनाक हरकतें

गौरेया, मैना, कौआ, चील गिद्ध, बाज, मोर, तोता ये सारे पक्षी कभी भी इतने दुर्लभ नहीं थे कि इन्हें देखने के लिये चिड़ियाघर जाना पड़े।
वर्षा ऋतु में खिली-फैली हरियाली में तरह तरह के रंग-बिरंगे अजनबी बेनाम फूलों पर मंडराती सतरंगी तितलियाँ खो गई हैं।

गर्मी की छुट्टियों में घर जाते थे तो मिट्टी की दीवारों वाली गौशाला के बाल्लों पर गौरेया के घांेसलों के लिए जगह होती थी। झुण्ड के झुण्ड गौरेया के बच्चों का चिंचियाना अद्भुत आनंद का बायज बनता था।

सांप-सपोलिये बचपन से देखने सुनते आये थे। 25 बरस तक भूतल के आवास में की भी सांप बिच्छू सपोलिये कनखजूरों से पाला नहीं पड़ा। खेतों, जंगलों, खण्डहरों, झुरमुटों में उनका घर होता है ये कुदरती बात थी। इन स्थानों पर जाकर बिलों से बाहर निकले सांपों के सिर, नदी नालों मंे केकड़े, बिच्छु देखना एक नैसर्गिक रोमांचकारी मजा था। पर पिछले दशकों में या और खासकर हाल के सालों में शहर की आब ओ हवा और जमीन को आदमियों ने खतरनाक ढंग से बदल दिया है।

जिंदगी में पहली बार पंजाब के एक कस्बे से हमारे नये फ्लैट के गृहप्रवेश कार्यक्रम मंे आई मौसी ने प्रश्न उठाये - कैसे आप लोग इस छोटी सी दड़बानुमा जगह में रह लोगे, घुटन नहीं होती। पांचवे माले पर पलने वाले बच्चों का बचपन क्या होगा?
हमने कहां घुटन कहां नहीं होती। अब शहर में जमीन बची ही कहां है? खेतों जंगलों मंे इंसान की रिहायशी बस्तियों, औद्योगिक विकास की राह में आए प्रकृति में पलने जंगली जीव जाएं कहाँ? अब घरों-बंगलों में, 6-7 मंजिला फ्लैट्स की ऊंचाईयों पर सांप बिच्छू पकड़े जा रहे हैं तो प्रश्न स्वाभाविक ही है कि वो किस ग्रह पर जाएं?

पढ़े लिखे इंसान ने जानवरों के लिए अभ्यारण्य बनाकर उनकी हदों पर बोर्ड लगा दिये हैं, पर पढ़े लिखे लोगों के आग्येस्त्रों की बंदूकों की नलियों से निकली चिंगारियां गहरी काली अंधेरी गुफाओं का अछूतापन चीर गई हैं।

जंगलों का जीवन पूरी तरह नंगा कर दिया गया है। सेटेलाईट पर सजी इंसान की निगाहों से बचने के लिए जानवर अगर पढ़े लिखे होते और किसी ग्रह की कल्पना कर सकते तो अब उनका नितांत आवश्यक, जीने-मरने का प्रश्न यह होता कि अब किसी भी तरह इंसान से बचकर उस ग्रह पर कैसे पहुँच जाएं।

थलचर, नभचर की तरह जलचर भी इंसान की पहुंच से बाहर नहीं तेल, गैस, इंसान के खोजे रसायन सागरों की अतल गहराईयों में दबे ढंके जीवन के लिए खतरा बन गये हैं।

डोडो, सिंह, शेर, चीते, गेंडे, सोन चिरैया, सफेद कौआ, गिद्ध - और भी अन्य जिनके नाम हमें पता नहीं,, ये सारे उन जीवों के नाम हैं जिन्हें ‘‘इंसान’’ नाम के जानवर ने अपनी खूंखार और अचूक शक्तियों से मिटा डाला है या मिटा डालने को ही है।

हमारे निकट ही रहने वाले एक परिवार की महिला मुखिया एक छोटे से 25-50 ग्राम के पक्षी के अंडे और पक्षी का जिस्म यौन-शक्तिवर्धक मानते हुए समय समय पर उदरस्थ करती रहती है। कब तक हम अपनी शारीरिक हवस के लिए हम कुदरत के सुन्दर जीवों को खाने पीने का सामान बनाते रहेंगे?

उस जमाने में भी जब मानव के पास अचूक हथियार नहीं थे मानवभक्षी शक्तिशाली खूंखार जानवरों ने कभी भी कुछ ऐसा नहीं किया कि वो मनुष्यों का पूरा का पूरा टोला या एक बस्ती ही निगल गये हों। पर इस तरह की उपलब्धि मनुष्य नाम के जानवर के नाम अवश्य है, इसने जल-थल-नभचर जीवों-प्राणियों की प्रजातियाँ की प्रजातियाँ समूल नष्ट कर दी हैं।

एक समय निश्चित ही शिकार करने का मजा रहा होगा। जब किसी जानवर को मारने के लिये आदमी को तीर कमान भाले, तलवारों के साथ टक्कर का मुकाबला करना पड़ता होगा। लेकिन अब क्या मजा? अत्याधुनिक बंदूकें और उनसे भी अचूक वैज्ञानिक तरीके हैं जो किसी भी भयानक,खूंखार और जहरीले शक्तिशाली जीव को मिनटों में झुण्ड के झुण्डों में निर्जीव कर दे।
दाँतों के लिए हाथियों की, हड्डियों खालों के लिये सिंह, बाघों, भालुओं, पांडों की। शारीरिक शक्तिवर्धन के लिये हिरणों, मोर, कई प्रजाति की बत्तखों, खरगोशों को मौत के घाट उतार देना पृथ्वीग्रह पर मानव का ही कुकृत्य है।

निरीह प्राणियों को अपनी जुबान के चटखारों और जिस्मानी हवस का साधन बनाना, चाहे अनचाहे ऐसी गतिविधियाँ जो प्राकृतिक विनाश का कारण हैं, मनुष्य जाति की ये वो शर्मनाक हरकतें हैं जिसके लिये उसके वैज्ञानिक विकास, धर्म, अध्यात्म और सभ्यता जैसे खोखले शब्दों पर लानत भेजी जा सकती है?

शुक्रवार, 21 अगस्त 2009

राहुकालम पर चढ़ा मानुष

आप राहु ग्रह के बारे में क्या जानते हैं? खैर आपकी गलतफहमियाँ दूर करते हैं। राहु की पैदाइश की कहानी कहती है एक समय अमृत मंथन के दौरान त्रिदेवों ने प्लान बनाया कि असुरों से मेहनत तो करवा ली जाये पर इनको अमृत न चखने दिया जाये। लेकिन एक असुर ने कुछ ज्यादा ही समझदारी दिखाई, देवता का रूप बन देवताओं की लाईन में ही खड़ा हो गया। जब तक उनके पीछे खड़े देवताओं को पता चला कि ये तो असुर है और अमृत पी गया है, काफी देर हो चुकी थी। विष्णु जी ने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। असुर एक ही था पर सिर यानि राहु और धड़ यानि केतु ने अलग-अलग ग्रह के नाम से जन्म ले लिया। धड़ और सिर, राहु और केतु कभी एक हो जाएँ ऐसा होता नहीं, तो अपने इस अधूरेपन का दुःख वो सिर और धड़ लोगों को दुखी कर जताते हैं।

दक्षिण में राहुकालम नाम से सप्ताह के प्रत्येक दिन में कुछ ऐसे घंटे होते हैं जिनमें शुभकार्य करना वर्जित माना जाता है, लेकिन सबको यह खबर कहाँ। राहु बेधड़क उन घंटों में सक्रिय रहता है।

सारे वो कार्य या गतिविधियाँ/घटनाएं जो हमारे आस पास के लोगों के दिमागों में खुराफात पैदा कर सम्पन्न की जा रही हैं वो पूरी तरह राहु प्रेरित हैं।

खयालों में रहना, झाड़ पर चढ़ जाना और ताजिंदगी उसी पर बने रहना राहुच्छादित मानुष का प्रथम लक्षण होता है। सिगरेट, शराब और शबाब (नीली फिल्मों) ने उनकी आंखों की रोशनी छीन ली। अजीब सी बीमारी हो गई, आंखों मे ंसूईयाँ सी चुभतीं थी। मोहल्ले के झोलाछाप डाॅक्टरों से इलाज कराते 5-7 बरस होने पर दो एक बार शासकीय अनुदान पर दिल्ली बैंगलोर चले गये। वहां के डाॅक्टरों ने क्या कहा पता नहीं। पर वहां से लौटे तो उन्होंने बताया कि जिस तरह की आंखों की बीमारी उनको है पूरे मध्यप्रदेश में किसी को नहीं। इस प्रकार उन्होंने इलाज करवाना बंद कर दिया, अब वो जो भी मिलता उस दुर्लभ बीमारी का बखान करते जो उनको है और भारत में किसी को नहीं। तो राहु मति की क्षति में अग्रगामी प्रभाव रखता है।

ऐसे ही ब्लाॅग लेखक, एलोपैथी प्रैक्टिशनर, कवि-कलाकार, जुगाड़ू लोग, कुछ नया-नया करने वाले,पागल-दीवाने, परायी बीवियों में इच्छुक लोग, परायी प्रेमिकाओं को आधार बनाकर शेर ओ शायरी करने वाले इन सब में समान बात ये है कि इन सभी का बस सिर चलता है। धड़ के लिए यानि आधार के लिए तड़पता है पर इन्हें जीवन भर किसी चीज का आधार नहीं मिलता। इनकी ये हालत राहु द्वारा इन्हें बुरी और पूरी तरह गिरफ्त में लिये जाने के कारण होती है। लोग बेवजह प्यार को अंधा कहते हैं, अंधेपन का कारक राहु होता है। वह सिर पर कुंडली मारकर बैठ जाता है और धड़ से दूर रखते हुए बाकी सब करवाता है। घर-परिवार-समाज वाले लोग इसे लड़के या लड़की का बरबाद हो जाना कहते हैं। प्यार की नजर तो बहुत तेज होती है इसलिए सांवले-काले आशिक गौरवर्ण गोरियों को आसानी से पटा लेते हैं।
गिरधारीलाल शायर थे। लिखना, गाना और बजाना शौक था। एक के बाद एक नौकरियां छूटती गईं। 10 सालों में मासिक आमदनी इतनी नहीं हो पाई की कोई घरवाली मिल जाए। एक राहुप्रभावित विदुषी मिलने पर उसकी परवरिश गिरधारीलाल के मित्रों को करनी पड़ी। गिरधारीलाल का सुबह 9 बजे काम पर जाना रात को 9 बजे आना। सुबह बच्चे स्कूल चले जाते थे और जब रात को लौटते बच्चे सो जाते थे। बच्चे अन्यों को पापा और गिरधारीलाल को अंकल कहते थे। भगवान राहु से बचाये।

चूंकि राहु का सिर ही सिर है धड़ है ही नहीं यानि हाथ पैर चलाने की कल्पना भर ही संभव है तो राहु लोगों के सिरों में घुसकर यह भाव अच्छी तरह पुष्ट कर देता है कि वो कुछ नहीं कर सकते। लेकिन करने के विचार तो आते हैं, इसलिए लोग ये मानते हुए कि करना-धरना कुछ नहीं पर अभिव्यक्त की आजादी तो भारतीय संविधान सम्मत है, ब्लाॅग लिखने लगते हैं, किताबें गढ़ने लगते हैं। राहु खुश हो जाता है।
कई लोगों के ब्लाॅग पर उनके ब्लाॅग लिखने की वजह लिखी है। हालांकि किसी ने पूछा नहीं होता कि ‘‘आप क्यों लिख रहे हैं।’’ जिनका कोई उद्देश्य हो वो पूछेगा ना। राहु सारे लोगों को उद्देश्यविहीन कर देता है। लोगबाग अपने कर्मों पर कमेन्ट्स करने वालों की तलाश में सभी तरह की सरकस करने लगते हैं। उनके ब्लाॅग पर लिखा होता है कि वो ‘‘दिल की भड़ास निकालने के लिए’’ ब्लाॅग लिखते हैं। भई, भड़ास निकालनी है तो मंत्रियों पर जूते फेंक कर निकालो। ये कोई जगह है भड़ास निकालने की। ब्लाॅगस्पाट ने आपको स्पाॅट क्या दे दिया आप तो फैलते ही जा रहे हैं। राहु के प्रभाव से ऐसी ही मति हो जाती है, जिसका खाएं उसकी ही में छेद करें। ब्लाॅग, ब्लाॅगस्पाट.गूगल वालों का विज्ञापन पराये शादी डाॅट काॅम और अन्य लोगों के।

राहु द्वारा सम्पन्न कर्मों में किसी भी गृहिणी द्वारा आयुपर्यन्त किये जा रहे समस्त गृहकार्य, राजनीति, चुनाव, लोकतंत्र-वोट देना, रोबोट की तरह काम करने वाले लोग जो जब तक जबरन वीआरएस देकर घर नहीं बैठा दिये जाते फेक्ट्री आॅफिस जाते रहते हैं इत्यादि शामिल हैं। इन्हें जिंदगी भर होश नहीं आता कि उस काम के अलावा कुछ किया जा सकता है जो वो पिछले दशकों से कर रहे हैं। राहुग्रसित व्यक्ति कईयों की हालत तो ये हो जाती है कि मरणशैय्या पर भी वही पिछले 5 दशकों की रूटीन दिनचर्या एक दिन और जीने की भीख माँगता है।
राहु प्रभावित व्यक्तियों की हाथ की उंगुलियाँ और टांगे बेहतर काम करने लगते हैं। हर कहीं उंगली करना और फटे में टांग अड़ाना सम्पूर्ण जीवन का ध्येय होता है। ऐसे लोग अच्छे भले काम में नुक्स निकाल सकते हैं। संदेह और शक इनकी आंखों में कीच की तरह जमा होता है। चारो ऋतुओं में इनकी आंखें दुखती रहती हैं। दुखती आंखें चहुं ओर अपना प्रदूषण फैलाती हैं। आलोचक टाईप के लोग इनके प्रतिनिधि अभिव्यक्ता होते हैं।

राहुग्रस्ति युवतियाँ 22-27 साल तक लड़की एमबीए, बीकाॅम सीए की डिग्रियाँ लेती है और आगे जाकर साल दो साल में ही सारी पढ़ाई छू मन्तर। इलेक्ट्रानिक्स चिमनी, माइक्रोवेव ओवन्स, मल्टीपरपज मिक्सर ग्राइन्डर, और सदियों पुराने चैका चूल्हे के आधुनिक संस्करण की आढ़ में सारी उपाधियाँ स्वाहा हो जाती हैं। कपड़े धोने, घर के झाड़ू पोंछे, बर्तनों की सफाई बच्चे पालने में ही प्रौढ़ावस्था पार हो जाती है।

राहुग्रसित वृद्ध अपने अतीत की दुहाई देते रहते हैं कि किस समय उन्होंने क्या तोप मारी थी। हालांकि ये सब खयाली बातें होती हैं राहुग्रस्तता के कारण जीवन भर ही कल्पना के अलावा कुछ और कर नहीं पाते वही कल्पनाएं उन्हें अपने अतीत का घटित सच लगने लगती हैं। कोई मनोवैज्ञानिक काम नही करता। क्योंकि राहुग्रसित व्यक्ति सिर ही सिर में जिंदा रहता है, लोगबाग ऐसे लागों को बुद्धिजीवी कहने लगते हैं।

सुअर बुखार की तरह राहु ग्रसित व्यक्ति के लक्षण भी सामान्य से दीखते हैं पर उभरने पर यकायक नरकारोहण के अलावा कुछ नहीं घटता। टेमूफ्लू की डोज बेअसर हो जाती है, इतने छोटे नाम की दवाई भला कैसे असर करेगी। सारे अखबार, टीवी चैनल्स के भय से लोग फ्लूग्रस्त हो जाते हैं। लोगों के बड़ी मात्रा में नजला होने से सरकार भयग्रस्त हो जाती है, कहीं ये नजला हम पर ही न आ गिरे। बड़े बड़े विज्ञापन छपवाने पड़ते हैं कि ऐसा नहीं वैसा है। लेकिन होता तो वही है, जो है। हकीकत इस बीमारी को एन1एच1 का नाम देने वालों को भी पता नहीं होती।

यही कहानी अमरीकियों के बारे में है ईरान से डायरेक्ट पंगा न लेने, मुस्लिम जगत के समक्ष और आक्रामक न होने के उद्देश्य और ईराक के तेल कुओं पर नजर लगाये अमरीका ने सद्दाम हुसैन को पाला, और अफगानिस्तान पर पकड़ के लिए तालिबान को पर सब सीखने और हथियार मिलने पर यह एक असुर का काम करने लगे। अब सद्दाम के जाने से लगा कि सिर और धड़ अलग हो गये पर आतंक जारी है। राहु आतंकवाद ही नहीं अन्यान्य कई रूपों में हमारे रोजमर्रा के जीवन में यत्र तत्र दिखता है।
तो भई राहुकालम का ध्यान रखिये। इस कालम पर चढ़ा व्यक्ति ईसा तो नहीं कहलाता पर हालत उनसे भी बुरी होती है।

मंगलवार, 18 अगस्त 2009

आप और राकेश राहू, केतु और शनि

उम्र के साथ कई बातों पर अंधविश्वास हटता गया जैसे; सभी उम्रदराज लोग समझदार और परिपक्व होते हैं, सभी स्त्रियाँ........... नहीं होतीं, सभी बच्चे बचकानी बातें ही करते हैं, गधे अफगानिस्तान में ही पाए जाते हैं इत्यादि। विज्ञान कहता है कि किसी भी व्यक्ति के दिमाग का विकास 15 वर्ष की आयु तक होता है, शेष सारी उम्र, उस 15 वर्ष तक विकसित दिमाग से काम चलाना पड़ता है।
यानि 15 वर्ष की उम्र में आदमी का दिमाग अपने विकास के चरम पर होता है और देखिये सारी गलतियों की शुरूआत आदमी 15 वर्ष की उम्र से ही करता है। तू सोलह बरस की मैं सत्रह बरस का.... यानि सत्यानाशों की श्रंखला का आरंभ। लेडीज फस्ट तो वो 16 बरस से ही दंगल में कूद जाती है। जो आदमी 15 वर्ष की उम्र मंे सही काम करने लग जाए वह आदमी नहीं होता.... क्या उसे आदमी कहा जाना चाहिए यह शोध का विषय है? खैर मेरे शोध का विषय व्यक्ति की आयु... और दिमाग का विकास न होकर यह है कि ”व्यक्ति वैसा क्यों हो जाता है जैसा वो है” यानि कौन कौन से घटक हैं जो उसे ‘ऐसा‘ बना देते हैं।
बहुत से लोगों की तरह हमारे दिमाग का विकास भी 15 वर्ष के बाद बंद हो गया था, तो हमने कुछ अन्य लोगों से जो 15 वर्ष की आयु में बुद्धिमत्ता के चरम पर थे, यह जानकारी हासिल करनी चाही कि आदमी वैसा क्यों हो जाता है जैसा है। मैं सोचा किया कि जिन्दगी भर औरत घर चलाती है, कपड़े सीती है पर शीर्ष फैशन डिजाइनर पुरुष जे जे वाल्या ही क्यों होता है? जिन्दगी भर खाना बनाती है पर फेमस कुक संजीव कपूर क्यों होता है? कई शीर्ष स्त्री रोग विशेषज्ञ भी नर मनुष्य ही थे। सारे किले महाराणाओं, अकबरों ने जीते। सारे अमेरिकाओं की खोज भी कोलंबसों ने की। मैं ये भी सोचा किया कि दुनियांभर की उपलब्धियों और कीर्तिमानों की स्थापना के बाद 30 से 60 सेकण्ड के खेल में पुरूष अखबारों के सर्वाधिक मँहगे और प्रतिदिन छपने वाले विज्ञापनों का विषय क्यों बन जाता है?
किसी ने आत्मा परमात्मा के फंडे दिये, किसी ने किस्मत बद्किस्मती के, किसी ने आदमी की करनियों को इसकी वजह बताया। पर हमारी समझ में जो बात आई वो ज्योतिष के नौ ग्रहों वाली थी, इस परिकल्पना में बहुत दम नजर आया। इस बात को समझने के बाद हमें भी अपने पर नाज हुआ कि 15 साल तक विकसित मस्तिष्क भी किसी आदमी की जिंदगी के गुजारे के लिए काफी होता है। तो हमने इस परिकल्पना को अपने सारे सह-ब्लाॅगकर्ताओं तक पहुंचाने की कोशिश निम्नानुसार कोशिश की है:
ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रह होते हैं और 12 राशियाँ होती हैं, लेकिन घबराएं नहीं हमें कुल जमा 21 बिन्दुओं का विस्तृत अध्ययन नहीं करना है। हमें बस ज्योतिष के मूल यानि शनि, राहू, केतू के बारे में जानना समझना है।
किसी भी व्यक्ति की रोते हुए पैदाइश से लेकर सड़कों पर मुर्दे की रूप में नुमाईश करते हुए विदाई तक यही त्रि-दुर्देव जी जान से सक्रिय रहते हैं। अब आप कहेंगे कि अन्य ग्रहों के बारे में क्यों नहीं जानना चाहिये तो भाई आप ही बतायें जो लोग या जो ग्रह कायदे कानून के अनुसार ही चल रहे हैं उनका चलना न चलना बराबर है, किसी महत्व का नहीं। उसी आदमी की तरह जो बड़े सीधे साधे ढंग से जिंदगी जी रहा है - जहाँ रिश्वत दी जानी चाहिए दे रहा है, जहाँ जूते खाने चाहिए खा रहा है, जहाँ गेला समझा जा रहा है समझा जा रहा है। संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करता हुआ वोट दे रहा है, संवैधानिक रूप से मान्य भ्रष्ट हत्यारों, गंुडे मवालियों, चाटुकारों, बलात्कारियों, अवसरवादियों को नेता चुन रहा है यानि वो सब कर रहा है जो संविधानसम्मत है।
हजारों सालों से आदमी और अन्य ग्रह वही कर रहे हैं जो लकीरों में लिखा है। ये सारे लकीर के फकीर हैं इनके किये मनुष्य जाति की कोई प्रगति नहीं हो रही। पर कुछ हटकर किया जा रहा है तो वो मात्र इन तीन ग्रहों द्वारा। शनि, राहु और केतु जी-जान से प्रत्येक चर अचर प्राणी की जिंदगी में भरपूर उंगली कर उसकी जिंदगी को जीने लायक बना रहे हैं। अगर सब कुछ अच्छा ही अच्छा होता तो भारत में कश्मीर को ही स्वर्ग क्यों कहते। कहने का मतलब ये कि अन्य प्रदेशों से प्रत्येक व्यक्ति को परेशान कर एक ही जगह की ओर खदेड़ा जाता है जहाँ पहुंचकर उसे लगता है कि यह स्वर्ग है। यह कोई दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह हो सकती है जैसे; अमेरिका। जहाँ की समुन्नत इमारत को शनि-राहु -केतू के एैक्य सफल प्रयास ने एक स्मारक के रूप में बदल दिया। अन्य आश्रय स्थलियों में पूंजीवाद, अलगाववाद, समाजवाद, लोकतंत्र, धर्म, कोई गुरू भी हो सकता है, पर कौन इन त्रिदुर्दैवों की माया से परे रह पाया है। जो नहीं है उसकी बात क्यों करें, पर दुनिया में जो भी है वो संक्षेप में राहू-केतु-शनि रा.के.श. (राकेश) से ही है।
कांग्रेस, बीजेपी या अन्य किसी दल के नेता की ही तरह रा के श अलग होते भी एक ही तरह के कारगुजारियो में निरंतर संलग्न रहते हुए जन का ता... धिन... धिन.. जन ता करते हैं। ये निराकार रूप हैं और साकार भी हैं। इनकी माया को समझने वाला भी इनसे नहीं बचता - क्योंकि वही बात, ऊँट की करवट की तरह इनका भी कुछ पक्का पता नहीं होता पिछली बार अटल बिहारी के साथ, इस बार संता जी के साथ, मायावती की मूर्ति देह ग्रहण कर लेती तो उस करवट भी बैठ सकते थे।
राजनीतिक दलों के दलदलों से अखबारों में छपे व्यक्ति की अंदरूनी (सेक्) जिंदगी के विज्ञापनों तक रा के श ही व्याप्त हैं। इनकी महिमा भी हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता की तरह है, मेरे खयाल से ‘हरि’ की जगह ‘रा के श’ शब्द ज्यादा उचित है। क्योंकि जब रा के श कथा को मोड़ देते हैं तो हरि अपने ही तारणहार स्वरूप का स्मरण करते हुए, आदमी को अपने हाल पर छोड़ निहाल कर देते हैं।
रा के श की माया की सक्रियता के कारण यह पाठ्य सामग्री निश्चित ही आपके 15 वर्ष तक विकसित उध्र्व अंग मस्तिष्क की पहुंच से छिटक रही होगी इसलिए मैं सोचता हूं आपको इस कड़ी के बाद वाली कड़ी में रा के श का पूर्ण परिचय दे ही दूं।
इस बीच जो पूर्वानुमान, अंदाजे, गालियाँ, साधुवाद, मजा, उपेक्षा, अपेक्षा आदि जो भी अंकुरित होता है उसे रा के श की ही व्याप्तता जानें। सारी तल्खियों, उंगली करने की इच्छा और उंगली करने के बाद हुई हानि का प्रतिशोध रा के श प्रभाव है। किसी को बिना वजह भाव मिलता है और कोई भाव पाने के लिए जिन्दगी बिता देता है पर फूटी कौड़ी की औकात हासिल नहीं कर पाता सब रा के श का किया धरा है। सब कुछ मनचाहा मिलने के बाद भी आप बेचैन रहते हैं और यह गाना गाते हैं “सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है...”, ”कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं मिलता, कभी जमीं कभी आसमां नहीं मिलता“। सारे तेल और गोलियां इस्तेमाल करने के बाद भी अपेक्षित परिणाम न निकलना, घु-टनों मंे दर्द बना ही रहना रा के शा का ही आवेश है। सारे धुंधलके, सारे उजाले, सारी खिसियाहटें, सारे नाले (रोने), आपके तन, मन और जो भी आप अपने आप में सोचते हैं रा के श के अलावा कुछ भी नहीं। ब्लाॅग सामग्री जारी आ........हे......

बुधवार, 12 अगस्त 2009

वैज्ञानिक अंधविश्वासों की उम्र

विज्ञान एक विचार नहीं, दृष्टि है। अंधविश्वास कला ही नहीं, विज्ञान का विषय भी है। वैज्ञानिक अंधविश्वास भी होते हैं। वैज्ञानिक अंधविश्वासों की उम्र, नई खोजों के स्पष्ट होने तक होती है। परन्तु संदेह, पुराने वैज्ञानिक विश्वासों को जिन्दा रखता है। स्वस्थ संदेह विज्ञान का आधार है। मानव शरीर के वैज्ञानिक अध्ययन में भी वैज्ञानिक अंधविश्वासों से उबरने की जरूरत है।
कई दवाईयाँ की खोज जिन बीमारियों को ठीक करने के लिए की गईं, उससे ज्यादा अन्य बीमारियों से निपटने के लिए प्रयोग की जाती हैं। वियाग्रा के साथ यह तथ्य और पुष्ट हुआ है। पर ऐसा नहीं कि साईड इफेक्ट अच्छे ही रहें, बुरे साइड इफेक्ट ज्यादा होते हैं। चूंकि ऐलौपेथी में समग्र शरीर और दिमाग को देखते हुए नहीं अंग विशेष को आधार बनाकर चिकित्सा की जाती है अतः यह एक ज्यादा अधूरी चिकित्सा पद्यति दिखती है। तो मानव शरीर को एक समग्र इकाई के रूप में देखना मानव शरीर की चिकित्सा के संबंध में प्रस्तुत किसी भी चिकित्सा पद्यति की पहली दृष्टि होनी चाहिए।
इसके बाद इंसान का शरीर बस शरीर ही नहीं वो ऐसी चीजों का आधार और घर भी है जो बिना भौतिक शरीर के काम करती हैं। इसलिए किसी भी मानवीय चिकित्सा पद्यति को मनुष्य शरीर से आगे मनुष्य के दिमाग और अन्य अपरिभाषित मनोवैज्ञानिक तथ्यों को भी अध्ययन का क्षेत्र बनाना चाहिए। भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा में इस बात का ध्यान बखूबी रखा गया है।
सीमित दृष्टिक्षेत्र होने के कारण मनुष्य की उत्कृष्ट वैज्ञानिक खोजें भी 100-200 सालों में समझ में आती हैं कि कितनी एकांगी और अधूरी थीं।
मनुष्य के अंधविश्वासों में एक है जादू टोना। कि किसी का बाल ले लिया और उस पर तंत्र मंत्र के प्रभाव से जिस व्यक्ति का वह बाल है उसे प्रभावित किया जाना। वैज्ञानिक अब किसी व्यक्ति के एक बाल से उसकी डी एन ए/ जीन्स संरचना को समझने में सक्षम हैं। कल को प्रभावित होने/करने वाली बात के संबंध में भी संभावना जताई जा सकती है। प्राचीन अंधविश्वास थोड़ा थोड़ा साफ हुआ है। प्राचीन मान्यता थी कि कोई भी बीमारी संक्रमित हो सकती है सभी बीमारियां छुआछूत से फैलती हैं यह बात गलत है, पर अब वैज्ञानिक रूप से भी कई बीमारियाँ छूने, रोगग्रसित व्यक्ति के संपर्क में आने, लार रक्त संबंध बनने से फैलती हैं यह एक तथ्य है। स्वाइन फ्लू तात्कालिक उदाहरण है।
वैज्ञानिक आविष्कारों में हवाई जहाज पक्षियों के व्यवहार की नकल से बना। आज कई वैज्ञानिक अनुसंधान मनुष्य की इसी नकल की प्रवृत्ति का अनुगमन कर रहे हैं। वैज्ञानिक चींटियों, मधुमक्खियों और अन्य धरतीवासी जीवों का अध्ययन कर रहे हैं जिनसे पता चले कि किस प्रकार मनुष्य जाति भी अधिक संयोजन और सामंजस्यपूर्ण तरीके से रहती हुई विकास कर सके। विमानों को बनाने के लिए उड़ने वाले कीटों और पक्षियों की भौतिक रासायनिक और अन्य वैज्ञानिक संरचनाओं का अध्ययन किया जा रहा है। धरती के एक बड़े हिस्से पर जल ही जल है। जल में रहने वाले जीवों और वनस्पतियों के अध्ययन से भी मानव जीवन के जल के भीतर रहने की संभावनाओं पर भी वैज्ञानिक शोध जारी हैं।
विज्ञान को धारणाओं, सिद्धांतों, निष्कर्षों में बांधने की बजाय संदेह के साथ, मुक्त रहने दिया जाय। क्योंकि यदि ऐसा नहीं किया गया तो वह भी पोंगापंथी-धर्म, विचारधाराओं, इतिहास और संस्कृति की तरह मुर्दा और थोथा हो जाएगा। विज्ञान मानव मेधा की सक्रियता है जिसे घिसे पिटे ढर्रों पर चलाने की बजाय खुला रहना चाहिए अज्ञात दशाओं और दिशाओं के लिए। नई खोजों के समय अतीत के वैज्ञानिक निष्कर्षों को अंधविश्वासों की तरह छोड़ने की जरूरत है। कला में क्या हम यही नहीं करते। नये प्रयोग, नये आदमी के जन्म की जरूरत हैं।

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

आने वाला पल----------- जाने वाला है......

प्रत्येक मनुष्य के पास जीने के लिए प्रतिदिन 24 घंटे हैं। गांधी जी हों या -मदर टेरेसा, आईंस्टीन हो या रवीन्द्रनाथ टैगोर, भगवान बुद्ध हों या जीसस, महावीर या अन्य विभूति उनको भी वही 24 घंटे मिले थे। न एक मिनट ज्यादा न एक मिनट कम। उनके दिन में घंटों की संख्या 25 नहीं होती थी। तो उन्होंने उस समय को कैसे बिताया और हम उसी समय को कैसे बिता रहे हैं यह देखने वाली बात है।

अति हर चीज की बुरी होती है। ऐसा ही समय के साथ भी है। जब लोग समय को जरूरत से ज्यादा ही गंभीरता से लेने लगते हैं तब समय सिरदर्द बन जाता है। इस जहान को हिन्दुओं में मत्र्यलोक भी कहा गया है जिसका मतलब यह कि यह मरने वालों का लोक है। दूसरे शब्दों में हम यह भी जानते हैं कि जो पैदा होता है वह खत्म भी होता है, मरता भी है। तो जीव पैदा होते हैं, विकसित होते हैं, बचपन, किशोर, जवानी, बुढा़ते हैं और फिर विदा हो जाते हैं।
समय वैज्ञानिक भौतिक तौर पर एक जरूरी पैमाना है वैसे ही जैसे नापने के लिए मीटर या गज, तौलने के लिए तराजू आदि।
पर आदमी बड़ी सरल चीजों को विकराल समस्या के रूप में बदलने में सक्षम है। लोग समय को भी समस्या बना देते हैं, वो ऐसे कि वो समय को भी अन्य चीजों की तरह खोपड़ी में सहेज कर रखने लगते हैं। सहेजते हैं और फिर उस गुजरे जमाने के बारे में सोच-सोच कर पागल हुए जाते हैं, जिसे वह सुनहरा अतीत कहते हैं। या उस भविष्य के बारे में ही हवाई किले बनाते रहते हैं जो आयेगा तो क्या पता उसकी शक्ल क्या होगी, या स्वयं सोचने वाला भी रहेगा या नहीं।

आप भी कुछ अतीत जीवी लोगों को जानते होंगे। इन लोगों के ताकिया कलाम होते हैं - वो भी क्या जमाना था, अरे हमने भी वो दिन देखें हैं..... या जी करता है वो दिन फिर लौट आएं, उस समय ऐसा होता था या उस समय वैसा होता था। मेरा एक ऐसा ही मित्र है। कभी राजे रजवाड़े रहे होंगे, उनके पीढ़ियों में हमारे ये मित्र पैदा हो गये। काम से कोरियर बाॅय हैं पर अकड़ वही जो महलों में लगी तस्वीरों में मूंछों पर ताव दिये लोगों की होती है। रस्सी जल गई पर बल नहीं गए। बाकायदा अपने राजचिन्ह का लाॅकेट गले में पहनते हैं। उनके पिता भी सारी उम्र इसी गलतफहमी में जिए। खाने के लाले थे पर घोड़ा खरीद रखा था जो शादी ब्याह में किराये पर दिया जाता था। एक दो नाली बंदूक थी, पर शिकार प्रतिबंधित है तो आस पास के घरों में दिखने वाली गौरयों, कौवों, कबूतरों की शामत थी। उनकी औलांदे भी वैसी ही - उनका शरारती लड़का खिलौना बंदूक से लोगों के घरों की खिड़कियों के शीशे चटखाया करता था। बहादुरी बस ऐसी ही ऊटपटंाग बातों में थीं, चैक पर छिड़ती लड़की देख वो दुबक कर निकल जाते थे।

इसी तरह एक दूसरी अति पर सक्रिय लोग समय के भविष्य रूप के बारे में ही सोचते विचारते और योजनाएं बनाते रहते हैं। भविष्यजीवी लोग आने वाले कल की ही बातें करते हैं। आपने दीवारों पर लाल रंग की मिट्टी से लिखी वो लाईने तो पढ़ी सुनी ही होंगी.......जय सतगुरूेदव, कलियुग जायेगा, सतियुग आयेगा... जाने किसके लिए किस रूप में?
मैं अपने एक मित्र को जानता हूं जो काफी पढ़ा लिखा और समृद्ध है है परंतु काफी मधुर सबंध हो जाने के बाद भी मुझे अपने कभी घर नहीं ले कर गया। मुझे अन्य मित्रों से पता चला कि उसके भविष्य के संबंध मंे बड़े बड़ी योजनाएं हैं कि बंगला होगा, गाड़ी होगी, नौकर चाकर होंगे तब वह सारे दोस्तों को अपना घर दिखायेगा। अभी वह अपने ड्राइवर पिता के साथ एक दो कमरों के क्वाटर में रहता है सो उस (उसके हिसाब से शोचनीय) स्थिति मंे लोग देखें तो उसे बुरा लगता है।
इस प्रकार ये दोनों तरह के लोग अतियों पर रहते हैं और सदा दुख में रहते हैं क्योंकि अतीत हमेशा के लिए जा चुका है और भविष्य कभी भी नहीं आता। मजा वर्तमान में और वर्तमान में भी सेकण्ड सेकण्ड का आनंद निचोड़ लेने में है। हर पल को शिद्दत के साथ जीना ही असल जीना है।

गीता मंे भगवान श्रीकृष्ण जी एक स्थान पर अर्जुन से कहा था कि - हे अर्जुन जहां तुम खड़े हो वहां करोड़ों करोड़ों जीव कई कई जन्म बिताकर सिधार चुके हैं।
यही बात समय और घटनाओं के बारे में सच है - हमारे आस पास यदि बुराई ही बुराई दिखती है तो सोचें - क्या अतीत मंे सभी अच्छे लोग थे? यदि हमारे पास अच्छाई ही अच्छाई और तरक्की दिखती है तो भी सोचिये कि अतीत में भी कितनी समृद्ध सभ्यताएं और संस्कृतियों ने युगों बिताये हैं।

बिना अतीत के कैसे जिएं? यदि कोई पीछे मुड़कर देखने वाला न हो तो अतीत कहाँ है? हम ही अपना अतीत बनाते हैं। समय के परिप्रेक्ष्य में सोचते करते हैं और अतीत बन जाता है। हम ही अपने भविष्य के सपने गढ़ते हैं। हमें अपने अतीत को बिना भला बुरा कहे उससे सीख लेनी चाहिए और भविष्य के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। नई चीजों को अपने विवेक के तराजू पर तौल कर सीखें। अतीत से बंधे न रहें। न तो सारा नया श्रेष्ठ होता है न सारा गुजरा हुआ।

इस मामले में अपने आस पास बचे जानवरों को देखें। उन्हें बीते कल का शोक नहीं होता और आने वाले कल की भी चिंता नहीं होती। क्या आदमी जानवर से भी गया बीता है।

अतीत के लिए जीते कई देवदास शराबखानों में मिल जाते हैं। पारो घर बार बसा कर मजे करती है और ये देवदास उन्हीं सुनहरे दिनों को याद कर अक्ल से हाथ धो बैठते हैं और शेर ओ शायरी कर गुजारा करने लायक भी नहीं बचते। सरकारी कार्यालयों में कई अतीतजीवी लोगों के दिमाग पूरी तरह ठस हो चुके हैं। मेज पर कम्प्यूटर भी रखा है और टाइपराइटर भी। पर आज भी सारा दिन टाईपराइटर ही खटर खटर करता है। सीखने की जरा इच्छा नहीं। कई कम्प्यूटर सीखने वाले भी ऐसे लोग हैं जो एक आध साफ्टवेयर सीख लिया तो रोबोट की तरह बस रटी रटाई कमांड एप्लाई करने में ही यकीन रखते हैं। कई उनसे भी महान लोग किसी साफ्टवेयर के नवीनतम संस्करण से उसी तरह परहेज रखते हैं जैसे स्वाइन फ्लू के बीमार से। उनके ये शब्द होते हैं, पुराना बेहतर है...., इसकी स्पीड अच्छी है, अरे नया समझ ही नहीं आता। अब इन लोगों के कौन समझाये कि पुराना अच्छा होता तो कहानी वहीं खत्म हो जाती क्यों अरबों डाॅलर लगाकर कई इंसानी दिमाग रात दिन नई सुविधाएं विकसित करने में जुटे हैं।

भावी के लिए संग्रह की मानवीय वृत्ति मँहगाई को कई गुना बढ़ा देती है। जमाखोरी ऐसी ही कुवृत्ति है। हमारे शहर में कई लोग अपनी सारी उम्र किराये के मकानों में निकाल चुके हैं लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जिनके शहर में उगी नई नई काॅलोनियों में 4 -5 मकान हैं और बंद पड़े धूल खा रहे हैं, सड़ रहे हैं। इसे सूझ-बूझ भरा निवेश न कहकर सामाजिक शोषण कहना चाहिए। क्या इस प्रकार की अन्य असमानताओं और वैषम्य का कारण यही अतीत या भविष्यजीवी मानवीय वृत्ति नहीं है?
तो प्रत्येक आयु अवस्था में व्यक्ति जिंदादिल रहे। पूर्वाग्रह न रखे। तथ्य को जस का तस देखे। कुतर्क न करे। न पीछे रहे न आगे हवा पर कदम रखे। जिस बढ़ते कदम के साथ जो उचित हो वही सनातन कर्म करे। सनातन शब्द का अर्थ ही यही ‘ऐसा जो अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में सत्य है’। और सनातन होती है हमारी दृष्टि जो किसी बात को वैसा का वैसा ही समझ ले, जैसी वो यथार्थ रूप में है। क्या आपने वो गीत नहीं सुना - ”आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू जो भी है बस यही इक पल है“ इसी पल को भरपूर जीने में सार्थकता है। चाहे भले बनो या बुरे, गांधी बनो या हिटलर, राम बनो या रावण लेकिन समय को उसकी समग्रता में जिओ। प्रत्येक क्षण को समग्र रूप से जीने वाला व्यक्ति वक्त की सीमाओं को लांघ, अमर हो जाता है।

रविवार, 26 जुलाई 2009

आपके इंतजार में

प्रतीक्षा या इंतजार मानवीय अहसासों एवं अनुभवों में घटने वाली एक घटना है। यह उन घटनाआंे में से है जो साँस लेने जैसी नियमित घटनाओं में आती है। प्रतीक्षा का अर्थ ढूंढने निकला तो यह सामग्री बन गई।

किसी इच्छा के पूर्ण होने पर उससे जन्मी अन्य इच्छा के पूर्ण होने के बीच का अंतराल प्रतीक्षा है।
जैसे हमें प्यास लगे और पानी की जगह शर्बत या शराब दी जाए तो काम नहीं चलेगा क्योंकि हमें पानी का ही इंतजार था। हमारा पूरा अस्तित्व पानी चाहता है- फीका, गीला सा, पारदर्शी, सामान्य शीतल पानी।
तो एक इच्छा से दूजी इच्छा के बीच सफर को प्रतीक्षा या इंतजार कहते हैं। प्रतीक्षा में जो प्राप्त है उस पर जो प्राप्त होने वाला है उसका अहसास ज्यादा हावी रहता है। प्राप्त होने वाले का ख्याल, कल्पनाएं और अदृश्य चित्रांकन जारी रहता है।
इंतजार अज्ञान की नहीं, अपूर्ण ज्ञान की स्थिति है। कुछ तो पता है और कुछ और पता चल जाने वाला है, स्पष्ट हो जाने वाला है - यह इंतजार का स्वरूप है।
तत्कालिक इच्छा पूरी न होना और इंतजार खत्म न होना एक ही चेहरे की दो आंखें हैं। इच्छा पूरी हो जाए और इंतजार शेष रहे तो यह एक कानी स्थिति है या इंतजार खत्म हो जाए और इच्छा पूरी न हो यह भी एक कानी स्थिति है।
धैर्य और प्रतीक्षा के बीच गहरा संबंध है। धैर्यपूर्वक इंतजार किया जाता है। अधैर्यता, धीरज न रखना और इंतजार न करना - घटने वाली घटना को समय पूर्व ही स्पष्ट करने की चेष्टा इष्ट नहीं करती। धैर्य, आशा, निराशा- आशंका से परे प्रतीक्षा की नींव है।
इच्छा के दो रूप होते हैं: आशा और आशंका। शुभ संभावना को आशा और अनिष्ट की शंका को आशंका कहते हैं। यह वाक्य सरासर गलत है कि ‘मुझे तुमसे यह आशा नहीं थी।’ यह कहना चाहिए कि मुझे यह आशंका नहीं थी।
प्रतीक्षा और धैर्य से वह भी लभ्य है जिसकी इच्छा नहीं की जा सकती, इसलिए प्रतीक्षा और धैर्य असीम को भी सीमा में ला सकता है।
प्रतीक्षा अदृश्य की गहराईयों की यात्रा है। हमने यह शेर सुना ही है: हम इंतजार करेंगे तेरा कयामत तक, खुदा करे कि कयामत हो और तू आये। सारा ताना बाना कयामत, खुदा और अपने से पुनः मिलन - जीवन को भरपूर इंतजार बना देना है।

सोमवार, 29 जून 2009

ये खुजली अगर मिट भी जाये तो क्या है

अज़ीब सी खुजली है ब्लाॅगिंग भी - कभी तो लगता है न पैसे न यश। एक झूठी-सी अयथार्थ दुनिया। क्या पता कौन सच्चा है कौन झूठा। कौन औरत है जो आदमी के नाम से ब्लाॅगिंग कर रही है और कौन आदमी है जो औरत की फोटो चिपका कर कमेंट्स के मज़े ले रहा है। दो-महिला पुरूषों को व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं। एक महिला के घर 5-10 वर्ष पुरानी पत्र पत्रिकाओं का भंडार है। कुछ ऐसी मरी पत्र पत्रिकाओं का भी जो अब जिंदा नहीं रहीं। पर आधुनिक कहानियां कविताएं कही जाने वाली सामग्री अपनी शाश्वतता के मामले में ऐसी हैं कि वो तब भी उतनी ही प्रभावी थी जितनी पैदा होते समय और अब मरने के बाद भी उतनी ही प्रभावी हैं यानि जो आधुनिक-कला-रसिक मार्डन आर्ट प्रेमी देखे पढ़े, वो तो प्रभावित होता ही है। ये अलग बात है जिनके एंटीने कैच नहीं करते वो नाक भौं सिकौड़ कर निकल लेते हैं, कमेंट नहीं करते। तो ऐसी सामग्री भी ब्लाॅग्स में खपा दी जाती है।

कुछ ब्लाॅगकर्ता ताजी सब्जियों को ही विभिन्न मसालों में परोसते हैं उनके विषय तो सामयिक ही होते हैं, सामयिक में तत्कालिक से लेकर माह से छः माह पुराने विषय भी आ जाते हैं। अब ”सामयिक“ शब्द के अर्थ की ऐसी तैसी हो तो उनकी बला से।

फिर कुछ ब्लाॅगपुरूष ऐसे हैं जो तत्कालिक मुद्दों पर नजर रखते हैं और चुन-चुन कर पिछले इतिहास और अगले भविष्य को दृष्टिगत रखते हुए ब्लाॅग सामग्री प्रस्तुत करते हैं ऐसे विद्वजनों से ही ब्लाॅग्स जगत की महिमा है।

पर शाश्वत ब्लाॅग-पितृ-पुरूषों का तो कहना ही क्या। ये ब्लाॅग पितामह ऐसे व्यक्तित्व हैं जो शाश्वत और मौलिक सामग्री के जन्मदाता होते हैं। इनकी पंक्तियां पढ़ के आनंद आ जाता है और जब भी ये सामग्री देखो.... आता ही रहता है। निश्चित ही ऐसे महानुभावों का आदर भी होना चाहिए। इन दुर्लभजनों की खोज में ही हम विभिन्न ब्लाॅग्स पटलों पर जाते हैं इनसे लिंक्स बैठाने में मजा आता है।

हमारा विषय था ब्लाॅगिंग की ये खुजली पैदा होने का। ब्लाॅगिंग की ये खुजली तब पैदा होती है जब हम विभिन्न ब्लाॅग्स पर तड़क भड़क वाले लेआउट्स में घटिया सामग्री और सरल सादे कलेवर में मजेदार सामग्री का खजाना देखते हैं। जी करता है अपन भी सिर आजमा लें। पर कौन सी बढ़िया चीज है जो पैदा होने में 9 महीने का समय नहीं लेती और देखिये उसके बाद भी आदमी की शक्ल में क्या-क्या पैदा हो जाता है। तो खुजली पैदा हो जाती है कि ब्लाॅग तैयार करें कुछ नया पेश करें। कुछ नया यूं ही पैदा नहीं हो जाता। दिन भर के कार्यालयीन काम काज से निपटे रात को थककर डेस्कटाॅप पर बैठे लोग क्या लिखेंगे अन्य लोगों के ब्लाॅग देख देख कर ही नींद आ जाती.. और सुबह हो जाती है। लेकिन कभी कभी सभी को लगता है कि हम उस कम्बख्त से तो बेहतर ही लिख सकते थे जिसे फालतू के विषय में ढेरों चिप्पियां मिलीं। चिप्पियां शब्द चुम्मियां शब्द के निकट का है। ऐसे लगता है किसी ने चूमा।
तो खुजली का मजा ये कमेंट्स हैं। कमेंट्स की तलाश में ब्लाॅगकर्ता पैदा होते हैं ओर उनसे ब्लाॅग। जे कृष्णमूर्ति कहते हैं -ब्लाॅगकर्ता ही ब्लाॅग है। ये फिलासफी ये कहती है कि आप जो पैदा कर रहे हैं आप वही हैं यानि अगर आपसे कुछ श्रेष्ठ निकल रहा है तो श्रेष्ठ और घटिया निकल रहा है तो शक की गंुजाइश नहीं। यदि आप यथार्थ को स्वीकार कर लेते हैं तो ही रूपांतरण संभव है।
पर खुजाल अपनी संभावनाएं तलाश कर ही लेती है। सर्वश्रेष्ठ का पहुंचा उसे अपने हाथ में नजर आता है और निकृष्ट की चोटी खींच पटक देने का बल भी उसके पास होता है। अलग बात है कि अंगूर खट्टे हो जाते हैं।
खराश को मेहनत करने में नहीं, छीलने में नहीं हल्का-हल्का सहलाने में मजा आता है। तो ब्लाॅगकर्ता को कभी नहीं लगता कि ब्लाॅगिंग को पूर्णकालिक कर्म बनाना चाहिये। आॅफिस में टाइम मिलने पर, कभी कभार पवित्रदिवस (संडे) को घर में ब्लाॅग पर कुछ अपलोड कर दिया तो कर दिया।
लेकिन ब्लाॅग-पितामह खराशातीत होते हैं। उनका बिग बी जैसा पूर्णकालिक कर्म होता है ब्लाॅगिंग। कुछ अन्य इस हेतु मानवीय कर्मचारी भी नियुक्त कर देते हैं। हल्का-हल्का या गहराई से खुजलने, सहलाने, मलहम लगाने, खुजाल स्थलों को सूखा छोड़ देने, अन्य लोगों की खाल निकाल कर ओड़ लेने में माहिर ब्लाॅगकर्ता भी अवतरित हो चुके हैं।
विगत वर्षों में ब्लाॅगकर्म ने तेजी से हाथ पैर और सारा शरीर ही पसार लिया है। वेबसाइट्स की असामथ्र्य या मुफ्त की, प्रयोग में सरल साइट्स की तरह ब्लाॅग्स के फायदों के कारण भारतीय साहित्य अनुरागियों ने अपूर्व रूप से इस नये नये जने क्षेत्र के मजे लिये हैं। पहले जो साहित्यानुरागी अपनी छपास को पत्र पत्रिकाओं से नहीं पूरा कर पाते थे उन्होंने भी अब ब्लाॅग्स का आश्रय लिया है। चिप्पियांे के रूप में कोई सहलाये या न सहलाये, खुजाल को जाहिर कर देने का आनंद तो मिलता ही है। वैसे भी ये इंटरनेट जगत कागज के फूलों सा है और हम फिर संभावनाएं पैदा कर लेंगे.........ये खुजली अगर मिट भी जाये तो क्या है।