Monday, 31 August 2009

सब प्रश्नों का एक ही उत्तर

पैसा खुदा क्यों?
भाई-भाई से जुदा क्यों?
बाप-बेटे में क्यों रंजिश है?
सब कुछ है फिर भी खलिश है?
बीमारियों का जाल क्यों फैला?
इंसान हुआ क्यों एड्स से मैला?
राहत राशि क्यों कम पड़ जाती है?
जीने की राह नजर नही आती है?
99वें का फेर क्या है?
देर में अंधेर क्या है?
राम को वनवास क्यों मिला?
रावण को राम से क्यों गिला?
भोजन काफी ज्यादा है, पर क्यों मिलता सबको आधा है?
दवा और दारू में क्या फर्क है?
क्या स्वर्ग है क्या नरक है?
कर्ज की जरूरत क्यों पड़ती है?
मर्ज की तेजी क्यों बढ़ती है?
होम करते हाथ क्यों जलते हैं?
चादर के बाहर खवाब क्यों पलते हैं?
उम्मीद का रहना क्या है?
संतों का गहना क्या है?
सुबह नींद जल्द क्यों नहीं खुलती?
अतीत की यादें क्यों नहीं घुलतीं?
रामराज का अर्थ क्या है?
किसी भी काज में अनर्थ क्या है??
आदमी कार्टून कब बन जाता है?
जुनून पागलपन कब कहाता है?
मन की शांति क्या है?
जग में भ्रांति क्या है?
विवेक क्या है, अविवेक क्या है?
बुरा क्या है, नेक क्या है?
सच की सजा क्यों हैं?
झूठ में मजा क्यों है?
लोभ पाप क्यों है?
सारे संताप क्यों हैं?
अनुशासन का क्या मतलब है?
तौल का क्या सबब है?
नजर कितनी होनी चाहिए?
बोवनी कितनी बोनी चाहिए?
विश्वास, अंधविश्वास क्या है?
प्रेम और मोहपाश क्या है?
कूकर में सेफ्टीवाल्व क्या है?
मनुष्य जीवन में काल क्या है?
आटे में नमक कितना डालें?
घाटे को कब संभालें?

इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर है-
जरूरत और हवस में अंतर है,
‘अति’ से बचना सबसे बड़ा मंतर है।

Saturday, 29 August 2009

मनुष्य जाति की शर्मनाक हरकतें

गौरेया, मैना, कौआ, चील गिद्ध, बाज, मोर, तोता ये सारे पक्षी कभी भी इतने दुर्लभ नहीं थे कि इन्हें देखने के लिये चिड़ियाघर जाना पड़े।
वर्षा ऋतु में खिली-फैली हरियाली में तरह तरह के रंग-बिरंगे अजनबी बेनाम फूलों पर मंडराती सतरंगी तितलियाँ खो गई हैं।

गर्मी की छुट्टियों में घर जाते थे तो मिट्टी की दीवारों वाली गौशाला के बाल्लों पर गौरेया के घांेसलों के लिए जगह होती थी। झुण्ड के झुण्ड गौरेया के बच्चों का चिंचियाना अद्भुत आनंद का बायज बनता था।

सांप-सपोलिये बचपन से देखने सुनते आये थे। 25 बरस तक भूतल के आवास में की भी सांप बिच्छू सपोलिये कनखजूरों से पाला नहीं पड़ा। खेतों, जंगलों, खण्डहरों, झुरमुटों में उनका घर होता है ये कुदरती बात थी। इन स्थानों पर जाकर बिलों से बाहर निकले सांपों के सिर, नदी नालों मंे केकड़े, बिच्छु देखना एक नैसर्गिक रोमांचकारी मजा था। पर पिछले दशकों में या और खासकर हाल के सालों में शहर की आब ओ हवा और जमीन को आदमियों ने खतरनाक ढंग से बदल दिया है।

जिंदगी में पहली बार पंजाब के एक कस्बे से हमारे नये फ्लैट के गृहप्रवेश कार्यक्रम मंे आई मौसी ने प्रश्न उठाये - कैसे आप लोग इस छोटी सी दड़बानुमा जगह में रह लोगे, घुटन नहीं होती। पांचवे माले पर पलने वाले बच्चों का बचपन क्या होगा?
हमने कहां घुटन कहां नहीं होती। अब शहर में जमीन बची ही कहां है? खेतों जंगलों मंे इंसान की रिहायशी बस्तियों, औद्योगिक विकास की राह में आए प्रकृति में पलने जंगली जीव जाएं कहाँ? अब घरों-बंगलों में, 6-7 मंजिला फ्लैट्स की ऊंचाईयों पर सांप बिच्छू पकड़े जा रहे हैं तो प्रश्न स्वाभाविक ही है कि वो किस ग्रह पर जाएं?

पढ़े लिखे इंसान ने जानवरों के लिए अभ्यारण्य बनाकर उनकी हदों पर बोर्ड लगा दिये हैं, पर पढ़े लिखे लोगों के आग्येस्त्रों की बंदूकों की नलियों से निकली चिंगारियां गहरी काली अंधेरी गुफाओं का अछूतापन चीर गई हैं।

जंगलों का जीवन पूरी तरह नंगा कर दिया गया है। सेटेलाईट पर सजी इंसान की निगाहों से बचने के लिए जानवर अगर पढ़े लिखे होते और किसी ग्रह की कल्पना कर सकते तो अब उनका नितांत आवश्यक, जीने-मरने का प्रश्न यह होता कि अब किसी भी तरह इंसान से बचकर उस ग्रह पर कैसे पहुँच जाएं।

थलचर, नभचर की तरह जलचर भी इंसान की पहुंच से बाहर नहीं तेल, गैस, इंसान के खोजे रसायन सागरों की अतल गहराईयों में दबे ढंके जीवन के लिए खतरा बन गये हैं।

डोडो, सिंह, शेर, चीते, गेंडे, सोन चिरैया, सफेद कौआ, गिद्ध - और भी अन्य जिनके नाम हमें पता नहीं,, ये सारे उन जीवों के नाम हैं जिन्हें ‘‘इंसान’’ नाम के जानवर ने अपनी खूंखार और अचूक शक्तियों से मिटा डाला है या मिटा डालने को ही है।

हमारे निकट ही रहने वाले एक परिवार की महिला मुखिया एक छोटे से 25-50 ग्राम के पक्षी के अंडे और पक्षी का जिस्म यौन-शक्तिवर्धक मानते हुए समय समय पर उदरस्थ करती रहती है। कब तक हम अपनी शारीरिक हवस के लिए हम कुदरत के सुन्दर जीवों को खाने पीने का सामान बनाते रहेंगे?

उस जमाने में भी जब मानव के पास अचूक हथियार नहीं थे मानवभक्षी शक्तिशाली खूंखार जानवरों ने कभी भी कुछ ऐसा नहीं किया कि वो मनुष्यों का पूरा का पूरा टोला या एक बस्ती ही निगल गये हों। पर इस तरह की उपलब्धि मनुष्य नाम के जानवर के नाम अवश्य है, इसने जल-थल-नभचर जीवों-प्राणियों की प्रजातियाँ की प्रजातियाँ समूल नष्ट कर दी हैं।

एक समय निश्चित ही शिकार करने का मजा रहा होगा। जब किसी जानवर को मारने के लिये आदमी को तीर कमान भाले, तलवारों के साथ टक्कर का मुकाबला करना पड़ता होगा। लेकिन अब क्या मजा? अत्याधुनिक बंदूकें और उनसे भी अचूक वैज्ञानिक तरीके हैं जो किसी भी भयानक,खूंखार और जहरीले शक्तिशाली जीव को मिनटों में झुण्ड के झुण्डों में निर्जीव कर दे।
दाँतों के लिए हाथियों की, हड्डियों खालों के लिये सिंह, बाघों, भालुओं, पांडों की। शारीरिक शक्तिवर्धन के लिये हिरणों, मोर, कई प्रजाति की बत्तखों, खरगोशों को मौत के घाट उतार देना पृथ्वीग्रह पर मानव का ही कुकृत्य है।

निरीह प्राणियों को अपनी जुबान के चटखारों और जिस्मानी हवस का साधन बनाना, चाहे अनचाहे ऐसी गतिविधियाँ जो प्राकृतिक विनाश का कारण हैं, मनुष्य जाति की ये वो शर्मनाक हरकतें हैं जिसके लिये उसके वैज्ञानिक विकास, धर्म, अध्यात्म और सभ्यता जैसे खोखले शब्दों पर लानत भेजी जा सकती है?

Friday, 28 August 2009

सच की कड़वाहट

दो फिल्मी यार बरसों से फिल्म लाईन में स्थापित थे। सच और झूठ विषय को लेकर उन्होंने कई हिट फिल्में दीं थीं। रात की दारू पार्टी में दोनों अपने नयी फिल्मों की विषय सामग्री पर बातचीत कर रहे थे।

राम: क्या दारू पीकर सभी लोग सच बोलते हैं?

जाॅन: मेरे खयाल से वो वैसा सच बोलते हैं जो उनकी नस नस में बसा होता है, जिससे वो मजबूर होते हैं...

राम: मतलब?

जाॅन: सामान्यतौर पर झूठ बोलने वाला नशे में भी झूठ बोलता है और सच बोलने वाला सच ही बोलेगा। आजकल बोलने वाले सच अलग होते हैं और करने वाले सच अलग तो दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ता।

राम: फिर वही सवाल सामने आता है - जनता क्या चाहती है?

जाॅन: जनता थियेटर में सच झूठ देखने नहीं, बोरियत दूर करने टाईम पास को आती है।

राम: पर कुछ तो सच होता है न, अपना फेमस डाॅयलाॅग ‘सत्यमेव जयते’।

जाॅन: घंटा जयते। हजारों साल लोग झूठ का मजा लेते लेते बोर हो जाते हैं तो फिर टेस्ट चेंज करने को सच की मिर्च से स्वाद बदलते हैं। लेकिन इसकी जरूरत हजारों सालों में एक बार पड़ती है.... कभी कभी बस एक बार। जीसस, गांधी, हरिश्चन्द्र, राम ........ सब मिर्ची का काम करते हैं।

हजारों साल तक वही ढर्रा, वाॅर, एड्रेन्लिन जगाने वाला मसाला, ये सब झूठ है तो क्या? यही चलता है।

राम: चलो मैं एक फिल्म बनाता हूं सात्विक, धार्मिक हरिश्चन्द्र टाईप। एक फिल्म तुम एक्शन, मसाला एड्रेन्लिन जगाने वाली।

जाॅन: ओ.के.

डेढ़ दो साल बाद दोनों की फिल्में तैयार होकर आधुनिक थियेटरों पर चलीं।
जाॅन की फिल्म का नाम था ‘आग का दरिया’ और राम की फिल्म का नाम था ‘‘आब’’
‘आग का दरिया‘ की कहानी अपनी गदर फिल्म जैसी थी। मुसलमानों को भरपूर गालियाँ, हिन्दुओं की उदारता की गाथा,  राम कृष्ण की धरती की महानता, किसी हिन्दू का उफान मारता जोश। फिल्म खूब चली। इसके जवाब में पाकिस्तानियों ने भी कई फिल्में बनाईं। जिनमें मोटी मोटी हीरोइने जाने किस शैली में डांस करती थीं। मोटापे के लिहाज से उन्हें भारतीय दक्षिण की फिल्मी हीरोइनों के डांस का अनुसरण करना चाहिए।

‘‘आब’’ में हिन्दू मुस्लिम एकता को मिसालें देते एक कबीरनुमा फकीर की कहानी थी। भारत पाक बार्डर के दोनों तरफ लोग उसके मुरीद हो जाते हैं और अमन और तरक्की के रास्ते पर चलते हैं तो यह हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के हुक्मरानों को और एड्रेन्लिन जागरण पसंद लोगों को अच्छा नहीं लगता। आखिर में कई प्रश्न हवा मंे छोड़ती हुई फिल्म द एंड को प्राप्त होती है। प्रश्न ये थे कि जो हिन्दुस्तान पाक के बीच पिस रहें हैं उनका क्या? जो खर्च हिन्दुस्तानी पाकिस्तानी सेनाओं पर सीमा की स्थिति संभालने के लिए खर्च हो रहा है, क्या वह तरक्की के लिए नहीं हो सकता? यह फिल्म कलासमीक्षकों को पसंद आई। थियेटरों में नहीं चली पर पुरस्कार मिले। सैकड़ा भर पाकिस्तानी कलाफिल्म पसंदों ने इसे पसंद किया।

राम और जाॅन, फिर दारू पार्टी पर मिले।
जाॅन: मैं बोला था न जनता को सच झूठ से मतलब नहीं। एड्रेन्लिन जागना चाहिए।
राम: हाँ, सच की उतनी ही जरूरत है जितनी आटे में नमक। ज्यादा सच जिंदगी को कड़वा कर देता है।

Wednesday, 26 August 2009

हाल-ए-दिल कैसे कहें ?




हाल ए दिल कैसे कहें- इन उलझनों में बिछड़ गए
तेरा मिलना ही परेशानी था, फिर क्या नहीं मुश्किल रहा।


शाम से चेहरा तेरा फिर जहन की दीवारों पर,
जाम की गहराई में तेरे लबों का तिल रहा।

मैं सोचकर हैरान हूं, ये दिल न मेरा दिल रहा,
ताजिन्दगी इक अज़नबी मेरे खवाबों की महफिल रहा।


उम्रों की उम्मीदों का, हाए बस यही हासिल रहा।
वो संग दिल था जब मिले, हम जब चले, संगदिल रहा।

 

Monday, 24 August 2009

धर्म अध्यात्म और योग पर हमारी सभी पोस्ट अब योगमार्ग डॉट ब्लॉगस्पाट डॉट कॉम पर :

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Friday, 21 August 2009

राहुकालम पर चढ़ा मानुष

आप राहु ग्रह के बारे में क्या जानते हैं? खैर आपकी गलतफहमियाँ दूर करते हैं। राहु की पैदाइश की कहानी कहती है एक समय अमृत मंथन के दौरान त्रिदेवों ने प्लान बनाया कि असुरों से मेहनत तो करवा ली जाये पर इनको अमृत न चखने दिया जाये। लेकिन एक असुर ने कुछ ज्यादा ही समझदारी दिखाई, देवता का रूप बन देवताओं की लाईन में ही खड़ा हो गया। जब तक उनके पीछे खड़े देवताओं को पता चला कि ये तो असुर है और अमृत पी गया है, काफी देर हो चुकी थी। विष्णु जी ने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। असुर एक ही था पर सिर यानि राहु और धड़ यानि केतु ने अलग-अलग ग्रह के नाम से जन्म ले लिया। धड़ और सिर, राहु और केतु कभी एक हो जाएँ ऐसा होता नहीं, तो अपने इस अधूरेपन का दुःख वो सिर और धड़ लोगों को दुखी कर जताते हैं।

दक्षिण में राहुकालम नाम से सप्ताह के प्रत्येक दिन में कुछ ऐसे घंटे होते हैं जिनमें शुभकार्य करना वर्जित माना जाता है, लेकिन सबको यह खबर कहाँ। राहु बेधड़क उन घंटों में सक्रिय रहता है।

सारे वो कार्य या गतिविधियाँ/घटनाएं जो हमारे आस पास के लोगों के दिमागों में खुराफात पैदा कर सम्पन्न की जा रही हैं वो पूरी तरह राहु प्रेरित हैं।

खयालों में रहना, झाड़ पर चढ़ जाना और ताजिंदगी उसी पर बने रहना राहुच्छादित मानुष का प्रथम लक्षण होता है। सिगरेट, शराब और शबाब (नीली फिल्मों) ने उनकी आंखों की रोशनी छीन ली। अजीब सी बीमारी हो गई, आंखों मे ंसूईयाँ सी चुभतीं थी। मोहल्ले के झोलाछाप डाॅक्टरों से इलाज कराते 5-7 बरस होने पर दो एक बार शासकीय अनुदान पर दिल्ली बैंगलोर चले गये। वहां के डाॅक्टरों ने क्या कहा पता नहीं। पर वहां से लौटे तो उन्होंने बताया कि जिस तरह की आंखों की बीमारी उनको है पूरे मध्यप्रदेश में किसी को नहीं। इस प्रकार उन्होंने इलाज करवाना बंद कर दिया, अब वो जो भी मिलता उस दुर्लभ बीमारी का बखान करते जो उनको है और भारत में किसी को नहीं। तो राहु मति की क्षति में अग्रगामी प्रभाव रखता है।

ऐसे ही ब्लाॅग लेखक, एलोपैथी प्रैक्टिशनर, कवि-कलाकार, जुगाड़ू लोग, कुछ नया-नया करने वाले,पागल-दीवाने, परायी बीवियों में इच्छुक लोग, परायी प्रेमिकाओं को आधार बनाकर शेर ओ शायरी करने वाले इन सब में समान बात ये है कि इन सभी का बस सिर चलता है। धड़ के लिए यानि आधार के लिए तड़पता है पर इन्हें जीवन भर किसी चीज का आधार नहीं मिलता। इनकी ये हालत राहु द्वारा इन्हें बुरी और पूरी तरह गिरफ्त में लिये जाने के कारण होती है। लोग बेवजह प्यार को अंधा कहते हैं, अंधेपन का कारक राहु होता है। वह सिर पर कुंडली मारकर बैठ जाता है और धड़ से दूर रखते हुए बाकी सब करवाता है। घर-परिवार-समाज वाले लोग इसे लड़के या लड़की का बरबाद हो जाना कहते हैं। प्यार की नजर तो बहुत तेज होती है इसलिए सांवले-काले आशिक गौरवर्ण गोरियों को आसानी से पटा लेते हैं।
गिरधारीलाल शायर थे। लिखना, गाना और बजाना शौक था। एक के बाद एक नौकरियां छूटती गईं। 10 सालों में मासिक आमदनी इतनी नहीं हो पाई की कोई घरवाली मिल जाए। एक राहुप्रभावित विदुषी मिलने पर उसकी परवरिश गिरधारीलाल के मित्रों को करनी पड़ी। गिरधारीलाल का सुबह 9 बजे काम पर जाना रात को 9 बजे आना। सुबह बच्चे स्कूल चले जाते थे और जब रात को लौटते बच्चे सो जाते थे। बच्चे अन्यों को पापा और गिरधारीलाल को अंकल कहते थे। भगवान राहु से बचाये।

चूंकि राहु का सिर ही सिर है धड़ है ही नहीं यानि हाथ पैर चलाने की कल्पना भर ही संभव है तो राहु लोगों के सिरों में घुसकर यह भाव अच्छी तरह पुष्ट कर देता है कि वो कुछ नहीं कर सकते। लेकिन करने के विचार तो आते हैं, इसलिए लोग ये मानते हुए कि करना-धरना कुछ नहीं पर अभिव्यक्त की आजादी तो भारतीय संविधान सम्मत है, ब्लाॅग लिखने लगते हैं, किताबें गढ़ने लगते हैं। राहु खुश हो जाता है।
कई लोगों के ब्लाॅग पर उनके ब्लाॅग लिखने की वजह लिखी है। हालांकि किसी ने पूछा नहीं होता कि ‘‘आप क्यों लिख रहे हैं।’’ जिनका कोई उद्देश्य हो वो पूछेगा ना। राहु सारे लोगों को उद्देश्यविहीन कर देता है। लोगबाग अपने कर्मों पर कमेन्ट्स करने वालों की तलाश में सभी तरह की सरकस करने लगते हैं। उनके ब्लाॅग पर लिखा होता है कि वो ‘‘दिल की भड़ास निकालने के लिए’’ ब्लाॅग लिखते हैं। भई, भड़ास निकालनी है तो मंत्रियों पर जूते फेंक कर निकालो। ये कोई जगह है भड़ास निकालने की। ब्लाॅगस्पाट ने आपको स्पाॅट क्या दे दिया आप तो फैलते ही जा रहे हैं। राहु के प्रभाव से ऐसी ही मति हो जाती है, जिसका खाएं उसकी ही में छेद करें। ब्लाॅग, ब्लाॅगस्पाट.गूगल वालों का विज्ञापन पराये शादी डाॅट काॅम और अन्य लोगों के।

राहु द्वारा सम्पन्न कर्मों में किसी भी गृहिणी द्वारा आयुपर्यन्त किये जा रहे समस्त गृहकार्य, राजनीति, चुनाव, लोकतंत्र-वोट देना, रोबोट की तरह काम करने वाले लोग जो जब तक जबरन वीआरएस देकर घर नहीं बैठा दिये जाते फेक्ट्री आॅफिस जाते रहते हैं इत्यादि शामिल हैं। इन्हें जिंदगी भर होश नहीं आता कि उस काम के अलावा कुछ किया जा सकता है जो वो पिछले दशकों से कर रहे हैं। राहुग्रसित व्यक्ति कईयों की हालत तो ये हो जाती है कि मरणशैय्या पर भी वही पिछले 5 दशकों की रूटीन दिनचर्या एक दिन और जीने की भीख माँगता है।
राहु प्रभावित व्यक्तियों की हाथ की उंगुलियाँ और टांगे बेहतर काम करने लगते हैं। हर कहीं उंगली करना और फटे में टांग अड़ाना सम्पूर्ण जीवन का ध्येय होता है। ऐसे लोग अच्छे भले काम में नुक्स निकाल सकते हैं। संदेह और शक इनकी आंखों में कीच की तरह जमा होता है। चारो ऋतुओं में इनकी आंखें दुखती रहती हैं। दुखती आंखें चहुं ओर अपना प्रदूषण फैलाती हैं। आलोचक टाईप के लोग इनके प्रतिनिधि अभिव्यक्ता होते हैं।

राहुग्रस्ति युवतियाँ 22-27 साल तक लड़की एमबीए, बीकाॅम सीए की डिग्रियाँ लेती है और आगे जाकर साल दो साल में ही सारी पढ़ाई छू मन्तर। इलेक्ट्रानिक्स चिमनी, माइक्रोवेव ओवन्स, मल्टीपरपज मिक्सर ग्राइन्डर, और सदियों पुराने चैका चूल्हे के आधुनिक संस्करण की आढ़ में सारी उपाधियाँ स्वाहा हो जाती हैं। कपड़े धोने, घर के झाड़ू पोंछे, बर्तनों की सफाई बच्चे पालने में ही प्रौढ़ावस्था पार हो जाती है।

राहुग्रसित वृद्ध अपने अतीत की दुहाई देते रहते हैं कि किस समय उन्होंने क्या तोप मारी थी। हालांकि ये सब खयाली बातें होती हैं राहुग्रस्तता के कारण जीवन भर ही कल्पना के अलावा कुछ और कर नहीं पाते वही कल्पनाएं उन्हें अपने अतीत का घटित सच लगने लगती हैं। कोई मनोवैज्ञानिक काम नही करता। क्योंकि राहुग्रसित व्यक्ति सिर ही सिर में जिंदा रहता है, लोगबाग ऐसे लागों को बुद्धिजीवी कहने लगते हैं।

सुअर बुखार की तरह राहु ग्रसित व्यक्ति के लक्षण भी सामान्य से दीखते हैं पर उभरने पर यकायक नरकारोहण के अलावा कुछ नहीं घटता। टेमूफ्लू की डोज बेअसर हो जाती है, इतने छोटे नाम की दवाई भला कैसे असर करेगी। सारे अखबार, टीवी चैनल्स के भय से लोग फ्लूग्रस्त हो जाते हैं। लोगों के बड़ी मात्रा में नजला होने से सरकार भयग्रस्त हो जाती है, कहीं ये नजला हम पर ही न आ गिरे। बड़े बड़े विज्ञापन छपवाने पड़ते हैं कि ऐसा नहीं वैसा है। लेकिन होता तो वही है, जो है। हकीकत इस बीमारी को एन1एच1 का नाम देने वालों को भी पता नहीं होती।

यही कहानी अमरीकियों के बारे में है ईरान से डायरेक्ट पंगा न लेने, मुस्लिम जगत के समक्ष और आक्रामक न होने के उद्देश्य और ईराक के तेल कुओं पर नजर लगाये अमरीका ने सद्दाम हुसैन को पाला, और अफगानिस्तान पर पकड़ के लिए तालिबान को पर सब सीखने और हथियार मिलने पर यह एक असुर का काम करने लगे। अब सद्दाम के जाने से लगा कि सिर और धड़ अलग हो गये पर आतंक जारी है। राहु आतंकवाद ही नहीं अन्यान्य कई रूपों में हमारे रोजमर्रा के जीवन में यत्र तत्र दिखता है।
तो भई राहुकालम का ध्यान रखिये। इस कालम पर चढ़ा व्यक्ति ईसा तो नहीं कहलाता पर हालत उनसे भी बुरी होती है।

Thursday, 20 August 2009

हाए। कहॉं गए तुम

तेरी मोहब्बत का जो सहारा मिलता
दिल की कश्ती को किनारा मिलता

चाँद तो सारी रात सबका रहा
अपनी कि‍स्‍मत को सि‍तारा मि‍लता

सारी शब तारे रहे गरदि‍श में
कुछ तो नजरों का इशारा मि‍लता

चेहरा भी धुंधला हुआ यादों में
कभी तेरी दीद का शरारा मि‍लता

Tuesday, 18 August 2009

आप और राकेश राहू, केतु और शनि

उम्र के साथ कई बातों पर अंधविश्वास हटता गया जैसे; सभी उम्रदराज लोग समझदार और परिपक्व होते हैं, सभी स्त्रियाँ........... नहीं होतीं, सभी बच्चे बचकानी बातें ही करते हैं, गधे अफगानिस्तान में ही पाए जाते हैं इत्यादि। विज्ञान कहता है कि किसी भी व्यक्ति के दिमाग का विकास 15 वर्ष की आयु तक होता है, शेष सारी उम्र, उस 15 वर्ष तक विकसित दिमाग से काम चलाना पड़ता है।
यानि 15 वर्ष की उम्र में आदमी का दिमाग अपने विकास के चरम पर होता है और देखिये सारी गलतियों की शुरूआत आदमी 15 वर्ष की उम्र से ही करता है। तू सोलह बरस की मैं सत्रह बरस का.... यानि सत्यानाशों की श्रंखला का आरंभ। लेडीज फस्ट तो वो 16 बरस से ही दंगल में कूद जाती है। जो आदमी 15 वर्ष की उम्र मंे सही काम करने लग जाए वह आदमी नहीं होता.... क्या उसे आदमी कहा जाना चाहिए यह शोध का विषय है? खैर मेरे शोध का विषय व्यक्ति की आयु... और दिमाग का विकास न होकर यह है कि ”व्यक्ति वैसा क्यों हो जाता है जैसा वो है” यानि कौन कौन से घटक हैं जो उसे ‘ऐसा‘ बना देते हैं।
बहुत से लोगों की तरह हमारे दिमाग का विकास भी 15 वर्ष के बाद बंद हो गया था, तो हमने कुछ अन्य लोगों से जो 15 वर्ष की आयु में बुद्धिमत्ता के चरम पर थे, यह जानकारी हासिल करनी चाही कि आदमी वैसा क्यों हो जाता है जैसा है। मैं सोचा किया कि जिन्दगी भर औरत घर चलाती है, कपड़े सीती है पर शीर्ष फैशन डिजाइनर पुरुष जे जे वाल्या ही क्यों होता है? जिन्दगी भर खाना बनाती है पर फेमस कुक संजीव कपूर क्यों होता है? कई शीर्ष स्त्री रोग विशेषज्ञ भी नर मनुष्य ही थे। सारे किले महाराणाओं, अकबरों ने जीते। सारे अमेरिकाओं की खोज भी कोलंबसों ने की। मैं ये भी सोचा किया कि दुनियांभर की उपलब्धियों और कीर्तिमानों की स्थापना के बाद 30 से 60 सेकण्ड के खेल में पुरूष अखबारों के सर्वाधिक मँहगे और प्रतिदिन छपने वाले विज्ञापनों का विषय क्यों बन जाता है?
किसी ने आत्मा परमात्मा के फंडे दिये, किसी ने किस्मत बद्किस्मती के, किसी ने आदमी की करनियों को इसकी वजह बताया। पर हमारी समझ में जो बात आई वो ज्योतिष के नौ ग्रहों वाली थी, इस परिकल्पना में बहुत दम नजर आया। इस बात को समझने के बाद हमें भी अपने पर नाज हुआ कि 15 साल तक विकसित मस्तिष्क भी किसी आदमी की जिंदगी के गुजारे के लिए काफी होता है। तो हमने इस परिकल्पना को अपने सारे सह-ब्लाॅगकर्ताओं तक पहुंचाने की कोशिश निम्नानुसार कोशिश की है:
ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रह होते हैं और 12 राशियाँ होती हैं, लेकिन घबराएं नहीं हमें कुल जमा 21 बिन्दुओं का विस्तृत अध्ययन नहीं करना है। हमें बस ज्योतिष के मूल यानि शनि, राहू, केतू के बारे में जानना समझना है।
किसी भी व्यक्ति की रोते हुए पैदाइश से लेकर सड़कों पर मुर्दे की रूप में नुमाईश करते हुए विदाई तक यही त्रि-दुर्देव जी जान से सक्रिय रहते हैं। अब आप कहेंगे कि अन्य ग्रहों के बारे में क्यों नहीं जानना चाहिये तो भाई आप ही बतायें जो लोग या जो ग्रह कायदे कानून के अनुसार ही चल रहे हैं उनका चलना न चलना बराबर है, किसी महत्व का नहीं। उसी आदमी की तरह जो बड़े सीधे साधे ढंग से जिंदगी जी रहा है - जहाँ रिश्वत दी जानी चाहिए दे रहा है, जहाँ जूते खाने चाहिए खा रहा है, जहाँ गेला समझा जा रहा है समझा जा रहा है। संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करता हुआ वोट दे रहा है, संवैधानिक रूप से मान्य भ्रष्ट हत्यारों, गंुडे मवालियों, चाटुकारों, बलात्कारियों, अवसरवादियों को नेता चुन रहा है यानि वो सब कर रहा है जो संविधानसम्मत है।
हजारों सालों से आदमी और अन्य ग्रह वही कर रहे हैं जो लकीरों में लिखा है। ये सारे लकीर के फकीर हैं इनके किये मनुष्य जाति की कोई प्रगति नहीं हो रही। पर कुछ हटकर किया जा रहा है तो वो मात्र इन तीन ग्रहों द्वारा। शनि, राहु और केतु जी-जान से प्रत्येक चर अचर प्राणी की जिंदगी में भरपूर उंगली कर उसकी जिंदगी को जीने लायक बना रहे हैं। अगर सब कुछ अच्छा ही अच्छा होता तो भारत में कश्मीर को ही स्वर्ग क्यों कहते। कहने का मतलब ये कि अन्य प्रदेशों से प्रत्येक व्यक्ति को परेशान कर एक ही जगह की ओर खदेड़ा जाता है जहाँ पहुंचकर उसे लगता है कि यह स्वर्ग है। यह कोई दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह हो सकती है जैसे; अमेरिका। जहाँ की समुन्नत इमारत को शनि-राहु -केतू के एैक्य सफल प्रयास ने एक स्मारक के रूप में बदल दिया। अन्य आश्रय स्थलियों में पूंजीवाद, अलगाववाद, समाजवाद, लोकतंत्र, धर्म, कोई गुरू भी हो सकता है, पर कौन इन त्रिदुर्दैवों की माया से परे रह पाया है। जो नहीं है उसकी बात क्यों करें, पर दुनिया में जो भी है वो संक्षेप में राहू-केतु-शनि रा.के.श. (राकेश) से ही है।
कांग्रेस, बीजेपी या अन्य किसी दल के नेता की ही तरह रा के श अलग होते भी एक ही तरह के कारगुजारियो में निरंतर संलग्न रहते हुए जन का ता... धिन... धिन.. जन ता करते हैं। ये निराकार रूप हैं और साकार भी हैं। इनकी माया को समझने वाला भी इनसे नहीं बचता - क्योंकि वही बात, ऊँट की करवट की तरह इनका भी कुछ पक्का पता नहीं होता पिछली बार अटल बिहारी के साथ, इस बार संता जी के साथ, मायावती की मूर्ति देह ग्रहण कर लेती तो उस करवट भी बैठ सकते थे।
राजनीतिक दलों के दलदलों से अखबारों में छपे व्यक्ति की अंदरूनी (सेक्) जिंदगी के विज्ञापनों तक रा के श ही व्याप्त हैं। इनकी महिमा भी हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता की तरह है, मेरे खयाल से ‘हरि’ की जगह ‘रा के श’ शब्द ज्यादा उचित है। क्योंकि जब रा के श कथा को मोड़ देते हैं तो हरि अपने ही तारणहार स्वरूप का स्मरण करते हुए, आदमी को अपने हाल पर छोड़ निहाल कर देते हैं।
रा के श की माया की सक्रियता के कारण यह पाठ्य सामग्री निश्चित ही आपके 15 वर्ष तक विकसित उध्र्व अंग मस्तिष्क की पहुंच से छिटक रही होगी इसलिए मैं सोचता हूं आपको इस कड़ी के बाद वाली कड़ी में रा के श का पूर्ण परिचय दे ही दूं।
इस बीच जो पूर्वानुमान, अंदाजे, गालियाँ, साधुवाद, मजा, उपेक्षा, अपेक्षा आदि जो भी अंकुरित होता है उसे रा के श की ही व्याप्तता जानें। सारी तल्खियों, उंगली करने की इच्छा और उंगली करने के बाद हुई हानि का प्रतिशोध रा के श प्रभाव है। किसी को बिना वजह भाव मिलता है और कोई भाव पाने के लिए जिन्दगी बिता देता है पर फूटी कौड़ी की औकात हासिल नहीं कर पाता सब रा के श का किया धरा है। सब कुछ मनचाहा मिलने के बाद भी आप बेचैन रहते हैं और यह गाना गाते हैं “सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है...”, ”कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं मिलता, कभी जमीं कभी आसमां नहीं मिलता“। सारे तेल और गोलियां इस्तेमाल करने के बाद भी अपेक्षित परिणाम न निकलना, घु-टनों मंे दर्द बना ही रहना रा के शा का ही आवेश है। सारे धुंधलके, सारे उजाले, सारी खिसियाहटें, सारे नाले (रोने), आपके तन, मन और जो भी आप अपने आप में सोचते हैं रा के श के अलावा कुछ भी नहीं। ब्लाॅग सामग्री जारी आ........हे......

Wednesday, 12 August 2009

वैज्ञानिक अंधविश्वासों की उम्र

विज्ञान एक विचार नहीं, दृष्टि है। अंधविश्वास कला ही नहीं, विज्ञान का विषय भी है। वैज्ञानिक अंधविश्वास भी होते हैं। वैज्ञानिक अंधविश्वासों की उम्र, नई खोजों के स्पष्ट होने तक होती है। परन्तु संदेह, पुराने वैज्ञानिक विश्वासों को जिन्दा रखता है। स्वस्थ संदेह विज्ञान का आधार है। मानव शरीर के वैज्ञानिक अध्ययन में भी वैज्ञानिक अंधविश्वासों से उबरने की जरूरत है।
कई दवाईयाँ की खोज जिन बीमारियों को ठीक करने के लिए की गईं, उससे ज्यादा अन्य बीमारियों से निपटने के लिए प्रयोग की जाती हैं। वियाग्रा के साथ यह तथ्य और पुष्ट हुआ है। पर ऐसा नहीं कि साईड इफेक्ट अच्छे ही रहें, बुरे साइड इफेक्ट ज्यादा होते हैं। चूंकि ऐलौपेथी में समग्र शरीर और दिमाग को देखते हुए नहीं अंग विशेष को आधार बनाकर चिकित्सा की जाती है अतः यह एक ज्यादा अधूरी चिकित्सा पद्यति दिखती है। तो मानव शरीर को एक समग्र इकाई के रूप में देखना मानव शरीर की चिकित्सा के संबंध में प्रस्तुत किसी भी चिकित्सा पद्यति की पहली दृष्टि होनी चाहिए।
इसके बाद इंसान का शरीर बस शरीर ही नहीं वो ऐसी चीजों का आधार और घर भी है जो बिना भौतिक शरीर के काम करती हैं। इसलिए किसी भी मानवीय चिकित्सा पद्यति को मनुष्य शरीर से आगे मनुष्य के दिमाग और अन्य अपरिभाषित मनोवैज्ञानिक तथ्यों को भी अध्ययन का क्षेत्र बनाना चाहिए। भारतीय आयुर्वेदिक चिकित्सा में इस बात का ध्यान बखूबी रखा गया है।
सीमित दृष्टिक्षेत्र होने के कारण मनुष्य की उत्कृष्ट वैज्ञानिक खोजें भी 100-200 सालों में समझ में आती हैं कि कितनी एकांगी और अधूरी थीं।
मनुष्य के अंधविश्वासों में एक है जादू टोना। कि किसी का बाल ले लिया और उस पर तंत्र मंत्र के प्रभाव से जिस व्यक्ति का वह बाल है उसे प्रभावित किया जाना। वैज्ञानिक अब किसी व्यक्ति के एक बाल से उसकी डी एन ए/ जीन्स संरचना को समझने में सक्षम हैं। कल को प्रभावित होने/करने वाली बात के संबंध में भी संभावना जताई जा सकती है। प्राचीन अंधविश्वास थोड़ा थोड़ा साफ हुआ है। प्राचीन मान्यता थी कि कोई भी बीमारी संक्रमित हो सकती है सभी बीमारियां छुआछूत से फैलती हैं यह बात गलत है, पर अब वैज्ञानिक रूप से भी कई बीमारियाँ छूने, रोगग्रसित व्यक्ति के संपर्क में आने, लार रक्त संबंध बनने से फैलती हैं यह एक तथ्य है। स्वाइन फ्लू तात्कालिक उदाहरण है।
वैज्ञानिक आविष्कारों में हवाई जहाज पक्षियों के व्यवहार की नकल से बना। आज कई वैज्ञानिक अनुसंधान मनुष्य की इसी नकल की प्रवृत्ति का अनुगमन कर रहे हैं। वैज्ञानिक चींटियों, मधुमक्खियों और अन्य धरतीवासी जीवों का अध्ययन कर रहे हैं जिनसे पता चले कि किस प्रकार मनुष्य जाति भी अधिक संयोजन और सामंजस्यपूर्ण तरीके से रहती हुई विकास कर सके। विमानों को बनाने के लिए उड़ने वाले कीटों और पक्षियों की भौतिक रासायनिक और अन्य वैज्ञानिक संरचनाओं का अध्ययन किया जा रहा है। धरती के एक बड़े हिस्से पर जल ही जल है। जल में रहने वाले जीवों और वनस्पतियों के अध्ययन से भी मानव जीवन के जल के भीतर रहने की संभावनाओं पर भी वैज्ञानिक शोध जारी हैं।
विज्ञान को धारणाओं, सिद्धांतों, निष्कर्षों में बांधने की बजाय संदेह के साथ, मुक्त रहने दिया जाय। क्योंकि यदि ऐसा नहीं किया गया तो वह भी पोंगापंथी-धर्म, विचारधाराओं, इतिहास और संस्कृति की तरह मुर्दा और थोथा हो जाएगा। विज्ञान मानव मेधा की सक्रियता है जिसे घिसे पिटे ढर्रों पर चलाने की बजाय खुला रहना चाहिए अज्ञात दशाओं और दिशाओं के लिए। नई खोजों के समय अतीत के वैज्ञानिक निष्कर्षों को अंधविश्वासों की तरह छोड़ने की जरूरत है। कला में क्या हम यही नहीं करते। नये प्रयोग, नये आदमी के जन्म की जरूरत हैं।

Monday, 10 August 2009

तुम कहाँ हो?

काश! तुम मिलो, एक बार फिर.
बस एक बार फिर सुनो!
मेरी आंखों की जुबां
देखो, मेरे खामोश लबों की दास्तां
मुझे महसूस करो,
दूर खड़ी... कहीं छत पर

काश! तुम मिलो, बस एक बार फिर
इतने बरसों बाद
फिर से जानो
कि बरसों बाद तक
अभी भी मेरे खयालों में
अभी तक सांसों के सवालों में
तुम्हारा वही बरसों पुराना चेहरा
अभी भी ताजा है

अभी भी मेरे हाथों से
यकायक बनी तस्वीर में
वही पुरानी
तुम्हारी शक्ल होती है

अभी भी तुम्हारा नाम लेते-लेते
बरसों पुरानी यादें
चमकती सी कविता बन जाती हैं

काश! तुम मिलो, एक बार फिर.
तुम्हारा अपना भूला हुआ चेहरा
मेरी पुतलियों में अभी भी ठहरा है
बरसों से सजल मेरी आंखें
जिंदा हैं इसी उम्मीद में
काश तुम मिलो बस एक बार फिर


काश! तुम मिलो, एक बार फिर.
वक्त की बंदिशों और
कायनात की हदों से आगे
जब तुम पूरी घुल गईं थीं
मेरे सपनीले दिन रातों में

काश! तुम मिलो, एक बार फिर.

जबकि पिछली बार भी तुम
बस ख्वाब में मिलीं थीं।

काश! तुम मिलो, एक बार फिर.
ख्वाब में ही सही।

Tuesday, 4 August 2009

आने वाला पल----------- जाने वाला है......

प्रत्येक मनुष्य के पास जीने के लिए प्रतिदिन 24 घंटे हैं। गांधी जी हों या -मदर टेरेसा, आईंस्टीन हो या रवीन्द्रनाथ टैगोर, भगवान बुद्ध हों या जीसस, महावीर या अन्य विभूति उनको भी वही 24 घंटे मिले थे। न एक मिनट ज्यादा न एक मिनट कम। उनके दिन में घंटों की संख्या 25 नहीं होती थी। तो उन्होंने उस समय को कैसे बिताया और हम उसी समय को कैसे बिता रहे हैं यह देखने वाली बात है।

अति हर चीज की बुरी होती है। ऐसा ही समय के साथ भी है। जब लोग समय को जरूरत से ज्यादा ही गंभीरता से लेने लगते हैं तब समय सिरदर्द बन जाता है। इस जहान को हिन्दुओं में मत्र्यलोक भी कहा गया है जिसका मतलब यह कि यह मरने वालों का लोक है। दूसरे शब्दों में हम यह भी जानते हैं कि जो पैदा होता है वह खत्म भी होता है, मरता भी है। तो जीव पैदा होते हैं, विकसित होते हैं, बचपन, किशोर, जवानी, बुढा़ते हैं और फिर विदा हो जाते हैं।
समय वैज्ञानिक भौतिक तौर पर एक जरूरी पैमाना है वैसे ही जैसे नापने के लिए मीटर या गज, तौलने के लिए तराजू आदि।
पर आदमी बड़ी सरल चीजों को विकराल समस्या के रूप में बदलने में सक्षम है। लोग समय को भी समस्या बना देते हैं, वो ऐसे कि वो समय को भी अन्य चीजों की तरह खोपड़ी में सहेज कर रखने लगते हैं। सहेजते हैं और फिर उस गुजरे जमाने के बारे में सोच-सोच कर पागल हुए जाते हैं, जिसे वह सुनहरा अतीत कहते हैं। या उस भविष्य के बारे में ही हवाई किले बनाते रहते हैं जो आयेगा तो क्या पता उसकी शक्ल क्या होगी, या स्वयं सोचने वाला भी रहेगा या नहीं।

आप भी कुछ अतीत जीवी लोगों को जानते होंगे। इन लोगों के ताकिया कलाम होते हैं - वो भी क्या जमाना था, अरे हमने भी वो दिन देखें हैं..... या जी करता है वो दिन फिर लौट आएं, उस समय ऐसा होता था या उस समय वैसा होता था। मेरा एक ऐसा ही मित्र है। कभी राजे रजवाड़े रहे होंगे, उनके पीढ़ियों में हमारे ये मित्र पैदा हो गये। काम से कोरियर बाॅय हैं पर अकड़ वही जो महलों में लगी तस्वीरों में मूंछों पर ताव दिये लोगों की होती है। रस्सी जल गई पर बल नहीं गए। बाकायदा अपने राजचिन्ह का लाॅकेट गले में पहनते हैं। उनके पिता भी सारी उम्र इसी गलतफहमी में जिए। खाने के लाले थे पर घोड़ा खरीद रखा था जो शादी ब्याह में किराये पर दिया जाता था। एक दो नाली बंदूक थी, पर शिकार प्रतिबंधित है तो आस पास के घरों में दिखने वाली गौरयों, कौवों, कबूतरों की शामत थी। उनकी औलांदे भी वैसी ही - उनका शरारती लड़का खिलौना बंदूक से लोगों के घरों की खिड़कियों के शीशे चटखाया करता था। बहादुरी बस ऐसी ही ऊटपटंाग बातों में थीं, चैक पर छिड़ती लड़की देख वो दुबक कर निकल जाते थे।

इसी तरह एक दूसरी अति पर सक्रिय लोग समय के भविष्य रूप के बारे में ही सोचते विचारते और योजनाएं बनाते रहते हैं। भविष्यजीवी लोग आने वाले कल की ही बातें करते हैं। आपने दीवारों पर लाल रंग की मिट्टी से लिखी वो लाईने तो पढ़ी सुनी ही होंगी.......जय सतगुरूेदव, कलियुग जायेगा, सतियुग आयेगा... जाने किसके लिए किस रूप में?
मैं अपने एक मित्र को जानता हूं जो काफी पढ़ा लिखा और समृद्ध है है परंतु काफी मधुर सबंध हो जाने के बाद भी मुझे अपने कभी घर नहीं ले कर गया। मुझे अन्य मित्रों से पता चला कि उसके भविष्य के संबंध मंे बड़े बड़ी योजनाएं हैं कि बंगला होगा, गाड़ी होगी, नौकर चाकर होंगे तब वह सारे दोस्तों को अपना घर दिखायेगा। अभी वह अपने ड्राइवर पिता के साथ एक दो कमरों के क्वाटर में रहता है सो उस (उसके हिसाब से शोचनीय) स्थिति मंे लोग देखें तो उसे बुरा लगता है।
इस प्रकार ये दोनों तरह के लोग अतियों पर रहते हैं और सदा दुख में रहते हैं क्योंकि अतीत हमेशा के लिए जा चुका है और भविष्य कभी भी नहीं आता। मजा वर्तमान में और वर्तमान में भी सेकण्ड सेकण्ड का आनंद निचोड़ लेने में है। हर पल को शिद्दत के साथ जीना ही असल जीना है।

गीता मंे भगवान श्रीकृष्ण जी एक स्थान पर अर्जुन से कहा था कि - हे अर्जुन जहां तुम खड़े हो वहां करोड़ों करोड़ों जीव कई कई जन्म बिताकर सिधार चुके हैं।
यही बात समय और घटनाओं के बारे में सच है - हमारे आस पास यदि बुराई ही बुराई दिखती है तो सोचें - क्या अतीत मंे सभी अच्छे लोग थे? यदि हमारे पास अच्छाई ही अच्छाई और तरक्की दिखती है तो भी सोचिये कि अतीत में भी कितनी समृद्ध सभ्यताएं और संस्कृतियों ने युगों बिताये हैं।

बिना अतीत के कैसे जिएं? यदि कोई पीछे मुड़कर देखने वाला न हो तो अतीत कहाँ है? हम ही अपना अतीत बनाते हैं। समय के परिप्रेक्ष्य में सोचते करते हैं और अतीत बन जाता है। हम ही अपने भविष्य के सपने गढ़ते हैं। हमें अपने अतीत को बिना भला बुरा कहे उससे सीख लेनी चाहिए और भविष्य के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। नई चीजों को अपने विवेक के तराजू पर तौल कर सीखें। अतीत से बंधे न रहें। न तो सारा नया श्रेष्ठ होता है न सारा गुजरा हुआ।

इस मामले में अपने आस पास बचे जानवरों को देखें। उन्हें बीते कल का शोक नहीं होता और आने वाले कल की भी चिंता नहीं होती। क्या आदमी जानवर से भी गया बीता है।

अतीत के लिए जीते कई देवदास शराबखानों में मिल जाते हैं। पारो घर बार बसा कर मजे करती है और ये देवदास उन्हीं सुनहरे दिनों को याद कर अक्ल से हाथ धो बैठते हैं और शेर ओ शायरी कर गुजारा करने लायक भी नहीं बचते। सरकारी कार्यालयों में कई अतीतजीवी लोगों के दिमाग पूरी तरह ठस हो चुके हैं। मेज पर कम्प्यूटर भी रखा है और टाइपराइटर भी। पर आज भी सारा दिन टाईपराइटर ही खटर खटर करता है। सीखने की जरा इच्छा नहीं। कई कम्प्यूटर सीखने वाले भी ऐसे लोग हैं जो एक आध साफ्टवेयर सीख लिया तो रोबोट की तरह बस रटी रटाई कमांड एप्लाई करने में ही यकीन रखते हैं। कई उनसे भी महान लोग किसी साफ्टवेयर के नवीनतम संस्करण से उसी तरह परहेज रखते हैं जैसे स्वाइन फ्लू के बीमार से। उनके ये शब्द होते हैं, पुराना बेहतर है...., इसकी स्पीड अच्छी है, अरे नया समझ ही नहीं आता। अब इन लोगों के कौन समझाये कि पुराना अच्छा होता तो कहानी वहीं खत्म हो जाती क्यों अरबों डाॅलर लगाकर कई इंसानी दिमाग रात दिन नई सुविधाएं विकसित करने में जुटे हैं।

भावी के लिए संग्रह की मानवीय वृत्ति मँहगाई को कई गुना बढ़ा देती है। जमाखोरी ऐसी ही कुवृत्ति है। हमारे शहर में कई लोग अपनी सारी उम्र किराये के मकानों में निकाल चुके हैं लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जिनके शहर में उगी नई नई काॅलोनियों में 4 -5 मकान हैं और बंद पड़े धूल खा रहे हैं, सड़ रहे हैं। इसे सूझ-बूझ भरा निवेश न कहकर सामाजिक शोषण कहना चाहिए। क्या इस प्रकार की अन्य असमानताओं और वैषम्य का कारण यही अतीत या भविष्यजीवी मानवीय वृत्ति नहीं है?
तो प्रत्येक आयु अवस्था में व्यक्ति जिंदादिल रहे। पूर्वाग्रह न रखे। तथ्य को जस का तस देखे। कुतर्क न करे। न पीछे रहे न आगे हवा पर कदम रखे। जिस बढ़ते कदम के साथ जो उचित हो वही सनातन कर्म करे। सनातन शब्द का अर्थ ही यही ‘ऐसा जो अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में सत्य है’। और सनातन होती है हमारी दृष्टि जो किसी बात को वैसा का वैसा ही समझ ले, जैसी वो यथार्थ रूप में है। क्या आपने वो गीत नहीं सुना - ”आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू जो भी है बस यही इक पल है“ इसी पल को भरपूर जीने में सार्थकता है। चाहे भले बनो या बुरे, गांधी बनो या हिटलर, राम बनो या रावण लेकिन समय को उसकी समग्रता में जिओ। प्रत्येक क्षण को समग्र रूप से जीने वाला व्यक्ति वक्त की सीमाओं को लांघ, अमर हो जाता है।