Thursday, 19 November 2020

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Thursday, 12 November 2020

रट्टू तोता

 


तकरीबन महीना भर पहले की बात है। ये तोता.. जिसकी तस्वीर यहां दी गई है, हमारे परिसर में आया। इसने दो चार गिनती के शब्द रटे हुए थे, यानि स्वाभाविक ही हम सब को महसूस हुआ कि शायद किसी के घर का पला—बढ़ा, मनुष्यों के बीच रहने वाला अभ्यस्त तोता है। जिस किसी की भी बालकनी में जाता वही, फल—फ्रूट—सब्जी, भोज्य इस तोते को प्यार से परोसता। किसी ने जबरिया पकड़ने और पिंजरे का इंतजाम कर अपने यहां ही रख लेने की कोशिश नहीं की। 

दिन गुजरे और आज धनतेरस का दिन आ गया। दीपावली के अवसर पर बिल्डर के आदमियों ने परिसर के सभी ब्लॉक्स में कल ही बिजली के बल्बों की लड़ियां लटकाईं थीं। आज सुबह सभी को इस तोते की यह बात पता चली कि सभी बा​ल​कनियों में जहां भी यह तोता जा रहा है, ब​ल्बों की लड़ियों की तारें कुतर रहा है। महीने भर, सबके मनोरंजन का केन्द्र रहा यह तोता.. आज सबके गुस्से और परेशानी का सबब बन गया है। 
इस तोते की मजबूरी या विव​शता उसकी पिंजरे, मनुष्यों के बीच रहने की आदत है। मैं सोच रहा था यह वापिस — पास ही के जंगल में क्यों नहीं उड़ जाता, अपनी ही प्रजाति जाति के तोतों के झुंड में रहने क्यों नहीं चला जाता?, अपनी कुदरती आजादी में क्यों नहीं रहता? 
...

मुझे जाने क्यों तोते से संबंधित एक कहानी याद आ गई। 
एक गांव के बाहर एक अमीर आदमी रहता था। धर्म अध्ययन—अध्यापन, योग अध्यात्म से उसे बड़ा प्रेम था। गांव के बाहर अपना निवास बना रखा था ताकि लोग उसके इस काम में बाधा ना बनें। एक सुबह घर के सामने, एक ऊंचे पेड़ से के कोटर से गिरा हुआ एक तोते का बच्चा उसे मिला। उसने उसे पाल लिया। एक बड़े सुंदर से पिंजरे में उसे रखा और जो भी अध्ययन मंत्र गीत उसे प्रिय थे उन्हें सिखाने लगा। कुछ ही दिनों में तोता उसकी सिखाये कई शब्द बोलने लगा। एक दिन उस व्यक्ति को किताबें खरीदने शहर जाना था तब उसे लगा कि अब कौन इसकी देख रेख करेगा? खैर.. इस बात का इंतजाम कर वो शहर गया। शहर में, अपने कामकाज की जगह जाते हुए उसने देखा कि एक पंछी बेचने वाला कई छोटे छोटे पिंजरों में 5—10 तोतों को बेच रहा था। उसे अपना तोता याद आया।
.
जब वो घर लौटा तो उसने सोचा कि हो सकता है यह तोता कभी इस पिंजरे से उड़ जाये। किसी जंगल चला जाये। पर फिर किसी शिकारी के हाथ गया तो? तो क्यों न तोते को मैं कोई/कुछ ऐसी बात सिखा दूं... ​रटा दूं कि इसे किसी जालिम शिकारी के पिंजरे में न कैद होना पड़े। यहां वहां न बिकना पड़े। इसे बचने का मौका मिल जाये, ये उड़ जाये, और लौट कर फिर कभी न आये... और सदा मुक्त रहे। 
तो उसने तोते को सिखाया— रटाया:
मिट्ठू... मिट्ठू से मिलने जायेगा
लौट को फिर यहीं आयेगा
भरोसा तो करो....

 

तोता बूढ़ा नहीं था, जल्द ही उसने यह तीन वाक्य भी रट लिये। जब यह तीन वाक्य, तोते ने भली भांति रट लिये तो व्यक्ति ने सोचा — कि मैंने जो इसे सिखाया है इसमें गलत क्या है... वैसे भी पंछी को तो मुक्त ही रहना चाहिए। यदि इसे पिंजरे में रहना होगा तो खुद ही आयेगा। उसने तोते को पिंजरे से बाहर निकाला, खुला छोड़ दिया.. मगर तोता वापिस पिंजरे में जा बैठता। तो आदमी ने कहा — चलो मुक्त रहो, और मेरे पास भी रहो। अब वह तोते से निश्चिंत था। तोता भोजन पानी के लिए नीचे आता और बाकी समय घर के सामने या अन्य पेड़ों पर उड़ान भरता, मनमौजी रटी बातें बोलता और मस्त रहता। 
फिर एक बार यूं हुआ कि तोता उसके घर कई दिनों तक नहीं आया। उस व्यक्ति ने सोचा कि चलो, पंछी है, मौज में कहीं चला गया होगा। उसने इंतजार किया पर तोता गया तो लौटा ही नहीं।
कुछ महीने बाद व्यक्ति को, फिर किताबें खरीदने शहर जाना पड़ा। लौटते हुए उसे वही तोते पंछी आदि बेचने वाला मिला, बड़ी उम्मीद से वह उसके पास पहुंचा और बोला कि क्या किसी जंगल में राम राम, गायत्री मंत्र और मिट्ठू इत्यादि बोलने वाला तोता तो नहीं दिखा। पंछी बेचने वाला बोला — भाई साहब हम तो शहर में रहते हैं... जंगली शिकारियों से पंछी खरीदते हैं शहर में बेच देते हैंं। हम खुद थोड़े ही जंगल जाकर...वगैरह वगैरह।

कई महीने बीत गये और साल भी। उस व्यक्ति का घर पुराना हो गया। छत चूने लगी। उसने मजदूर बुलाये और उन्हें घर के रिनोवेशन के काम पर लगाया। इस काम धाम से अलग एक कमरे में वो शांत हो किताबों में मग्न था। एक दोपहर उस व्यक्ति का ध्यान... दो मजदूरों की बातों पर गया—
पहला मजदूर बोला — मैं कल ही शहर गया था, हमारा मिट्ठू तो बहुत महंगा बिका, एक शहरी व्यक्ति ने उसके दो हजार रूपये दिये। 
दूजा बोला — चलो किसी काम तो आया, वरना गांव में तो उसने लोगों को परेशान कर रखा था। कहीं भी बैठ जाये मंत्र गाये, राम राम बोले और वो क्या बोलता था... 
मिट्ठू... मिट्ठू से मिलने जायेगा
लौट को फिर यहीं आयेगा
भरोसा तो करो....

.... अरे मिट्ठू टें टें कर तोतों को बुलायेगा, फसलें सब्जियां खराब करेगा, यहां वहां चीजें कुतरेगा ये तो बोलता ही नहीं था।
पहला मजदूर बोला — अरे शहरियों को क्या मतलब, उसकी आजादी से... वो तो पिंजरे में रखेंगे, उनके वास्तुदोष शांत हो जायेंगे और उनके बच्चों का मनोरंजन भी। वैसे भी, उसे तो पिंजरे में ही रहने की आदत है... पता नहीं किसने सिखा दिया था कि —
मिट्ठू... मिट्ठू से मिलने जायेगा
लौट को फिर यहीं आयेगा
भरोसा तो करो....
भरोसा क्या करना, वो तो पिंजरे में ही रहने का आदी हो गया था, समय पर खाना—पीना, बच्चों—औरतों के बीच , मनुष्यों घरों में ही रहना—बैठना, रटी रटाई बातें बोलना। 

...

किताबों में मग्न व्यक्ति को अचानक जैसे ब्रह्मज्ञान हुआ। बरसों से वह भी किताबों में मग्न है। धर्मग्रन्थों का अध्ययन अध्यापन, दूजों को बताना कि क्या करना और कैसे करना है... लेकिन वो स्वयं तो उस तोते की तरह है, जिसने उसे स्वयं ही सिखाया था कि —
मिट्ठू... मिट्ठू से मिलने जायेगा
लौट को फिर यहीं आयेगा
भरोसा तो करो....
उसने स्वयं कभी ​किताबों, भाषणबाजी और रटी—रटाई बातों से इतर मुक्ति का स्वाद नहीं चखा। ना उन बातों का उसके जीवन में, जिसे वह जी रहा है... उससे कोई सरोकार रहा।

Sunday, 24 June 2018

क्या आप जानते हैं— 'सुनना' एक महान कला है।

न महान कलाओं में से है जो हमने नहीं रचीं— एक है "किसी को पूरी तरह सुनना। ध्यानपूर्वक सुनना। कान या श्रवणमात्र.. सुनना ही हो जाना।"
जब आप​ किसी को पूरी तरह ध्यान लगाकर सुनते हैं, तब आप...अपने आपको या अपने बारे में भी सुनते हैं। अपनी ही समस्याओं, अपनी ही अनिश्चितताओं, अपनी ही दुगर्ति दुर्भाग्य का किस्सा सुनते हैं। भ्रम, सुरक्षा की चाह और शनै:शनै: मन के पतन होने की कहानी सुनते हैं.. कि कैसे आपका मन ज्यादा से ज्यादातर यंत्रवत होते गया, कैसे आप रोबोट जैसे ही हो गये।
~ जे कृष्णमूर्ति 'सम्बंधों में जीवन' मैग्नीट्यूड आॅफ माइंड
You know listening is a great art. It is one of the great arts we have not cultivated- to listen completely to another. When you listen completely to another, you are also listening to yourself- listening to your own problems, to your own uncertainties to your own misery, confusion, the desire for security, the gradual degradation of the mind which is becoming more and more mechanical.

Wednesday, 4 April 2018

एक खूब सूरत पंजाबी रूहानी सा लोकगीत - मिट्टी दा बावा

Mitti Da Bawa मिट्टी दा बावा 

.....
कित्ते ते लावां टालियां
वे पत्ता वालियां
वे मेरा पतला माही
कित्ते ते लावां शहतूत
वे तेनु समझ ना आवे

मिट्टी दा बावा मैं बनो णिं आं
चग्गा पौ णिं आं
वे उत्ते देनी आं खेसी
ना रो मिट्टी दे बा वेया
वे तेरा प्यो परदेसी

मिट्टी दा बावा नई बोल दा
वे नइ यो चालदा
वे नइ यो दें दा हुं गारा
ना रो मिट्टी दे या बा वे या
वे तेरा प्यो बणजारा

मेरी जे हिं या लक्ख गोरियां
वे तन्नी डोरियॉं
वे गोदी बाल हिंडोले
हॅंस हॅंस दें दियां लो रि यां
वे मेरे लड़न सपोले
...
दीवा बले सारी रात पंजाबी फिल्म 2011

Monday, 31 October 2016

एक दिया

जब से एंड्राइड स्मार्टफोन लिया है, लिखने की आदत छूट सी गई. केवल फेसबुक. फेसबुक क्षणिक सुख है माया है. सारे महत्वपूर्ण सुख क्षणिक होते हैं. क्या आपने लंबे चलने वाले सुख देखे हैं? सुख भी यदि लंबे चलें तो बोरियत और दु:ख में तब्दील हो जाते हैं.
दुख या तो भूतकाल होता है या भविष्यकाल. जो वर्तमान है वो ना तो दुख होता है ना सुख. लेकिन जब हम जो अभी सामने है, उसका सामना नहीं कर पाते तो बात सुखद या दुखद में रंग जाती है. जब हम जो अभी सामने ही है उसे टालकर अतीत में धक्का मारकर गिरा देते हैं या ख्यालों ख्वाबों की पतंग के कंधे पर बैठा उसे भविष्य में प्रक्षेपित करते हैं तो बात विकृत हो जाती है...कुरूप भ्रष्ट हो जाती है.
सोशलसाईट्स पर कहीं भी जाओ  आस्तिक नास्तिक मिलेंगे, हिंदू मुसलमान मिलेंगे, राष्ट्रवादी और देशद्रोही मिलेंगे, पक्ष या विपक्ष वाले मिलेंगे... अतियों पर खड़े लोग मिलेंगे या अतियों की ओर सरकते हुए.. बीच में खड़े होकर कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाटी हाथ... इस मुद्रा में कोई नहीं दिखता... दिखता भी है बस लिखता लिखता ही दिखता... नाना पाटेकर बोला मिट्टी की, बाती की, तेल की, और आखिरकार लौ की, आग की कौन जाति होती है?
ज्ञानीजनों की संगत मुश्किल है क्योंकि ज्ञान के साथ अहं फ्री मिलता है. निपट ज्ञानी नहीं मिलेगा उसके साथ कुछ ना कुछ श्लेष्मा अलंकृत होता है जो उसे ज्ञानी नहीं रहने देता-
गुजरात में नया साल दिवाली से शुरू होता है... तो देखते हैं रोज नये दिये सी एक नई ब्लॉग पोस्ट

Sunday, 24 January 2016

फेसबुक पर चिपको आंदोलन


इतना तो तय है कि अगर आदमी को काम हो, उसे फालतू चीजों के लिए फुर्सत ही ना हो तो आदमी फेसबुक लाॅगइन नहीं करेगा. एक आदमी जो रोटी-कपड़ा-मकान-दुकान के चक्कर में है वह भी फेसबुक पर नहीं होता. नियमित रूप से खाने-पीने के प्रति लापरवाह, खाते-पीते ऐसे लोग जिनके पास बिजली, कम्प्यूटर और इंटरनेट पर किये गये खर्च का हिसाब रखने के कारण नही हैं.. वो सोशन नेटवर्किंग साईट्स (सो.ने.सा.) पर सहज होते हैं।

कम्प्यूटर इंटरनेट की सुविधा होने के बावजूद फालतू लोग हैं, कोई काम नहीं... तो बस बैठे हैं. दूसरों पर कमेंट करना. सुनी-सुनाई, पढ़ी-पढ़ाई बातों से ही बात का बतंगढ़ बनाना. गलतफहमी होना कि आस-पास पास-पड़ोस में यार-दोस्त नहीं मिल सके तो यहां मिल जायेंगे. किसी ना किसी तरह के नेटवर्क में रहने की भी एक आदिम तलब भी...एक वजह है. भड़ास निकालना. अफवाह फैलाना. चुगलियां करना. व्यर्थ की बतौलेबाजी. टांग खींचना और अजनबी लोगों की टांग खींचना. उपदेश देना. 3 लोग महज इसलिए जबरन फेसबुक पर होते हैं कि उनके अन्य 7 साथी यहां पर हैं. जो बातें कर नहीं पा रहे हैं, करने में सक्षम नहीं है..वो कही जाती हैं तो ऐसी बातों का भी यह एक मंच है. गालियों का भी.

कम्प्यूटरनेट से पहले कुछ लोग हुआ करते थे जिनमें लिखास का जीन्स सक्रिय होता है... उनके लिखे को उन्हीं के समाज-जाति वालों द्वारा छपवाई स्मारिकाओं में भी जगह नहीं मिल पाती थी.. तो उनके लिए भी यह एक उपयुक्त मंच है. लोग फेसबुक पर छपास भी निकालते हैं. किसी मासिक पत्रिका या समाचार पत्र में कोई लेख या कविता भेजनी है तो उसे पहले फेसबुक पर डाल दो... प्राथमिक मूल्यांकन हो जाता है. जिन्हें अच्छा लिखने की गलतफहमी है वह अपने बारे में गाने गा सकता है, जो बुरा लिखते हैं वो दूसरों के अच्छे के आलोचक हो सकते हैं... कि फलां फलां चीज की कहां कहां कमी है। किस किस गुड़ में कहां कहां कुछ गोबर का टच देते तो क्या ही फ्रूंटपंच बनता. पहले अच्छे-खासे लेखकों को स्थापित होने में एक उम्र लग जाती थी, अक्सर तो उसकी पहली दूसरी बरसी पर ही पता चलता था कि वह कितना महान था... आज के लेखक पैदा बाद में होते हैं... सारी सोनोग्राफिक कहानी पहले छप चुकी होती है. लाखों की तादाद में महिला अनुयायी... फोलोवर्स होते हैं। सो.ने.सा. ने विभिन्न तरह की गुटबाजी को काफी सहयोग दिया है...


फिर दुनियां भर की खबरे सुनने को मिलती हैं, उन पर आदमी चिंतित होता है.. अब कुछ करेगा तो मेहनत, ताकत, हिम्मत, दिमाग, पैसा जाने क्या क्या खर्च होगा... फेसबुक पर बैठे-ठाले बतौलेबाजी करो, चिंताओं के चिंतन से सारे नेटवर्क को धन्य करो। खुद चिता पर बैठे हो दूसरों को भी जलाओ, खुद का पक रहा है, दूजों का दिमाग भी दही करो।

फेसबुक टाईमलाईन लोगों के बारे में मोटा मोटा हिसाब तो दे ही देती है। ज़रा भी सच्चाई हो तो किसी की अपलोड या शेयर की तस्वीरें और पठन सामग्री बता देती है कि कौन, किस उम्र में, कैसा और फिलवक्त इनका क्या मिज़ाज है, बावजूद इसके कि यह मुखौटालोक है..धोखा हो सकता है।

आदमी ताउम्र मनोरंजन चाहता है. जैसे देह.दिमाग.मन हैं वैसै वैसे मनोरंजन के जरिये भी... यहां तक की ज्ञान.ध्यान को भी मनोरंजन बना लिया जाता है-

Saturday, 9 January 2016

बस यूं ही

वैसी ही नहीं, जैसी कोई चाहे
आग कई तरह की होती है
वैसी भी... जैसी कोई ना चाहे

सब चाहते हैं
दीपक सोने का हो
बाती, अभी—अभी उतरे कपास के फाहे की हो
श्यामा गाय से पाया- पिघला कुनकुना घी हो
और किसी तीर्थ की पवित्र अग्नि से
सुगंधित दिया रोशन हुआ हो

पर सबके
इतने सारे इंतजाम नहीं हो पाते
इ​सलिए
आग कई तरह की होती है
वैसी भी... जैसी कोई ना चाहे

मिट्टी के तेल से गंधाती कुप्पी
साईकिल की ट्यूब की नोजल में सजी
गुदड़ियों से निकली चिंदियों की बाती
गंगू तेली की बीड़ी से उपजी आग
दिये का ऐसा इंतजाम
रौशनी कम देता है
काला गंधाता धुंआ ज्यादा
धुंआ—रामायण की चौपाईयों का शोर
धुंआ—शोर में तुलसी कबीर के रटे दोहे गाने की होड़
धुआं—अमावस की रात में जप
धुंआ—बर्फ बारिश आग में तप
धुआं—प्रोफेसरों के तर्क
धुआं—बुद्धिजीवियों का जुबानी तेजाबी अर्क
धुआं—विज्ञानसम्मत सुबूत
धुंआ—बरसों वही कथन..रगड़ रगड़ मजबूत


कभी तो आपका भी
जाना हुआ होगा शमशान
वहां की आग सबसे महान
ये आग सदा साथ रहती है
आपकी पैदाइश से
किसी के मरने तक

क्योंकि हम
मौत से तो हमेशा बेखबर होते ही हैं
हमें जीवन का होश भी नहीं होता
कब फूल से पैदा हुए
कब कोंपलों पत्तियां
​डाली शाखों में बदलीं
कब हम फूले फले
कब पतझड़ आया
कब सूखी पत्तियों से उड़ चले

तो मौत की याद की आग
सीने में सदा सुलगाये रहो
वो सब जो देह है
कभी नहीं था
वो सब जो देह है
कभी नहीं होगा

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इक ना इक शमां, अंधेरों में जलाये रहिये
सुबह होने को है, माहौल बनाये रहिये
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Thursday, 7 January 2016

दिनों महीनों सालों तक


दिनों महीनों सालों तक
बस वही दिन. बस वही रात
दिनों महीनों सालों तक
रोटी.रोजी.बोटी की बात

दिनों महीनों सालों तक
तू, मैं, तू—तू मैं—मैं
दिनों महीनों सालों तक
ओह!, अच्छा, हैं...?

दिनों महीनों सालों तक
गंवाई यूं ही सांसें
दिनों महीनों सालों तक
महसूसी दिल में फांसें


दिनों महीनों सालों तक
मशीनों में पालन पोषण
दिनों महीनों सालों तक
कौटिल्यों ने किया शोषण

*चाणक्य को कौटिल्य भी कहा जाता है, उनकी कुटिल व्यवहार परंपरा के कारण

दिनों महीनों सालों तक
मजबूरियों का साथ
दिनों महीनों सालों तक
खुदगर्जियों की लात

दिनों महीनों सालों तक
हकीकत से बचना,
दिनों महीनों सालों तक
कोई कुनकुना सपना

दिनों महीनों सालों तक
कृष्ण का कहा धर्म
दिनों महीनों सालों तक
कोशिश,श्रम और कर्म

दिनों महीनों सालों तक
असफलताएं, कुंठाएं
दिनों महीनों सालों तक
मौत की याद, हाय! हाय!

दिनों महीनों सालों तक
भेड़ों की भीड़ में भेड़ रहे
दिनों महीनों सालों तक
खरपतवार, हरा ढेर रहे

दिनों महीनों सालों तक
किसी जीवन की तलाश रही
दिनों महीनों सालों तक
मौत ही सदा पास रही

दिनों महीनों सालों तक
बस निरर्थकता को महसूसा
दिनों महीनों सालों तक
इच्छाओं ने सोखा, चूसा

दिनों महीनों सालों तक
जलन, कुढ़न और बदले
दिनों महीनों सालों तक
रहे वही, नहीं बदले

Tuesday, 29 September 2015

सैर पर विचारों के पर


हालांकि आज भी सुबह सुबह जागना अनायास नहीं होता. आज भी नाक बंद सी लगी, छींकें आईं और आंखें भींचकर सोते रहने की वजह ना दिखी तो उठ गये। सुबह सैर पर निकले अधिकतर मनुष्य अपनी ही तरह बकवादी, बड़बड़ाते और सपने में चलते से नज़र आते हैं। क्यों.... क्या जब आप सैर पर जाते हैं तो निर्विचार होते हैं? तो आंखें, कान, नाक, मन यदि स​क्रिय है तो सैरगाह में यत्र तत्र विषय होते हैं और मन में विचारों की रेलमपेल.

शाहपुरा झील पर कल—परसों विसर्जित किये गये गणेशों की सैकड़ों छोटी—बड़ी मूर्तियां थीं। जिस दिन मैं गणेश जी की स्थापना के लिए गणेश जी की छोटी सी मूर्ति खरीदने स्थानीय बाजार पहुंचा तो छोटा सा मिट्टी का लोंदा 50 रू से कम ना था. वह आकार जिसमें गणेश जी स्पष्ट नज़र आते थे उस आकार की मूर्तियां 100- 200 से कम की ना थीं। आज झील किनारे कूड़े कर्कट में सैकड़ों ऐसी मूर्तियां थी जो उस दिन 500 हजार और हजारों रूपये की बिकी होंगी।

दस दिन इन गणेशों मूर्तियों ने फूलों के हार पहने, हरी—हरी दूर्वा, मोदक, देसी घी के लड्डुओं के भोग—भोगे, एल..डी. के प्रकाश में नहाये, स्तुतियां और आरतियां सुनीं और फिर मनुष्य के अबूझ मन ने उन्हें आम समझ सम्मत वो जल समाधि दी जिसमें देवता की देह को पलट कर, देखा भी नहीं जाता। मुर्दे को भी हम भलीभांति दफनाते या जलाते हैं... उसकी राख का भी उचित इंतजाम करते हैं कि किसी के पैरों में ना आए, दूषित जगह ना जाये पर इस स्थापित देवता का वो हाल होता है कि बस..

पानी कम है स्थापित किये जाने वाले देवता की मूर्तियां ज्यादा... प्लास्टर आॅफ पेरिस की मूर्तियां बने...किसी शास्त्रग्रंथ में नहीं लिखा, पर बनती हैं, सुंदर साफ सजीली दिखती हैं महंगे दाम देकर खरीदी, स्थापित और विसर्जित की जाती हैं पर ढेर सारा कचरा बनाती हैं। सारी झील के किनारों पर प्लास्टिक की पन्नियों, शाम को लगाये जाने वाले चाउमिन, चाट, पेटिस के ठेलों से निकले कागजप्लास्टिक के दोने प्लेटों जूठन के बीच मंडराते कुत्ते सुअरों के सानिध्य में गौरी पुत्र गणेशकी औंधी आड़ी तिरछी उघड़ी मू​र्तियां... कुछ ही दिनों बाद उनकी माता गौरी की मूर्तियां भी स्थापित की जाएंगी... और उनका भी यही हश्र होगा। पता नहीं हम मूर्तिपूजक हिंदुओं की श्रद्धा का सिरपैर क्या है?

एक दिन इसी ​मूर्ति चिंतन के बीच मैंने सोचा क्यों ना कागज के कैलेण्डर पोस्टर ही लगाकर 10 दिन की गणेश पूजा कर ली जाये या लुगदी की बनी मूर्तियां स्थापित की जायें— जो मिनटों में जल में लीन हो जायें, प्रदू​​षण ना फैलायें और जाते जाते आदमी की आत्मा को देह से मुक्ति की सुगमता का भान कराकर शांति दे जाएं।

कायदा तो कुछ और ही कहता है कि मूर्ति् खरीदी ना जाये, जैसी भी बनें, खुद बनाईं जाये। यही वजह है कि हमारे प्राचीन मंदिरों में अनगढ़ पत्थरों की पिण्डियां, और आड़ी तिरछे देव विग्रह मिलते हैं... पर पूजने वाले द्वारा गढ़े गये। मूर्तिपूजा बचपन के खेल खिलौने वाले गृहस्थिी के सेट जैसी है घर की सारी चीजें होना जरूरी हैं... पर खेल है कुछ दिनों का, जिंदगी भी चार दिन की। रामकृष्ण परमहंस ने मां को मूर्ति में पूजा, ख​​ंडित को भी जोड़जाड़ कर जुगाड़ कर काम चलाया। किसने कहा कि वो परमब्रह्म से परिचित ना थे? पर देह, संसार स्वप्न है और जो ना जागे, अच्छी नींद के लिए, सपने में सुख के लिए... देह के कायदों में रहना पड़ता है...

मैं मूर्ति विसर्जन के बारे में नहीं, असल में... सुबह की सैर पर निकलने पर आये विचारों के बारे में बात करता था। ये सब विचार में चलता है कि लोगों की पूजा पाठ कैसा है... चैनल पर आने वाले ज्योतिषी पंडितों बाबाओं द्वारा संचालित, अपनी और से ईश्वर द्वारा दी गई कुछ ग्राम की बुद्धि का रत्ती तोला माशा भर भी उपयोग नहीं। मछलियों को ब्रेड कुतर कुतर डाल रहे हैं, मछलियां मरें या जिएं पर हमें मछली को दाना डालने का पुण्य मिल जाये। कुत्तों को ग्लूकोज के बिस्किट डाल रहे हैं, कुत्ता खुजा खुजा कर मर जाये हमारी बला से... काले कुत्ते मरेंगे हमारे शनि कटेंगे। खुद तो अंटशंट अंडशंड खा रहे हैं, बाहर भी फेंक रहे हैं... गिलहरियां खा रहीं हैं..मर रहीं हैं... वही गिलहरियां जिनकी देह पर रघुपति राघव राजाराम के हाथ फेरने पर बनी धारियां हैं।

मुंडेर से गौरेया और कौए कब गायब हो गये पता नहीं चला, अब महीनों सालों में शहर से कहीं इधर होने पर ही इनके दर्शन नसीब होते हैं। खुद के ही होश नहीं...पर्यावरण का ध्यान खाक रखेंगे। सुबह ही फट​फटियों और चौपाया कारों से सारी ​सड़कें काली धुएं और धूल से पट जाती हैं। आप सुबह की सैर को शहर में किस ओर जाएंगे ? या तो उन छोटे छोटे मैदानों में कोल्हू के बैल की तरह चक्कर काटिये जो नगर विकास संस्थाओं ने आपके मोहल्लों में रहम कर बना दिये हैं, जहां कुत्ते घुमाने वाले कुत्ते घुमाते हैं उन्हें सुबह सुबह निवृत्त कराते हैं। जो दोपहर और रात को शराबियों जुआरियों के अडडे बन जाते हैं, असामाजिक गतिविधियों की योजनाएं बनाने के एकांत के रूप में काम आते हैं। मोहल्ले के बाहर जाती स्कूल कॉलेज जाने वाली सड़कों पर भारी भरकम बसें, और अन्य तेजरफ्तार वैन, दूध बांटने वाले तिपहिया अलसुबह सुबह ही निकल पड़ते हैं। किसी तालाब या नदी किनारे जाएंगे तो मन और खराब होगा जब आप पाएंगे कि यहीं से आपके घर पानी की आपूर्ति होती है और इन तालनदियों के किनारों पर कस्बों-शहर के गटरों के मुहाने भी खुलते हैं

फिर बड़े क्रांतिकारी विचार आये कि ये होना चाहिए, ऐसे होना चाहिए.. डू द न्यू, डू द न्यू नाउ, एक नयी वेबसाईट, एक नया कैंपेन.. जिसमें सारी चीजें व्यस्थित करने के लिए जो करना है तुरंत करें. कोई भी व्यक्ति व्यक्तिगत अस्तित्व से कुछ बहुत ज्यादा होता है... कहीं भी 5 व्यक्ति मिलें और शुरू हो जाएं मोहल्ले की नियमित सफाई के लिए... गांधी की तरह. नालियों, सड़कों गलियों की सफाई के लिए ताकि मन की गलियां और रास्ते भी साफ हों। और जब सुबह सुबह सैर को निकलें तो मन में  कूड़ा कर्कट विचारों और विर्सर्जित श्रद्धा का जमावड़ा ना हो, उस पर कुत्ते निवृत्त ना हो रहे हों, सुअर ना लोट रहे हों। सुबह सुबह की सैर के दौरान जो औरतें बड़बड़ाती दिखें वो भजन गा रही हों ना कि बेटेबहूपोतेपोतियों को कोस रही हों। आदमी परेशान ना दिखे, क्योंकि अव्यवस्था ही सारी परेशानियों की जड़ है। आदमी सुबह सुबह मंत्र बड़बड़ाते दिखें... सर्वे सन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामय:... सभी सुन्दर सुखी दिखें और ​दुख किसी के हिस्से में भी ना आए..