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सोमवार, 3 मई 2010

रूठ गये गर तुम ही मुझसे, कहो फिर मेरी ठौर कहां है



चि‍त्रांकन : राजेशा

रूठ गये गर तुम ही मुझसे, कहो फिर मेरी ठौर कहां है

गले लगाया तुमने ही तो, मेरे जलन भरे सीने को
तेरे ही तो होंठ हैं प्यासे, मेरे सारे गम पीने को
दर्द भरी धड़कने मैं जी लूं, मुझमें इतना जोर कहां है।
रूठ गये गर तुम ही मुझसे, कहो फिर मेरी ठौर कहां है

इन रेशम केशों की छाया, जीवन की हर धूप भुलाती
इस चेहर की चंद्रप्रभा ही, दुनियां की हर रात सजाती
ये मुस्कान तेरी है सब कुछ, वर्ना कोई भोर कहां है
रूठ गये गर तुम ही मुझसे, कहो फिर मेरी ठौर कहां है

केवल एक तुम्हीं तो मेरे, जीवन का आधार प्रिये
केवल एक तुम्हीं तो मेरे, सपनों का संसार प्रिये
तुम ही मौन हुए तो मेरी, इन सांसों का शोर कहां है
रूठ गये गर तुम ही मुझसे, कहो फिर मेरी ठौर कहां है

सोमवार, 11 जनवरी 2010

सांस-सांस मेरे संग ही जीता, मेरा अकेलापन



कल सा नहीं, कि जाय बीता, मेरा अकेलापन
सांस-सांस मेरे संग ही जीता, मेरा अकेलापन

हो सुबह रंगीन सूरज, सूनी सफेद दोपहरें हों
सुनहली सांझ आंमत्रण दे, या चांद तारों के सेहरें हों
पा के सब कुछ रहता रीता, मेरा अकेलापन
सांस-सांस मेरे संग ही जीता, मेरा अकेलापन....

डूबे सूरज से लाली ले, लब आये कर रंगीन शाम
महीन सुरमई साड़ी में, गालों पे लाली ले जहीन शाम
कहीं ना फिर भी पाये सुभीता, मेरा अकेलापन
सांस-सांस मेरे संग ही जीता, मेरा अकेलापन

यादों के खंडहर, बीती राहें और खोई नि‍गाहें
आहें कितनी ठंडी हों, किसे मिलती परायी चाहें
खुश, अतीत में लगा पलीता, मेरा अकेलापन
सांस-सांस मेरे संग ही जीता, मेरा अकेलापन 

हमसे हुई जो दि‍ल्‍लगी,  बात उसने दि‍ल पे ली
बेजा पछताते रहे वो,  रात हमने खूब पी
 नींदों में उधड़े ख्‍वाब सीता, मेरा अकेलापन
सांस-सांस मेरे संग ही जीता, मेरा अकेलापन  

कल सा नहीं, कि जाय बीता, मेरा अकेलापन
सांस-सांस मेरे संग ही जीता, मेरा अकेलापन

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

शुरूआत तो हो

किसी से उम्मीद रहे
किसी का इंतजार रहे
जीने में मज़ा आता है
जो जिन्दगी में प्यार रहे

दो बोल अपने कहो
दो बोल मेरे सुनो
तुम भी मायूस न हो
मुझे भी करार रहे

एक अफसाना तो हो
जो सबसे कहतें फिरें
ऐसा मौसम गुजरे
कि यादों में बहार रहे

कुछ लम्हें ऐसे हों
न ताउम्र वैसे हों
जो मुड़ कभी देखें
जिन्दगी में सार रहे