फिर रमेश की शादी हो गई। बहु आई। दादी गुजर गईं। रमेश के बाल बच्चे हो गये। रमेश की मां दादी बन गईं। फिर रमेश के मां —बाप भी गुजर गये। रमेश खुद बूढ़ा हो चला। रमेश के बाल—बच्चे सुबह काम—काज को निकल जाते, देर रात घर आते।
आज सुबह कोई काम था, रमेश नहा—धोकर काम पर गया लौटा और खाना खाकर दोपहर को गाय चराने निकला। दरवाजे की चौखट पर पलट कर देखा, तो पिछली कोई याद यकायक सामने आ गई — दादी की आवाज गूंजी... ''क्यों रे रमेश! दोपहर को धुले कपड़े पहन, सिर पर तेल चुपड़ कर, गालों पर क्रीम पाउडर लगाकर मत निकला कर.. भूत चुड़ैल चिपक जाते हैं।''
गाय भैंसे भी नईं थी। बीवी, बच्चे और नये—नये लोग जिनसे वो दादी मां बाप के साथ बीते वक्त को नहीं बांच, बांट सकता था। रमेश की की भाषा और शब्द भी किसी को समझ नहीं आते थे, न उसकी बचपन से चली आ रही आदतें। अकेले रमेश के पास ही समय बचा था — वो गांव के बाहर, शहर से बची खुची जगहों पर गायें चराने जाता, जहां प्लॉट कट चुके थे।
रमेश ने खुद को ही ध्यान से देखने की कोशिश की। बचपन—जवानी गुजर गये। दादी, मां बाप गुजर गये। गांव में यार दोस्त भी गुजरने लगे। रमेश के संगी—साथी बहुत से लोग गांव छोड़ शहर चले गये। रमेश की देह पर मंडराती झुर्रियां। बाहों से छाती तक सफेद हो गये बाल। पगड़ी में लिपटा गंजा सिर। आंखों में धुंधलापन उतर आया था। वो खुद को ही, खुद से अज़नबी पाता था। वो ना तो अपने इस गये—बीते रूप रंग से परिचित था ना ही आज की दुनिया से।
फिर अब तो अक्सर ही कभी भी कहीं भी रमेश को दादी की आवाज सुनाई देती — ''क्यों रे रमेश! दोपहर को धुले कपड़े पहन, सिर पर तेल चुपड़ कर, गालों पर क्रीम पाउडर लगाकर मत निकला कर.. भूत चुड़ैल चिपक जाते हैं।'' और वो सोचता — क्या पता उसके साथ कुछ ऐसा हुआ हो।

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