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गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

लटक कर सोचते हुए मरना

वो भी घर से यही सोचकर निकला होगा कि सांझ तक 200-400 रूपये मिल जाएंगे। वो भी ये सोचकर ही घर से निकला होगा कि किसी बच्चे की कोई ख्वाहिश पूरी हो जाएगी, बीवी की कोई जरूरत या दाल-रोटी का डर कुछ टल जाएगा। पता नहीं, यह वही मोटा रस्सा था जिससे वह कई दिनों से जिंदगी और मौत का जुआ खेल रहा था या, ये मौत का सामान आज ही उसने किराये पर लिया था। ली-जीन्स का 15 बाई 50 फीट का फ्लैक्स पेस्ट कर रहा था वो, तीन कोने तो टंग गये थे। बस, एक कोना बाकी था... जिसमें मौत छिपी बैठी थी।

चित्र के लिए देखें
Google Images > Dead body on ground Or, Dead body on Floor

कुछ लोग धीरे-धीरे मरते हैं, लोग उनकी परवाह ही नहीं करते... पहले पहल तो सबको तकलीफ होती है। काॅलेज से निकले किसी ताजा छात्र को 8 घंटे किसी नियत जगह पर बैठाइये, उसकी गर्दन में अकड़न होती है, पैर कसमसाते हैं, बाजूएं... अंगड़ाइयों से भर जाती हैं, सिर फटने लगता है... और सवाल बार-बार उठता है... क्या ऐसा जिंदगी भर करना होगा... और फिर वह खुद को तसल्ली देता है... नहीं बस कुछ दिन की बात, यही तो संघर्ष है जिंदगी का, जीवन इक संघर्ष है... आदि। पर महज 5 दस साल, शादी बच्चे हुए कि सब खत्म। पता ही नहीं चलता यातनाओं का। सब उलट जाता है... किसी तयशुदा जगह पर 8-10 घंटे बिताने की ऐसी लत पड़ती है कि 2-चार साल में, यदि कोई ऐसा दिन आये कि अचानक किसी वजह से कारखाना या कार्यालय बंद हो तो इस कर्मचारी को सूझता ही नहीं कि ऐसे अपवाद वक्त का क्या करना है? पागल हो उठता है, परेशान हो जाता है। इस तरह लोग 60 बरस तक निकाल देते हैं.. सिगरेट की तरह, रोज आठ घंटे.. वक्त फूंकने की आदत। पर कुछ लोगों को जैसे इलेक्ट्रिशियन, ऊंची जगहों पर मजदूरी करने वालों, जोखिम भरे धंधों में लगे लोग... मौत अचानक से कुछ ज्यादा अचानक आती है... 60 साल तक मुर्दानगी घसीटे बगैर। 

बेसमेंट में एयरकंडीशंड, साफ सुथरी जगह. कांच के पार्टीशन्स से बने दफ्तर में 20-25 लोग काम में मशगूल थे... सभी लोग अपने जिम्मेदारियों के प्रति सचेत थे कि नौकरी जारी रहनी चाहिए, ऊपर बैठे अधिकारी में कोई शिकायत ना पैदा हो जाए... इस बार की तनख्वाह से इतने खर्च निकल जाएंगे। बस दिन निकालो... ये साल निकल जाए। कहीं दूसरी जगह जुगाड़ भी तो नहीं हो रही। कम्बख्त उसको तो इतनी तनख्वाह मिल रही है, करता क्या है वो साला? साला कमीना है .. करना-धरना कुछ नहीं...बकर करवा लो। और वो मटका तो मटकने के... कम्बख्त ने बाॅस की दुखती रग पकड़ रखी है। 

कोई चीज धड़ाम से नीचे गिरने की आवाज आई। यक-ब-यक किसी कर्मचारी का वाॅकी-टाॅकी बजा। कुछ लोग बाहर दौड़े... मैं भी सीट से उठा और बाहर की ओर लपका... । जिस दरवाजे से हम अंदर दफ्तर में घुसते थे उसी दरवाजे के बाहर खुलने की हद में ही एक जिस्म फैला पड़ा था... गले में.. मोटा रस्सा जो टूटा था और 4 मंजिला ऊंचाई से मौत ने उसे लपक लिया था। ठुड्डी के नीचे का हिस्सा कटा सा... जैसे किसी बकरे की गर्दन आधी ही काट छोड़ दिया गया हो.. और बकरा भी मौत को चकमा देने की कोशिश में बेहोश सा हो गया हो। किसी सुरक्षाकर्मी ने नाक के सामने हाथ रखकर उसके जीने के अंदाजे लगाए.. शोर मचाया 108 एम्ब्यूलेंस बुलाओ... जल्दी! जल्दी! पर सामने लाश में बदलता एक जिस्म था.. मौत को देखती पथराई आंखों ने वक्त कुछ पल के लिए रोक दिया था कोई सुनता ही ना था... किसी ने उसकी कलाई पकड़ी... और बोला नब्ज चालू आहे...जल्दी करो आॅटो लाओ... तभी उसका साथी शायद उसने ऊपर रहते हुए रस्सा पकड़ रखा था आया और उसके छूकर रूंआसा सा.. नहीं रोने ही वाला था कि किसी ने उसे झिड़क दिया... एक आॅटो वाला आया...जल्दी जल्दी! जल्दी... एक ने कंधों की तरफ से, एक ने टांगों की तरफ उसे उठे उठाया। मौत ने भारी कर दिया था... या मौत से अजनबी छुअन बड़ी ताकत नहीं लगाना चाहती थी.. उसे उठाने पर। एक तीसरे की आवाज आई उसकी गर्दन को लटकने मत दो सहारा दो... तीसरे ने पैरों की तरफ से सहारा दिया.. एक मामूली गार्ड, ऊंचे वाले गार्ड से इस अंदाज में बोला... जैसे कह रहा हो पकड़ ले साले बीच से..तू मरेगा तो घसीट कर ले जाउंगा। उसकी टांगे बाहर ही लटक रहीं थीं। लोग ले गये... उस अस्पताल में जहां तक पहुंचने से पहले ही आम तजुर्बाकारों ने उसे मृत घोषित कर दिया था।

उस जिस्म के आॅटो में लोड होते-होते माॅल मैनेजमेंट करने वाली कंपनी में अफरा-तफरी मच गई। पुलिस केस, कौन फंसेगा कौन बचेगा, उससे दस्तखत ले लिये गये थे या नहीं... उतनी ऊंचाई पर काम करने से पहले उससे लिखवा तो लेना था। किस कंपनी का आदमी था? किसने उसे काम पर लगाया? कौन था उसके साथ? उस कंपनी के साथ कोई एमओयू था या नहीं? एमओयू अपडेट है या नहीं? जल्द फाईल निकालो? गार्ड को बोलो जल्दी उन खून के छींटों को साफ करने को? कोई भी दाग पड़ा नहीं दिखना चाहिये? भीड़ में बात नहीं फैलनी चाहिए। भास्कर वालों को तो मौका मिल जाएगा? पुलिस को फोन लगा लेने और नहीं लगाने वाले दो भागों में बंट गये। तीसरा धड़ा कभी फोन लगा लेने वाले के पक्ष में हो जाता कभी फोन ना लगाने के पक्ष में। 5-7 लाख से कम मंे तो क्या बात बनेगी? एक मुर्गे जैसा पला-पलाया जवान कह रहा था, पुलिस वालों का फोन आ गया है, कह रहें आ कर मिल लो,,, बैठ कर बात करो समझे ना... उसने अबूझ स्माइली सी आंख मारी। मैनेजर एमओयू के पेपर्स के पीछे पड़ा था। पेपर निकाले गये एमओयू पुराना हो गया था, उसका नवीनीकरण किया ही नहीं गया था। सारी आवाजें शोर के प्रथम तल से खुसफुसाहट के बेसमेंट तक आ ठहरीं थीं और अब ज्यादा स्प/ट सुनाई दे रहीं थीं। मैंने एक आदमी से पूछा- क्या वो वाकई लाश हो गया? वो बोला-हां पक्का, कन्फर्म। अंग्रेजी में कन्फर्म सुनकर मुझे भी तय हो गया कि मैंने उस जिस्म को वाकई मरने से पहले फड़कता देखा। सारी बीमारी में मां को तड़फता देखा पर मौत के वक्त इधर-उधर हो रहा। पर इसे तो बिल्कुल... हां मैंने देखा ना।

कुछ साल पहले शहर में बन रहे पहले माॅल में एक क्रेन से, एक पुताई करते समय और एक आदमी शीशे लगाते वक्त.. गिर मरे थे। पिछले ही दिनों उसी माॅल के बेसमेंट में में किसी जीजा ने साली की चाकुआंे से गोदकर हत्या कर दी थी। उस माॅल का मालिक भारत के नं 1 अखबार का मालिक था। सारे भारत में वह अखबार निकलता था। इतना फैला था कि दो चार दस मौतें उसमें आसानी से समा जातीं थीं बिना निशान छोड़े। बाहर से आया प्रतिद्वंवी अखबार ही उन मौतों को जूम करके दिखा पाया था। प्रतिद्वंवी अखबार को जनता के सामने नि/पक्ष बनना था। उसका शहर में कोई माॅल नहीं था सो वो सारी दुर्घटनाओं, मौतों को छापता था। शहर के किसी भी माॅल की घटना को... चाहे तो वो विज्ञापन दे...या...? 

पुलिस, मीडिया में फोन घुमाते-घुमाते.. मौत के लाल छींटे पोंछते-पोंछते मैनेजमेंट वालों को पसीने आ रहे थे। बाहर शोर सुनाई दिया मजदूर की लाश लिए... मजदूरों का एक जत्था आया था. मैंने महसूसा.. उस शोर को साइलेंसर पी गये। बात कमिश्नर तक पहुंच गई थी। रकम मोटी हुई जा रही थी। मैनेजमेंट को माॅल मालिक को जवाब देना था... मृतक की बीवी, बच्चों की जिंदगी सवाल बनी रहे तो बनी रहे। माॅल साला वैसे ही घाटे में था ऊपर से इस मनहूस को यहीं मरना था? 

रस्सा उसकी उम्र थी...वो वहीं से टूटा जब उसकी उम्र खत्म हो गई थी। किसी का रस्सा कितना ही मोटा क्यों ना हो... भाग्य की सिल से रगड़ खाता हुआ, कभी भी टूट सकता है... या ऊपर खड़े दोनों में से जिसने पकड़ रखा है वो लापरवाह हो सकता है? या आपकी बेहोशी दारू में दिखी लहरों को सच कर सकती हैं... सारा शहर तो डोलता है। आप भी मानेंगे.. यह खयाली प्रेमिका के लिए लिखने वाली लाईनों से बहुत ज्यादा बेहतर विषय है। प्रेमिका अगर निवस्त्र हो पुकारे तो भी बेवफा है, धोखा है... मौत सच है। अगर जवान होने का मौका मिले तो मौत को प्रेमिका से पहले जानना चाहिए। वही तो उम्र होती है... जब जिस्म में फट पड़ने को तैयार हो जिंदगी... और हमें मौत के हिंडोलों में बैठने का स्वाद चखना चाहिए । इंसान की प्रजाति की उन्नत किस्में जवानी में ही मौत को जान पाईं। कई तो जवानी में ही जिंदगी को निर्वस्त्र विलाप करता छोड़ गईं। मौत की खूबसूरती से किस बला की तुलना... जो जिस्म बीस का हुआ है...50 का भी होगा। और 50 के लक्षण बड़े डरावने हैं... आप बोटोक्स से चेहरे कि कितनी लकीरें छिपा लेंगे, किस-किस जगह के बाल सफेद होने से बचा लेंगे। ये बाल इच्छाओं की तरह हैं, अनचाही जगहों पर आते हैं.. घने काले, लम्बे-लम्बे। और जहां चाहो, वहीं धूसर, सफेद हो जाते हैं... उड़ जाते हैं। 

मैंने तुम्हें बताया क्योंकि मुझे लगा कि उसके साथ ही कुछ हिस्सा मैं भी मरा। ‘मैं’ जो मानता ही नहीं...। लगभग हर दिन ही दूर, पास और सामने ही... कई हकीकते गुजरती हैं पर जागता ही नहीं। गलतफहमियों के कीचड़ में कमल की तलाश। कि दीपिका पादुकोण/प्रिंयका चोपड़ा ने आज सेक्टर का नंबर पूछा है, कल मेरे घर का पता पूछेगी... परसों फोन नं... और.... रोज एक नया ख्वाब। एक बेचैनी जो जिस्म में पैदा होते हार्मोन्स पर विवेक की हुकूमत खो बैठती है। आदतों में जीते-जीते हम रोबोट बनाने लगते हैं और रोबोट्स के साथ रहते-रहते हम रोबोट्स हुए जाते हैं। हमें अपने पतन पर गर्व है। हम चाहते हैं कि इस ओर के 125 करोड़ लोगों पर अंग्रेज आज भी राज करते तो बेहतर होता। कई सौ साल की गुलामी की यंत्रणा के अनुभव, हमारे जीन्स से बस 100 सालों में गायब हो चले हैं। 
शायद किसी संवेदनहीनता की कमी थी। नजफ भट्ट 4 दिन की छुट्टी के बाद काम पर लौटा था। उसके भाई की शादी थी। बरफी लाया था..दरवाजे पर साफ—सफाई के बाद बर्फी बांटी गई। लोग नई लाश, अभी-अभी देखी सुनी मौत को.. बरफी के स्वाद के साथ पचाने की कोशिश कर रहे थे।

माॅल प्रबंधन खुश है ... बस इतने से ही बात बन गई। अब सीख मिली कि ऐसा हादसा होने से पहले क्या होने देना है और बाद में क्या करना है। पुलिस खुश है कि माॅल तरक्की कर रहा है वो अब 10 लाख तक निवेश कर सकता है पुलिस कल्याण के लिए। वो जरा सी चूक के लिए अब पहले से कहीं ज्यादा तैयार है। निकम्मे झोंपडि़ये शहर को गंदा करने वाले निरोध का इस्तेमाल क्यों नहीं करते? साले बद-बेक्ल अपनी शुक्राणुओं को फैलाये ही चले जाते हैं...जैसे ये इतने कीमती हों कि इनकी मां को इब्नेबतूता आंइस्टीन ने...। 

नहीं भाई... सब जुड़ा हुआ है। यह प्रलाप नहीं... जरा ऊंचे से देखिये. चींटी जैसे लोग... 2डी स्क्रीन पर रंेगता हुआ सारा एक ही शहर। उसी शहर का एक महीन सा काला बिंदु ... सभ्यता के ऊंचे माॅल पर 15 बाई 50 फिट का फ्लैक्स टांगता हुआ... वक्त के उच्च तापमान से पिघल कर गिर पड़ा था। फ्लैक्स का तीसरा सिरा हवा में है... उससे लाल रंग के छींटे बरस रहे हैं, मुझे आज रात नींद नहीं आई... क्या आपको ये छींटे महसूस नहीं होते?

सोमवार, 31 मार्च 2014

दिल की धोखा खाने की आदत


जिधर रोका वहीं जाने की आदत
दिल की धोखा खाने की आदत

उम्र ने कहा दानां बनो ना
हमें नादान कहाने की आदत

बिना वजह रूठ जाते हैं वो
जाने है मेरी मनाने की आदत

अजनबी ले लेतें है मुझसे वादा,
शक्ल पर चिपकी, निभाने की आदत

सबको पता,  कब.. होंगे कहां
जिंदा घर, मुर्दा श्मशान जाने की आदत

तुम तो कभी... आवाज दोगे नहीं
हमें ही सुनने-सुनाने की आदत

तेरी हकीकतों से रूबरू तो हुए हैं
... जाएगी जाते जाते ख्वाब सजाने की आदत

सारी दुनियां खाक होनी ही है
...  हमें जलने, उन्हें जलाने की आदत

पता नहीं रूह का, फिर होता होगा क्या?
जिस्म की कभी भी, मर जाने की आदत

बुधवार, 23 अक्टूबर 2013

जो अभी चल रही है..

बस यही दुख था...
कि मैं जब भी... जहाँ था
वहाँ मुझे कुछ घंटे या...
महीने भर ही सुख था

मैं वहां सालों रुका रहा
मुझे वहां सालों रूकना पड़ा
और आज मैं
बीता हुआ
बड़ा ही गया...और बीता हुआ
महसूसता हूं...
कि मैं ठहरा ही ठहरा
चला ही नहीं..भटका ही नहीं..
ना मेरे खयाल में कोई मंजिल आई
ना मुझे कोई राह सुझाई

तो क्या वक्त के मुताबिक चलने का मतलब
ठहरना कदापि नहीं होता?

या ठहरने का
वर्ष नाम की इकाई से कोई संबंध नहीं?

कितना चलना चाहिए?
कितना रूकना चाहिए?
कितना अकड़ना चाहिए?
कितना झुकना चाहिए?
कितना रूपये काफी होते हैं...जीने के लिए?
कितना रूपया काफी होता है...मरने से बचने के लिए?
क्या 'रोजी—रोटी' भर..जीवन का लक्ष्य हो सकते हैं?
या किसी दुनियां भर का एक चक्कर लगा लेना...
दुनियां भर की यादों से अपना इतिहास सजा लेना
यही जीवन का चरम है...
और अगर ऐसा नहीं..
दुनियां कभी भी कुछ खास होती नहीं...
इसके बकवास और निरर्थक होने में कभी कोई कमी नहीं होती
तो वैसी ही सटीक है..
जो अभी चल रही है..

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

हल नहीं ढूंढा करते



खाक में गुजरा हुआ कल, नहीं ढूंढा करते
वो जो पलकों से गिरा पल नहीं ढूंढा करते

पहले कुछ रंग लबों को भी दिये जाते हैं
यूं ही आंखों में तो काजल नहीं ढूंढा करते

बेखुदी चाल में शामिल भी तू कर ले पहले
यूं थके पैरों में पायल नहीं ढंूढा करते

जिस ने करना हो सवाल आप चला आता है
लोग जा जा के तो साहिल नहीं ढूंढा करते

ये हैं खामोश अगर इस को गनीमत जानो
यूं ही जज्बात में हलचल नहीं ढूंढा करते

पीछे खाई है तो आगे है समन्दर गहरा
मसला ऐसा हो तो फिर हल नहीं ढूंढा करते

बुधवार, 11 सितंबर 2013

जिंदगी को यूं ही व्यर्थ गुजारना


सबसे ज्यादा दु:ख निरन्तर मानवता में हो रहे ह्रास को वहाँ देखकर होता है... जहाँ लोग उन नौकरियों से जकड़े बैठे हैं जो उन्हें पसंद नहीं हैं लेकिन क्योंकि उनमें भय है कि कहीं इनसे भी घटिया नौकरी ना करनी पड़े. लोग दिमाग से खाली हो गये हैं. वो कांपते हुए जिस्म भर हैं जिनमें डरा हुआ और आज्ञाकारी मन है. उनकी आंखों से रंगत चली गई है. उनकी आवाज भरभराई हुई है और भद्दी है.. यही हाल उनके शरीर, उनके बालों, उनके हाथों के नाखूनों, उनके जूतों और यही हाल उनके सारे किये गये कामों का भी है.

तो मेरी किस्मत थी कि अंतत: मैं इन जगहों से बाहर निकल गया, इस सब में कितना समय लगा... ये बात बेमायनी है.. यह सब जान मुझे एक तरह का आनंद महसूस होता है, किसी चमत्कार को देखने जैसा आनंद. अब मैं एक पुराने मन और पुरानी देह से लिख रहा हूं.. उस पुराने समय के बहुत परे से..जबकि आज भी कई आदमी उसी पुराने ढर्रे.. उन्हीं सब चीजों पर ही निरन्तर चलने की सोचते हैं.. जब जबकि मैंने बहुत देरी से शुरू किया.. मेरी खुद की इच्छा है कि अब में इसी राह पर चलूं..अब जबकि शब्द लड़खड़ाने लगे हैं.. मुझे सीढ़ियां चढ़ने के लिए रेलिंग की मदद लेनी पड़ती है.. अब मैं एक पेपरक्लिप की मदद से चिढ़िया नहीं बना पाता, मैं अभी भी महसूस करता हूं कि मुझमें कुछ यादें अभी भी बाकी हैं.. ये मुद्दा नहीं कि में अब मैं उस सबसे कितनी दूर आ गया हूं... मैं अपनी हत्या होने से बच पाया हूं.. कई ​उलटफेर गड़बड़ियों और कड़ी मेहनतों से गुजरा हूं और उस रास्ते पर आ पाया हूं कि एक भली मौत गले लगा सकूं.

जिंदगी को यूं ही व्यर्थ गुजारना भी मूल्यवान है, यदि यह सब स्वयं मेरे लिए ही हो.. मैं अपने लिए ही करूं...

Author Charles Bukowski in a letter to a friend about finally “breaking free” of his job and being able to write :
And what hurts is the steadily diminishing humanity of those fighting to hold jobs they don’t want but fear the alternative worse. People simply empty out. They are bodies with fearful and obedient minds. The color leaves the eye. The voice becomes ugly. And the body. The hair. The fingernails. The shoes. Everything does.

So, the luck I finally had in getting out of those places, no matter how long it took, has given me a kind of joy, the jolly joy of the miracle. I now write from an old mind and an old body, long beyond the time when most men would ever think of continuing such a thing, but since I started so late I owe it to myself to continue, and when the words begin to falter and I must be helped up stairways and I can no longer tell a bluebird from a paperclip, I still feel that something in me is going to remember (no matter how far I’m gone) how I’ve come through the murder and the mess and the moil, to at least a generous way to die.

To not to have entirely wasted one’s life seems to be a worthy accomplishment, if only for myself.

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

उम्रें

कम उम्र किशोरों में उम्र के बारे में जो ख़याल होते हैं, उनमें ज्यादा मतभेद होते हैं। जैसे जैसे उम्र बढ़ती है यह खयाली मतभेद कमतर होते जाते हैं। साठ साल का आदमी 50 साल वाले से ज्यादा पूछपाछ नहीं करता... इंतजार करता है, वो 10 साल का फासला यूं ही गुजर जाता है।
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उम्र के फासलों के धोखे में रहना 
ख्वाबों—खयालों के झरोखों में रहना
दानापन नहीं है

जिस्म की इमारत बनते—बनते ही
खंडहर भी होने लगती है

तो छत खुली रखो
अक्सर टहलो
और जब तक इमारत राजी हो
खुलापन संजोओ

फिर मैदानों की ओर लौट चलो.

वो लम्हा खूबसूरत है जहां
किसी भी दिन के शिखर पर
एक नजर में ही
सारे उतार—चढ़ाव दिखते हैं

जहां से दिखता है कि
उम्र के उतार—चढ़ावों की ओट में
झूठ के सिवा कुछ नहीं है।

बचपन.जवानी.बुढ़ापा नादानी
सब एक साथ, सांसों में
आता जाता है... हर पल

दाने लोग
उसी पल को 
जीने की बात करते हैं.

रविवार, 23 जून 2013

एक इंटरनेट दोस्त से कहीं ज्यादा जिगरी...कहीं अपना

कल परसों ही जब गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुले तो मैंने 5 साल की तोषी से सुना...., उसकी मैडम कह रही थी कि किसी उत्तरखांड नाम के देश में बहुत सारे लोग बादल फट जाने से मर गये, उसने पूछा उत्तरखांड नाम का देश, हमारी सोसायटी से कितनी दूर है? बादल फटना क्या होता है? जब ढेर सारा इकट्ठा पानी गिरता होगा तो नहाने में और मजा आता होगा... बाढ़ में कार बहती होगी तो वो अपने आप ही चलती होगी.. पेट्रोल लगता ही नहीं होगा... आदि-आदि।

इस तरह उत्तराखंड जैसे हादसों के बाद मैंने अक्सर सोचा कि मुझे कितने किलोमीटर तक रहने वाले इंसानों के बारे में सोचना और उनके बारे में चिंतित होना चाहिए। क्योंकि बीवी बच्चों और दो चार रिश्तेदारों के बारे में ही हम कुछ कर सकने की जिम्मेदारी महसूस कर पाते हैं, तो क्या मुझे अपने परिवार के बारे में ही सोचना-समझना-करना चाहिए? इससे ज्यादा मोहल्ले की गतिविधियों में शामिल होना चाहिए? या जिस दिल्ली मुम्बई शहर में काम कर रहे हैं वहां के निवास स्थल के आसपास और स्थानीय गतिविधियों में, जहां शारीरिक उपस्थिति दर्ज कराई जा सके वहां के बारे में चिंतित होना, समझना, करना चाहिए? या फिर दूर 5000 कि.मी. दूर जापान में आये सूनामी में परमाणी विकिरण के खतरों के बारे में, दक्षिण अफ्रीका की भूख के बारे में, अमरीका के ऐश्वर्य-उन्माद-खोखली जीवनशैली से तंग लोगों के बारे में सोचना चाहिए जो आॅटोमैटिक गन से भीड़ पर गोलियां चलाने लगते हैं?

फिर लगा कि समाधान तो सामने ही दिख रहा है.. उत्तराखंड में स्थानीय लोगों ने ही बचाव कार्य किया. जापान में आये भूकंप-सूनामी में भी स्थानीय लोगों ने ही सब कुछ को महीनों में ही पटरी पर ला दिया... इजराइल लेबनान-फिलिस्तीन की समस्या भी स्थानीय लोगों द्वारा ही बनाई रखा जी सकती या सुलझाई जा सकती है... कश्मीर की समस्या भी आर पार के स्थानीय लोगों द्वारा ही बनाई रखी या सुलझाई जा सकती है...

क्योंकि किलोमीटर्स दूर बैठे लोग किसी फेसबुक स्टेटस या पेज को लाइक कर सकते हैं ज्यादा से ज्यादा कमेंट कर देंगे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर देंगे.... ज्यादा से ज्यादा किसी चुनाव में किसी पार्टी को वोट कर देंगे... बाद में जब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर मनमानी करने वाले मनमोहन बैठ गये, तो फिर... वही सालों इंतजार करने वाले बेनाम आम आदमी का रोल आपको ही निभाना पड़ेगा। 

इस सारी कवायद का सार यह है कि इंटरनेट पर हजारों नेट मित्रों में सक्रिय रहकर भी कोई परिणाम नहीं निकलता, और मोहल्ले में दो चार लोगों के सक्रिय सहयोग से इतनी समस्याओं का समाधान हो सकता है कि आप किसी इंटरनेट वेबसाईट पर लाखों लाईक्स और कमेंट पा सकें, सो स्थानीय स्तर पर, शारीरिक संपर्कों में ज्यादा-ज्यादा सक्रिय रहिये... शारीरिक स्थानीय स्तर के संपर्क टूट रहे हैं और आत्महत्या के केस बढ़ रहे हैं... । लोग इंटरनेट पर हजारों मित्रों से 24 घंटों जुड़े हैं पर अंदर ही अंदर खोखलापन-बेचैनी... भाई.बहिन.मां.बाप से दिल की बात नहीं कर रहे... रोज दो चार आत्महत्याओं की खबर पढ़ने को मिलती है... इस हिसाब से सप्ताह में 30-40 महीने में 200 लोग मर रहे हैं... क्या ये उत्तराखंड में बादल फटने, जापान में भूकम्प सूनामी, चीनी सीमा पर सेना के खड़े होने, कश्मीर समस्या और दक्षिण अफ्रीका में भुखमरी की समस्या से ज्यादा प्राथमिकता वाली.. जरूरी चीज नहीं है.... 

आप यहां तुरंत... अभी सक्रिय हो कर इंसानियत को बचा सकते हैं... बिना इंटरनेट कनेक्शन के और प्रतिसाद भी हवाहवाई..ख्वाबख्याली नहीं.. अभी यहीं तुरंत मिलेगा...एक इंटरनेट दोस्त से कहीं ज्यादा जिगरी...कहीं अपना... मां बाप भाई बहिन बुआ मौसी चाचा चाची जैसे मजबूत रिश्ते... जो किसी भी निराशा की गहरा दल दल बनने की संभावना ही खत्म कर दें, जो आपको आत्महत्या के मगर के मुंह में ले जाये।

मंगलवार, 28 मई 2013

ज़िंदगी का कोई सिर पैर नहीं है..

जब लिखने का मन होता है,फुर्सत नहीं होती. जब फुर्सत होती है, सूझता नहीं कि क्या लिखें? कुछ बेहतर लिखने के लिए समझ और फुर्सत का संयोग होना आवश्यक है.
एक थे आशी जी. जब कोई व्यक्ति 'है' होता है तो उसके बारे में लिखने में बड़ी झंझटें होती हैं, जब कोई आम व्यक्ति 'थे' हो जाता है,तो उसके बारे में बेधड़क लिखा जा सकता है. खास लोग-- मरने के बाद भी अपनी आपत्तियॉं बनाये रखते हैं. 


नहीं, अभी सोचना नहीं है
किसी दूजे इंसान के बारे मे
नहीं, अभी सोचना नहीं है
किसी कुदरत के बारे में
ना ही सोचना हैा
किसी खुदा के बारे में

हालांकि कुछ भी तय नही है
फिर भी,
नहीं, अभी फुर्सत नहीं हैं
कल हो ना हो
कल का ख्याल है
क्या पता कल हो, ना हो
आज सा, पहचाना सा
रोटी कपड़ा मकान दुकान धंधा पानी
इनकी निरंतरता
क्यों इतनी जरूरी लगती है
कि पिछले छत्तीस बरस से
मैं इन्हीं के इंतजाम में खत्म ​हूं
असल में

मैं पांच अरब दुनियांवालों से
अलग थोड़े ही ना हूं

किसी को क्या सूझता है
इसका पता
इसी बात से चल जाता है
कि वो अक्सर क्या करता है...
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कई तरह की इन्द्रियां होने के बावजूद हम देखने, सुनने, कहने, सोचने, समझने सब चीजों में अनुमान ही लगा पाते हैं... 

रिश्तों को ही लीजिए जिस मां बाप के साथ मैं बरसों रहता हूं, उनके बारे में भी बहुत कुछ अनुमान ही होता है। यदि आप उनके बारे में बहुत कुछ पक्का कह सकते हैं.. तो ये सब वो बातें होती हैं जो उनकी आदते हैं.. जो आपके साथ के दौरान जाहिर हुईं, ना कि वो जो किन्हीं और तरह की परिस्थितियों में बदल जाएंगी। ऐसा ही इंसान के सामाजिक रिश्तों के बारे में भी है। ऐसा ही हमारे जीवन में आने वाले नये और पुराने लोगों के बारे में है। हम टटोलते— टटोलते हुए चलते हैं... सुनने, सूंघने, छूने और रोजमर्रा के घने काले अंधेरे में आंखे फैला कर देखने की कोशिश करते हैं.. यहां तक कि हम अतीत के अनुभवों को भविष्य में प्रक्षेपित करते हुए अपने निजी तकिया कलाम या, मत भी गढ़ लेते हैं. उन्हें अपनी आगामी जिंदगी के लिए द्वार पर बैठा देते हैं, कि अब कोई.. इस टाईप का आये तो देख लेना. ये जवाब देकर चलता करना या, ये कहकर इंतजार करने को बोलना.. या ये कह के वापिस बुलाना.. बोलना मैं पक्का मिलूंगा।

हम आंखों से देखते हुए भी वह नहीं देखते जो हकीकत है, कानों से वो नहीं सुनते जो हकीकत है, मन से वह नहीं महसूस करते जो हकीकत है, हाथों से वह नहीं छू पाते जो हकीकत है, पैरों से वहां तक नहीं पहुंच पाते जो हकीकत है.. एक अनजानी सी दशा में ही डोलते रहते हैं...

मैं आधी रात को सरकारी कुर्सी पर बैठा हूं। चारों तरफ से मच्छरों का धावा है। पैरों से चलना फिरना है सो ढंक नहीं सकते, हाथों से लिखना है इन्हें भी ओढ़ाया नहीं जा सकता.. आल आउट जैसे उपाय जहरीले हैं.. इनके धुंए से कैंसर हो सकता है। मच्छर भगाने वाली क्वाइल से अस्थमा होता है.. आडोमास से त्वचा संबंधी रोग..मच्छरदारनी के अंदर लेपटॉप लेकर बैठो तो ... लेपटॉप पर कुछ टाईप करना...मजा नहीं आता। आपको लिखना भी है और समांतरत: मच्छरों से भी निपटना है। कुछ मच्छर मारे जायेंगे.. कुछ कुछ खून पियेंगे..कुछ उन विचारों को खा जायेंगे जिनका आप रातभर इंतजार करते रहे।

हम अपनी मजबूरियों से डरते हैं, इसलिए नफरत करते हैं.. उनसे उबर नहीं पाते। मजबूरियां मतलब वो छोटे छोटे सुख सुविधाएं 'जिनका होना ही' हमें जिंदगी लगता है.. इस सुरक्षित संरक्षित रहने की कोशिश में ही हम नर्क गढ़ लेते हैं. नहीं तो औसत 65 साल की उम्र मिले तो क्या आप रोज़ाना आठ दस घंटे कोई फालतू सी नौकरी करेंगे? 24 घंटों का बंधा—बंधाया रूटीन बनायेंगे?

ज़िंदगी का ही कोई सिर पैर नहीं है..फिर शुरू कहां से मानना और खत्म कहां करना...?

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

.... नहीं चाहते हो.


ज़माने भर से दिल्लगी और हमसे बेरूखी क्या है,
यूं तो तुम कहते हो, कि हमें आजमाना नहीं चाहते हो.

अपने किस काम में लाओगे, बता दो मुझे ऐ दोस्त
ये माना कि तुम मेरी दोस्ती, गंवाना नहीं चाहते हो.

यूं जो, ढली शाम, गली से बचते हुए तुम निकले हो
क्या कयामत तलाश है कि, घर जाना नहीं चाहते हो.

ये जो अहसान किया करते हो दीवाने को शैदाई बुला
ये कैसी अदा, हारे हुए को हराना नहीं चाहते हो.

यूं कहां खो गये? क्या हो गये? कि खबर ही नहीं
तुम्हारी नज़र कहती थी, रोना-रूलाना नहीं चाहते हो.

सोमवार, 2 जनवरी 2012

पिछली सदी में.. और इस पल


 सदी नहीं, बरस महत्वपूर्ण होता है
बरस नहीं,  महीना खास होता है
महीना नहीं, हफ्ता विशेष होता है
हफ्ता नहीं, कोई दिन होता है बहुत जरूरी
दिन नहीं, किसी पहर को महसूसना स्पेशल है
किसी पहर में भी..
कोई पल ही चरम होता है...
इसलिए मुझे अच्छी नहीं लगती
किसी बीते या आने वाले बरस की बात

तुम अतीत से संचालित हो
तुम मुझसे वैसा ही व्यवहार करोगे
जैसा तुमने मुझे
किसी बीते पल महसूसा।
अभी बीते पल जैसा या
सदियों पहले जैसा।

आता कल तुम देख नहीं सकते
और इस पल के हिसाब से व्यवहारना
सच,
सदियों में कोई 'एक' ही सीख पाता है।
सच,
'एक' होना बहुत मुश्किल है।

सोमवार, 21 नवंबर 2011

परिंदे की मौत

जिन्दगी एक खुजली का नाम है। जब आत्मा को खुजली होती है तो वो किसी गर्भ में उतरती है और जिन्दगी की नौटंकी शुरू होती है। करोड़ों योनियां (जून या जन्म) हैं, करोड़ों भूमिकाएं। मुझे याद नहीं कि, यह तय करना अपने हाथ में या नहीं कि आप कौन सी भूमिका चुनेंगे। दुनियां में कुछ लोग तो ऐसे दिखे जो भूमिका उन्हें मिली वो भी नहीं निभाते, हद ये कि.... कुछ अपनी भूमिका और चरित्र से दुखी होकर आत्महत्या कर लेते हैं। कुछ जो भूमिका मिली है उससे इतर भी फटे में टांगें डालते रहते हैं, ऐसे लोगों की हाथों में 11 अंगुलियां होती हैं। एक अतिरिक्त उंगली अतिरिक्त जगहों पर डालने के लिए, जो शरीर पर नजर नहीं आती पर उनके चरित्र का अभिन्न अंग होती है। खैर मैं शायद भटक रहा हूं, मुझे आपको कुछ पलों का छोटा सा किस्सा सुनाना है, कहानी नहीं। कहानी की परिभाषा ये है कि - वो किस्सा जो लम्बा लगने लगे उसे कहानी कहते हैं। कब कैसा लगता है इसे मापने के लिए आपका जिन्दा होना जरूरी है। यह किस्सा जिन्दा रहने का ही है।
 
एक समय रामाधार नाम का एक आदमी बेचैन था, या बेचैन होने का दिखावा करता था। क्योंकि उसके पास आधारभूत रूप से... बेसिकली वो सब था जो किसी दुनियांदार के पास होता है। मां बाप बीवी बच्चे, इन सबके लिए पैसा और कभी कभी फैशन में आ रही चीजों... जैसे पिज्जा बर्गर का स्वाद लेने का हौसला। रामाधार को खुजली हुई कि उसकी छोटी बिटिया 4 की एक छोटा सा पंछी पालने की मांग जायज है। उसकी छोटी बिटिया को पड़ोस का पंचू चिढ़ाता था क्योंकि उन्होंने एक तोता पाल रखा था, इसलिए वो रामाधार को पंछी लाने को कहती, और बड़ी बिटिया मीतू 10 उसकी मांग का समर्थन करती।
दरअसल यह बात बड़ी उलझी है कि आदमी में होने वाली कौन सी खुजली, किस खुजली से जुड़ी है। रामाधार ने बचपन में एक कुत्ता पाला था, और कबूतर पाले थे। कुत्ते को उसके पिताजी ने घर से निकलवा दिया था। रामाधार खुद उसे एक सुनसान में, भरी सर्दी के दिनों में एक पुलिया के नीचे छोड़ आया था। उसके पाले कबूतरों को उसकी अनुपस्थिति में एक बड़ा सा बिल्ला खा गया था।
शायद इस वजह से उसने अब 40 बरस की उम्र में दो परिंदे खरीद लिये। बड़े दिनों की टालमटोल के बाद एक दिन बाजार जाकर एक नीली और एक हरी चिडि़या जिसे अंग्रेजी में लवबर्डस कहते हैं का जोड़ा खरीद लिया। उसका खयाल था कि कुछ दिन बाद जब छोटी बिटिया गुन्नी का दिल बहल जायेगा तो चिडि़यों को पार्क में ले जाकर उड़ा देंगे। इससे परिंदे पालने की खुजली दूर हो जायेगी, परिंदे सैयाद से छुड़ाकर उड़ा देने पुण्य भी मिलेगा। जब चिडि़यों का जोड़ा घर लाये तो गुन्नी बहुत खुश हुई, बड़ी मीतू को भी मजा आया। बीवी को लगा कि बहुत पैसे खर्च कर दिये इतने में तो एक अच्छा पर्स आ जाता। खैर दिन निकलना शुरू हो गये।
रामाधार ने इंटरनेट पर देखा कि लवबर्डस कैसे पालते हैं, उनकी जरूरते क्या होती हैं। पर सबसे बड़ी जरूरत रामाधार जानता था (उन्हें पिंजरे से उड़ा कर मुक्त हवा में छोड़ देना) जो इंटरनेट पर लवबर्डस को पालने वाली वेबसाइट्स में कहीं नहीं लिखा था।
सप्ताह बाद रामाधार को लगा कि पिंजरा छोटा है, अगर कुछ सप्ताह या महीनें इन्हें घर पर ही रखना है तो पिंजरा बड़ा होना चाहिए ताकि ये एक मीटर लम्बी छोटी सी उड़ान भर सकें। दूसरा पिंजरा खरीदने में इतने ही पैसे और लगने थे जिनमें ये दो परिंदे और पिंजरा आ गया था। दो हफ्तों बाद गुन्नी का लगाव परिंदों से बहुत बढ़ गया था। रामाधार की बीवी को परिंदों के लालनपालन, ध्यान रखने से खीझ थी। बड़ी मीतू के लिए सब ठीकठाक था, वो चाहती थी कि अब बड़ा पिंजरा ले ही लिया जाये।
तीसरे सप्ताह में पिंजरे लाने का विचार अमल में आना शुरू हुआ। रामाधार ने जाकर पिंजरे वाले से बात की तो उसने जो दाम बताये वो ज्यादा लगने लगे। रामाधार ने सोचा वो खुद ही पिंजरा बना लेगा। इन सबकी जुगाड़ में आज और कल के दिन निकल रहे थे।
एक दिन रामाधार दोपहर के भोजन के समय दफ्तर से घर आया तो उसकी बीवी ने बताया कि हरे रंग वाला परिंदा उड़ गया है। रामाधार को भला ही लगा कि चलो अच्छा हुआ। फिर उसे लगा कि अब नीला पंछी अकेला ही रह गया है, ये उदास हो जायेगा। उसने घर में मौजूद बीवी और बड़ी मीतू को बुलाया कि चलो इस नीले पंछी को भी उड़ा देने का मजा लें। उसने पिंजरे का दरवाजा खोला, और अन्य सब तरफ से पंछी को दरवाजे की ओर जाने को प्रेरित किया। पर पंछी नहीं उड़ा वो दरवाजे से बाहर गर्दन निकालता और वापस पिंजरे की जाली से चिपट जाता, पिंजरे में ही घूमने लगता।
काफी देर बाद जब पाया कि वो अपने आप नहीं निकलेगा तो रामाधार ने सोचा कि जैसी कि उसने कल्पना की है, उसे पकड़कर फिल्मी स्टाईल में हवा में छोड़ दे। उसने पंछी को पकड़ा, पंछी ने छोटी सी चोंच से उसे काटा... उसे मजा आया। बीवी और मीतू के सामने उसने पंछी को हवा में लहराया। पंछी ने पर मारे पर वो 45 डिग्री का कोण बनाते हुए तीसरे माले के फ्लैट से नीचे बिछी कांक्रीट रोड़ पर धड़ के बल जा गिरा। उसके गिरते ही अचानक कहीं से एक कुत्ता आया और उसे मुंह में दबाकर चलता बना। तीसरे माले के फ्लैट की बालकनी में खड़े रामाधार को अब महसूस हुआ कि वो तीसरे माले के फ्लैट से फिल्मी स्टाइल में छलांग नहीं लगा सकते। वो चप्पल पहनकर नीचे दौड़े। जब तक नीचे पहुंचते, कुत्ता उस पंछी को दबाकर कुछ दूर ले गया था। रामाधार जब तक कुत्ते के पास पहुंचते रामाधार को लगा... वो उसके प्राण ले चुका था। रामाधार ने एक बड़ा सा पत्थर उठाकर दे मारा... पर वो कुत्ता पंछी को मुंह में दबाकर दूसरी ओर भागा। और एक कार के पीछे जाकर छुपकर उसे खाने लगा। जब तक उस कार के पीछे पहुंचते, रामाधार ने देखा, पंछी की एकडेढ़ सेमी बड़ी गर्दन निपट चुकी है। या शायद रामाधार ये सब देखना ही नहीं चाहते थे। उस परिंदे के रंगीन पंख जिनकी सुंदरता के आधार पर रामाधार ने खरीदने के लिए उसे चुना था...  बिखर गये थे। रामाधार ने सोचा, अगर अब कुत्ते को एक बड़ा सा पत्थर दे मारें तो यह कुत्ते का भोजन छीनना और एक और पाप का भागी बनना होगा। होनी हो चुकी है। इस सब नौटंकी के बाद रामाधार जब घर लौटे तो मीतू रो रही थी। रामाधार बीवी पर बिफरने ही वाले थे कि यदि उसे कमरे में ही उड़ा कर उसकी उड़ान की क्षमता या इच्छा देख लेते तो अच्छा रहता। वैसे पता तो किसी को भी नहीं था कि पंछी के पंखों में उड़ने लायक शक्ति नहीं थी।
रामाधार को हरे वाले पंछी के उड़ जाने की खुशी थी और नीले परिंदे के इस दुखद निधन का अफसोस। रामाधार की उसे उड़ाने की कोशिश में परिंदा मौत के मुंह में गया। सबसे बड़ा दुख ये था कि उसके, बीवी और बेटी मीतू के सामने वो कमीना कुत्ता उस परिंदे को उनके सामने ही दबोच ले गया जिसे 3-4 हफ्ते से पाल रहे थे।

बुधवार, 16 नवंबर 2011

बड़बड़ाना छोड़ दो

बड़बड़ाना छोड़ दो, क्या पता, तुम्हें भी पता ना चले कि तुमने क्या कह दिया है...और दुनियां वाले क्या-क्या समझ लें। बड़बड़ाना छोड़ दो, सबको खबर हो जायेगी - कि तुम सोचते कैसे हो? किन वजहों से, किन बातों का समर्थन करते हो, किन वजहों से... किन बातों के सख्त खिलाफ हो।

बड़बड़ाना छोड़ दो, सबको पता चल जायेंगे...तुम्हारे भय। बड़बड़ाना छोड़ दो, तुमने सुना नहीं- जिसे, दूसरों से छिपाना चाहते हैं, उसे, खुद से भी नहीं कहते।
बड़बड़ाना, अनजाने ही नंगे होने के तरह है। तुम्हें बड़बड़ाने से बचना चाहिये, क्योंकि तुम तो दीवारों और दरवाजों से बंद बाथरूम में भी कपड़े पहनकर नहाते हो।

बड़बड़ाना छोड़ दो- सबको पता चल जायेगी... तुम्हारे पागलपन की मात्रा।
बड़बड़ाना छोड़ दो, किसी भी रिश्ते से... सीधे-सीधे सपाट शब्दों में कहो। इससे दिल के दौरों से बचा जा सकता है।
बड़बड़ाना छोड़ दो - जो होना है, होगा ही... चाहे तुम बड़बड़ाओ या, चुप रह जाओ।

तुम परिणाम नहीं बदल सकते। ना शामिल होने से बचे रह सकते हो, इसलिए भी...बड़बड़ाना छोड़ दो। सीधे सपाट कहना भी छोड़ दो, अपने हाथों होनी को देखो। क्योंकि तुम ही जिम्मेदार हो अगर तुमने सच को छोड़ा, और किसी तरह तुम्हारी सांसें चलती रहीं और तुम उस तरह बचे रह गये, जिसे तुम जिन्दगी कहते हो।

बुधवार, 9 नवंबर 2011

आखिरकार

कल एक अवसर था श्मशान जाने का। पर एक नहीं 4-5 चिताएं एक साथ सजाई जाती हुई, जलती और राख होती देखीं। अगर मौत दुर्घटना नहीं है और इतनी अचानक ना आये तो हमें तैयारी करनी चाहिए। सांसे छूटने से कुछ साल पहले से अन्न त्यागना चाहिए, कुछ महीने पहले शाक आदि पेय, और आखिर जल पर निर्भर रहना चाहिए। इससे देह में रासायनिक क्रियाएं कम होंगी। देह हल्की रहेगी और चार कंधे देने वालों को सुविधा होगी। जगह और लकड़ी भी कम लगेगी। जीते जी भले ही आप एक सुन्दरतम हीरो या हीरोइन हों, मृत देह को छून से सब हिचकते हैं। इसलिए देह पर प्राकृतिक सुगंध जैसे चन्दन आदि का लेप भी लगाना चाहिए। अपने मित्रों की टेलीफोन, मेल लिस्ट भी किसी विश्वस्त व्यक्ति को देनी चाहिए कि टाईम पर लोगों को सूचित कर दे। श्मशान जाकर खुद ही अरेंजमेंट कर देने से घर वालों को सुविधा होगी।

कभी-कभी हमें जो महसूस हुआ वह लिखा नहीं जाया जाता। ये एक झूठी कोशिश है -

जिन्दगी है क्या देखो
जलती हुई चिता देखो

कैसे आती है मौत की खबर
क्या होता है दिल पे असर
क्यों झूठा जिन्दगी का समर
क्या खोया क्या मिला देखो
जलती हुई चिता देखो।

पल में सब छूटता है कैसे
सारा भरम टूटता है कैसे
मैं, मेरा, मुझे लूटता है कैसे
क्या रहा, क्या मिटा देखो
जलती हुई चिता देखो।

कैसे लकडि़यां सजाते हैं,
कैसे देह लेटाते हैं,
कैसे आग लगाते हैं,
आखिरी सफर है क्या, देखो
जलती हुई चिता देखो।

आग देह से लिपटे कैसे
उठती हैं लपटें कैसे
राख कर देने सब झपटे कैसे
सबकी नजर है क्या देखो
जलती हुई चिता देखो।


बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

बहुत तेज जि‍न्‍दगी में जब वक्‍त मि‍ले... सोचि‍ये

भारतीय त्यौहारों का शुभारंभ मुख्यतः रक्षाबंधन से होता है, फिर जन्मअष्टमी, गणेश चतुर्थी, पितृपक्ष, ईद, नवरात्रि, दशहरा, दीवाली, क्रिमसम, नया साल, 26 जनवरी, होली तक कहानी जारी रहती है।

नवरात्रियों में आखिरी, आज नवमीं तिथि थी। मिश्रा जी की दो बेटियों के सुबह उठने से पहले ही 4 जगह से बुलौवा आ चुका था। बेटियां नहा धोकर तैयार किये जाने के बाद शर्मा जी के यहां जाने के लिए निकलीं तो श्रीमती रामचंदानी उन्हें हाथ पकड़ कर अपने घर घेर ले गईं। घंटे भर बाद बेटियां शर्मा जी के यहां से निकलीं तो घर वापिस नहीं पहुंची, चैहान जी अपने घर ले गये। दोपहर के तीन बजे जब मिश्रा जी की बेटियां घर पहुंचीं तो 5 घरों से कन्याभोज करवाया जा चुका था। बेटियां थकी हुई, खुश थीं कि उन्हें चाॅकलेट, छोटे पर्स, सिक्के और नोट, कुरकुरे आदि मिले थे। कन्याभोज का सिलसिला अष्टमी से ही शुरू हो जाता है और दशमी तक चलता है। इन्हीं तीन दिनों में सभी देवीभक्तों को कन्यापूजन, भोजन करवाना होता है। इन्हीं तीन दिनों में कन्याओं की जरूरत पड़ती है।  साल के बाकी 362 दिन कन्याओं की जो पूछपरख होती है, किसी से छिपी नहीं। नवरात्रि के पूर्व पितृपक्ष में बुजुर्गों के दर्शन, उनके हालचाल जानने, पूछपरख का भी यही हाल है।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने बेटियों के संरक्षण, उनकी तरक्की के बारे में जोर शोर से बहुत कुछ कहा है, योजनाएं लाएं हैं। उनमें से एक है लाडली लक्ष्मी योजना इसमें, चुनी गई निर्धन नवजात शिशु कन्याओं का पंजीकरण कर उन्हें वार्षिक आधार पर अच्छी खासी आर्थिक सहायता 5000 वार्षिक (उनके नाम बैंक में जमा कर दी जाती है) दी जाती है। कन्याओं की उम्र के पड़ावों पर जब जब उन्हें आवश्यकता होगी ये राशि काम आयेगी। भली योजना है।

पर सभी कन्याओं को जन्मदाता माता पिता इतने भले नहीं हैं। हमारी सोसायटी के एकबोटे साहब के यहां कन्या ने जन्म लिया। एकबोटे ने उसका नाम सुषमा रखा। एकबोटे कस्ट्रशन में काम आने वाला आयरन, सरिया आदि का काम चलाते हैं। ऊपरी कमाई इतनी कि 5 वर्ष में दो प्लाॅट, दस एफडी, सोने चांदी, कार जैसी चीजों से अमीर हो गये। एकबोटे की बहन एक आंगनवाड़ी में काम करती हैं। उन्होंने अपने भाई की कन्या का पंजीयन लाडली लक्ष्मी योजना में करा दिया, लाडली लक्ष्मी सुषमा को राशि मिलने लगी। एक योग्य जरूरतमंद निर्धन कन्या योजना का लाभ पाने से वंचित रह गई। यही एकबोटे साहब नवरात्रि को कन्याभोज करवाते हैं, कन्याओं के भले की बात करते हैं...तो इसे क्या कहें?

हमारे सभी काम इसी तरह से औपचारिक हैं, साल के विशेष दिनों में पूजे गये पितरों, कन्याओं, देवी देवताओं, ईश्वर... को वर्ष भर बिसराये रखा जाता है। जैसे जीवन का इनसे कोई सबंध ही ना हो।

सब कुछ एक फैशन और सामाजिक भेड़चाल का हिस्सा है। रीति-रिवाजों, कर्मकाण्डों का मात्र एक ही उद्देश्य होता है - धनधान्य की आवक निर्बाध बनी रहे। इस धन से समस्त सुविधाओं, इन्द्रिय भोगों का लक्ष्य पूरा होता रहे। ईश्वर से की जाने वाली यही असली प्रार्थनाएं, अपेक्षाएं और दूजों को दी जाने वाली शुभकामनाएं हैं, बाकी सब औपचारिकताएं हैं।

हमारे पूर्वजों, पंचांग बनाने वालों ने प्रत्येक दिन का एक महत्व देखा था और उस दिन को किये जाने वाले कर्म भी पहचाने थे। ये कर्म एक व्यक्ति को अन्य व्यक्ति से, प्रकृति से और ईश्वर से जोड़ते थे।

लेकिन आज, लोगों का आजीवन एकमात्र ध्येय धन रूपी ईश्वर कमाना ही होता है। धन के लिए समय देना होता है, तो लोग 16 घंटे जुते हुए हैं। नौकरी करने वाले छुट्टियों को भूल गये हैं, नियोक्ता प्रसन्न है...कि अच्छे से अच्छे कम्प्यूटर भी घंटों लगातार चलाये जाने पर हैंग होने लगते हैं...पर इन्हें चलाने वाले आदमी या गुलाम, मशीन से कई गुना ज्यादा मशीनी हैं.... ये रविवार को भी, ईद, दशहरे दिवाली को भी चलते है।

धन एक छद्म लोक का निर्माण करता है। इसे अर्जित करने के लिए लम्बे घंटों वाली, महीनों तक लगातार बिना छुट्टियों की नौकरी है और एक मोटी तनख्वाह है। इस तनख्वाह को पिछले लोन, शाॅपिंग माॅल, बर्थडे या डेट और नये इलेक्ट्रानिक गैजेटस पर खत्म हो जाना हैं। कभी फुर्सत ने आ घेरा तो एलसीडी होम थियेटर, कम्प्यूटर-फेसबुक... इस छद्मलोक में आपको बनाये रखते हैं। उम्र होती जाती है, खोती जाती है.... आपके साक्षात जीवित मित्र ना के बराबर और इंटरनेट पर फोलोअर्स की संख्या बढ़ती जाती है।

कभी-कभी चिंता आ घेरती है कहीं ”कंधे ही कम ना पड़ जायें‘‘ और लोग पिकनिक, पार्टी, कथा, जगराता रख लेते हैं, शादी-ब्याह में शामिल हो जाते हैं।

तो चलिये इस भाग दौड़ में कभी ठहरने का मौका मिले तो देखें कि किस दिन, किस समय, क्या किया जाना जरूरी है...जो किया जाना ही जिन्दगी है। ना कि 24 गुणा 7 गुणा 365 दिन धन का इंतजाम किया जाना। अगर आपने ठहर के पढ़ा है तो बताओ ना मि‍त्र साक्षात कब मि‍ल रहे हो ?

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

क्‍या जि‍न्‍दगी एक अधूरा शॉट है ?

फिल्मी कलाकार, अक्सर इतने मंजे हुए अभिनेता होते हैं, या इतने सौभाग्यशाली कि उन्हें स्वयं पता नहीं होता।  जिनका एक शॉट पहली बार में ही ओ.के. हो जाता है। या दूजी बार,- या तीजी बार, या दसवीं, या पचासवीं या सौंवी..बस दो-चार सौंवी बार... और अभिनेता की किस्मत देखिये कि यदि शॉट ओ.के. नहीं हो पा रहा, तो डुप्लीकेट तैयार होता है, शॉट ओ.के. करने के लिए।
पर आम आदमी. और मुझ जैसे लोग. क्लर्क, मोची, धोबी, भंगी, या किसी नौकरी पर जाने वाले नौकर कहाने वाले। जि‍न्‍दगी भर मजबूरन कि‍सी तयशुदा काम या धंधे पर जाने वाले लोग। किसी काम के साथ में "वाला" जोड़कर पुकारे जाने वाले. दूधवाला, प्रेसवाला, किरानेवाला, पानवाला, सब्जीवाला, या मजदूर सड़क खोदकर फिर से बनाने वाला .. 50-60-70 बरस, जब तक हाथ पैर हिलें उसे बस एक तयशुदा शॉट ओ.के. करवाने में सारी जिन्दगी निकल जाती है.। और बावजूद इसके कोई अदृश्य ईश्‍वर या डायरेक्टर कभी भी आकर नहीं कहता कि ठीक है, शॉट ओ.के. है, तुम्हें अब कोई जन्म नहीं लेना। 


मेरा हर जन्‍म, कोई पूरा सीन या कहानी नहीं होता। वह पूरा शॉट भी नहीं होता। मेरी सारी जि‍न्‍दगी अधूरा शॉट होती है, जिसे मैं अनवरत रोज रीटेक करता हूँ। टूटकर गि‍र जाने तक।

एवंई, Misc, जो कि‍ बहुत जरूरी होता है Very Important

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

इसे चिराग क्यों कहते हो?

ये बुझा हुआ है। 
रौशनीना तो बाहर हैना ही अन्दर
औरइसे जलना भी नहीं आता।
इसे चिराग क्यों कहते हो?

गुरुवार, 25 अगस्त 2011

महात्मा गांधी ने संसद और मनमोहन सिंहों के बारे में क्या कहा?

1909 में जब अंग्रेज हम पर राज कर रहे थे, तब भी संसद वगैरह थी और महात्मा गांधीजी ने संसदीय लोकतंत्र के बारे में लिखा था -
" जिसे आप पार्लियामेंटों की माता कहते हैं, वह पार्लियामेंट (संसद) तो बांझ और बेसवा (वैश्या) है... मैंने उसे बांझ कहा क्योंकि अब तक इस संसद ने अपने आप एक भी अच्छा काम नहीं किया... संसद सदस्‍य दिखावटी और स्वार्थी हैं। यहां सब अपना मतलब साधने की सोचते हैं। सिर्फ डर के कारण ही संसद  कुछ करती है। आज तक एक भी चीज को संसद ने ठिकाने लगाया हो, ऐसी कोई मिसाल देखने में नहीं आती... बड़े सवालों की चर्चा जब संसद में चलती है, तब उसके मेंबर पैर फैला कर लेटते हैं या बैठे बैठे झपकियां लेते रहते हैं.. या फिर इतने जोरों से चिल्लाते हैं कि सुनने वाले हैरान परेशान हो जाते हैं... जितना समय और पैसा संसद खर्च करती है उतना समय और पैसा अगर अच्छे लोगों को मिले तो प्रजा का उद्धार हो जाये । संसद को मैंने वैश्या कहा क्योंकि उसका कोई मालिक नहीं है, उसका कोई एक मालिक नहीं हो सकता। लेकिन बात इतनी नहीं है। जब कोई उसका मालिक बनता है, जैसे प्रधानमंत्री, तब भी उसकी चाल एक सरीखी नहीं रहती। जैसे बुरे हाल वैश्या के होते हैं, वैसे ही हमेशा संसद के होते हैं.. अपने दल को बलवान बनाने के लिए प्रधानमंत्री संसद में कैसे-कैसे काम करवाता है, इसकी मिसालें जतिनी चाहिए उतनी मिल सकती हैं... मुझे प्रधानमंत्रियों से द्वेष नहीं है लेकिन तजुर्बे यानि अनुभव से मैंने देखा है कि वे सच्चे देशाभिमानी नहीं कहे जा सकते... मैं हिम्मत के साथ कह सकता हूं कि उनमें शुद्ध भावना और सच्ची ईमानदारी नहीं होती.. "

क्या यही सब, आज, भारत की संसद और प्रधानमंत्री की भी कहानी नहीं है?

शुक्रवार, 15 जुलाई 2011

अनायास, बि‍ना स्‍ट्रगल कि‍ये... सब मि‍लना

चलो आज तुम्हारी तरह दुनियां भर से सारे खयाल बाँटूं। दरअसल मुझे मजा आता है ईश्वर की बातें करना, हालांकि तुम्हारे या किसी और की तरह, मैं भी उसके बारे में कुछ नहीं करता। लेकिन पीछे इतना कुछ पढ़ा-सुना है कि मुझे वही चीज सबसे महत्वपूर्ण लगती है। मुझे कुछेक वाक्य बार-बार अच्छे लगते हैं जैसे ”प्रभु से लगे रहो रे भाई, बनत बनत बन जाई“, ”होते-होते होता है“ आदि आदि। ऐसा नहीं है कि डर नहीं कचोटता कि बिना कुछ हुए ही मर गये तो, तो क्या होगा? वैसे भी इस जिन्दगी का कोई खास मतलब नहीं होता, सिवा इसके कि मरने के पहले ये जान लिया जाये कि जिन्दगी क्या है? कुछ लोग ये भी जानना चाहते हैं कि मरने से पहले ही, ऐसा कुछ जान लिया जाये कि कभी मौत ही ना हो, शरीर की भी। दो-चार सौ साल जिया... कोई शरीर तो कहीं दिखता नहीं, सो लोग किसी और सूक्ष्म रूप की कल्पना करते हैं और सोचते हैं वो ये सच हो जाये। खैर! मुझे ऐसी ही बातें करने में मजा आता है।
 
तुम यह जानते ही हो कि मुझे घुमा फिरा के बात करना अच्छा नहीं लगता मैं चाहता हूं कि सब साफ साफ रहे,
धुंधला-धुंधला, भ्रमित नहीं। जरूरत होने पर भी दुनियां की तरह वक्री चलने में मुझे बहुत तकलीफ होती है।
हालांकि हर वक्त परेशानी सताती है कि करूं तो क्या करूं। कुछ सूझता नहीं है और बरसों बरसों निकल गये हैं। ये बरसों बरसों का निकलता जाना भी दुख देता है। जवानी पक चली है, और बरस निकल रहे हैं। लगता है कि कुछ महत्वपूर्ण होना चाहिए पर सब महत्वरहित निकलता है... लगता है ”महत्वपूर्ण क्या है“, यह तय करने वाले हम नहीं हैं। ऐसा भी हो सकता है कि सारी दुनियां की तरह, मैं कुछ महत्वपूर्ण करना, चाहता ही ना होऊं और अपने आप को ही बना रहा होऊं। कौन अपने सुविधाओंभरे कोकून से निकलना चाहता है। कुछ चीजों की बातें करने में ही ज्यादा मजा है, बनिस्बत की वो हो जायें, शायद मैं ऐसे ही ना-सूझने में उलझा हूं। जो भी हो बड़ी बंधी-बंधाई सी है जिन्दगी... बरसों बरस से, मैं उकता चुका हूं.. उकताना बड़ा बुरा हो सकता है। मैंने सुना है-उकताने वाले लोग मानवबम बन जाते हैं। क्या किसी को इतना बोर किया जा सकता है कि वो मरने को तैयार हो जाये? योग, ध्यान, जप, तप, भक्ति..... हो सकता है ये सब बोर करने के ही तरीके हों, इतना बोर हो जाये कि मौत आये ना आये कोई फर्क ना पड़े बल्कि और सुभीता रहे कि चलो अब कोई अहसास नहीं रहा। अहसास का होना ही सबसे बड़े बीमारी है, अहसास जन्मजात रोग है.... आजन्म रहने वाला। 

 
दरअसल यह सब वो हकीकत है...जो मैंने सपने में देखी, मेरा कोई दोस्त परसों हुए बम विस्फोट में मारा गया वो अच्छा खासा भोपाल में जॉब कर रहा था, बीवी दो बच्चियां, मां बाप...सब हैं। कहता था बड़ा बोर हो गया है छोटे शहर की नौकरी से, उसका ग्राफिक्स डिजाइनिंग का काम औसत था। उसे उम्मीद थी कि मुम्बई में उसे किसी 5 दिन वर्किंग डे वाले अच्छे से आफि‍स में काम मिल जायेगा.. वो कहता था उसने जिन्दगी में कभी स्ट्रगल नहीं की। पढ़ाई के साथ ही नौकरी, नौकरी के साथ ही छोकरी, छोकरी के साथ ही बच्चे सब अनायास ही होता चला गया और.... आजकल वो बहुत बोर हो रहा था रोज 10 से 7
आफि‍स रूटीन से... सालों साल वैसी ही होली दिवाली... बीवी बच्चे मां बाप। मुझे लगता है वह नई नौकरी नहीं चाहता था क्योंकि भोपाल हो या मुम्बई... वहां पर भी तो यही सब होता.... शायद कुछ और झंझटें बढ़ जाती। मेरे ख्याल से वह इस तरह जिन्दा रहने के ख्याल से दुखी था। वह नहीं चाहता था कि उसे "कुछ ऐसा बोरियत सा, रूटीन सा महसूस हो" वो अहसास की कैद से रिहा होना चाहता था, हो गया... और इस बार भी... बिना कोई संघर्ष किये... बिना कोई स्ट्रगल किये... मुम्बई जाने के दो दिन बाद ही अनायास ही मौत भी मिल गई। 
मेरे पास वो बहुत सारे सवाल छोड़ गया है - क्या वो बम विस्फोट से मरा?  क्‍या आदमी को बोर नहीं होना चाहि‍ये? क्‍या बीवी-बच्‍चे-मां-बाप से बोर हुआ जाता है ? जि‍न्‍दगी में नयापन और अबोरि‍यतभरा क्‍या है? क्‍या वो वाकई ईश्‍वर की तलाश में था ?

सोमवार, 11 जुलाई 2011

गरीबि‍याँ

तीन लड़कियां थीं, तकरीबन 5, 8 और 10 बरस कीं। सुबह का वक्त था जब बच्चे स्कूल बसों-वैनों में ठुंसे जा रहे होते हैं। वो शहर की पॉश ऐरिये में कचरे की टंकी के पास बरसाती मक्खियों, गाय, कुत्तों के साथ पन्नियां तलाश रहीं थीं। अंकल चिप्स और चाकलेट खाने की बातें करते-करते वो एक अच्छे घर के गेट पर जाकर खड़ीं हो गईं। उनमें से एक जोर-जोर से पुकारने लगीं ... आंटी खाना दे दो....आंटी खाना दे दो....पता नहीं घर पर कोई सुन रहा था या नहीं, सुनना चाह रहा था या नहीं...सुनकर सोच रहा था या नहीं। वो लड़की निरंतर पुकारती रही .. आंटी खाना दे दो....आंटी खाना दे दो.... तभी उसकी साथ वाली सबसे बड़ी लड़की उसको समझाते हुए बोली... देख ऐसे बोल.. और उसने धीरे से उसके पास उसने कुछ बोलकर दिखाया.. इस बीच ही उस घर में एक प्रौढ़ व्यक्ति दिखा तो वो छोटी लड़की पुकारने लगी... अंकल खाना दे दो....अंकल खाना दे दो....पर वो व्यक्ति ओझल हो गया और लड़की फिर से टेक लगाकर पुकारने लगी आंटी खाना दे दो....आंटी खाना दे दो....  
आज कोई दिन त्यौहार नहीं था, ग्रहण नहीं था, दीवाली-दशहरा नहीं था... हो सकता है जिस घर के पास वो बच्चियां खड़ीं थी, उसमें रहने वालों ने कि‍सी न्यूज चैनल पर आज सुबह भविष्यफल सुना, ना सुना हो। उसमें वो दान पुण्य वाले उपाय बताते हैं... जिनसे देने और मांगने वालों के अपेक्षित कर्म पूरे होते हैं।
शहरी गरीबी, गांव की गरीबी से अलग होती है। वो रोटी, कपड़े और रहने के लिए झुग्गियां या किराये के मकान मिलने के बाद जन्म लेती है। शायद सारी दुनियां में दो ही तरह के लोग हैं... अभाव पैदा करने वाले और अभावग्रस्त।