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बुधवार, 16 जुलाई 2014

था मैं इतना पराया भी नहीं

17-17
था मैं इतना पराया भी नहीं
कि तूने आजमाया ही नहीं

जो दौलतें हैं तो संग सब ही
नहीं तो धूप में साया नहीं

18-18
उम्र और तजुर्बे बोलते हैं
यूं मैं कुछ सीखा सिखाया नहीं

तू मिला तो गीत, खोया तो गम
इस दिल ने, और कुछ गाया नहीं

बुधवार, 4 जून 2014

आह को लफ्जों में तराशा जो

आह को लफ्जों में तराशा जो
कहा ये उसने..ये तमाशा क्यों?

कभी कभार कोई इशारा दिया,
दिल के बच्चे को, ये बताशा क्यों?

प्यार की क्वालिटी देखिये साहिब
खुदा मिलता है, तोला माशा क्यों?

इक बार मिले, बिछड़ने के लिए
पर दे गये, इतनी निराशा क्यों?

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

कभी तुझ पे भी, कुछ ऐसा मेरे बिन गुजरे


कभी तुझ पे भी, कुछ ऐसा मेरे बिन गुजरे
तुझे सोचते हुए, जैसे मेरा दिन गुजरे

तेरी तस्वीर से, अब ये सवाल रहता है
इक रास्ता, करता है क्या, जब मंजिल गुजरे ?

उदासी, बदहवासी, दिल में दर्द का रहना
तू बता इनके सिवा, और क्या मुमकिन गुजरे?


सोमवार, 7 अप्रैल 2014

तुमसे जो बात हो गर्इ् साहिब

तुमसे जो बात हो गर्इ् साहिब 
हसीन हयात हो गई साहिब

शब के खामोश लब जब हिले हैं
दिन नये, रातें हैं नई साहिब

चंद लफ्जों का लेन देन महज
बस में जज़्बात ही नहीं साहिब

खयालों ने नई परवाज ली है
छोड़ दी तंग दिल जमीं साहिब

यूं हकीकत के हम मुरीद बहुत
ख्वाब में, बस तुम्हीं—तुम्हीं साहिब


शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

मौत से क्यूं मैं रोज डरता रहा


मौत से क्यूं मैं रोज डरता रहा
हकीकत तो मैं रोज मरता रहा
एक बार इश्क से होकर गुजरा
बारहा मैं खुदा से डरता रहा
सहना सब्र और समझ का रस्ता
बस मुसीबतों से यूं तरता रहा
जब भी किसी का दर्द टटोला तो
मेरे दर्द पर अमृत झरता रहा
जब भी जीवन में कुछ शिवम पाया
याद में मां की, शीश धरता रहा
छंद में मात्राओं का संतुलन
अर्थ के अन​र्थ कई करता रहा

गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

जरा सी जिंदगी,किस किस तरह जीते

बड़े दिनों बाद... पागलपन आया याद



इक जरा सी जिंदगी, किस किस तरह जीते
बस एक ही क़तरा था, किस—किस तरह पीते.

सूरज आता, सताता कि कुछ कर
रात कहती, जिओ जैसे हों सुभीते

जो गये, बस खो गये, अब ढूंढे कैसे?
ढूंढो... जब त​क ये जिंदगी ना बीते.

ज़िंदगी ने लिया ही लिया, दिया क्या ?
ख्वाहिशें निकली हीं थी, लगे पलीते.


शनिवार, 27 अगस्त 2011

झूठ के जलवों में खोना क्यों?

झूठ के जलवों में खोना क्यों?
खुदा का दोषी होना क्यों?

सब विधना की मर्जी है,
फिर तकदीर का रोना क्यों?

सब कुछ यहीं रह जाना है,
पाप-पुण्य का ढोना क्यों?

दर्द भी उसकी रहमत है,
पल-पल आंख भिगोना क्यों?

दसों दिशा वहीं मुस्काये,
जप तप जादू टोना क्यों?

उससे जनम उसी में मरण

पाना क्‍या  क्या और खोना क्यों?

अन्तर क्षीर है, अमृत है,
बाहर नीर, बिलौना क्यों?

अन्दर खोज खजाने पगले,
बाहर पकड़े दोना क्यों?

पत्थर छोड़ दे इगो का,
खुद ही खुद को डुबोना क्यों?

मौत अचानक आती है,
घोड़े बेच के सोना क्यों?

सपनों में भी ना आये,
उसका दर्द संजोना क्यों?

यूं तो दुनियां भूल गये,
आंखों में वो सलोना क्यों?


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गुरुवार, 26 मई 2011

तुमको इससे क्या?



हर ख्‍याल औ ख्‍वाब का हर आसंमा खो गया
कट जाएं मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या?

औरों का हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ
मैं भूल जाऊं अपना ही घर, तुमको इससे क्या?

मेरी आंखों से बरसते रहें मोती, क्या हुआ?
कोई सीप रहे बांझ अगर, तुमको इससे क्या?

ले जायें जहां चाहें मुझे तूफानों के सफर
तुमने तो डाल लिया लंगर, तुमको इससे क्या?

जंगल में जरा छांव मिली, तुम तान सो गये
मैं भटकता रहूं इधर या उधर, तुमको इससे क्या?

सोमवार, 16 मई 2011

तेरी हसरतों के नाज क्या हैं?


दूसरों के सीने में, सच की तलाश बेमानी है,
देखना तो देखिये, झूठ कहने का अंदाज क्या है?

आती जाती सांस में, जिन्दगी और मौत जी
किताबों, गुरूओं से पूछ मत - और कोई राज क्या है।

सब कुछ तयशुदा नहीं होता, फुर्सत में जहा'न नहीं होता
ये तुझी को समझने हैं, तेरी हसरतों के नाज क्या हैं?

बीते कल की फिक्र क्यों?, आने वालों का जिक्र क्यूं?
बस तू इतना संभाल ले, देख ले कि आज क्या है? 

ऐय्याशियों की राह पर, बैबसी है-रोने हैं
नौकरी में रस है जो, भूल जा परवाज क्या है?

जब तक निभे साथ रह, झगड़े-टंटे बेवजह ना सह
यारी क्या बीमारी है? निभाना रीति रिवाज क्या है?

तुझे दूसरों की क्‍यों पड़ी, देख अपना गि‍रेबां हर घड़ी 
हर सांस में तैयारी रख, कि‍से पता मौत के मि‍जाज क्‍या हैं?

रविवार, 6 मार्च 2011

जूझने में मजा है, यही जिन्दगी का कायदा है


अगर सफर की मुश्किलें-थकान नहीं होती
घर क्या है इसकी पहचान नहीं होती

गर सभी का, सुकून से ही, वास्ता होता
दौलतों के पीछे, दुनियां शैतान नहीं होती

मेहनत पसीने ही गर, हर मर्ज की दवा होते
किसानों-मजदूरों की खुदकुशी, यूं आम नहीं होती

आंखे खोलकर कर, अगर इंसाफ होता, सबका
ऊंची ईमारतों से, झोपड़ी परेशान नहीं होती

मिसाइलों-बमों से गर, इंसान खुदा हो जाता
कोई गीता नहीं होती, कोई कुरान नहीं होती

क्या करूं, बेईमानियों की फसलें बहारों पर हैं,
वर्ना ईमानदारी तेरी, मुझ पे अहसान नहीं होती

जिस्मानी लज्जते, जो मुहब्बतों का मकाम होती
रूहानी मोहब्बतें, खुदाबंदों का अरमान नहीं होती

इंसानी रिश्ते, अगर बस सुविधा, या व्यापार नहीं होते
दूल्हे बाजारों में ना बिकते, दुल्हने नीलाम नहीं होती



टीपू कि‍बरि‍या द्वारा खींची गई तस्‍वीर

अजनबी, लोग जिन्दगी का ककहरा सीखे ही नहीं
वर्ना जूझने में मजा होता, मौत आसान नहीं होती

Alone