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बुधवार, 4 जून 2014

आह को लफ्जों में तराशा जो

आह को लफ्जों में तराशा जो
कहा ये उसने..ये तमाशा क्यों?

कभी कभार कोई इशारा दिया,
दिल के बच्चे को, ये बताशा क्यों?

प्यार की क्वालिटी देखिये साहिब
खुदा मिलता है, तोला माशा क्यों?

इक बार मिले, बिछड़ने के लिए
पर दे गये, इतनी निराशा क्यों?

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

उसका हर सितम बेमिसाल ऐसा,

उसका हर सितम बेमिसाल ऐसा,
मेरी हर आह पर सवाल कैसा?

अधजगी रातों के गवाह, तारों..
चांद के चेहरे पर जाल कैसा?

उसका होना, कि ज्यों खामोशी हो
ना हो आवाज, तो मलाल कैसा?

यादों और ख्वाबों का तमाशा है
मिलना कैसा? उसका विसाल कैसा?

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

कभी तुझ पे भी, कुछ ऐसा मेरे बिन गुजरे


कभी तुझ पे भी, कुछ ऐसा मेरे बिन गुजरे
तुझे सोचते हुए, जैसे मेरा दिन गुजरे

तेरी तस्वीर से, अब ये सवाल रहता है
इक रास्ता, करता है क्या, जब मंजिल गुजरे ?

उदासी, बदहवासी, दिल में दर्द का रहना
तू बता इनके सिवा, और क्या मुमकिन गुजरे?