Thursday, 26 May 2011

तुमको इससे क्या?



हर ख्‍याल औ ख्‍वाब का हर आसंमा खो गया
कट जाएं मेरी सोच के पर, तुमको इससे क्या?

औरों का हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ
मैं भूल जाऊं अपना ही घर, तुमको इससे क्या?

मेरी आंखों से बरसते रहें मोती, क्या हुआ?
कोई सीप रहे बांझ अगर, तुमको इससे क्या?

ले जायें जहां चाहें मुझे तूफानों के सफर
तुमने तो डाल लिया लंगर, तुमको इससे क्या?

जंगल में जरा छांव मिली, तुम तान सो गये
मैं भटकता रहूं इधर या उधर, तुमको इससे क्या?

9 comments:

Sunil Kumar said...

मेरी आंखों से बरसते रहें मोती, क्या हुआ?
कोई सीप रहे बांझ अगर, तुमको इससे क्या?
कुछ नया सा , सुंदर अभिव्यक्ति ,बधाई

kunwarji's said...

waah!....
jabardast hai ji...

kunwar ji,

दिगम्बर नासवा said...

औरों का हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ
मैं भूल जाऊं अपना ही घर, तुमको इससे क्या ...
बहुत खूब ... तुम अपनी देखो ... हम अपनी देखेंगे ... तुम्हे क्या ... लाजवाब शेर है जनाब ...

संजय कुमार चौरसिया said...

bahut sundar rachna

दिलबागसिंह विर्क said...

ati sunder
gazalnuma gazal ka lebel lgaya hai aapne , shayd agazal jyada behter nhin hota

pragya said...

"औरों का हाथ थामो, उन्हें रास्ता दिखाओ
मैं भूल जाऊं अपना ही घर, तुमको इससे क्या?"
बहुत ख़ूब, कई बार दुनिया को रास्ता दिखाने वालों को अपने घरवालों से ये शिकायतें मिलती हैं...

केवल राम said...

मेरी आंखों से बरसते रहें मोती, क्या हुआ?
कोई सीप रहे बांझ अगर, तुमको इससे क्या?

हर एक शब्द में बहुत तरह के भाव समां दिए हैं आपने ....बहुत भाव प्रवण रचना आपका आभार

संजय भास्‍कर said...

लाजवाब शेर बहुत खूब ....

ana said...

bahut achchhi post....wah

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