Wednesday, 9 February 2011

जिन्दगी एक वीडि‍यो गेम है


जिन्दगी एक कम्प्यूटर गेम की तरह है
आपको मिलता है एक तयशुदा वक्त
इस तयशुदा वक्त में
तय करने होते हैं अनगिनत रास्ते
और अनगिनत मंजिलें

कुछ रास्ते जैसे दिखते से हैं
पर भूलभुलैया होते हैं
कुछ मंजिलों जैसे दिखते हैं
पर वो पड़ाव होते हैं

लाईफ कम हो जाती है
किन्हीं पड़ावों पर ठहर जाने पर
लाईफ कम हो जाती है
निषिद्ध चीजों को स्पर्श करने पर

कुछ ऐसी चीजें होती है
जो किन्हीं खास पड़ावों पर ही काम आती हैं
कुछ ऐसी चीजें होती हैं
जिन्हें ना लें तो कोई फर्क नहीं पड़ता
पर जिन्हें धारण कर लें तो लाईफ बढ़ जाती है

इस गेम में हर लेवल पर
कुछ मुश्किलें मिलती हैं,
और इनका सामना ही
असली खेल है।

खेल के प्रमुख नियम हैं
लाईफ को सुदृढ़ करते/रखते हुए
मंजिल दर मंजिल तय की जाये।

प्राथमिकता अनुसार
सही वक्त पर सही काम किया जाये
सही वक्त पर सही चीज ली जाये
हर लेवल पर हर वो चीज ली जाये
जिनसे लाईफ बढ़ती हो
क्योंकि ये लाईफ वहां खर्च होनी है
जहां हमें कुछ निषिद्ध चीजों को भी छूना होगा

कहीं चलना होगा दबे पांव
कहीं संभलकर तेज चलना होगा
कहीं सर्वोच्च कुशलता से छलांग मारनी होगी

और वहां तो अक्सर लोग चूक कर जाते हैं
जिस बिन्दु पर इस गेम में
कुछ भी नहीं करना होता
सिवा कुछ पलों के इंतजार के।
कुछ धैर्य रखने के।

पर जैसे कि आप गेम के चरम पर हों,
कभी कभी ऐसा भी होता है,
कि अचानक बिजली गुल हो जाये।
आपको मौका होता है,
कम्प्यूटर/गेम को कभी फिर से शुरू करने का।
पुरानी कुशलताओं को और तीखेपन से दोहराने,
और गलतियों से सीख लेने का।

लेकिन जिन्दगी के खेल में
हमें, बस एक ही बारी मिलती है।
और पता नहीं क्या होता है,
बिजली गुल हो जाने पर
मौत आने पर।

5 comments:

वन्दना said...

यही जीवन का सत्य है…………क्या करना है जानकर बाद मे क्या होगा जीते जी इतना जान ले कि जीना कैसे है तो मौत की कैसी चिन्ता…………बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

उपेन्द्र ' उपेन ' said...

सच जिंदगी भी किसी खेल से कम नहीं........ कैसे शह कैसे मात, बिल्कुल अनिश्चित .

हरकीरत ' हीर' said...

ज़िन्दगी है खेल कोई पास कोई फेल .....
ज़िन्दगी के सरे माप दंड दे दिए आपने तो ......

योगेन्द्र पाल said...

आपकी कविता पढ़ कर एक रोमांच का अनुभव हुआ, बहुत अच्छा लिखा है आपने

Udan Tashtari said...

एक खेल ही तो है..

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