Monday, 13 September 2010

बड़ी अटपटी दुनियां

Image by : Kees Straver
  
ख्यालों से छंटी दुनियां, कैसे-कैसे बंटी दुनिया
आशाओं-सपनों में उलझी, हकीकत से कटी दुनिया

रिवाजों में सहूलियत है, नयेपन से हटी दुनियां
इतिहास में भविष्य देखे, बड़ी अटपटी दुनियां

स्वाद कैसा होता है अम्मी-अब्बा से जाना
जुबां जब बूढ़ी हुई तो, लगी चटपटी दुनियां

सच-शांति की राहों से बोर हो हटी दुनियां
झूठ और फरेबों के संग्रामों में डटी दुनियां

जिन्दगी के मैदानों में दूर तलक भागी है
डरी-सहमी रहे फिर भी, मौत से सटी दुनियां

3 comments:

Majaal said...

हिस्सों में बँटी दुनिया, चिन्दों में फटीं दुनिया,
गलती फिर भी न माने, है बड़ी हठी दुनिया ..

उम्दा पेशकश

वीना said...

जिन्दगी के मैदानों में दूर तलक भागी है
डरी-सहमी रहे फिर भी,मौत से सटी दुनियां

बहुत ही अच्छी रचना, बधाई

http://veenakesur.blogspot.com

दिगम्बर नासवा said...

जिन्दगी के मैदानों में दूर तलक भागी है
डरी-सहमी रहे फिर भी, मौत से सटी दुनियां

बहुत खूब ... सच कहा है .. लाजवाब शेर ...

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