गुरुवार, 18 जून 2015

यूं ही


वादे और कसमें आकाश में चमकते उन​ सितारों जैसे होते हैं. वो उतने ही ज्यादा चमकते हैं जितनी गहरी काली रात होती है.
God's promises are like the stars; the darker the night the brighter they shine. ~David Nicholas


दुनियां में सभी जगह राजनीतिज्ञ एक से होते हैं. वह वहां भी पुल बनाने का वादा करते हैं जहां कोई नदी ही नहीं होती.
Politicians are the same all over. They promise to build bridges even when there are no rivers. ~Nikita Khrushchev


पता भी नहीं चलता कि कब कोई वादा या वचन, धमकी में बदल जाता है।
When did the future switch from being a promise to being a threat? ~Chuck Palahniuk

एक विज्ञापन का पहला नियम यह है कि किसी पक्के वादे से पूरी तरह बचा जाये ओर एक खूबसूरत भ्रामक सुखद दृश्य प्रस्तुत किया जाये।
The very first law in advertising is to avoid the concrete promise and cultivate the
delightfully vague. ~Bill Cosby

वादा और एक बड़ा वादा, बस यही एक विज्ञापन की जान होता है.
Promise, large promise, is the soul of an advertisement. ~Samuel Johnson

संकल्प, वादा या कसम... ये बातें इस बात का सुबूत हैं कि आप कुछ समझ पाने या कर पाने में असमर्थ हैं।


Better break your word than do worse in keeping it. ~Thomas Fuller
जो वचन आपने दिया है उसे तोड़ देना इससे बेहतर है कि उसे निभाने के चक्कर में आप सत्यानाश के मार्ग पर चले जायें।

A promise is a comfort for a fool. ~Proverb
एक वचन, शपथ या वादा, अनेक मूर्खताएं करने की सुविधा मात्र है.



बुधवार, 11 मार्च 2015

माँ

माँ का पिण्ड दान

दोस्त कुटुम्बी देते हैं ,
बारी बारी कान्धा तुझको,
और मैं कच्ची हांडी सा,
तेरा बच्चा, चलता हूँ आगे,
एक पकी हाँडी,
हाथ में ले कर ।

इस मिट्टी के बर्तन में,
लिये जाता हूँ माँ,
थोडा इतिहास, एक युग, एक जीवन,
चुट्की भर जवानी, एक अंजुली बचपन,
अट्कन बट्कन, दही चट्कन,
घी दूध मख्खन,
अलमारियों की चाबी,
गंगाजली का ढक्कन,
और तू कुछ बोलती नहीं।

यों तेरी गृहस्थी,
मटकी में किये बंद,
चलता हूँ मैं माँ,
नंगे पैर, कि तू ,
कन्धों से आंगन में,
उतर कर आ जाये।

पहले झगडे, चिढे, गुस्साये,
बाद में फ़ुसलाये,
"लल्ला नंगे पांव ना घूमो"
पर तू कुछ बोलती नहीं।

अन्तिम यात्रा कहते हैं लोग इसे,
रोने भी नही देते जी भर,
देते हैं मुझे हवाले ,
वासांसि जीर्णानि से,
नैनम छिन्दन्ति तक,
गीता से गरुड तक,
ईश्वर से नश्वर तक,
लौकिक से शाश्वत तक,
मैं मुस्कुरा के तुझे,
देता हूँ मुखाग्नि,
करता हूँ तेरा पिन्ड दान,
कि माएं ना पैदा होती हैं,
ना मरती हैं।
– दिव्यांशु शर्मा




मां और दुनियां

मेरे लिए एक छोटा रहस्य है।
दुनिया को जानने का कौतुहूल
जरूर बना रहा मन में
किंतु ‘माँ’ को जानकर
जाना जा सकता है
आसानी से इस ‘संसार’ को
 
यह बहुत देर में जाना.....
छोटी सी थी तो देखती....
माँ को बडे धैर्य से....
बडी शांति से वह संवार देती थी
’घर और जीवन’ की हर बिगडी चीज को
बिना माथे पर शिकन लाए
गाती गुनगुनाती सहजता से


सब्जी मे भूले से
ज्यादा नमक डल जाने पर
सोख लेती थी उसका ‘सारा खारापन’
सहजता से, आटे की पेडी डाल उसमें....
अधिक डली हल्दी के बदरंग और स्वाद
की ही तरह....
ठीक कर लेती थी
संबधों और परिस्थितियों के भी
बिगडे रंग और स्वाद...
चाय मे अधिक चीनी हो
या फिर फटा दूध
या कि 
स्वेटर बुनते हुए
असावधानी वश सलाई से छूट गया ‘फन्दा’
(गिरे हुये घर को)
कैसे आसानी से उठा लेती थी ‘माँ’
वह गिरा हुआ फन्दा
कैसे सहेजता से, 
बुनाई – सिलाई के झोल की ही तरह
निकाल लेती थी
जीवन के भी सारे झोल.....

हम तो घबरा उठते हैं
छोटी छोटी मुश्किलों में....
छोड देते हैं धैर्ये.....
चुक जाती है शक्ति.....
शायद ‘माँ’ होना
अपने आप मे ही ‘ईश्वरीय शक्ति’
का होना है।


मीनाक्षी जिजीविषा

सोमवार, 21 जुलाई 2014

वही ख्वाब - वही अज़ाब

मेरे सुकून में भी, बस वही अज़ाब था
इक झपकी लगी, कि वही ख्वाब था
________________________________________
अज़ाब = पीड़ा, सन्ताप, दंड अज़ीज़ = प्रिय, माननीय, आदरणीय, 
गुणवान अज़ीम = महान, विशाल, उच्च मर्यादा वाला अटक =विघ्न

बुधवार, 16 जुलाई 2014

था मैं इतना पराया भी नहीं

17-17
था मैं इतना पराया भी नहीं
कि तूने आजमाया ही नहीं

जो दौलतें हैं तो संग सब ही
नहीं तो धूप में साया नहीं

18-18
उम्र और तजुर्बे बोलते हैं
यूं मैं कुछ सीखा सिखाया नहीं

तू मिला तो गीत, खोया तो गम
इस दिल ने, और कुछ गाया नहीं

बुधवार, 4 जून 2014

आह को लफ्जों में तराशा जो

आह को लफ्जों में तराशा जो
कहा ये उसने..ये तमाशा क्यों?

कभी कभार कोई इशारा दिया,
दिल के बच्चे को, ये बताशा क्यों?

प्यार की क्वालिटी देखिये साहिब
खुदा मिलता है, तोला माशा क्यों?

इक बार मिले, बिछड़ने के लिए
पर दे गये, इतनी निराशा क्यों?

बुधवार, 30 अप्रैल 2014

उसका हर सितम बेमिसाल ऐसा,

उसका हर सितम बेमिसाल ऐसा,
मेरी हर आह पर सवाल कैसा?

अधजगी रातों के गवाह, तारों..
चांद के चेहरे पर जाल कैसा?

उसका होना, कि ज्यों खामोशी हो
ना हो आवाज, तो मलाल कैसा?

यादों और ख्वाबों का तमाशा है
मिलना कैसा? उसका विसाल कैसा?

भूख और प्यार


मुझे चढ़ती दोपहर में
यही कोई 27 बजे
भूख लगी थी।
मैंने खाना खा लिया था।
और तुम
अब शाम को आई हो
40 बजे।
मेरी भूख मिट गर्इ् है।
तुम्हें तो भयंकर भूख लगी है
जाओ
आज तुम अकेले ही खा लो।
खाना खाते समय
किसी का देखना,
किसी से बात करना
अच्छा नहीं है।
तुम निपट लो,
फिर दालान में मिलना
हम फिर बातें करेंगे।
मुझे पता है
तुम्हें खटाई पसंद है,
खाने में भी
रिश्ते में भी।

सोमवार, 28 अप्रैल 2014

कभी तुझ पे भी, कुछ ऐसा मेरे बिन गुजरे


कभी तुझ पे भी, कुछ ऐसा मेरे बिन गुजरे
तुझे सोचते हुए, जैसे मेरा दिन गुजरे

तेरी तस्वीर से, अब ये सवाल रहता है
इक रास्ता, करता है क्या, जब मंजिल गुजरे ?

उदासी, बदहवासी, दिल में दर्द का रहना
तू बता इनके सिवा, और क्या मुमकिन गुजरे?


गुरुवार, 17 अप्रैल 2014

लटक कर सोचते हुए मरना

वो भी घर से यही सोचकर निकला होगा कि सांझ तक 200-400 रूपये मिल जाएंगे। वो भी ये सोचकर ही घर से निकला होगा कि किसी बच्चे की कोई ख्वाहिश पूरी हो जाएगी, बीवी की कोई जरूरत या दाल-रोटी का डर कुछ टल जाएगा। पता नहीं, यह वही मोटा रस्सा था जिससे वह कई दिनों से जिंदगी और मौत का जुआ खेल रहा था या, ये मौत का सामान आज ही उसने किराये पर लिया था। ली-जीन्स का 15 बाई 50 फीट का फ्लैक्स पेस्ट कर रहा था वो, तीन कोने तो टंग गये थे। बस, एक कोना बाकी था... जिसमें मौत छिपी बैठी थी।

चित्र के लिए देखें
Google Images > Dead body on ground Or, Dead body on Floor

कुछ लोग धीरे-धीरे मरते हैं, लोग उनकी परवाह ही नहीं करते... पहले पहल तो सबको तकलीफ होती है। काॅलेज से निकले किसी ताजा छात्र को 8 घंटे किसी नियत जगह पर बैठाइये, उसकी गर्दन में अकड़न होती है, पैर कसमसाते हैं, बाजूएं... अंगड़ाइयों से भर जाती हैं, सिर फटने लगता है... और सवाल बार-बार उठता है... क्या ऐसा जिंदगी भर करना होगा... और फिर वह खुद को तसल्ली देता है... नहीं बस कुछ दिन की बात, यही तो संघर्ष है जिंदगी का, जीवन इक संघर्ष है... आदि। पर महज 5 दस साल, शादी बच्चे हुए कि सब खत्म। पता ही नहीं चलता यातनाओं का। सब उलट जाता है... किसी तयशुदा जगह पर 8-10 घंटे बिताने की ऐसी लत पड़ती है कि 2-चार साल में, यदि कोई ऐसा दिन आये कि अचानक किसी वजह से कारखाना या कार्यालय बंद हो तो इस कर्मचारी को सूझता ही नहीं कि ऐसे अपवाद वक्त का क्या करना है? पागल हो उठता है, परेशान हो जाता है। इस तरह लोग 60 बरस तक निकाल देते हैं.. सिगरेट की तरह, रोज आठ घंटे.. वक्त फूंकने की आदत। पर कुछ लोगों को जैसे इलेक्ट्रिशियन, ऊंची जगहों पर मजदूरी करने वालों, जोखिम भरे धंधों में लगे लोग... मौत अचानक से कुछ ज्यादा अचानक आती है... 60 साल तक मुर्दानगी घसीटे बगैर। 

बेसमेंट में एयरकंडीशंड, साफ सुथरी जगह. कांच के पार्टीशन्स से बने दफ्तर में 20-25 लोग काम में मशगूल थे... सभी लोग अपने जिम्मेदारियों के प्रति सचेत थे कि नौकरी जारी रहनी चाहिए, ऊपर बैठे अधिकारी में कोई शिकायत ना पैदा हो जाए... इस बार की तनख्वाह से इतने खर्च निकल जाएंगे। बस दिन निकालो... ये साल निकल जाए। कहीं दूसरी जगह जुगाड़ भी तो नहीं हो रही। कम्बख्त उसको तो इतनी तनख्वाह मिल रही है, करता क्या है वो साला? साला कमीना है .. करना-धरना कुछ नहीं...बकर करवा लो। और वो मटका तो मटकने के... कम्बख्त ने बाॅस की दुखती रग पकड़ रखी है। 

कोई चीज धड़ाम से नीचे गिरने की आवाज आई। यक-ब-यक किसी कर्मचारी का वाॅकी-टाॅकी बजा। कुछ लोग बाहर दौड़े... मैं भी सीट से उठा और बाहर की ओर लपका... । जिस दरवाजे से हम अंदर दफ्तर में घुसते थे उसी दरवाजे के बाहर खुलने की हद में ही एक जिस्म फैला पड़ा था... गले में.. मोटा रस्सा जो टूटा था और 4 मंजिला ऊंचाई से मौत ने उसे लपक लिया था। ठुड्डी के नीचे का हिस्सा कटा सा... जैसे किसी बकरे की गर्दन आधी ही काट छोड़ दिया गया हो.. और बकरा भी मौत को चकमा देने की कोशिश में बेहोश सा हो गया हो। किसी सुरक्षाकर्मी ने नाक के सामने हाथ रखकर उसके जीने के अंदाजे लगाए.. शोर मचाया 108 एम्ब्यूलेंस बुलाओ... जल्दी! जल्दी! पर सामने लाश में बदलता एक जिस्म था.. मौत को देखती पथराई आंखों ने वक्त कुछ पल के लिए रोक दिया था कोई सुनता ही ना था... किसी ने उसकी कलाई पकड़ी... और बोला नब्ज चालू आहे...जल्दी करो आॅटो लाओ... तभी उसका साथी शायद उसने ऊपर रहते हुए रस्सा पकड़ रखा था आया और उसके छूकर रूंआसा सा.. नहीं रोने ही वाला था कि किसी ने उसे झिड़क दिया... एक आॅटो वाला आया...जल्दी जल्दी! जल्दी... एक ने कंधों की तरफ से, एक ने टांगों की तरफ उसे उठे उठाया। मौत ने भारी कर दिया था... या मौत से अजनबी छुअन बड़ी ताकत नहीं लगाना चाहती थी.. उसे उठाने पर। एक तीसरे की आवाज आई उसकी गर्दन को लटकने मत दो सहारा दो... तीसरे ने पैरों की तरफ से सहारा दिया.. एक मामूली गार्ड, ऊंचे वाले गार्ड से इस अंदाज में बोला... जैसे कह रहा हो पकड़ ले साले बीच से..तू मरेगा तो घसीट कर ले जाउंगा। उसकी टांगे बाहर ही लटक रहीं थीं। लोग ले गये... उस अस्पताल में जहां तक पहुंचने से पहले ही आम तजुर्बाकारों ने उसे मृत घोषित कर दिया था।

उस जिस्म के आॅटो में लोड होते-होते माॅल मैनेजमेंट करने वाली कंपनी में अफरा-तफरी मच गई। पुलिस केस, कौन फंसेगा कौन बचेगा, उससे दस्तखत ले लिये गये थे या नहीं... उतनी ऊंचाई पर काम करने से पहले उससे लिखवा तो लेना था। किस कंपनी का आदमी था? किसने उसे काम पर लगाया? कौन था उसके साथ? उस कंपनी के साथ कोई एमओयू था या नहीं? एमओयू अपडेट है या नहीं? जल्द फाईल निकालो? गार्ड को बोलो जल्दी उन खून के छींटों को साफ करने को? कोई भी दाग पड़ा नहीं दिखना चाहिये? भीड़ में बात नहीं फैलनी चाहिए। भास्कर वालों को तो मौका मिल जाएगा? पुलिस को फोन लगा लेने और नहीं लगाने वाले दो भागों में बंट गये। तीसरा धड़ा कभी फोन लगा लेने वाले के पक्ष में हो जाता कभी फोन ना लगाने के पक्ष में। 5-7 लाख से कम मंे तो क्या बात बनेगी? एक मुर्गे जैसा पला-पलाया जवान कह रहा था, पुलिस वालों का फोन आ गया है, कह रहें आ कर मिल लो,,, बैठ कर बात करो समझे ना... उसने अबूझ स्माइली सी आंख मारी। मैनेजर एमओयू के पेपर्स के पीछे पड़ा था। पेपर निकाले गये एमओयू पुराना हो गया था, उसका नवीनीकरण किया ही नहीं गया था। सारी आवाजें शोर के प्रथम तल से खुसफुसाहट के बेसमेंट तक आ ठहरीं थीं और अब ज्यादा स्प/ट सुनाई दे रहीं थीं। मैंने एक आदमी से पूछा- क्या वो वाकई लाश हो गया? वो बोला-हां पक्का, कन्फर्म। अंग्रेजी में कन्फर्म सुनकर मुझे भी तय हो गया कि मैंने उस जिस्म को वाकई मरने से पहले फड़कता देखा। सारी बीमारी में मां को तड़फता देखा पर मौत के वक्त इधर-उधर हो रहा। पर इसे तो बिल्कुल... हां मैंने देखा ना।

कुछ साल पहले शहर में बन रहे पहले माॅल में एक क्रेन से, एक पुताई करते समय और एक आदमी शीशे लगाते वक्त.. गिर मरे थे। पिछले ही दिनों उसी माॅल के बेसमेंट में में किसी जीजा ने साली की चाकुआंे से गोदकर हत्या कर दी थी। उस माॅल का मालिक भारत के नं 1 अखबार का मालिक था। सारे भारत में वह अखबार निकलता था। इतना फैला था कि दो चार दस मौतें उसमें आसानी से समा जातीं थीं बिना निशान छोड़े। बाहर से आया प्रतिद्वंवी अखबार ही उन मौतों को जूम करके दिखा पाया था। प्रतिद्वंवी अखबार को जनता के सामने नि/पक्ष बनना था। उसका शहर में कोई माॅल नहीं था सो वो सारी दुर्घटनाओं, मौतों को छापता था। शहर के किसी भी माॅल की घटना को... चाहे तो वो विज्ञापन दे...या...? 

पुलिस, मीडिया में फोन घुमाते-घुमाते.. मौत के लाल छींटे पोंछते-पोंछते मैनेजमेंट वालों को पसीने आ रहे थे। बाहर शोर सुनाई दिया मजदूर की लाश लिए... मजदूरों का एक जत्था आया था. मैंने महसूसा.. उस शोर को साइलेंसर पी गये। बात कमिश्नर तक पहुंच गई थी। रकम मोटी हुई जा रही थी। मैनेजमेंट को माॅल मालिक को जवाब देना था... मृतक की बीवी, बच्चों की जिंदगी सवाल बनी रहे तो बनी रहे। माॅल साला वैसे ही घाटे में था ऊपर से इस मनहूस को यहीं मरना था? 

रस्सा उसकी उम्र थी...वो वहीं से टूटा जब उसकी उम्र खत्म हो गई थी। किसी का रस्सा कितना ही मोटा क्यों ना हो... भाग्य की सिल से रगड़ खाता हुआ, कभी भी टूट सकता है... या ऊपर खड़े दोनों में से जिसने पकड़ रखा है वो लापरवाह हो सकता है? या आपकी बेहोशी दारू में दिखी लहरों को सच कर सकती हैं... सारा शहर तो डोलता है। आप भी मानेंगे.. यह खयाली प्रेमिका के लिए लिखने वाली लाईनों से बहुत ज्यादा बेहतर विषय है। प्रेमिका अगर निवस्त्र हो पुकारे तो भी बेवफा है, धोखा है... मौत सच है। अगर जवान होने का मौका मिले तो मौत को प्रेमिका से पहले जानना चाहिए। वही तो उम्र होती है... जब जिस्म में फट पड़ने को तैयार हो जिंदगी... और हमें मौत के हिंडोलों में बैठने का स्वाद चखना चाहिए । इंसान की प्रजाति की उन्नत किस्में जवानी में ही मौत को जान पाईं। कई तो जवानी में ही जिंदगी को निर्वस्त्र विलाप करता छोड़ गईं। मौत की खूबसूरती से किस बला की तुलना... जो जिस्म बीस का हुआ है...50 का भी होगा। और 50 के लक्षण बड़े डरावने हैं... आप बोटोक्स से चेहरे कि कितनी लकीरें छिपा लेंगे, किस-किस जगह के बाल सफेद होने से बचा लेंगे। ये बाल इच्छाओं की तरह हैं, अनचाही जगहों पर आते हैं.. घने काले, लम्बे-लम्बे। और जहां चाहो, वहीं धूसर, सफेद हो जाते हैं... उड़ जाते हैं। 

मैंने तुम्हें बताया क्योंकि मुझे लगा कि उसके साथ ही कुछ हिस्सा मैं भी मरा। ‘मैं’ जो मानता ही नहीं...। लगभग हर दिन ही दूर, पास और सामने ही... कई हकीकते गुजरती हैं पर जागता ही नहीं। गलतफहमियों के कीचड़ में कमल की तलाश। कि दीपिका पादुकोण/प्रिंयका चोपड़ा ने आज सेक्टर का नंबर पूछा है, कल मेरे घर का पता पूछेगी... परसों फोन नं... और.... रोज एक नया ख्वाब। एक बेचैनी जो जिस्म में पैदा होते हार्मोन्स पर विवेक की हुकूमत खो बैठती है। आदतों में जीते-जीते हम रोबोट बनाने लगते हैं और रोबोट्स के साथ रहते-रहते हम रोबोट्स हुए जाते हैं। हमें अपने पतन पर गर्व है। हम चाहते हैं कि इस ओर के 125 करोड़ लोगों पर अंग्रेज आज भी राज करते तो बेहतर होता। कई सौ साल की गुलामी की यंत्रणा के अनुभव, हमारे जीन्स से बस 100 सालों में गायब हो चले हैं। 
शायद किसी संवेदनहीनता की कमी थी। नजफ भट्ट 4 दिन की छुट्टी के बाद काम पर लौटा था। उसके भाई की शादी थी। बरफी लाया था..दरवाजे पर साफ—सफाई के बाद बर्फी बांटी गई। लोग नई लाश, अभी-अभी देखी सुनी मौत को.. बरफी के स्वाद के साथ पचाने की कोशिश कर रहे थे।

माॅल प्रबंधन खुश है ... बस इतने से ही बात बन गई। अब सीख मिली कि ऐसा हादसा होने से पहले क्या होने देना है और बाद में क्या करना है। पुलिस खुश है कि माॅल तरक्की कर रहा है वो अब 10 लाख तक निवेश कर सकता है पुलिस कल्याण के लिए। वो जरा सी चूक के लिए अब पहले से कहीं ज्यादा तैयार है। निकम्मे झोंपडि़ये शहर को गंदा करने वाले निरोध का इस्तेमाल क्यों नहीं करते? साले बद-बेक्ल अपनी शुक्राणुओं को फैलाये ही चले जाते हैं...जैसे ये इतने कीमती हों कि इनकी मां को इब्नेबतूता आंइस्टीन ने...। 

नहीं भाई... सब जुड़ा हुआ है। यह प्रलाप नहीं... जरा ऊंचे से देखिये. चींटी जैसे लोग... 2डी स्क्रीन पर रंेगता हुआ सारा एक ही शहर। उसी शहर का एक महीन सा काला बिंदु ... सभ्यता के ऊंचे माॅल पर 15 बाई 50 फिट का फ्लैक्स टांगता हुआ... वक्त के उच्च तापमान से पिघल कर गिर पड़ा था। फ्लैक्स का तीसरा सिरा हवा में है... उससे लाल रंग के छींटे बरस रहे हैं, मुझे आज रात नींद नहीं आई... क्या आपको ये छींटे महसूस नहीं होते?