बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

हल नहीं ढूंढा करते



खाक में गुजरा हुआ कल, नहीं ढूंढा करते
वो जो पलकों से गिरा पल नहीं ढूंढा करते

पहले कुछ रंग लबों को भी दिये जाते हैं
यूं ही आंखों में तो काजल नहीं ढूंढा करते

बेखुदी चाल में शामिल भी तू कर ले पहले
यूं थके पैरों में पायल नहीं ढंूढा करते

जिस ने करना हो सवाल आप चला आता है
लोग जा जा के तो साहिल नहीं ढूंढा करते

ये हैं खामोश अगर इस को गनीमत जानो
यूं ही जज्बात में हलचल नहीं ढूंढा करते

पीछे खाई है तो आगे है समन्दर गहरा
मसला ऐसा हो तो फिर हल नहीं ढूंढा करते

बुधवार, 11 सितंबर 2013

जिंदगी को यूं ही व्यर्थ गुजारना


सबसे ज्यादा दु:ख निरन्तर मानवता में हो रहे ह्रास को वहाँ देखकर होता है... जहाँ लोग उन नौकरियों से जकड़े बैठे हैं जो उन्हें पसंद नहीं हैं लेकिन क्योंकि उनमें भय है कि कहीं इनसे भी घटिया नौकरी ना करनी पड़े. लोग दिमाग से खाली हो गये हैं. वो कांपते हुए जिस्म भर हैं जिनमें डरा हुआ और आज्ञाकारी मन है. उनकी आंखों से रंगत चली गई है. उनकी आवाज भरभराई हुई है और भद्दी है.. यही हाल उनके शरीर, उनके बालों, उनके हाथों के नाखूनों, उनके जूतों और यही हाल उनके सारे किये गये कामों का भी है.

तो मेरी किस्मत थी कि अंतत: मैं इन जगहों से बाहर निकल गया, इस सब में कितना समय लगा... ये बात बेमायनी है.. यह सब जान मुझे एक तरह का आनंद महसूस होता है, किसी चमत्कार को देखने जैसा आनंद. अब मैं एक पुराने मन और पुरानी देह से लिख रहा हूं.. उस पुराने समय के बहुत परे से..जबकि आज भी कई आदमी उसी पुराने ढर्रे.. उन्हीं सब चीजों पर ही निरन्तर चलने की सोचते हैं.. जब जबकि मैंने बहुत देरी से शुरू किया.. मेरी खुद की इच्छा है कि अब में इसी राह पर चलूं..अब जबकि शब्द लड़खड़ाने लगे हैं.. मुझे सीढ़ियां चढ़ने के लिए रेलिंग की मदद लेनी पड़ती है.. अब मैं एक पेपरक्लिप की मदद से चिढ़िया नहीं बना पाता, मैं अभी भी महसूस करता हूं कि मुझमें कुछ यादें अभी भी बाकी हैं.. ये मुद्दा नहीं कि में अब मैं उस सबसे कितनी दूर आ गया हूं... मैं अपनी हत्या होने से बच पाया हूं.. कई ​उलटफेर गड़बड़ियों और कड़ी मेहनतों से गुजरा हूं और उस रास्ते पर आ पाया हूं कि एक भली मौत गले लगा सकूं.

जिंदगी को यूं ही व्यर्थ गुजारना भी मूल्यवान है, यदि यह सब स्वयं मेरे लिए ही हो.. मैं अपने लिए ही करूं...

Author Charles Bukowski in a letter to a friend about finally “breaking free” of his job and being able to write :
And what hurts is the steadily diminishing humanity of those fighting to hold jobs they don’t want but fear the alternative worse. People simply empty out. They are bodies with fearful and obedient minds. The color leaves the eye. The voice becomes ugly. And the body. The hair. The fingernails. The shoes. Everything does.

So, the luck I finally had in getting out of those places, no matter how long it took, has given me a kind of joy, the jolly joy of the miracle. I now write from an old mind and an old body, long beyond the time when most men would ever think of continuing such a thing, but since I started so late I owe it to myself to continue, and when the words begin to falter and I must be helped up stairways and I can no longer tell a bluebird from a paperclip, I still feel that something in me is going to remember (no matter how far I’m gone) how I’ve come through the murder and the mess and the moil, to at least a generous way to die.

To not to have entirely wasted one’s life seems to be a worthy accomplishment, if only for myself.

शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

मौत से क्यूं मैं रोज डरता रहा


मौत से क्यूं मैं रोज डरता रहा
हकीकत तो मैं रोज मरता रहा
एक बार इश्क से होकर गुजरा
बारहा मैं खुदा से डरता रहा
सहना सब्र और समझ का रस्ता
बस मुसीबतों से यूं तरता रहा
जब भी किसी का दर्द टटोला तो
मेरे दर्द पर अमृत झरता रहा
जब भी जीवन में कुछ शिवम पाया
याद में मां की, शीश धरता रहा
छंद में मात्राओं का संतुलन
अर्थ के अन​र्थ कई करता रहा

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

उम्रें

कम उम्र किशोरों में उम्र के बारे में जो ख़याल होते हैं, उनमें ज्यादा मतभेद होते हैं। जैसे जैसे उम्र बढ़ती है यह खयाली मतभेद कमतर होते जाते हैं। साठ साल का आदमी 50 साल वाले से ज्यादा पूछपाछ नहीं करता... इंतजार करता है, वो 10 साल का फासला यूं ही गुजर जाता है।
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उम्र के फासलों के धोखे में रहना 
ख्वाबों—खयालों के झरोखों में रहना
दानापन नहीं है

जिस्म की इमारत बनते—बनते ही
खंडहर भी होने लगती है

तो छत खुली रखो
अक्सर टहलो
और जब तक इमारत राजी हो
खुलापन संजोओ

फिर मैदानों की ओर लौट चलो.

वो लम्हा खूबसूरत है जहां
किसी भी दिन के शिखर पर
एक नजर में ही
सारे उतार—चढ़ाव दिखते हैं

जहां से दिखता है कि
उम्र के उतार—चढ़ावों की ओट में
झूठ के सिवा कुछ नहीं है।

बचपन.जवानी.बुढ़ापा नादानी
सब एक साथ, सांसों में
आता जाता है... हर पल

दाने लोग
उसी पल को 
जीने की बात करते हैं.

रविवार, 23 जून 2013

एक इंटरनेट दोस्त से कहीं ज्यादा जिगरी...कहीं अपना

कल परसों ही जब गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुले तो मैंने 5 साल की तोषी से सुना...., उसकी मैडम कह रही थी कि किसी उत्तरखांड नाम के देश में बहुत सारे लोग बादल फट जाने से मर गये, उसने पूछा उत्तरखांड नाम का देश, हमारी सोसायटी से कितनी दूर है? बादल फटना क्या होता है? जब ढेर सारा इकट्ठा पानी गिरता होगा तो नहाने में और मजा आता होगा... बाढ़ में कार बहती होगी तो वो अपने आप ही चलती होगी.. पेट्रोल लगता ही नहीं होगा... आदि-आदि।

इस तरह उत्तराखंड जैसे हादसों के बाद मैंने अक्सर सोचा कि मुझे कितने किलोमीटर तक रहने वाले इंसानों के बारे में सोचना और उनके बारे में चिंतित होना चाहिए। क्योंकि बीवी बच्चों और दो चार रिश्तेदारों के बारे में ही हम कुछ कर सकने की जिम्मेदारी महसूस कर पाते हैं, तो क्या मुझे अपने परिवार के बारे में ही सोचना-समझना-करना चाहिए? इससे ज्यादा मोहल्ले की गतिविधियों में शामिल होना चाहिए? या जिस दिल्ली मुम्बई शहर में काम कर रहे हैं वहां के निवास स्थल के आसपास और स्थानीय गतिविधियों में, जहां शारीरिक उपस्थिति दर्ज कराई जा सके वहां के बारे में चिंतित होना, समझना, करना चाहिए? या फिर दूर 5000 कि.मी. दूर जापान में आये सूनामी में परमाणी विकिरण के खतरों के बारे में, दक्षिण अफ्रीका की भूख के बारे में, अमरीका के ऐश्वर्य-उन्माद-खोखली जीवनशैली से तंग लोगों के बारे में सोचना चाहिए जो आॅटोमैटिक गन से भीड़ पर गोलियां चलाने लगते हैं?

फिर लगा कि समाधान तो सामने ही दिख रहा है.. उत्तराखंड में स्थानीय लोगों ने ही बचाव कार्य किया. जापान में आये भूकंप-सूनामी में भी स्थानीय लोगों ने ही सब कुछ को महीनों में ही पटरी पर ला दिया... इजराइल लेबनान-फिलिस्तीन की समस्या भी स्थानीय लोगों द्वारा ही बनाई रखा जी सकती या सुलझाई जा सकती है... कश्मीर की समस्या भी आर पार के स्थानीय लोगों द्वारा ही बनाई रखी या सुलझाई जा सकती है...

क्योंकि किलोमीटर्स दूर बैठे लोग किसी फेसबुक स्टेटस या पेज को लाइक कर सकते हैं ज्यादा से ज्यादा कमेंट कर देंगे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर देंगे.... ज्यादा से ज्यादा किसी चुनाव में किसी पार्टी को वोट कर देंगे... बाद में जब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर मनमानी करने वाले मनमोहन बैठ गये, तो फिर... वही सालों इंतजार करने वाले बेनाम आम आदमी का रोल आपको ही निभाना पड़ेगा। 

इस सारी कवायद का सार यह है कि इंटरनेट पर हजारों नेट मित्रों में सक्रिय रहकर भी कोई परिणाम नहीं निकलता, और मोहल्ले में दो चार लोगों के सक्रिय सहयोग से इतनी समस्याओं का समाधान हो सकता है कि आप किसी इंटरनेट वेबसाईट पर लाखों लाईक्स और कमेंट पा सकें, सो स्थानीय स्तर पर, शारीरिक संपर्कों में ज्यादा-ज्यादा सक्रिय रहिये... शारीरिक स्थानीय स्तर के संपर्क टूट रहे हैं और आत्महत्या के केस बढ़ रहे हैं... । लोग इंटरनेट पर हजारों मित्रों से 24 घंटों जुड़े हैं पर अंदर ही अंदर खोखलापन-बेचैनी... भाई.बहिन.मां.बाप से दिल की बात नहीं कर रहे... रोज दो चार आत्महत्याओं की खबर पढ़ने को मिलती है... इस हिसाब से सप्ताह में 30-40 महीने में 200 लोग मर रहे हैं... क्या ये उत्तराखंड में बादल फटने, जापान में भूकम्प सूनामी, चीनी सीमा पर सेना के खड़े होने, कश्मीर समस्या और दक्षिण अफ्रीका में भुखमरी की समस्या से ज्यादा प्राथमिकता वाली.. जरूरी चीज नहीं है.... 

आप यहां तुरंत... अभी सक्रिय हो कर इंसानियत को बचा सकते हैं... बिना इंटरनेट कनेक्शन के और प्रतिसाद भी हवाहवाई..ख्वाबख्याली नहीं.. अभी यहीं तुरंत मिलेगा...एक इंटरनेट दोस्त से कहीं ज्यादा जिगरी...कहीं अपना... मां बाप भाई बहिन बुआ मौसी चाचा चाची जैसे मजबूत रिश्ते... जो किसी भी निराशा की गहरा दल दल बनने की संभावना ही खत्म कर दें, जो आपको आत्महत्या के मगर के मुंह में ले जाये।

बुधवार, 19 जून 2013

लगभग कुछ सालों बाद ...





लगभग कुछ सालों बाद
समन्दर के किनारों पर सूनामी जैसे भयंकर तूफान आने चाहिए

लगभग कुछ सालों बाद
नदियों के किनारे झुग्गियों.गांव.शहरों में बाढ़ आनी चाहिए

लगभग कुछ सालों बाद
पहाड़ी और रेगिस्तानी इलाकों में भूकम्प आने चाहिए
लगभग कुछ सालों बाद
जंगलों में आग लगनी चाहिए

लगभग कुछ सालों बाद
किसी तरह की कोई उथल-पुथल तो होनी चाहिए
लगभग कुछ ही सालों बाद
आदमी के बसाये गांव और शहर
बड़ा बोर करने लगते हैं

लगभग कुछ सालों बाद :
... समन्दर और नदियां प्रदूषित हो जाती हैं
... पहाड़ों पर ढेर सारा कचरा जमा हो जाता है
... बासे जंगलों में फंफूंद उग आती है
लगभग कुछ ही सालों बाद
आदमी के बसाये गांव और शहरों में
संस्कृति सड़ जाती है।

लगभग कुछ सालों बाद
कोई क्रांति तो होनी ही चाहिए,
आदमी में ना सही,
अकेले-अकेले पंचतत्वों:
आग.हवा.पानी.धरती. और आकाश में सही।
ताकि आदमी 
इन शब्दों के अर्थ से वाकिफ रहे :

"ओम शांति शांति शांति..."

- राजेशा

मंगलवार, 28 मई 2013

ज़िंदगी का कोई सिर पैर नहीं है..

जब लिखने का मन होता है,फुर्सत नहीं होती. जब फुर्सत होती है, सूझता नहीं कि क्या लिखें? कुछ बेहतर लिखने के लिए समझ और फुर्सत का संयोग होना आवश्यक है.
एक थे आशी जी. जब कोई व्यक्ति 'है' होता है तो उसके बारे में लिखने में बड़ी झंझटें होती हैं, जब कोई आम व्यक्ति 'थे' हो जाता है,तो उसके बारे में बेधड़क लिखा जा सकता है. खास लोग-- मरने के बाद भी अपनी आपत्तियॉं बनाये रखते हैं. 


नहीं, अभी सोचना नहीं है
किसी दूजे इंसान के बारे मे
नहीं, अभी सोचना नहीं है
किसी कुदरत के बारे में
ना ही सोचना हैा
किसी खुदा के बारे में

हालांकि कुछ भी तय नही है
फिर भी,
नहीं, अभी फुर्सत नहीं हैं
कल हो ना हो
कल का ख्याल है
क्या पता कल हो, ना हो
आज सा, पहचाना सा
रोटी कपड़ा मकान दुकान धंधा पानी
इनकी निरंतरता
क्यों इतनी जरूरी लगती है
कि पिछले छत्तीस बरस से
मैं इन्हीं के इंतजाम में खत्म ​हूं
असल में

मैं पांच अरब दुनियांवालों से
अलग थोड़े ही ना हूं

किसी को क्या सूझता है
इसका पता
इसी बात से चल जाता है
कि वो अक्सर क्या करता है...
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कई तरह की इन्द्रियां होने के बावजूद हम देखने, सुनने, कहने, सोचने, समझने सब चीजों में अनुमान ही लगा पाते हैं... 

रिश्तों को ही लीजिए जिस मां बाप के साथ मैं बरसों रहता हूं, उनके बारे में भी बहुत कुछ अनुमान ही होता है। यदि आप उनके बारे में बहुत कुछ पक्का कह सकते हैं.. तो ये सब वो बातें होती हैं जो उनकी आदते हैं.. जो आपके साथ के दौरान जाहिर हुईं, ना कि वो जो किन्हीं और तरह की परिस्थितियों में बदल जाएंगी। ऐसा ही इंसान के सामाजिक रिश्तों के बारे में भी है। ऐसा ही हमारे जीवन में आने वाले नये और पुराने लोगों के बारे में है। हम टटोलते— टटोलते हुए चलते हैं... सुनने, सूंघने, छूने और रोजमर्रा के घने काले अंधेरे में आंखे फैला कर देखने की कोशिश करते हैं.. यहां तक कि हम अतीत के अनुभवों को भविष्य में प्रक्षेपित करते हुए अपने निजी तकिया कलाम या, मत भी गढ़ लेते हैं. उन्हें अपनी आगामी जिंदगी के लिए द्वार पर बैठा देते हैं, कि अब कोई.. इस टाईप का आये तो देख लेना. ये जवाब देकर चलता करना या, ये कहकर इंतजार करने को बोलना.. या ये कह के वापिस बुलाना.. बोलना मैं पक्का मिलूंगा।

हम आंखों से देखते हुए भी वह नहीं देखते जो हकीकत है, कानों से वो नहीं सुनते जो हकीकत है, मन से वह नहीं महसूस करते जो हकीकत है, हाथों से वह नहीं छू पाते जो हकीकत है, पैरों से वहां तक नहीं पहुंच पाते जो हकीकत है.. एक अनजानी सी दशा में ही डोलते रहते हैं...

मैं आधी रात को सरकारी कुर्सी पर बैठा हूं। चारों तरफ से मच्छरों का धावा है। पैरों से चलना फिरना है सो ढंक नहीं सकते, हाथों से लिखना है इन्हें भी ओढ़ाया नहीं जा सकता.. आल आउट जैसे उपाय जहरीले हैं.. इनके धुंए से कैंसर हो सकता है। मच्छर भगाने वाली क्वाइल से अस्थमा होता है.. आडोमास से त्वचा संबंधी रोग..मच्छरदारनी के अंदर लेपटॉप लेकर बैठो तो ... लेपटॉप पर कुछ टाईप करना...मजा नहीं आता। आपको लिखना भी है और समांतरत: मच्छरों से भी निपटना है। कुछ मच्छर मारे जायेंगे.. कुछ कुछ खून पियेंगे..कुछ उन विचारों को खा जायेंगे जिनका आप रातभर इंतजार करते रहे।

हम अपनी मजबूरियों से डरते हैं, इसलिए नफरत करते हैं.. उनसे उबर नहीं पाते। मजबूरियां मतलब वो छोटे छोटे सुख सुविधाएं 'जिनका होना ही' हमें जिंदगी लगता है.. इस सुरक्षित संरक्षित रहने की कोशिश में ही हम नर्क गढ़ लेते हैं. नहीं तो औसत 65 साल की उम्र मिले तो क्या आप रोज़ाना आठ दस घंटे कोई फालतू सी नौकरी करेंगे? 24 घंटों का बंधा—बंधाया रूटीन बनायेंगे?

ज़िंदगी का ही कोई सिर पैर नहीं है..फिर शुरू कहां से मानना और खत्म कहां करना...?

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

.... नहीं चाहते हो.


ज़माने भर से दिल्लगी और हमसे बेरूखी क्या है,
यूं तो तुम कहते हो, कि हमें आजमाना नहीं चाहते हो.

अपने किस काम में लाओगे, बता दो मुझे ऐ दोस्त
ये माना कि तुम मेरी दोस्ती, गंवाना नहीं चाहते हो.

यूं जो, ढली शाम, गली से बचते हुए तुम निकले हो
क्या कयामत तलाश है कि, घर जाना नहीं चाहते हो.

ये जो अहसान किया करते हो दीवाने को शैदाई बुला
ये कैसी अदा, हारे हुए को हराना नहीं चाहते हो.

यूं कहां खो गये? क्या हो गये? कि खबर ही नहीं
तुम्हारी नज़र कहती थी, रोना-रूलाना नहीं चाहते हो.

तेरी याद का इक लम्‍हा -रश्‍मि शर्मा


तेरी याद का इक लम्‍हा
मुट़ठी में बंद जुगनू जैसा है
काली अंधेरी रात में
दि‍प-दि‍प कर जलता है
बांधना चाहूं तो
कहीं दम तोड़ न दे, डर लगता है

तेरी याद का इक लम्‍हा
मुझमें पीपल की तरह उगता है
खाद-पानी की नहीं दरकार
अंधेरे, सीले से कोने में जन्‍मता है
और अपनी उम्र से पहले ही
कोई मारता है, कभी खुद मरता है

तेरी याद का इक लम्‍हा
मन में पखेरू सा कुलाचें भरता है
आकाश में जब अंदेशों के
घि‍रते हैं काले मेघ
भीगी चि‍रैया सी डरता है, और
यर्थाथ की कोटर में जा दुबकता है.....

..................... रश्‍मि शर्मा