गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

जरा सी जिंदगी,किस किस तरह जीते

बड़े दिनों बाद... पागलपन आया याद



इक जरा सी जिंदगी, किस किस तरह जीते
बस एक ही क़तरा था, किस—किस तरह पीते.

सूरज आता, सताता कि कुछ कर
रात कहती, जिओ जैसे हों सुभीते

जो गये, बस खो गये, अब ढूंढे कैसे?
ढूंढो... जब त​क ये जिंदगी ना बीते.

ज़िंदगी ने लिया ही लिया, दिया क्या ?
ख्वाहिशें निकली हीं थी, लगे पलीते.


रविवार, 3 मार्च 2013

गुलाब, कैक्टस और बाबू मद्रासी का कुत्ता


बाबू मद्रासी सरकारी दफ्तर में दफ्तरी था। रामखिलावन की पत्नी ने पूछा-दफ्तरी क्या होता है? रामखिलावन ने बताया था - दफ्तरी होना एक मुगालता होता है। दफ्तरी मतलब ‘कुछ’ होने का भाव। दफ्तरी स्वयं को सारे दफ्तर की गतिविधियों का केन्द्र मानता है, वो चौराहे पर बैठा वो कुत्ता होता है जिस पर से नए-नए मेट्रो हुए शहर की बस गुजर जाती है और वो समझता है कि बस ने उसके चौराहे पर फैले होने का ध्यान रखा और बाकायदा बड़ी सटीकता से उसकी पूंछ के बालों का भी बांका किये बगैर गुजर गई। खैर हमें इस दफ्तरी और कुत्ते की तुलना से कुछ आगे बढ़ना है। 

निराला की एक कविता है- गुलाब और कैक्टस। गुलाब विशिष्ट पूंजीपति शासक अभिजात्य वर्ग का प्रतीक है और कैक्टस दबे-कुचले शासित श्रमिक वर्ग का। रामखिलावन ने बताया कि निराला भी उस वर्ग को बिसरा गये जो असली संसारी है। ना इधर का ना उधर का.. मध्यम वर्ग। 

रामखिलावन के हिसाब से बाबू मद्रासी कन्वर्टड ईसाई था। कन्वर्ट होने, बदलने की जरूरत किसे थी? कोई ब्राम्हण क्यों कन्वर्ट होगा? कोई क्षत्रिय भी क्यों कन्वर्ट होगा? कोई वैश्य भी क्यों कन्वर्ट होगा? कन्वर्ट वो होगा जो कुछ है ही नहीं... जो किसी सूची में अनुसूचित है या जो अभी भी जंगलीपन से उबरा नहीं है..जनजातीय है.. पता नहीं अनुसूचित जाति और जनजाति का अर्थ क्या है? या शायद चालाकों को हरिजन में भी भेद दिखा कि वो तो हरि के जन और हम...? तो अब आप भी जानते हैं रामखिलावन चलने से पहले ही भटक जाता हैं।

‘बाबू मद्रासी’ उस दफ्तरी को दिया गया सरल नाम था। सारे मुहल्ले के लोग उसे इसी नाम से जानते थे पर बुलाते नहीं थे। दरअसल हमारा असली नाम वो होता है जिसे हमारे पीछे लोग एकदूसरे से बातचीत में इस्तेमाल करते हैं। बाबू मद्रासी को कहीं से पता चला कि उसके अफसर की कुतिया ने पिल्ले जने हैं। तो बाबू ने दफ्तरी.. दफ्तर और अफसर की कडि़या जोड़ते हुए कुत्ता प्राप्त कर लिया। कुत्ता देखने में साधारण था वैसे ही जैसे हमारे मोहल्ले में पाये जाने वाले.. पैदा होते वक्त ठीक ठाक और बाद में साधारण से अतिसाधारण होते जाने वाले और अंततोगत्वा खुजली खाकर मर जाने वाले कुत्ते। 

छोटा सा कुत्ता, सर्दी के दिन, वो कुत्ता अक्सर सोसायटी का चैकीदार के पास दिखता। शायद बाबू मद्रासी को लगा कि इतना साधारण सा कुत्ता लेकर उसने ठीक नहीं किया. बाबू को लगा कि उसके अफसर ने कुतिया का ध्यान नहीं रखा। कालान्तर में खिलाने-पिलाने पर कुत्ता अच्छा खासा दिखने लगा। बाबू के बच्चे उसे उठा-उठा कर घूमने लगे। धीरे-धीरे बाबू मद्रासी ने महसूसा कि कुत्ता अब ऐसा हो चला है कि सुबह सुबह-साथ ले जाया जा सकता है। घरवाली के पेटीकोट के महंगे नाड़े से बंधा मोटा सा पिल्ला सोसायटी के गेट पर जाकर अटक जाता, तो बाबू को समझ नहीं आता कि क्या करे? खैर घसीट-घसाट के कुत्ता मोहल्ला दर्शन या मोहल्ले की सड़कों के किनारे गंदगी फैलने जाने लगा। रामखिलावन कहते थे कि मोहल्ले के कुत्ते, पालतुओं से ज्यादा प्राकृतिक और समझदार होते हैं... वो मूत्र और पखाने के बाद धूल उड़ा कर ढंक दिया करते हैं, इन पालतुओं में वो तमीज भी नहीं होती।

खैर कुत्ता धीरे-धीरे बाबू मद्रासी का हो गया और बड़ा होता गया। पहले माले पर स्थित फ्लैट की बालकनी में बंधा कुत्ता कूंकियाता रहता। कुत्ते का बाबू के परिजनों यानि मनुष्यों में रहना था। पिछली टांगों के बल खड़े होने पर बालकनी से उसकी अपनी प्रजाति से लगते कुत्ते मोहल्ले भर में दिखते, उनसे उसके वही संबंध थे जो बाबू मद्रासी होने देता। जब मोहल्ले के कुत्ते भौंकते तो उसे समझ में नहीं आता और जब बाबू मद्रासी का कुत्ता भौंकता तो मोहल्ले के कुत्ते बिना उस ओर ध्यान दिये अपनी गतिविधियों में लगे रहते। रहने, खाने-पीने, दिन में दो एक बार टहलने को मिलता। धीरे-धीरे कुत्ता विचारक होता गया। रोटी-कपड़े-मकान के बेसिक इंतजाम के बाद मध्यवर्गीय भी अक्सर विचारक हो जाते हैं। कुत्ता अपने जैसे अन्य पालतू और मोहल्ले में आवारा विचरते कुत्तों के बीच तुलना करने लगा। क्या उसकी जिंदगी अच्छी है या ये जिंदगी ही नहीं है? या मोहल्ले के आवारा कुत्तों का जीना नर्क है उसकी ही जिंदगी स्वर्ग है? कुत्ता मनुष्यों के बीच था, वो कुत्ता था और मनुष्य मालिक थे। हालांकि भोजन में कुछ तो उसे कुत्ते होने के हिसाब से मिलता, पर कुछ मालिकों के खान-पान के हिसाब से भी ग्रहण करना पड़ता। जब उसे बाहर जाने की तलब होती तो मालिकों को फुर्सत ना होती और जब वो नहीं जाना चाहता मालिक टहलने की औपचारिकता को पूरा कर फ्री होने के लिए उसे घसीटते। धीरे-धीरे उसे अपने हिसाब से ना चलने देने का मनुष्यों का व्यवहार अत्याचार लगने लगा। इंसान होता तो वो इसे ‘आजादी’ शब्द से व्यक्त करता। 

मोहल्ले के कुत्ते आजा़द थे, वो जब चाहे भौंकते, जब चाहे छाया में रहते, जब चाहे धूप में, जब चाहे बारिश में भीगते। रात को कुत्ते के भौंकने से सारा मोहल्ला गूंज जाता। उसे जरूरत ही नहीं पड़ती। उसे समझ ही नहीं आता था कि वो इंसानों के बीच ही क्यों है? क्यों उसे पाला गया है? क्यों उसका इतना ध्यान रखा जाता है? क्यों नहीं उसे मोहल्ले में आजाद छोड़ दिया जाता? धीरे-धीरे उसने तुलना करनी शुरू कर दी। वो जहां था सुरक्षित था, सर्दी-गर्मी, धूप-बरसात से बचा हुआ था, खाने-पीने और वातानुकूलन के इंतजाम थे। बीमार पड़ने, खुजली होने पर उपचार की व्यवस्था थी। गली के कुत्तों का जीवन भी क्या जीवन था? एक तो ढेर-से पैदा होते? उसने ही बालकनी से देखा था कि एक कुतिया ने सड़क किनारे 7 पिल्ले जने थे। दो-चार दिन में 1-2 सड़क पर गुजरती कारों तले आते गये... एक आध ही बचा था जो महीने भर की उम्र पार कर सका। कुछ बड़े हुए कि खुजली हो जाती है? और लाख तरह की बीमारियाँ... समय पर भूख का निपटारा नहीं होता, बासा-सड़ा गला खाना, पीने को गंदा पानी? फिर अपने अपने इलाकों के लिए लड़ाई-झगड़े? किसी की टांग इंसानों ने तोड़ दी तो किसी के कान को प्रतिद्वंद्वी ने काट खाया, किसी के शरीर का एक भाग ही शरीर से बाहर है? किसी के बाल खुजली से पूरे झड़ गये हैं, पूरी तरह नग्न। एक 4 माह के पिल्ले को तो एक मोटा-सा सुअर जिंदा खा गया था। आज़ादी इतनी आसान नहीं होती। 

लेकिन दूसरी तरफ यह जीवन भी तो कितना ऊब भरा था। भूख नहीं है पर सामने भोजन पानी। ना खाओ तो बीमार समझा जाता। दिन भर पट्टे से बंधे रहो, टहलने भी जाओ तो मालिक के हिसाब से। ना मां बाप का पता ना कोई किसी यार दोस्त की खबर। मालिकों के तलवे चाटकर निज’कुत्तापन और गुलामी ही झलकती? मोहल्ले के कुत्तों की उसकी रिरियाहट समझ नहीं आती। यहां तक कि ना तो मोहल्ले के कुत्ते उसके पास फटक पाते ना ही उसे किसी को संूघने दिया जाता। कुत्ते होकर कुत्ता’इतर किसी प्रजाति मनुष्य में जीवन गुजारना... इसमें कहाँ की समझ थी।

रामखिलावन बोला - दफ्तरी और पालतू कुत्ते में ज्यादा अंतर नहीं होता, बस ये कि... शायद कुत्ता ये सारी बातें कभी सोच भी लेता हो।

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2013

एक सपाट जि‍न्‍दगी


मूल कवि‍ता : वि‍लि‍यम हेनरी डेवि‍स 


व्यर्थ का धन-दौलत क्यों चाहूं
जबकि सूरज मेरा दोस्त है
जो कतई कंजूस नहीं है
लुटाता है, अपनी अपार रोशनी, बेवजह

हीरे जवाहरात जैसे कीमत पत्थर क्यों चाहूं
जबकि यह हरी भरी सुबह
जहां भी मैं जाऊं
बिनी किसी शुल्क के
ओस के मोती लुटा रही है


इन बेजान किताबों में क्या रखा है
जबकि मुंडेर पर बैठी चिडि़या
अपनी मीठी जुबान से
अपने सबसे खुशनुमा गीत
जोर-जोर से पढ़कर सुना रही है

क्यों चाहूं अद्वितीय चित्रकारी वाली
बहुमूल्य पेन्टिन्गस
जबकि बादल दिन में हजार बार
आकाश को कुछ नया ही रंग देते हैं
मेरे आंखों को खुश करने के लिए

नहीं चाहिये
सिर पर चढ़ बैठने वाली शराब।
जबकि, जब भी मैंने पिया है मौसम
वसंत मेरे कानों में
मधुर स्वरलहरियां घोलने के लिए
बेताब है।

नहीं चाहिये, बेतहाशा नई पोशाकें
जबकि हर जीव-जंतु
मुझे सिखा सकता है कि
कम से कम मैं कैसे खुश रहूँ।


मूल कवि‍ता

A Plain Life 
by 
William Henry Davies

No idle gold -- since this fine sun, my friend,
Is no mean miser, but doth freely spend.

No prescious stones -- since these green mornings show,
Without a charge, their pearls where'er I go.

No lifeless books -- since birds with their sweet tongues
Will read aloud to me their happier songs.

No painted scenes -- since clouds can change their skies
A hundred times a day to please my eyes.

No headstrong wine -- since, when I drink, the spring
Into my eager ears will softly sing.

No surplus clothes -- since every simple beast
Can teach me to be happy with the least. 

मंगलवार, 8 जनवरी 2013

माँ.....1


माँ
तुम केवल याद नहीं हो
जो कभी हो, कभी ना हो.
तुम मेरे भीतर
मेरे जिन्दा रहने तक जिन्दा हो.

माँ तुम मुझमें वैसे ही हो
जैसी तुम में तुम्हारी मां थीं...
जैसे सुकून देने वाला कोई मंत्र
तभी तो हर खुशी—गम में
तुम याद करतीं थीं...'ओ मेरी माँ !'...
और हर—खुशी गम में
तुम मेरे साथ होती हो.


माँ
जब कुछ होता है
हम उसकी मूल्य भर जानते हैं
जब खो जाता है
तब हम जानते हैं
कि वो कितना अमूल्य था.
मां तुमने तो
बड़ी जल्द बता दिया
कि तुम कितनी अमूल्य थीं..


माँ
बड़े ही मशहूर लोगों की तरह
बेनाम लोगों की भी माएँ होती हैं
और उस चिड़िया के बच्चे की भी
जिसकी मां.. बाज झपट ले गया
और तुझे मौत.
पर मुझे याद है
पंखों सी नर्म और कुनकुनी
तेरी मौजूदगी की गर्माइश
जिसकी याद में
जीवन के कठिनतम पल
अपनी कठिनता खो देंगे.


माँ
जब नानी नहीं रहीं थीं
तुमने दशकों तक ये जिज्ञासा जताई--
कि | वो जाने किस रूप में होंगी...
तुमने चिड़िया को दाने डाले
गाय को रोटियां​ खिलाईं
कुत्ते के पिल्ले को प्यार किया
आकाश की ओर देखा
ईश्वर को उस घर की तरह देखा
जिसमें माँ रहती है
और सच...
अब तू भी
ईश्वर के घर चली गई है

माँ
तू बड़ी सीधी—सादी थी
तूने अर्थी के लिए कंधे नहीं जुगाड़े
पड़ोस जाकर चुगलियां नहीं कीं...
रूदालियां ना इकट्ठा कीं
विज्ञान नहीं पढ़े..गप्पें नहीं हांकी ...
जवानी की दहलीज से
बुढ़ापे की अर्थी तक
हमारी साज—संभाल में ही व्यस्त रही
मां तू बड़े ही पुराने जमाने की मां थी
आदिकाल की.. आदिशक्ति सी..

माँ
मुझमें जो भी गुण हैं
वो सब तेरे हैं
जो भी अवगुण दूर हो सके
तेरे कारण...

माँ तू मेरा सबसे बड़ा गुरू है
तू सबसे बड़ी है
तेरे कारण मेरा होना है
तेरे कारण वो समझ है
जो जान सके गुरूता
क्या है?



माँ
तुझमें खुदा के इशारे हैं
तू ईश्वरत्व का अनुमान है
वर्ना मैं कैसे समझता जानता
ईश्वर किस चिड़िया का नाम है.

माँ
तुम ईश्वर की तरह
हमेशा एक कविता थीं
जब साकार थीं तब भी
जब निराकार हो तब भी.
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पिछले 2—3 बरस कुछ ज्यादा ...संबंधितों के मां बाप को श्मशान तक विदा दी.. अपनी बारी इतनी जल्द आयेगी...मौत की तरह ही इसका अनुमान नहीं होता. अंतिम संस्कार की र​स्मों से अपरिचित थे... कि... माँ ही पहला पुख्ता सबक बनकर सामने आ गई..
लगभग 7 त्रासद महीनों की अंतिम अवधि उपरांत 13 जुलाई 2012 को हमारी मां सुदर्शना देवी से देह छूट गई।
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गुरुवार, 3 जनवरी 2013

अब लिखना जारी रखना...

बहुत दिनों से लिखना चाह रहे थे। नहीं लिखा गया सो नहीं लिखा। लिख पा रहे हैं सो लिखा जा रहा है। इन महीनों में जो कुछ घटित हुआ, घटा या बढ़ा... वह कभी ना कभी कहीं ना कहीं अभिव्यक्त होगा ही अगर लिखने की खराश बनी रही। ये अन्यत्र पुराने लेखों में स्पष्ट किया ही जा चुका ही आदमी की जीवन्तता की पहचान ही है किसी खराश का होना। मरणासन्न व्यक्ति की देह स्पर्श कर  डॉक्टर पूछते हैं - कैसे हो बाबा? कैसी हैं मां जी? अब बाबा या मां जी को खराश अनुभव होती है तो उं हां हैं जैसे मंत्रों के द्वारा इस खराश को व्यक्त करते  है और डॉक्टर उक्त मंत्रों से अंदाजा लगाते हैं कि इसकी सांसे जाते-जाते चली जाएंगी  या जाते-जाते बहुत दूर तक जाकर  पुनः लौट आयेंगी, ये आदमी दुनियां के झमेले में सतत बना रहेगा।

ब्लॉग पर कोई ना कोई समस्या रहती ही है। कभी लेआउट पुराना लगने लगता है, कभी क्या लिखें समझ ही नहीं आता और अब ये जाना कि महीनों लिखने की इच्छा ही नहीं होती। उन जैसे लोगों के बारे में जिनके बारे में ये लिखा था कि .. "कोई महीनों ब्लॉग पर एक पंक्ति भी नहीं लिखता तो यह स्पष्ट होते देर नहीं लगती कि ईश्वर ने इस नाट्यमंच पर उसकी भूमिका की अंतिम पंक्ति लिखकर कलम तोड़ दी है", अब ये बात खुद पर लागू होती दिखी। ये सही भी है क्योंकि बाकी सब रोजाना छापने वालों के लिए तो मृतप्राय ही हुए...

लौटे, तो ब्लॉग पर फोलोअर्स विजेट पर खाली चैकोर डब्बा रह गया था..मित्रों के चेहरे नजर नहीं आ रहे थे... अब भी नजर नहीं आ रहे। यहां-वहां से समाधान जुगाड़ने की कोशिश की पर...अभी तक तो समाधान नहीं दिखा। किसी मित्र के पास समाधान हो तो अवश्य बताये, जताये कि उसने मुझे समाधान सुझाया, धन्यवाद शुक्रिया मेहरबानी.. जैसे आभार शब्द अग्रिम प्रस्तावित हैं।

जब हम अतीत को देखते है तो पता चलता है कि कुछ तो घटिया था, कुछ बेहतर था, कुछ बेहतर हो सकता था और कुछ तो ऐसा हुआ कि अब वैसा भी नहीं हो पा रहा। खैर आदमी की अनुसूचित जाति यानि आदिवासी जनजाति प्रजाति से निकल कर आज सतत विकास कर रही हिन्दी में  अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार ताल पीट कर दुरूपयोग किया जा रहा हो तो किसी को पीछे रहने की जरूरत नहीं। किसी भाषा का विकासशील रहना उसी तरह बड़ी प्रसन्नता की बात होती है जैसे किसी नवजात को बढ़ता देखना... और हिन्दी के साथ भी ऐसा ही है। वो दशकों से विकासशील है.. और आने वाली शताब्दियों तक विकास जारी रहे ऐसी शुभकामनाएं दी जा सकती है। क्योंकि जब कोई भाषा परिपक्व हो जाये तो इंसान के जीवन की तरह ही उस भाषा का अंत भी निकट होता है।
ब्रेक....................
ब्रेक के बाद विषय बदल भी सकता है। वहां स्थिति कुछ ज्यादा ही जीवन्त हो उठती है जब निरन्तर लिखते हुए भी निरन्तर विषय भटक जा रहा हो। इस प्रकार ब्रेक हो या ना हो... आप गुजर रहे हों और इस दौरान ही आपको साथ चल रहे अजनबी हमसफर से कुछ कहना हो तो ... भूमिका या कोई विषय होना जरूरी नहीं.... ब्रेक.....................

मैं होश में था तो फिर उस पे मर गया कैसे....... । पता नहीं भौतिक रूप से कितनी देर तक चले, जहन में भी किसी गीत-संगीत के बजते रहने की कोई सीमा नहीं होती। वो कभी भी शुरू हो सकता है अलसुबह जागने से पहले भी वो सुनाई दे सकता है और रात गये नींद में भी। यही बात अगर आपके मनोनकूल नहीं तो शोर बनकर बड़ी ही त्रासद हो सकती है। मुझे याद नहीं आ रहा वो उस फोबिया सा हो सकता है जो मधुर संगीत से भी हो सकता है। ऋतु बदलने के साथ ही आपको अपने मिजाज के साथ ही बदलना पड़ता है। कभी-कभी आप अपना मिजाज बदल सकते हैं.. कभी कभी आपको अपने मिजाज के हिसाब से बदलना होता है। अंततोगत्वा हावी आप ही होते हैं... कभी अपने से हारकर... कभी जीतकर। कभी लोग अपने पर इतने हावी होते हैं कि अच्छी-भली तंदरूस्ती के मालिक होते हुए जीवन को अलविदा कह जाते हैं और कभी दूसरी तरह हावी होते हैं कि अपूर्ण देह से भी आखिरी सांस तक उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हैं।

ब्रेक...............
ब्रेक के बाद.. इन्दौर शहर से अख्तर हिन्दुस्तानी ने जुल्फों को झटका, अपने भौतिक व्यक्तित्व की भयावहता को भी पटका और नई शुरूआत को यूं कहा कि चलो चलो फिर यहां से शु.................................रू करते हैं। चैनल वालों ने अख्तर को कुछ दिन तो झेला, फिर कहा कि भई आपके हकलाहट भरे अंदाज से आप मानसिक रूप से हकलाई हुई जनता में तो आप रोजाना प्रसिद्ध होते जा रहे हैं पर कुल टी.आर.पी नहीं बढ़ रही सो सच बयानी तो उतनी जारी रहे जितनी चैनल को फायदा पहुंचाये पर हकलाहट को न्यूनतम किया जाय। अख्तर साहब ने अपने अंदाज पर नोटो को बलिहारा और मान गये। अब चैनल वाले चाहें तो छिपने की जगह यानि उनकी जुल्फें कभी भी विदा हो सकती हैं। 

रेडियो तक तो बात एक हद तक संतुलित रहती है.. आदमी कृषि वैज्ञानिक है, कृषि वैज्ञानिक ही रहता है पर टीवी पर कृषिदर्शन पर साक्षात्कार देने आया हो या कविता पढ़ने वो अभिनेता ज्यादा हो जाता है। बाकी सब चीजें पर्दे के पीछे चली जाती हैं। जिनका पर्दें के पीछे कुछ भी नहीं होता वो पर्दें के पीछे की कालिमा से एकरंग हो जाते हैं। 

ब्रेक............
देखो राजेशा इस तरह तुमने पुन: लिखने की शुरूआत की है.. अब लिखना जारी रखना...

शनिवार, 26 मई 2012

ढेर सारी सुविधा, ढेर सारा आलस।

ढेर सारी सुविधा
ढेर सारा आलस
मौसमी गर्मी उमस से नहीं
दिल घबराता है
इस बात से कि
अगर ये सब ना हो तो ?
यही...
ढेर सारी सुविधा
ढेर सारा आलस।
ढेर सारी सुविधा, ढेर सारा आलस,
आपको वो सब नहीं करने देता
जो आप पिछले कई सालों से नहीं कर पाये हैं
और हो सकता है कि
आप किसी भी मौत तक वो ना कर सकें,
वजह आप मानेंगे ही
ढेर सारी सुविधा
ढेर सारा आलस।
हम इस सब के इतने आदि हैं
कि न्यूनतम पर राजी हैं
यकीनन कुछ खास नहीं
आम आदमी हैं
गाजर मूली भाजी हैं
वजह वही
ढेर सारी सुविधा
ढेर सारा आलस।
ढेर सारा खाना, ढेर सारा टीवी
ढेर सारे बच्चे, ढेर सारी बीवी
ढेर सारे खर्चे, ढेर सारी चिंता
ढेर सारे काम, इंतिहा इंतिहा
मौत तक नहीं करोगे बस
रहोगे जस के तस
बिना किसी बीमारी के,
बीमार, लाचार, बेजार, बे-खबरदार
अनचाहे ही,
तुम जानते हो वजह
ढेर सारी सुविधा
ढेर सारा आलस





ये भी बुरा है



अगर मैं
इससे बेखबर रहूं
कि मैं खुद,
और तुम
कब तक साथ रहेंगे?

और
दिन ऐसे बिताऊं
जैसे मैं
या तुम
हमेशा ही साथ रहेंगे,
और तुम्हें
कोई वजह ना होने से भुलाऊं
कभी जरूरी ही
कोई बात करूं
और सारा दिन
काम धंधें में खपाऊं
तो बुरा है।

और अगर मैं
हमेशा
ये ध्यान रखूं
कि क्या पता
कब मैं,
या,
कब तुम,
साथ नहीं रहेंगे
और तुमसे
सारा सारा दिन
चिपका रहूं
बीतते हुए
बरसों-बरस
छोड़ूं ही ना तुम्हें
जीने के लिए
तो ये भी बुरा है

कुछ भी
भला नहीं लगता -
मौत के
लिहाज से।

गुरुवार, 10 मई 2012

एक होना, यानि पूर्ण होना।



जैसे ही दो लोग मिलते हैं,
एका होने से, खुशी होती है।
जब वो कुछ कहने लगते हैं,
वो अपनी-अपनी ”बात“ होती है,
किसी ”बात“ का मतलब ही होता है
दो चीजें।
इस तरह दो चीजों में बंटते ही
खुशी काफूर हो जाती है,
इसलिए
चुप रहो।

जब कुछ महसूस किया जाता है
खो जाता है सबकुछ
वक्त भी।
जब फिर से मांगा जाता है वही महसूसना,
तो वक्त लौट आता है
अतीत, वर्तमान और भविष्य के
तीन सिरों में कटा हुआ।
कटी-फटी-टुकड़ों में बंटी चीजें
अशुभ होती हैं।
इसलिए
महसूस करो और
चुप रहो।

याद करो
उन दिनों हम कितने खुश थे
जब ना कोई बोली थी
ना कोई भाषा
मौजूदगी को महसूसने की
थी
अपनी ही अबूझ परिभाषा।
जब से हमने
अहसासों को बांधने की कोशिश की है-
बोलियों-भाषाओं में,
शब्दों-स्मृतियों में।
हम बेइन्तहा बंट गये हैं।
इतने कि
एक छत और
एक बिस्तर को
एक साथ महसूसने के बाद भी
हम एक नहीं हो पाते।
इसलिए हो सके तो
कुछ ना कहो
चुप रहो।

प्रार्थना
कैसे की जा सकती है?
क्योंकि जैसे ही प्रार्थना की जाती है,
एक खाई बन जाती है
प्रार्थना करने वाले, और
जिससे प्रार्थना की जारी रही
उसमें।
इसलिए चुप रहो।

सहज खामोशी में हम
एक हो सकते हैं।
खामोश होने के लिए
जरूरी है कि हम
वही रहें, जो हैं।
और कुछ होना ना चाहें
उसके सिवा
जो है।
जो हैं,
बस वही भर रह जाने से
हम एक हो जाते हैं।
खामोशी रह जाती है।
एक होना,  यानि पूर्ण होना
मृत्यु रहित होना।

शनिवार, 17 मार्च 2012

एक रोबोट और आप में क्या अन्तर है?



वो रोज सुबह सूरज की पहली किरन के साथ उठता है। ब्रश करता है, नहाता है। अगरबत्ती, पूजापाठ-जप करता है। नाश्ता करता है। बच्चों के सिर पर हाथ फेरता है। बीवी को चूमता है। ठिकाने से मोटरसाइकिल या कार निकालता है और दफ्तर चला जाता है। दफ्तर या किसी साइट पर रूटीन बंधा-बंधाया काम करता है। शाम को एक नियत समय लौटने का इंतजार करता है और घर कही जाने वाली जगह में वापस लौट आता है। जी हां ये सब बातें रोबोट किसी भी आदमी से बेहतर कर सकता है। 

यदि आपको लगे कि आपकी जिन्दगी की तुलना किसी रोबोट से की जा सकती है, तो क्या यह जिन्दगी है? फिर यह भी प्रश्न उठना चाहिए कि, वो क्या चीजें हैं जो इंसान को रोबोट या परिष्कृत मशीनों से अलग करती हैं? रोज हो रहे नये आविष्कारों को पढ़ते-सुनते-देखते हुए, यह प्रश्न करना बहुत ही आवश्यक है। 

याद रखिये लोहे या अन्य धातु या पदार्थों से बनी मशीनों की औसत उम्र, आदमी की औसत उम्र से बहुत ही ज्यादा है। उनके अचानक, दुघर्टना, कैंसर या हार्टअटैक जैसी बीमारियों से खत्म हो जाने की आशंकाएं भी बहुत कम हैं। परिष्कृत मशीनों या रोबोट की मरम्मत आसान और टिकाऊ है, पर आदमी की? मशीनों से पटी दुनियां, प्राकृतिक जैविक दुनियां से अत्यधिक सुविधाजनक और दीर्घजीवी होगी, हो सकता है कि मशीनों पर आश्रित आदमी की उम्र भी बढ़ जाये... तो क्या? 

इस मामले में कुछ मोटी-मोटी बातें जो विचारणीय हैं ये हैं:
  1. रोबोट की मेमोरी में क्या डालना है या नहीं डालना है ये आदमी तय करेगा, यानि कौन सी सूचनाएं स्टोर करनी हैं या ‘‘नहीं करनी हैं’’ आदि।
  2. रोबोट के अपने निर्णय भी, इंसान द्वारा पूर्व नियोजित किये गये होंगे, यानि आदमी ही तय करेगा कि किसी रोबोट की किसी क्रिया के होने पर क्या प्रतिक्रया होगी।
  3. रोबोट में यांत्रिक गड़बड़ी होगी तो वह उसे कैसे अभिव्यक्त करेगा - रो के, गा के, या किस इंडीकेटर द्वारा.. ये भी आदमी तय करेगा, यानि रोबोट के सुख-दुख भी आदमी द्वारा तय होंगे।
  4. रोबोट में जो संवदेनशीलताएं डालनी हैं वो आदमी तय करेगा यानि रोबोट में कैसे सेंसर होंगे और किन सीमाओं पर वो क्या संकेत देगा, आदि।
निश्चित ही आदमी के हाथों में ही होगा कि उसके बनाये किसी रोबोट में क्या फीचर्स हों, आदमी ही तय करेगा कि उसका रोबोट कैसा हो। रोबोट में आदमी जैसी कमजोरियां ना हों, ये बात भी आदमी ही तय करेगा और उन्हें रोबोट में डालेगा ही नहीं, जैसे ;
  1. उसका रोबोट डरे।
  2. उसका रोबोट गुस्सा हो।
  3. उसका रोबोट गालियां बके।
  4. उसका रोबोट विश्वास या अविश्वास करे।
  5. उसका रोबोट शराब पिये और बेहोश हो जाये।
  6. उसका रोबोट दी गई स्टोर क्षमता से भी कहीं ज्यादा चीजें इकट्ठी करता जाये।
  7. उसका रोबोट वेद, कुरान, बाइबिल या किसी ग्रंथ या गुरू के अनुसार चले।
  8. उसका रोबोट अपना ही डुप्लीकेट बना ले और ऐसे दो-चार डुप्लीकेट मिलकर आपको (यानि किसी रोबोट के जनक को) ही धमकाने लगें। 
  9. उसका रोबोट किसी औरत की गंध पाकर उसके पास से हिले ही नहीं और सारे काम छोड़ दे।
ये तो बस कुछ प्राथमिक बातें थीं, ऐसी ही बहुत सी बातें आप अपनी दिमागी क्षमता से ढूंढ सकते हैं।

अब इस सारी कथा-कहानी का निचोड़ ये, कि इन्सान होते हुए भी -
  1. ऐसा क्यों होता है कि कुछ बहुत अच्छी बातें, जो आप जानते और चाहते हैं - आपमें नहीं होतीं... और 
  2. ऐसा क्यों होता है कि कुछ बहुत बुरी बातें, जो आप नहीं चाहते और चाहते हैं आपमें ना हों ... आप उन्हीं पर जिन्दगी भर अमल करते हैं।