बुधवार, 16 फ़रवरी 2011

जमाने की हकीकतें ना आयें रास क्या करें



जमाने की हकीकतें ना आयें रास क्या करें
अजीज भी पराया सा, अब किससे आस, क्या कहें

जब मिला-जो भी मिला, मतलब का ही रोगी मिला
ये किस्सा था हर रिश्ते का, बस और खास क्या कहें

जिससे बड़ी उम्मीदें थीं, वो भी मिला पर शर्तों पर
अब नाउम्मीदी कैसी है?, क्यों दिल उदास क्या कहें?

सेहत तो भली दिखती है, सूरत पे भी मुस्कुराहटें
पर दिल के हैं अहसास क्या, होश-ओ-हवास क्या कहें,

यही हर घड़ी सवाल था, हो जिन्दगी का हश्र क्या?
इक मौत "अजनबी" तय लगी, बाकी कयास क्या कहें

गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

तुझमें मुझमें बैर कराये, वो धर्म नहीं है, साजिश है


हर तरह की हैवानियत से टकराना जरूरत है
इंसानियत के लिए हर मजहब, भूल जाना जरूरत है


कब तक हम हिन्दू या मुसलमान रहेंगे
देश की तरक्की के लिए, ये सब छुट जाना जरूरत है

पैगम्बर गये, वो ऋषि गये जिन्होंने एक को जाना
अब हमारा भी किसी दोगलेपन से, हट जाना जरूरत है


कब तक तुम कल की दुहाई दे, अपना आज बिगाड़ोगे
अतीत की काली परछाईंयो से, कट जाना जरूरत है

इन पंडितों और मौलवियों की साजिशें समझों
ये बनें रहें, इनकी ”हमारा बंट जाना“ जरूरत है


तुझमें मुझमें बैर कराये, वो धर्म नहीं है, साजिश है
ऐसे किसी भी नर्क की राह से, पलट जाना जरूरत है

”ना तो जिओ ना जीने दो“, कौन सी किताब कहती है
दिमागों से ऐसी सारी किताबें, छंट जाना जरूरत है

बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

जिन्दगी एक वीडि‍यो गेम है


जिन्दगी एक कम्प्यूटर गेम की तरह है
आपको मिलता है एक तयशुदा वक्त
इस तयशुदा वक्त में
तय करने होते हैं अनगिनत रास्ते
और अनगिनत मंजिलें

कुछ रास्ते जैसे दिखते से हैं
पर भूलभुलैया होते हैं
कुछ मंजिलों जैसे दिखते हैं
पर वो पड़ाव होते हैं

लाईफ कम हो जाती है
किन्हीं पड़ावों पर ठहर जाने पर
लाईफ कम हो जाती है
निषिद्ध चीजों को स्पर्श करने पर

कुछ ऐसी चीजें होती है
जो किन्हीं खास पड़ावों पर ही काम आती हैं
कुछ ऐसी चीजें होती हैं
जिन्हें ना लें तो कोई फर्क नहीं पड़ता
पर जिन्हें धारण कर लें तो लाईफ बढ़ जाती है

इस गेम में हर लेवल पर
कुछ मुश्किलें मिलती हैं,
और इनका सामना ही
असली खेल है।

खेल के प्रमुख नियम हैं
लाईफ को सुदृढ़ करते/रखते हुए
मंजिल दर मंजिल तय की जाये।

प्राथमिकता अनुसार
सही वक्त पर सही काम किया जाये
सही वक्त पर सही चीज ली जाये
हर लेवल पर हर वो चीज ली जाये
जिनसे लाईफ बढ़ती हो
क्योंकि ये लाईफ वहां खर्च होनी है
जहां हमें कुछ निषिद्ध चीजों को भी छूना होगा

कहीं चलना होगा दबे पांव
कहीं संभलकर तेज चलना होगा
कहीं सर्वोच्च कुशलता से छलांग मारनी होगी

और वहां तो अक्सर लोग चूक कर जाते हैं
जिस बिन्दु पर इस गेम में
कुछ भी नहीं करना होता
सिवा कुछ पलों के इंतजार के।
कुछ धैर्य रखने के।

पर जैसे कि आप गेम के चरम पर हों,
कभी कभी ऐसा भी होता है,
कि अचानक बिजली गुल हो जाये।
आपको मौका होता है,
कम्प्यूटर/गेम को कभी फिर से शुरू करने का।
पुरानी कुशलताओं को और तीखेपन से दोहराने,
और गलतियों से सीख लेने का।

लेकिन जिन्दगी के खेल में
हमें, बस एक ही बारी मिलती है।
और पता नहीं क्या होता है,
बिजली गुल हो जाने पर
मौत आने पर।

रविवार, 6 फ़रवरी 2011

क्या फैसला करते?


सांसों की ही फिक्र की और बिक गई सब जिन्दगी
सांसे थीं या थी बला, क्या फैसला करते?
उलझे-क्या करें, ना करें? हमेशा अंजामों से डरे,
मौत तक बस यही चला, क्या फैसला करते?

शराफतें पाले सीने में, बस घिरे रहे कमीनों में
आस्तीनों में विष पला, क्या फैसला करते?
दूसरों को क्यों दोष दें, गर हिम्मत ना अपना होश दे
अपनी ही हसरतों ने छला, क्या फैसला करते?

डर बसा रोम-रोम में, ध्यान हर घड़ी था विलोम में
धड़कनें थीं कि जलजला, क्या फैसला करते?
हर बार धोखा, हर बार गम, हर बार इक संगदिल सनम
अपने दिल बस ना चला, क्या फैसला करते?

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

इतनी जल्‍दी में .... हम बस वहीं पहुंचेंगे


लोग बहुत जल्‍दी में हैं
आंखे होते हुए भी देखना नहीं चाहते
कान होते हुए भी सुनना नहीं चाहते
और इसी तरह
लोग अपने जि‍स्‍म की ताकतों से भी दूर होकर
लोग बस भाग रहे हैं
यहां तक कि‍ उन्‍हें यह भी नहीं पता
कि‍ वो कब उड़ने लगे हैं

लोग बहुत जल्‍दी में हें
झूठ की फि‍सलन भरी राहों पर
जैसे हवाई जहाज से
आत्‍म हत्‍या के लि‍ये कूदा हुआ कोई आदमी
कि‍सी के भी हाथ में नहीं आये
यहां तक की सच के भी

लोग बहुत जल्‍दी में हैं
बटोर ले जाना चाहते हैं
धन दौलत, और
अपनी हवस के सारे अनुभव
इस धरती के पार तक
कि‍सी अनजान ग्रह पर

लोग बहुत जल्‍दी में हैं
इतनी जल्‍दी में
कि‍ उन्‍हें खुद नहीं मालूम
कि‍ वो कि‍स राह पर हैं

और उस राह की
कोई मंजि‍ल है भी या नहीं

लोग बहुत जल्‍दी में हैं
और जि‍से वो जि‍न्‍दगी की जुगाड़ कहते हैं
उस इंतजाम में खोये हुए
वो बस अचानक
खुद ही
वहां पहुंच जाते हैं जि‍ससे बचते हुए
लोग बहुत जल्‍दी में होते हैं हर वक्‍त


लोग बहुत जल्‍दी में हैं
और अचानक अपने आपको पाते हैं उस शै के सामने 
जि‍से 'अचानक' शब्‍द का पर्याय कहते हैं।

लोग बहुत जल्‍दी में हैं
कि‍सी के भी हाथ नहीं आते
सि‍वा मौत के।

सोमवार, 24 जनवरी 2011

जि‍न्‍दगी यूं ही ना गुजर जाये


मौत की ओर बढ़ते हुए
कोई कैसे सोच सकता है
किन्हीं लालिमामय होंठों का
तीखा नाजुकी भरा रसीलापन
पर
देह के रसायनों का असर देखो
मन की मौज का कहर देखो
मुझे कुछ और नजर ही नहीं आता
इन होंठो के सिवा।

मौत की ओर बढ़ते हुए
कोई कैसे मजे ले सकता है
बरसों पके हुए अभिमान के
कार, बंगला, बैंक बैलेंस
हर घड़ी प्रशस्त
ऐश-ओ-आराम के
पर मुझे अहं की मस्ती में
कुछ सूझता ही नहीं
कि इसके सिवा
जिन्दगी क्या है?

मौत की ओर बढ़ते हुए
किसी को कैसे सूझ सकते हैं नौकरी धंधे
हर बात में दलाली
हर बात से नोट उगाहने के फंदे
पर मुझे कुछ सूझता ही नहीं
नोटों की ताकत के सिवा
मैं दिन रात गर्क हूं गुलामी में
हर उस काम में
जो मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा
हर वो काम जिससे
जिस्म, मन और रूह कांपते हैं
हर वो काम-जिससे खीझ होती है
हर वो काम-जिसे करते हुए जी मिचलाता है
हर वो काम, जिसे बंद करके
एक उम्र बाद, आराम से मुझे
मौत का हँस के स्वागत करना है

मौत की ओर बढ़ते हुए
पता नहीं मैं इतना निश्चिंत क्यों हूं
क्यों मुझे लगता है कि
आदमी की एक हर देश में
एक औसत उम्र होती है
जबकि अखबार रोज कहते हैं
कि उन बहानों से भी मौत रोज आती है
जो हमने कभी भी ख्याल में नहीं लिये
और अचानक कभी भी...
‘‘अचानक’’ शब्द ‘मौत‘ का पर्याय ही है।

मौत की ओर बढ़ते हुए
मैं मौत से इतना बेखबर क्यों हूं
क्यों उलझा हुआ हूँ
फिल्मों में, हीरो-हीरोइनों की बातों में
चैपाटियों पर, पिज्जा बर्गर के स्वादों में
हर तरह की किताबों में
शेर ओ शायरी, कविता कहानियों में
समाज सेवा की नादानियों में

मौत की ओर बढ़ते हुए
किस डर से बचने के लिए
किस चीज को बचाने के लिए
मैं व्रतों उपवासों में फंसा हूं
तंत्रों मंत्रों को लिखते, जपते
खुद पर कई बार हँसा हूं
कि ऐसा पागलपन क्यों?
और हर सुबह मैं जपता हूं
वही मंत्र यंत्रवत।

मौत की ओर बढ़ते हुए,
मौत की बातें सोचने से,
क्या मौत नहीं आयेगी?

अचानक आये उस पल के पहले
जिसे मौत कहते हैं -
मैं बड़ा ही बेचैन हूं.... कुछ वो करने को
अहसास के जगत में
जिन्दगी भरा, जिन्दा-सा कुछ -
ताकि जिन्दगी हुई सो हुई,
मरना निरर्थक का ना हो।
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शनिवार, 15 जनवरी 2011

खुद को ही समझाने वाले, कुछ-कुछ पागल होते हैं


पा गये हैं जो मंजिले वो, किसी को क्योंकर याद करें
राहों में खो जाने वाले, कुछ-कुछ पागल होते हैं

मजनुओं की कुत्तों से यारी, रांझों को खंजर का प्यार
इश्क से वफा निभाने वाले, कुछ-कुछ पागल होते हैं

वो मजबूर था, वो गाफिल था दुनियां की खुदगर्जी से,
खुद को ये समझाने वाले, कुछ-कुछ पागल होते हैं

शहर में सजी ख्वाहिशें सारी, पर दश्त से जिनकी यारी
वीरानों में गाने वाले, कुछ-कुछ पागल होते हैं

जिन्दगी से वो ऐसे गये, किस देस-ठिकाने खबर नहीं
"अजनबी" यादें सजाने वाले, कुछ कुछ पागल होते हैं

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बुधवार, 29 दिसंबर 2010

अपने चश्मे उतारें और मुर्गों को पहनायें



वे महिला पुरूष युगल जो विवाहपूर्व अपनी मित्रता को लम्बे समय तक यौनसम्बधों से बचाये रखते हैं उनका विवाह उनके लिए कई प्लस प्वांइट लेकर आता है। अमरीकन साइकोलॉजीकल एसोसिएशन की पारिवारिक मनोविज्ञान शाखा के जर्नल में छपे एक अध्ययन में 2035 विवाहितों ने भाग लिया। इस निष्कर्ष में उन युगलों को विवाहोपरांत अतिरिक्त लाभ मिले जो अपने संबंधों में यौनसंसर्ग को काफी बाद में या वर्षों की देरी से लाये। जब उनसे पूछा गया कि आप अपने रिश्ते में यौन सम्बंधों में कब उतरे? उनके उत्तरों का सांख्यकीय विश्लेषण करने से यह निष्कर्ष सामने आये:
- संबंधों में स्थिरता की दर अन्य युगलों से 22 प्रतिशत ऊंची थी
- संबंधों से संतुष्टि की दर अन्य से 20 प्रतिशत ज्यादा थी।
- संबंधों में यौन संबंधों की गुणवत्ता भी अन्यों से 15 प्रतिशत बेहतर थी।
- संबधों में आपसी सामंजस्य, संवाद भी 12 प्रतिशत बेहतर रहता है।

जो लोग विवाह पूर्व ही यौन सम्बंधों में पड़े उनको इन बिन्दुओं से आधे से भी कम लाभ मिले। आस्टिन की यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्सास के समाज विज्ञानी मार्क रेगनेरस ने बताया कि उनकी रिसर्च संबंधों में वैयक्तिक अनुभवों पर आधारित थी ना कि संबंधों की अवधि पर ।

ब्रीघम यंग यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फैमिली लाईफ के प्रोफेसर डीन बसबी के अनुसार - संबंध, यौन संसर्ग के अलावा भी बहुत कुछ होते हैं लेकिन हमने यह जानने की कोशिश की कि वो लोग जो अपने संबंधों के यौन पक्ष के प्रति प्रतीक्षापूर्ण रवैया अपनाते हैं, ज्यादा खुशहाल रहते हैं। क्योंकि वे लोग जीवन के भावी प्रश्नों के बारे में आपस में बातचीत करना और साथ मिलकर काम करना सीख लेते हैं।

जो लोग हनीमून की पहली रात को ही यौन संसर्ग में उतर जाते हैं उन्हें लगता है कि उनका बाद का वैवाहिक जीवन, जीवन के प्रश्नों का उत्तर देने के लिए अपरिपक्व था। यहां तक कि संबंधों को स्थिरता, साथी की विश्वसनीयता जैसे गुणों के पनपने में भी यह ‘‘पहली ही रात का यौन संबंध’’ प्रतिकूल रहा।
जो युगल अपने संबंधों में यौन संसर्ग के प्रति प्रतीक्षावान दिखे, उनके रिश्ते को उनका धार्मिक पक्ष भी इस मामले में मजबूती प्रदान करता है।
कैंसरग्रस्त निःसंतान युगलों के लिए विज्ञान का नया वरदान

कैंसर के इलाज के दौरान बड़ी संख्या मंे महिलाएं बांझपन और पुरूष नपुंसकता से ग्रस्त हो जाते हैं। कैंसरग्रस्त मरीज भी बेऔलाद ना रहें, मां-बाप बन सकें इसके लिए सेना के रिसर्च एंड रेफरल अस्पताल में डॉक्‍टरों ने महिलाओं के अंडाशय यानि ओवरी के ऊतक संरक्षित करने करने में सफलता प्राप्त की है।

अब कैंसर का इलाज करने से पहले महिलाओं की ओवरी के कैंसर कोशिकाओंरहित ऊतकों को संरक्षित कर लिया जायेगा और जब भी कोई कैंसरग्रस्त महिला माँ बनना चाहेगी इन अंडाशय के ऊतकों को महिला की बांह के अगले हिस्से की त्वचा के नीचे या पेट में इंप्लांट किया जा सकेगा। कुछ दिन बाद, यदि इंपलांट वाले स्थान पर मटर के दाने के बराबर उभार नजर आता है तो डॉक्‍टर समझ जायेंगे के अंडाशय के ऊतकों में अंडाणु बन चुके हैं। इन ऊतकों से अंडाणु को अलग कर आईवीएफ तकनीक के जरिये महिलाएं 3-4 माह में गर्भधारण कर सकती हैं।

चिकित्सीय जॉंचों के लिए मोबाइल फोन के आकार का गैजेट
बैंगलोर की रजनीकांत वांगला एंड टीम एक ऐसा गैजेट परिष्कृत करने में जुटी है जिससे विभिन्न तरह की जांचे जेसे फोरेंसिक जांच, एचआईवी, कैंसर, अज्झाईमर और ब्रेन ट्यूमर आदि की जांच मात्र 20 मिनिट में और केवल रू 150/- के खर्च पर की जा सकेगी।
इससे जैनेटिक जांच से भाग रहे नारायण दत्त तिवारी जैसे पतित नेताओं के पापों की गणना भी हो सकेगी। काश चुनाव में खड़े होने वाले नेताओं के चरित्र की जांच करने का भी कोई गैजेट निकाला जा सके जो बताये कि आने वाले सालों में वो किन किन भ्रष्टाचारों, दुष्कर्मों के कर्ताधर्ता बनेंगे तो देश का भला हो।

अपने चश्मे उतारें और मुर्गों को पहनायें

चीन के दक्षिणी-पश्चिमी क्षेत्र के चेगदू प्रांत के मुर्गी पालकों ने मुर्गों को आपस में लड़कर घायल होने से बचाने के लिए चश्में का उपाय ढूंढा है। यहां के मुर्गे स्वभाव से बेहद लड़ाकू होने की वजह से अक्सर आपस में लड़ते रहते हैं और परस्पर एक-दूसरे को बहुत बुरी तरह से घायल कर देते हैं। ऐसे मुर्गों को चश्मा पहना दिया जाता है जिससे उनको ठीक से नजर नहीं आता और वो आपस में नहीं लड़ते। 
लेकिन इंसानों की बीमारी ठीक उलट है - उनकी आंखों पर धर्म, जाति, सम्प्रदाय, पार्टी, समूह विशेष के चश्में उम्र के साथ-साथ एक के बाद एक चढ़ते ही चले जाते हैं, जिनको उतारना बहुत ही आवश्यक है जिससे वो किसी भी तथ्य को नंगी आंखों से ज्यों का त्यों देख सकें।

एक वैज्ञानिक जोक:
यदि आपको आये दिन गैस रहती है। वायु विकार रहता है। गैस बहुत बनती है। इस विकार से आप हर वक्त परेशान रहते हैं तो आपको वायु विकार से बचने के लिए डॉ उमेश पुरी ज्ञानेश्वर एक उपाय बता रहे हैं। डॉ उमेश पुरी ज्ञानेश्वर के अनुसार यह टोटका अचूक है और इसमें मन्त्र का प्रयोग होता है।
मन्त्र इस प्रकार है-ऊँ वम वज्रहस्ताभ्याम नमः
इस मंत्र को किसी भी सूर्य ग्रहण में 10माला पढ़कर सिद्ध कर लें। बाद में मिश्री या कोई वस्तु को इस मन्त्र से 21 बार अभिमन्त्रित कर दें। रोगी को वह मिश्री खाने को दे दें। वायु विकार में तुरन्त आराम होगा। इस मन्त्र को जितना जपेंगे उतना अधिक सिद्ध होगा और लाभ भी अधिक होगा। वायु विकार से मुक्ति का अनुभूत मन्त्र प्रयोग है। इस मन्त्र को करके आप भी लाभ उठाएं और अपने मिलने जुलने वालों या परिचितों को बताकर लाभ पहुंचाएं। अंधविश्वास सहित किया प्रयोग सफल होता है।

अब ये सब लिखने और आप तक पहुंचाने की वजह यही है कि मैं अपने दिमाग का वह हिस्सा काफी समृद्ध करना चाहता हूं जो मस्तिष्क वैज्ञानिकों के अनुसार, सोशल नेटवर्क होने की वजह से फलता-फूलता है।
इस कुछ वर्षों के लिए मिली देह और मनमस्तिष्क के साथ ही आवश्यक है कि हम कुछ और गहरे उतर, अमर तत्व - अपनी आत्मा के बारे सोचें करें, जिसके लिए निम्नलिखित लिंक बहुत ही सहायक हो सकता है।

सोमवार, 6 दिसंबर 2010

भोपाल में प्री-पेड स्मार्ट मोडम डिवाइज टाटा फोटोन विज

भोपाल शहर में टाटा इंडिकॉम के आउटलेट्स की कार्यप्रणाली

इंटरनेट तक घर पर ही पहुंच के उद्देश्य से इस बार टाटा के प्रीपेड कनेक्शन ”फोटोन विज“ को चुना ताकि कामचलाऊ विकल्प घर पर भी रहे। इसके लिए हम टाटा इंडिकॉम आउटलेट नं. 1 पर गये जहां पर यह प्लान समझाया गया। 1399 की यूएसबी मोडम डिवाइज है+रू 100 की एक्टिवेशन किट+रू 300 रू. का प्रारंभिक रिचार्ज जिसमें आपको एक महीने अनलिमिटेड नेट एक्सेस मिलेगा।

लेकिन भाई ने बताया कि फोटोन विज डिवाइज नहीं है दूसरे आउटलेट से मंगा कर रखते हैं, आप कल फोन सम्पर्क करें। दूसरे दिन कहा गया फोटोन विज डिवाइज तो आ गई है पर इन दिनों इस डिवाइस का एक्टिवेशन कार्य तकनीकी कारणों से बंद है (सर्वर संबंधित)। आप यदि कल फोन लगायेंगे तो हम बता पायेंगे कि क्या स्थिति है। तीसरे- चैथे दिन फोन लगाने पर पता चला की स्थिति अभी भी ज्यों की त्यों है।

आखिकर कार 5वें दिन हमने आउटलेट नं. 2 का रूख किया। जहां बैठी मोहतरमा ने बताया कि उन्हें तो इस प्लान का पता ही नहीं जिसमें 1 महीने अनलिमिटेड एक्सेस का प्रावधान है। लेकिन उन्होंने कहा कि उन्हें अभी अभी पता चला है अब कोशिश कर के देख लेते हैं। खैर डिवाइज भी थी, एक्टिवेशन भी हो रहा था तो हमने 1800 रू दिये डिवाइज हमारे नाम पर रजिस्टर कर दी गई पर आधे घंटे तक कोशिशों के बाद भी 300 रू. का प्रारंभिक रिचार्ज जिसमें आपको एक महीने अनलिमिटेड नेट एक्सेस मिलेगा, ये रिचार्ज नहीं हो सका। खैर वक्त की कमी के कारण हमें आउटलेट से घंटे बाद निकलना पड़ा।

6ठे दिन फोन करने पर भी तकनीकी समस्या। सातवें दिन फोन करने भी यथा स्थिति। आठवें दिन परेशान होकर कहा गया कि आप 224 में माह भर सीमित घंटों का रिचार्ज ही करवा लें। करवा लिया गया। हमने इसकी रसीद मांगी तो फिर वही तकनीकी समस्या। रसीद आज तक नहीं मिली है। टाटा इंडि‍कॉम के कस्टमर केयर सेंटर पर बताया गया कि हमारे आईडी का कोई कनेक्शन है, यह रिकार्ड में ही नहीं है।

अब समस्या यह कि डिवाइज की स्पीड इतनी भी नहीं कि सुविधापूर्वक मेल चेक कर सकें। पर इस खरीद की रसीद भी नहीं दी गई है। पता चला है कि 15-20 दिनों से चल रही तकनीकी समस्या ज्यों कि त्यों है।

तो लेपटाप डेस्‍कटॉप धारक, प्री-पेड स्मार्ट मोडम डिवाइज फोटोन विज के प्रत्याशियों को उपरोक्त कथा सनद रहे कि‍ टाटा की सेवा के दौरान कोई तकनीकी खराबी महीने भर तक संभव है।