Wednesday, 12 May 2010

दिल्लगी की मुश्किल


मुझको ये ईनाम मिला है, उस संगदिल की महफिल से
‘‘दीवाना इक’’ नाम मिला है, उस संगदिल की महफिल से

डूबा, ये गम लेकर दिल में, कोई किनारा नहीं रहा
सारा नजारा देखा उसने, चुपचाप खड़े हो साहिल से

जिस पर की कुर्बान जान, भूला वही अनजान जान
हँस हँस के बातें करता है, महफिल में वो कातिल से

गली-गली में दिल को लगाया, शहर-शहर में धोखा खाया
अब क्यों नजरें किसी से मिलायें, मिली हैं नजरें मंजिल से

किस से, किसका शिकवा करते, अजनबी वो हमारा नहीं रहा
अब दिल की धड़कन डरती है, हर दिल्लगी की मुश्किल से