शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

मौत से क्यूं मैं रोज डरता रहा


मौत से क्यूं मैं रोज डरता रहा
हकीकत तो मैं रोज मरता रहा
एक बार इश्क से होकर गुजरा
बारहा मैं खुदा से डरता रहा
सहना सब्र और समझ का रस्ता
बस मुसीबतों से यूं तरता रहा
जब भी किसी का दर्द टटोला तो
मेरे दर्द पर अमृत झरता रहा
जब भी जीवन में कुछ शिवम पाया
याद में मां की, शीश धरता रहा
छंद में मात्राओं का संतुलन
अर्थ के अन​र्थ कई करता रहा

शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

उम्रें

कम उम्र किशोरों में उम्र के बारे में जो ख़याल होते हैं, उनमें ज्यादा मतभेद होते हैं। जैसे जैसे उम्र बढ़ती है यह खयाली मतभेद कमतर होते जाते हैं। साठ साल का आदमी 50 साल वाले से ज्यादा पूछपाछ नहीं करता... इंतजार करता है, वो 10 साल का फासला यूं ही गुजर जाता है।
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उम्र के फासलों के धोखे में रहना 
ख्वाबों—खयालों के झरोखों में रहना
दानापन नहीं है

जिस्म की इमारत बनते—बनते ही
खंडहर भी होने लगती है

तो छत खुली रखो
अक्सर टहलो
और जब तक इमारत राजी हो
खुलापन संजोओ

फिर मैदानों की ओर लौट चलो.

वो लम्हा खूबसूरत है जहां
किसी भी दिन के शिखर पर
एक नजर में ही
सारे उतार—चढ़ाव दिखते हैं

जहां से दिखता है कि
उम्र के उतार—चढ़ावों की ओट में
झूठ के सिवा कुछ नहीं है।

बचपन.जवानी.बुढ़ापा नादानी
सब एक साथ, सांसों में
आता जाता है... हर पल

दाने लोग
उसी पल को 
जीने की बात करते हैं.

रविवार, 23 जून 2013

एक इंटरनेट दोस्त से कहीं ज्यादा जिगरी...कहीं अपना

कल परसों ही जब गर्मी की छुट्टियों के बाद स्कूल खुले तो मैंने 5 साल की तोषी से सुना...., उसकी मैडम कह रही थी कि किसी उत्तरखांड नाम के देश में बहुत सारे लोग बादल फट जाने से मर गये, उसने पूछा उत्तरखांड नाम का देश, हमारी सोसायटी से कितनी दूर है? बादल फटना क्या होता है? जब ढेर सारा इकट्ठा पानी गिरता होगा तो नहाने में और मजा आता होगा... बाढ़ में कार बहती होगी तो वो अपने आप ही चलती होगी.. पेट्रोल लगता ही नहीं होगा... आदि-आदि।

इस तरह उत्तराखंड जैसे हादसों के बाद मैंने अक्सर सोचा कि मुझे कितने किलोमीटर तक रहने वाले इंसानों के बारे में सोचना और उनके बारे में चिंतित होना चाहिए। क्योंकि बीवी बच्चों और दो चार रिश्तेदारों के बारे में ही हम कुछ कर सकने की जिम्मेदारी महसूस कर पाते हैं, तो क्या मुझे अपने परिवार के बारे में ही सोचना-समझना-करना चाहिए? इससे ज्यादा मोहल्ले की गतिविधियों में शामिल होना चाहिए? या जिस दिल्ली मुम्बई शहर में काम कर रहे हैं वहां के निवास स्थल के आसपास और स्थानीय गतिविधियों में, जहां शारीरिक उपस्थिति दर्ज कराई जा सके वहां के बारे में चिंतित होना, समझना, करना चाहिए? या फिर दूर 5000 कि.मी. दूर जापान में आये सूनामी में परमाणी विकिरण के खतरों के बारे में, दक्षिण अफ्रीका की भूख के बारे में, अमरीका के ऐश्वर्य-उन्माद-खोखली जीवनशैली से तंग लोगों के बारे में सोचना चाहिए जो आॅटोमैटिक गन से भीड़ पर गोलियां चलाने लगते हैं?

फिर लगा कि समाधान तो सामने ही दिख रहा है.. उत्तराखंड में स्थानीय लोगों ने ही बचाव कार्य किया. जापान में आये भूकंप-सूनामी में भी स्थानीय लोगों ने ही सब कुछ को महीनों में ही पटरी पर ला दिया... इजराइल लेबनान-फिलिस्तीन की समस्या भी स्थानीय लोगों द्वारा ही बनाई रखा जी सकती या सुलझाई जा सकती है... कश्मीर की समस्या भी आर पार के स्थानीय लोगों द्वारा ही बनाई रखी या सुलझाई जा सकती है...

क्योंकि किलोमीटर्स दूर बैठे लोग किसी फेसबुक स्टेटस या पेज को लाइक कर सकते हैं ज्यादा से ज्यादा कमेंट कर देंगे ज्यादा से ज्यादा शेयर कर देंगे.... ज्यादा से ज्यादा किसी चुनाव में किसी पार्टी को वोट कर देंगे... बाद में जब प्रधानमंत्री की कुर्सी पर मनमानी करने वाले मनमोहन बैठ गये, तो फिर... वही सालों इंतजार करने वाले बेनाम आम आदमी का रोल आपको ही निभाना पड़ेगा। 

इस सारी कवायद का सार यह है कि इंटरनेट पर हजारों नेट मित्रों में सक्रिय रहकर भी कोई परिणाम नहीं निकलता, और मोहल्ले में दो चार लोगों के सक्रिय सहयोग से इतनी समस्याओं का समाधान हो सकता है कि आप किसी इंटरनेट वेबसाईट पर लाखों लाईक्स और कमेंट पा सकें, सो स्थानीय स्तर पर, शारीरिक संपर्कों में ज्यादा-ज्यादा सक्रिय रहिये... शारीरिक स्थानीय स्तर के संपर्क टूट रहे हैं और आत्महत्या के केस बढ़ रहे हैं... । लोग इंटरनेट पर हजारों मित्रों से 24 घंटों जुड़े हैं पर अंदर ही अंदर खोखलापन-बेचैनी... भाई.बहिन.मां.बाप से दिल की बात नहीं कर रहे... रोज दो चार आत्महत्याओं की खबर पढ़ने को मिलती है... इस हिसाब से सप्ताह में 30-40 महीने में 200 लोग मर रहे हैं... क्या ये उत्तराखंड में बादल फटने, जापान में भूकम्प सूनामी, चीनी सीमा पर सेना के खड़े होने, कश्मीर समस्या और दक्षिण अफ्रीका में भुखमरी की समस्या से ज्यादा प्राथमिकता वाली.. जरूरी चीज नहीं है.... 

आप यहां तुरंत... अभी सक्रिय हो कर इंसानियत को बचा सकते हैं... बिना इंटरनेट कनेक्शन के और प्रतिसाद भी हवाहवाई..ख्वाबख्याली नहीं.. अभी यहीं तुरंत मिलेगा...एक इंटरनेट दोस्त से कहीं ज्यादा जिगरी...कहीं अपना... मां बाप भाई बहिन बुआ मौसी चाचा चाची जैसे मजबूत रिश्ते... जो किसी भी निराशा की गहरा दल दल बनने की संभावना ही खत्म कर दें, जो आपको आत्महत्या के मगर के मुंह में ले जाये।

बुधवार, 19 जून 2013

लगभग कुछ सालों बाद ...





लगभग कुछ सालों बाद
समन्दर के किनारों पर सूनामी जैसे भयंकर तूफान आने चाहिए

लगभग कुछ सालों बाद
नदियों के किनारे झुग्गियों.गांव.शहरों में बाढ़ आनी चाहिए

लगभग कुछ सालों बाद
पहाड़ी और रेगिस्तानी इलाकों में भूकम्प आने चाहिए
लगभग कुछ सालों बाद
जंगलों में आग लगनी चाहिए

लगभग कुछ सालों बाद
किसी तरह की कोई उथल-पुथल तो होनी चाहिए
लगभग कुछ ही सालों बाद
आदमी के बसाये गांव और शहर
बड़ा बोर करने लगते हैं

लगभग कुछ सालों बाद :
... समन्दर और नदियां प्रदूषित हो जाती हैं
... पहाड़ों पर ढेर सारा कचरा जमा हो जाता है
... बासे जंगलों में फंफूंद उग आती है
लगभग कुछ ही सालों बाद
आदमी के बसाये गांव और शहरों में
संस्कृति सड़ जाती है।

लगभग कुछ सालों बाद
कोई क्रांति तो होनी ही चाहिए,
आदमी में ना सही,
अकेले-अकेले पंचतत्वों:
आग.हवा.पानी.धरती. और आकाश में सही।
ताकि आदमी 
इन शब्दों के अर्थ से वाकिफ रहे :

"ओम शांति शांति शांति..."

- राजेशा

मंगलवार, 28 मई 2013

ज़िंदगी का कोई सिर पैर नहीं है..

जब लिखने का मन होता है,फुर्सत नहीं होती. जब फुर्सत होती है, सूझता नहीं कि क्या लिखें? कुछ बेहतर लिखने के लिए समझ और फुर्सत का संयोग होना आवश्यक है.
एक थे आशी जी. जब कोई व्यक्ति 'है' होता है तो उसके बारे में लिखने में बड़ी झंझटें होती हैं, जब कोई आम व्यक्ति 'थे' हो जाता है,तो उसके बारे में बेधड़क लिखा जा सकता है. खास लोग-- मरने के बाद भी अपनी आपत्तियॉं बनाये रखते हैं. 


नहीं, अभी सोचना नहीं है
किसी दूजे इंसान के बारे मे
नहीं, अभी सोचना नहीं है
किसी कुदरत के बारे में
ना ही सोचना हैा
किसी खुदा के बारे में

हालांकि कुछ भी तय नही है
फिर भी,
नहीं, अभी फुर्सत नहीं हैं
कल हो ना हो
कल का ख्याल है
क्या पता कल हो, ना हो
आज सा, पहचाना सा
रोटी कपड़ा मकान दुकान धंधा पानी
इनकी निरंतरता
क्यों इतनी जरूरी लगती है
कि पिछले छत्तीस बरस से
मैं इन्हीं के इंतजाम में खत्म ​हूं
असल में

मैं पांच अरब दुनियांवालों से
अलग थोड़े ही ना हूं

किसी को क्या सूझता है
इसका पता
इसी बात से चल जाता है
कि वो अक्सर क्या करता है...
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कई तरह की इन्द्रियां होने के बावजूद हम देखने, सुनने, कहने, सोचने, समझने सब चीजों में अनुमान ही लगा पाते हैं... 

रिश्तों को ही लीजिए जिस मां बाप के साथ मैं बरसों रहता हूं, उनके बारे में भी बहुत कुछ अनुमान ही होता है। यदि आप उनके बारे में बहुत कुछ पक्का कह सकते हैं.. तो ये सब वो बातें होती हैं जो उनकी आदते हैं.. जो आपके साथ के दौरान जाहिर हुईं, ना कि वो जो किन्हीं और तरह की परिस्थितियों में बदल जाएंगी। ऐसा ही इंसान के सामाजिक रिश्तों के बारे में भी है। ऐसा ही हमारे जीवन में आने वाले नये और पुराने लोगों के बारे में है। हम टटोलते— टटोलते हुए चलते हैं... सुनने, सूंघने, छूने और रोजमर्रा के घने काले अंधेरे में आंखे फैला कर देखने की कोशिश करते हैं.. यहां तक कि हम अतीत के अनुभवों को भविष्य में प्रक्षेपित करते हुए अपने निजी तकिया कलाम या, मत भी गढ़ लेते हैं. उन्हें अपनी आगामी जिंदगी के लिए द्वार पर बैठा देते हैं, कि अब कोई.. इस टाईप का आये तो देख लेना. ये जवाब देकर चलता करना या, ये कहकर इंतजार करने को बोलना.. या ये कह के वापिस बुलाना.. बोलना मैं पक्का मिलूंगा।

हम आंखों से देखते हुए भी वह नहीं देखते जो हकीकत है, कानों से वो नहीं सुनते जो हकीकत है, मन से वह नहीं महसूस करते जो हकीकत है, हाथों से वह नहीं छू पाते जो हकीकत है, पैरों से वहां तक नहीं पहुंच पाते जो हकीकत है.. एक अनजानी सी दशा में ही डोलते रहते हैं...

मैं आधी रात को सरकारी कुर्सी पर बैठा हूं। चारों तरफ से मच्छरों का धावा है। पैरों से चलना फिरना है सो ढंक नहीं सकते, हाथों से लिखना है इन्हें भी ओढ़ाया नहीं जा सकता.. आल आउट जैसे उपाय जहरीले हैं.. इनके धुंए से कैंसर हो सकता है। मच्छर भगाने वाली क्वाइल से अस्थमा होता है.. आडोमास से त्वचा संबंधी रोग..मच्छरदारनी के अंदर लेपटॉप लेकर बैठो तो ... लेपटॉप पर कुछ टाईप करना...मजा नहीं आता। आपको लिखना भी है और समांतरत: मच्छरों से भी निपटना है। कुछ मच्छर मारे जायेंगे.. कुछ कुछ खून पियेंगे..कुछ उन विचारों को खा जायेंगे जिनका आप रातभर इंतजार करते रहे।

हम अपनी मजबूरियों से डरते हैं, इसलिए नफरत करते हैं.. उनसे उबर नहीं पाते। मजबूरियां मतलब वो छोटे छोटे सुख सुविधाएं 'जिनका होना ही' हमें जिंदगी लगता है.. इस सुरक्षित संरक्षित रहने की कोशिश में ही हम नर्क गढ़ लेते हैं. नहीं तो औसत 65 साल की उम्र मिले तो क्या आप रोज़ाना आठ दस घंटे कोई फालतू सी नौकरी करेंगे? 24 घंटों का बंधा—बंधाया रूटीन बनायेंगे?

ज़िंदगी का ही कोई सिर पैर नहीं है..फिर शुरू कहां से मानना और खत्म कहां करना...?

मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

.... नहीं चाहते हो.


ज़माने भर से दिल्लगी और हमसे बेरूखी क्या है,
यूं तो तुम कहते हो, कि हमें आजमाना नहीं चाहते हो.

अपने किस काम में लाओगे, बता दो मुझे ऐ दोस्त
ये माना कि तुम मेरी दोस्ती, गंवाना नहीं चाहते हो.

यूं जो, ढली शाम, गली से बचते हुए तुम निकले हो
क्या कयामत तलाश है कि, घर जाना नहीं चाहते हो.

ये जो अहसान किया करते हो दीवाने को शैदाई बुला
ये कैसी अदा, हारे हुए को हराना नहीं चाहते हो.

यूं कहां खो गये? क्या हो गये? कि खबर ही नहीं
तुम्हारी नज़र कहती थी, रोना-रूलाना नहीं चाहते हो.

तेरी याद का इक लम्‍हा -रश्‍मि शर्मा


तेरी याद का इक लम्‍हा
मुट़ठी में बंद जुगनू जैसा है
काली अंधेरी रात में
दि‍प-दि‍प कर जलता है
बांधना चाहूं तो
कहीं दम तोड़ न दे, डर लगता है

तेरी याद का इक लम्‍हा
मुझमें पीपल की तरह उगता है
खाद-पानी की नहीं दरकार
अंधेरे, सीले से कोने में जन्‍मता है
और अपनी उम्र से पहले ही
कोई मारता है, कभी खुद मरता है

तेरी याद का इक लम्‍हा
मन में पखेरू सा कुलाचें भरता है
आकाश में जब अंदेशों के
घि‍रते हैं काले मेघ
भीगी चि‍रैया सी डरता है, और
यर्थाथ की कोटर में जा दुबकता है.....

..................... रश्‍मि शर्मा




गुरुवार, 4 अप्रैल 2013

जरा सी जिंदगी,किस किस तरह जीते

बड़े दिनों बाद... पागलपन आया याद



इक जरा सी जिंदगी, किस किस तरह जीते
बस एक ही क़तरा था, किस—किस तरह पीते.

सूरज आता, सताता कि कुछ कर
रात कहती, जिओ जैसे हों सुभीते

जो गये, बस खो गये, अब ढूंढे कैसे?
ढूंढो... जब त​क ये जिंदगी ना बीते.

ज़िंदगी ने लिया ही लिया, दिया क्या ?
ख्वाहिशें निकली हीं थी, लगे पलीते.


रविवार, 3 मार्च 2013

गुलाब, कैक्टस और बाबू मद्रासी का कुत्ता


बाबू मद्रासी सरकारी दफ्तर में दफ्तरी था। रामखिलावन की पत्नी ने पूछा-दफ्तरी क्या होता है? रामखिलावन ने बताया था - दफ्तरी होना एक मुगालता होता है। दफ्तरी मतलब ‘कुछ’ होने का भाव। दफ्तरी स्वयं को सारे दफ्तर की गतिविधियों का केन्द्र मानता है, वो चौराहे पर बैठा वो कुत्ता होता है जिस पर से नए-नए मेट्रो हुए शहर की बस गुजर जाती है और वो समझता है कि बस ने उसके चौराहे पर फैले होने का ध्यान रखा और बाकायदा बड़ी सटीकता से उसकी पूंछ के बालों का भी बांका किये बगैर गुजर गई। खैर हमें इस दफ्तरी और कुत्ते की तुलना से कुछ आगे बढ़ना है। 

निराला की एक कविता है- गुलाब और कैक्टस। गुलाब विशिष्ट पूंजीपति शासक अभिजात्य वर्ग का प्रतीक है और कैक्टस दबे-कुचले शासित श्रमिक वर्ग का। रामखिलावन ने बताया कि निराला भी उस वर्ग को बिसरा गये जो असली संसारी है। ना इधर का ना उधर का.. मध्यम वर्ग। 

रामखिलावन के हिसाब से बाबू मद्रासी कन्वर्टड ईसाई था। कन्वर्ट होने, बदलने की जरूरत किसे थी? कोई ब्राम्हण क्यों कन्वर्ट होगा? कोई क्षत्रिय भी क्यों कन्वर्ट होगा? कोई वैश्य भी क्यों कन्वर्ट होगा? कन्वर्ट वो होगा जो कुछ है ही नहीं... जो किसी सूची में अनुसूचित है या जो अभी भी जंगलीपन से उबरा नहीं है..जनजातीय है.. पता नहीं अनुसूचित जाति और जनजाति का अर्थ क्या है? या शायद चालाकों को हरिजन में भी भेद दिखा कि वो तो हरि के जन और हम...? तो अब आप भी जानते हैं रामखिलावन चलने से पहले ही भटक जाता हैं।

‘बाबू मद्रासी’ उस दफ्तरी को दिया गया सरल नाम था। सारे मुहल्ले के लोग उसे इसी नाम से जानते थे पर बुलाते नहीं थे। दरअसल हमारा असली नाम वो होता है जिसे हमारे पीछे लोग एकदूसरे से बातचीत में इस्तेमाल करते हैं। बाबू मद्रासी को कहीं से पता चला कि उसके अफसर की कुतिया ने पिल्ले जने हैं। तो बाबू ने दफ्तरी.. दफ्तर और अफसर की कडि़या जोड़ते हुए कुत्ता प्राप्त कर लिया। कुत्ता देखने में साधारण था वैसे ही जैसे हमारे मोहल्ले में पाये जाने वाले.. पैदा होते वक्त ठीक ठाक और बाद में साधारण से अतिसाधारण होते जाने वाले और अंततोगत्वा खुजली खाकर मर जाने वाले कुत्ते। 

छोटा सा कुत्ता, सर्दी के दिन, वो कुत्ता अक्सर सोसायटी का चैकीदार के पास दिखता। शायद बाबू मद्रासी को लगा कि इतना साधारण सा कुत्ता लेकर उसने ठीक नहीं किया. बाबू को लगा कि उसके अफसर ने कुतिया का ध्यान नहीं रखा। कालान्तर में खिलाने-पिलाने पर कुत्ता अच्छा खासा दिखने लगा। बाबू के बच्चे उसे उठा-उठा कर घूमने लगे। धीरे-धीरे बाबू मद्रासी ने महसूसा कि कुत्ता अब ऐसा हो चला है कि सुबह सुबह-साथ ले जाया जा सकता है। घरवाली के पेटीकोट के महंगे नाड़े से बंधा मोटा सा पिल्ला सोसायटी के गेट पर जाकर अटक जाता, तो बाबू को समझ नहीं आता कि क्या करे? खैर घसीट-घसाट के कुत्ता मोहल्ला दर्शन या मोहल्ले की सड़कों के किनारे गंदगी फैलने जाने लगा। रामखिलावन कहते थे कि मोहल्ले के कुत्ते, पालतुओं से ज्यादा प्राकृतिक और समझदार होते हैं... वो मूत्र और पखाने के बाद धूल उड़ा कर ढंक दिया करते हैं, इन पालतुओं में वो तमीज भी नहीं होती।

खैर कुत्ता धीरे-धीरे बाबू मद्रासी का हो गया और बड़ा होता गया। पहले माले पर स्थित फ्लैट की बालकनी में बंधा कुत्ता कूंकियाता रहता। कुत्ते का बाबू के परिजनों यानि मनुष्यों में रहना था। पिछली टांगों के बल खड़े होने पर बालकनी से उसकी अपनी प्रजाति से लगते कुत्ते मोहल्ले भर में दिखते, उनसे उसके वही संबंध थे जो बाबू मद्रासी होने देता। जब मोहल्ले के कुत्ते भौंकते तो उसे समझ में नहीं आता और जब बाबू मद्रासी का कुत्ता भौंकता तो मोहल्ले के कुत्ते बिना उस ओर ध्यान दिये अपनी गतिविधियों में लगे रहते। रहने, खाने-पीने, दिन में दो एक बार टहलने को मिलता। धीरे-धीरे कुत्ता विचारक होता गया। रोटी-कपड़े-मकान के बेसिक इंतजाम के बाद मध्यवर्गीय भी अक्सर विचारक हो जाते हैं। कुत्ता अपने जैसे अन्य पालतू और मोहल्ले में आवारा विचरते कुत्तों के बीच तुलना करने लगा। क्या उसकी जिंदगी अच्छी है या ये जिंदगी ही नहीं है? या मोहल्ले के आवारा कुत्तों का जीना नर्क है उसकी ही जिंदगी स्वर्ग है? कुत्ता मनुष्यों के बीच था, वो कुत्ता था और मनुष्य मालिक थे। हालांकि भोजन में कुछ तो उसे कुत्ते होने के हिसाब से मिलता, पर कुछ मालिकों के खान-पान के हिसाब से भी ग्रहण करना पड़ता। जब उसे बाहर जाने की तलब होती तो मालिकों को फुर्सत ना होती और जब वो नहीं जाना चाहता मालिक टहलने की औपचारिकता को पूरा कर फ्री होने के लिए उसे घसीटते। धीरे-धीरे उसे अपने हिसाब से ना चलने देने का मनुष्यों का व्यवहार अत्याचार लगने लगा। इंसान होता तो वो इसे ‘आजादी’ शब्द से व्यक्त करता। 

मोहल्ले के कुत्ते आजा़द थे, वो जब चाहे भौंकते, जब चाहे छाया में रहते, जब चाहे धूप में, जब चाहे बारिश में भीगते। रात को कुत्ते के भौंकने से सारा मोहल्ला गूंज जाता। उसे जरूरत ही नहीं पड़ती। उसे समझ ही नहीं आता था कि वो इंसानों के बीच ही क्यों है? क्यों उसे पाला गया है? क्यों उसका इतना ध्यान रखा जाता है? क्यों नहीं उसे मोहल्ले में आजाद छोड़ दिया जाता? धीरे-धीरे उसने तुलना करनी शुरू कर दी। वो जहां था सुरक्षित था, सर्दी-गर्मी, धूप-बरसात से बचा हुआ था, खाने-पीने और वातानुकूलन के इंतजाम थे। बीमार पड़ने, खुजली होने पर उपचार की व्यवस्था थी। गली के कुत्तों का जीवन भी क्या जीवन था? एक तो ढेर-से पैदा होते? उसने ही बालकनी से देखा था कि एक कुतिया ने सड़क किनारे 7 पिल्ले जने थे। दो-चार दिन में 1-2 सड़क पर गुजरती कारों तले आते गये... एक आध ही बचा था जो महीने भर की उम्र पार कर सका। कुछ बड़े हुए कि खुजली हो जाती है? और लाख तरह की बीमारियाँ... समय पर भूख का निपटारा नहीं होता, बासा-सड़ा गला खाना, पीने को गंदा पानी? फिर अपने अपने इलाकों के लिए लड़ाई-झगड़े? किसी की टांग इंसानों ने तोड़ दी तो किसी के कान को प्रतिद्वंद्वी ने काट खाया, किसी के शरीर का एक भाग ही शरीर से बाहर है? किसी के बाल खुजली से पूरे झड़ गये हैं, पूरी तरह नग्न। एक 4 माह के पिल्ले को तो एक मोटा-सा सुअर जिंदा खा गया था। आज़ादी इतनी आसान नहीं होती। 

लेकिन दूसरी तरफ यह जीवन भी तो कितना ऊब भरा था। भूख नहीं है पर सामने भोजन पानी। ना खाओ तो बीमार समझा जाता। दिन भर पट्टे से बंधे रहो, टहलने भी जाओ तो मालिक के हिसाब से। ना मां बाप का पता ना कोई किसी यार दोस्त की खबर। मालिकों के तलवे चाटकर निज’कुत्तापन और गुलामी ही झलकती? मोहल्ले के कुत्तों की उसकी रिरियाहट समझ नहीं आती। यहां तक कि ना तो मोहल्ले के कुत्ते उसके पास फटक पाते ना ही उसे किसी को संूघने दिया जाता। कुत्ते होकर कुत्ता’इतर किसी प्रजाति मनुष्य में जीवन गुजारना... इसमें कहाँ की समझ थी।

रामखिलावन बोला - दफ्तरी और पालतू कुत्ते में ज्यादा अंतर नहीं होता, बस ये कि... शायद कुत्ता ये सारी बातें कभी सोच भी लेता हो।