इच्छा
उस फिल्मी नायिका का
स्वर्गिक सौन्दर्य होती है
जिसे हमने अपनी जिन्दगी में
किसी अंधेरे एयरकंडीशंड सिनेमाघर में
पहली बार फिल्म देखते वक्त देखा हो
इच्छा
सुर्ख होंठों, सुराहीदार गले
काली, तर्रार आंखों वाली
वह नवयौवना होती है
जो इतनी ढंकी छुपी होती है
कि हमें बाकी सब कल्पना करनी पड़े
और
बस कुछ दिन बाद ही पता चले
कि उस कैंसरग्रस्त नवयौवना के
कुछ ही दिन शेष हैं।
इच्छा
उस नवयुवा कवि की
दर्द, प्रेम और अद्भुत जीवंत अर्थों वाली
वो दो चार पंक्तियां होती हैं
जिसे
हर जवान होता शख्स
कभी ना कभी गुनगुनाता है
और बाद में पता चलता है
यही युवा कवि
अपनी गुनगुनाहट में असफल होकर
प्रेमिका के चेहरे पर तेजाब फेंक देता है
इच्छा
पहली नजर में
इतनी मादक होती है
कि इस दौरान ही
हर कोई मौत चाहने लगता है
लेकिन
इस खुमार के तुरन्त बाद
हर रोज, हर पल
ना चाहकर भी मरता है
इच्छा
दीवाली की कल्पना सी होती है
धन-दौलत-रौशनी और पटाखे
सारे साल में,
बस एक रात,
बस एक पहर।
इच्छा उस चांदनी रात सी है
जिसके बाद हर रात
चांद खत्म होते-होते
काली अमावस में बदल जाता है
पता नहीं किस मृत इच्छा में।इच्छा को
आदमी भोगना चाहता है
पर इच्छा
आदमी को भोग लेती है
इच्छा की उम्र तो देखो
कि
अभी जेहन में आये और
बिना चेहरा दिखाये ही
बदल लेती है चेहरा।
इच्छा
दुनियांदारों की
सदियों बाद आबादी है
और तुरन्त बर्बादी है।
इच्छा
गुफाओं में बैठे हुए
तपस्वियों की उम्र है।
इच्छा
ताना-बाना है
‘नया’, ‘कुछ और’, ‘चरम’
‘सर्वश्रेष्ठ’, ‘अमरत्व’ ‘अनूठा’
आदि शब्दों का।
बुधवार, 2 मार्च 2011
हमें पता है- आपकी इच्छा क्या है?
सोमवार, 21 फ़रवरी 2011
किस्मत में, अनपढ़ फकीरों की, खुदा मिलना
एक अंधा सा कुआं, हर रौशनी से डर
क्यों डराता है, किसी सोचे से, जुदा मिलना
रात भर को सब्र की, रोशन शमा रखिये
जो चाहते हो, नूर की परचम, सुबह मिलना
अपने खयालों-फैसलों की, यही आदत सताती है
तय था कल, अब फिर कोई, शक-ओ-शुबा मिलना
तेरी ही कोशिश पर, नजर उसकी, जो करता तय
कुछ और कर, ये जानकर कि, तयशुदा मिलना
जो जायेगी ही एक दिन, दौलत वो छोड़िये
जन्नते दिखलायेगा, गरीबों की दुआ मिलना
किताबी कीड़ों को, रद्दी के सिवा क्या मिलना
किस्मत में अनपढ़ फकीरों की खुदा मिलना
क्यों डराता है, किसी सोचे से, जुदा मिलना
रात भर को सब्र की, रोशन शमा रखिये
जो चाहते हो, नूर की परचम, सुबह मिलना
अपने खयालों-फैसलों की, यही आदत सताती है
तय था कल, अब फिर कोई, शक-ओ-शुबा मिलना
तेरी ही कोशिश पर, नजर उसकी, जो करता तय
कुछ और कर, ये जानकर कि, तयशुदा मिलना
जो जायेगी ही एक दिन, दौलत वो छोड़िये
जन्नते दिखलायेगा, गरीबों की दुआ मिलना
किताबी कीड़ों को, रद्दी के सिवा क्या मिलना
किस्मत में अनपढ़ फकीरों की खुदा मिलना
शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011
या देवी सर्वभूतेषु दृष्टि रूपेण संस्थिता
इससे पहले कि तुम
मेरे आगे दोस्ती का दाना डालो
फिर प्रेम के रोने रोओ
और फिर
शादी के कागजों पर अंगूठा लगवाओ
तुम्हें जानना चाहिये
मैं तुम्हारी
सुबह की ताजा और गर्मा-गर्म
बेड-टी नहीं हूं
इसी तरह
वक्त पर
दोपहर, और रात का भोजन भी नहीं।
मैं वो कम्प्यूटराईज्ड मशीन नहीं हूं
जिसमें तुमने अपनी पसंद के
सारे शेड्यूल फीड कर रखे हैं
और वो मशीन
तुम्हें कपड़े, जूते, मोजे तुरन्त देगी
टूटे बटन टांक देगी
तुम्हारी मर्दानगी के सुबूत
बच्चे पैदा करेगी
पालेगी उन्हें तुम्हारे हिसाब से
मैं तुम्हारी वो जागीर नहीं हूं
जिसके रूप और समझदारी पर इतराते फिरो
कार में बगल वाली सीट पर सजाते फिरो।
जिसे तुम दोस्तों को दिखाते फिरो
मैं तुम्हारी शाम का रोमांस नहीं हूं।
मैं तुम्हारी रात का बिस्तर नहीं हूं।
मैं तुम्हारे वासनाओं की खूंटी नहीं हूं
कि कभी जींस, कभी स्कर्ट, कभी साड़ी
मुझ पर हर तरह के कपड़े टंगे रहें
जो तुमने फिल्मी हिरोइनों पर देखे हों, पसंद हों।
मैं जिम की वो मशीन नहीं
जिस पर
तुम वात्सयायन की नीली सीडियों में
रक्तचाप और बेहोशी बढ़ाती
उत्तेजक मुद्राएं आजमाओ।
तुम जिसके सपने देखते हो
मैं वो महिला आरक्षण भी नहीं
कि मैं सारे कामों के साथ
नौकरी भी करूं
इंतजाम करूं
तुम्हारे मोबाईल, टीवी, इंटनेट, कार के लिए पेट्रोल का
बच्चों के साथ सैर सपाटों का
मैं वो आधुनिक महिला नहीं
जो तुम्हारा अहसान माने
कि तुमने बिना कुछ किये
उसे आधुनिक होने दिया
और घर के साथ ही किसी दफ्तर और
दुनियां भर की जिम्मेदारियां, मगजमारियां दे दी।
मैंने पढ़ा सुना है
लक्ष्मी, शिवानी, ब्रम्हाणी के बारे में
गार्गी, मैत्रैयी, झांसी की रानी के बारे में
अगर तुमने भी सुना हो....
अगर किसी पूर्णता की तलाश में हो तुम भी
तो दो और
जीती जागती आंखों की सामर्थ्य की तरह
मुझे भी साथ ले चलो।
बुधवार, 16 फ़रवरी 2011
जमाने की हकीकतें ना आयें रास क्या करें
जमाने की हकीकतें ना आयें रास क्या करें
अजीज भी पराया सा, अब किससे आस, क्या कहें
जब मिला-जो भी मिला, मतलब का ही रोगी मिला
ये किस्सा था हर रिश्ते का, बस और खास क्या कहें
जिससे बड़ी उम्मीदें थीं, वो भी मिला पर शर्तों पर
अब नाउम्मीदी कैसी है?, क्यों दिल उदास क्या कहें?
सेहत तो भली दिखती है, सूरत पे भी मुस्कुराहटें
पर दिल के हैं अहसास क्या, होश-ओ-हवास क्या कहें,
यही हर घड़ी सवाल था, हो जिन्दगी का हश्र क्या?
इक मौत "अजनबी" तय लगी, बाकी कयास क्या कहें
गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011
तुझमें मुझमें बैर कराये, वो धर्म नहीं है, साजिश है
हर तरह की हैवानियत से टकराना जरूरत है
इंसानियत के लिए हर मजहब, भूल जाना जरूरत है
कब तक हम हिन्दू या मुसलमान रहेंगे
देश की तरक्की के लिए, ये सब छुट जाना जरूरत है
पैगम्बर गये, वो ऋषि गये जिन्होंने एक को जाना
अब हमारा भी किसी दोगलेपन से, हट जाना जरूरत है
कब तक तुम कल की दुहाई दे, अपना आज बिगाड़ोगे
अतीत की काली परछाईंयो से, कट जाना जरूरत है
इन पंडितों और मौलवियों की साजिशें समझों
ये बनें रहें, इनकी ”हमारा बंट जाना“ जरूरत है
तुझमें मुझमें बैर कराये, वो धर्म नहीं है, साजिश है
ऐसे किसी भी नर्क की राह से, पलट जाना जरूरत है
”ना तो जिओ ना जीने दो“, कौन सी किताब कहती है
दिमागों से ऐसी सारी किताबें, छंट जाना जरूरत है
इंसानियत के लिए हर मजहब, भूल जाना जरूरत है
कब तक हम हिन्दू या मुसलमान रहेंगे
देश की तरक्की के लिए, ये सब छुट जाना जरूरत है
पैगम्बर गये, वो ऋषि गये जिन्होंने एक को जाना
अब हमारा भी किसी दोगलेपन से, हट जाना जरूरत है
कब तक तुम कल की दुहाई दे, अपना आज बिगाड़ोगे
अतीत की काली परछाईंयो से, कट जाना जरूरत है
इन पंडितों और मौलवियों की साजिशें समझों
ये बनें रहें, इनकी ”हमारा बंट जाना“ जरूरत है
तुझमें मुझमें बैर कराये, वो धर्म नहीं है, साजिश है
ऐसे किसी भी नर्क की राह से, पलट जाना जरूरत है
”ना तो जिओ ना जीने दो“, कौन सी किताब कहती है
दिमागों से ऐसी सारी किताबें, छंट जाना जरूरत है
बुधवार, 9 फ़रवरी 2011
जिन्दगी एक वीडियो गेम है
जिन्दगी एक कम्प्यूटर गेम की तरह है
आपको मिलता है एक तयशुदा वक्त
इस तयशुदा वक्त में
तय करने होते हैं अनगिनत रास्ते
और अनगिनत मंजिलें
कुछ रास्ते जैसे दिखते से हैं
पर भूलभुलैया होते हैं
कुछ मंजिलों जैसे दिखते हैं
पर वो पड़ाव होते हैं
लाईफ कम हो जाती है
किन्हीं पड़ावों पर ठहर जाने पर
लाईफ कम हो जाती है
निषिद्ध चीजों को स्पर्श करने पर
कुछ ऐसी चीजें होती है
जो किन्हीं खास पड़ावों पर ही काम आती हैं
कुछ ऐसी चीजें होती हैं
जिन्हें ना लें तो कोई फर्क नहीं पड़ता
पर जिन्हें धारण कर लें तो लाईफ बढ़ जाती है
इस गेम में हर लेवल पर
कुछ मुश्किलें मिलती हैं,
और इनका सामना ही
असली खेल है।
खेल के प्रमुख नियम हैं
लाईफ को सुदृढ़ करते/रखते हुए
मंजिल दर मंजिल तय की जाये।
प्राथमिकता अनुसार
सही वक्त पर सही काम किया जाये
सही वक्त पर सही चीज ली जाये
हर लेवल पर हर वो चीज ली जाये
जिनसे लाईफ बढ़ती हो
क्योंकि ये लाईफ वहां खर्च होनी है
जहां हमें कुछ निषिद्ध चीजों को भी छूना होगा
कहीं चलना होगा दबे पांव
कहीं संभलकर तेज चलना होगा
कहीं सर्वोच्च कुशलता से छलांग मारनी होगी
और वहां तो अक्सर लोग चूक कर जाते हैं
जिस बिन्दु पर इस गेम में
कुछ भी नहीं करना होता
सिवा कुछ पलों के इंतजार के।
कुछ धैर्य रखने के।
पर जैसे कि आप गेम के चरम पर हों,
कभी कभी ऐसा भी होता है,
कि अचानक बिजली गुल हो जाये।
आपको मौका होता है,
कम्प्यूटर/गेम को कभी फिर से शुरू करने का।
पुरानी कुशलताओं को और तीखेपन से दोहराने,
और गलतियों से सीख लेने का।
लेकिन जिन्दगी के खेल में
हमें, बस एक ही बारी मिलती है।
और पता नहीं क्या होता है,
बिजली गुल हो जाने पर
मौत आने पर।
रविवार, 6 फ़रवरी 2011
क्या फैसला करते?
सांसों की ही फिक्र की और बिक गई सब जिन्दगी
सांसे थीं या थी बला, क्या फैसला करते?
उलझे-क्या करें, ना करें? हमेशा अंजामों से डरे,
मौत तक बस यही चला, क्या फैसला करते?
शराफतें पाले सीने में, बस घिरे रहे कमीनों में
आस्तीनों में विष पला, क्या फैसला करते?
दूसरों को क्यों दोष दें, गर हिम्मत ना अपना होश दे
अपनी ही हसरतों ने छला, क्या फैसला करते?
डर बसा रोम-रोम में, ध्यान हर घड़ी था विलोम में
धड़कनें थीं कि जलजला, क्या फैसला करते?
हर बार धोखा, हर बार गम, हर बार इक संगदिल सनम
अपने दिल बस ना चला, क्या फैसला करते?
सांसे थीं या थी बला, क्या फैसला करते?
उलझे-क्या करें, ना करें? हमेशा अंजामों से डरे,
मौत तक बस यही चला, क्या फैसला करते?
शराफतें पाले सीने में, बस घिरे रहे कमीनों में
आस्तीनों में विष पला, क्या फैसला करते?
दूसरों को क्यों दोष दें, गर हिम्मत ना अपना होश दे
अपनी ही हसरतों ने छला, क्या फैसला करते?
डर बसा रोम-रोम में, ध्यान हर घड़ी था विलोम में
धड़कनें थीं कि जलजला, क्या फैसला करते?
हर बार धोखा, हर बार गम, हर बार इक संगदिल सनम
अपने दिल बस ना चला, क्या फैसला करते?
शुक्रवार, 28 जनवरी 2011
इतनी जल्दी में .... हम बस वहीं पहुंचेंगे
लोग बहुत जल्दी में हैं
आंखे होते हुए भी देखना नहीं चाहते
कान होते हुए भी सुनना नहीं चाहते
और इसी तरह
लोग अपने जिस्म की ताकतों से भी दूर होकर
लोग बस भाग रहे हैं
यहां तक कि उन्हें यह भी नहीं पता
कि वो कब उड़ने लगे हैं
लोग बहुत जल्दी में हें
झूठ की फिसलन भरी राहों पर
जैसे हवाई जहाज से
आत्म हत्या के लिये कूदा हुआ कोई आदमी
किसी के भी हाथ में नहीं आये
यहां तक की सच के भी
लोग बहुत जल्दी में हैं
बटोर ले जाना चाहते हैं
धन दौलत, और
अपनी हवस के सारे अनुभव
इस धरती के पार तक
किसी अनजान ग्रह पर
लोग बहुत जल्दी में हैं
इतनी जल्दी में
कि उन्हें खुद नहीं मालूम
कि वो किस राह पर हैं
और उस राह की
कोई मंजिल है भी या नहीं
लोग बहुत जल्दी में हैं
और जिसे वो जिन्दगी की जुगाड़ कहते हैं
उस इंतजाम में खोये हुए
वो बस अचानक
खुद ही
वहां पहुंच जाते हैं जिससे बचते हुए
लोग बहुत जल्दी में होते हैं हर वक्त
लोग बहुत जल्दी में हैं
और अचानक अपने आपको पाते हैं उस शै के सामने
जिसे 'अचानक' शब्द का पर्याय कहते हैं।
लोग बहुत जल्दी में हैं
किसी के भी हाथ नहीं आते
सिवा मौत के।
सोमवार, 24 जनवरी 2011
जिन्दगी यूं ही ना गुजर जाये
मौत की ओर बढ़ते हुए
कोई कैसे सोच सकता है
किन्हीं लालिमामय होंठों का
तीखा नाजुकी भरा रसीलापन
पर
देह के रसायनों का असर देखो
मन की मौज का कहर देखो
मुझे कुछ और नजर ही नहीं आता
इन होंठो के सिवा।
मौत की ओर बढ़ते हुए
कोई कैसे मजे ले सकता है
बरसों पके हुए अभिमान के
कार, बंगला, बैंक बैलेंस
हर घड़ी प्रशस्त
ऐश-ओ-आराम के
पर मुझे अहं की मस्ती में
कुछ सूझता ही नहीं
कि इसके सिवा
जिन्दगी क्या है?
मौत की ओर बढ़ते हुए
किसी को कैसे सूझ सकते हैं नौकरी धंधे
हर बात में दलाली
हर बात से नोट उगाहने के फंदे
पर मुझे कुछ सूझता ही नहीं
नोटों की ताकत के सिवा
मैं दिन रात गर्क हूं गुलामी में
हर उस काम में
जो मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा
हर वो काम जिससे
जिस्म, मन और रूह कांपते हैं
हर वो काम-जिससे खीझ होती है
हर वो काम-जिसे करते हुए जी मिचलाता है
हर वो काम, जिसे बंद करके
एक उम्र बाद, आराम से मुझे
मौत का हँस के स्वागत करना है
मौत की ओर बढ़ते हुए
पता नहीं मैं इतना निश्चिंत क्यों हूं
क्यों मुझे लगता है कि
आदमी की एक हर देश में
एक औसत उम्र होती है
जबकि अखबार रोज कहते हैं
कि उन बहानों से भी मौत रोज आती है
जो हमने कभी भी ख्याल में नहीं लिये
और अचानक कभी भी...
‘‘अचानक’’ शब्द ‘मौत‘ का पर्याय ही है।
मौत की ओर बढ़ते हुए
मैं मौत से इतना बेखबर क्यों हूं
क्यों उलझा हुआ हूँ
फिल्मों में, हीरो-हीरोइनों की बातों में
चैपाटियों पर, पिज्जा बर्गर के स्वादों में
हर तरह की किताबों में
शेर ओ शायरी, कविता कहानियों में
समाज सेवा की नादानियों में
मौत की ओर बढ़ते हुए
किस डर से बचने के लिए
किस चीज को बचाने के लिए
मैं व्रतों उपवासों में फंसा हूं
तंत्रों मंत्रों को लिखते, जपते
खुद पर कई बार हँसा हूं
कि ऐसा पागलपन क्यों?
और हर सुबह मैं जपता हूं
वही मंत्र यंत्रवत।
मौत की ओर बढ़ते हुए,
मौत की बातें सोचने से,
क्या मौत नहीं आयेगी?
अचानक आये उस पल के पहले
जिसे मौत कहते हैं -
कोई कैसे सोच सकता है
किन्हीं लालिमामय होंठों का
तीखा नाजुकी भरा रसीलापन
पर
देह के रसायनों का असर देखो
मन की मौज का कहर देखो
मुझे कुछ और नजर ही नहीं आता
इन होंठो के सिवा।
मौत की ओर बढ़ते हुए
कोई कैसे मजे ले सकता है
बरसों पके हुए अभिमान के
कार, बंगला, बैंक बैलेंस
हर घड़ी प्रशस्त
ऐश-ओ-आराम के
पर मुझे अहं की मस्ती में
कुछ सूझता ही नहीं
कि इसके सिवा
जिन्दगी क्या है?
मौत की ओर बढ़ते हुए
किसी को कैसे सूझ सकते हैं नौकरी धंधे
हर बात में दलाली
हर बात से नोट उगाहने के फंदे
पर मुझे कुछ सूझता ही नहीं
नोटों की ताकत के सिवा
मैं दिन रात गर्क हूं गुलामी में
हर उस काम में
जो मुझे कभी भी अच्छा नहीं लगा
हर वो काम जिससे
जिस्म, मन और रूह कांपते हैं
हर वो काम-जिससे खीझ होती है
हर वो काम-जिसे करते हुए जी मिचलाता है
हर वो काम, जिसे बंद करके
एक उम्र बाद, आराम से मुझे
मौत का हँस के स्वागत करना है
मौत की ओर बढ़ते हुए
पता नहीं मैं इतना निश्चिंत क्यों हूं
क्यों मुझे लगता है कि
आदमी की एक हर देश में
एक औसत उम्र होती है
जबकि अखबार रोज कहते हैं
कि उन बहानों से भी मौत रोज आती है
जो हमने कभी भी ख्याल में नहीं लिये
और अचानक कभी भी...
‘‘अचानक’’ शब्द ‘मौत‘ का पर्याय ही है।
मौत की ओर बढ़ते हुए
मैं मौत से इतना बेखबर क्यों हूं
क्यों उलझा हुआ हूँ
फिल्मों में, हीरो-हीरोइनों की बातों में
चैपाटियों पर, पिज्जा बर्गर के स्वादों में
हर तरह की किताबों में
शेर ओ शायरी, कविता कहानियों में
समाज सेवा की नादानियों में
मौत की ओर बढ़ते हुए
किस डर से बचने के लिए
किस चीज को बचाने के लिए
मैं व्रतों उपवासों में फंसा हूं
तंत्रों मंत्रों को लिखते, जपते
खुद पर कई बार हँसा हूं
कि ऐसा पागलपन क्यों?
और हर सुबह मैं जपता हूं
वही मंत्र यंत्रवत।
मौत की ओर बढ़ते हुए,
मौत की बातें सोचने से,
क्या मौत नहीं आयेगी?
अचानक आये उस पल के पहले
जिसे मौत कहते हैं -
मैं बड़ा ही बेचैन हूं.... कुछ वो करने को
अहसास के जगत में
जिन्दगी भरा, जिन्दा-सा कुछ -
ताकि जिन्दगी हुई सो हुई,
मरना निरर्थक का ना हो।
जिन्दगी भरा, जिन्दा-सा कुछ -
ताकि जिन्दगी हुई सो हुई,
मरना निरर्थक का ना हो।
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