Friday, 15 July 2011

अनायास, बि‍ना स्‍ट्रगल कि‍ये... सब मि‍लना

चलो आज तुम्हारी तरह दुनियां भर से सारे खयाल बाँटूं। दरअसल मुझे मजा आता है ईश्वर की बातें करना, हालांकि तुम्हारे या किसी और की तरह, मैं भी उसके बारे में कुछ नहीं करता। लेकिन पीछे इतना कुछ पढ़ा-सुना है कि मुझे वही चीज सबसे महत्वपूर्ण लगती है। मुझे कुछेक वाक्य बार-बार अच्छे लगते हैं जैसे ”प्रभु से लगे रहो रे भाई, बनत बनत बन जाई“, ”होते-होते होता है“ आदि आदि। ऐसा नहीं है कि डर नहीं कचोटता कि बिना कुछ हुए ही मर गये तो, तो क्या होगा? वैसे भी इस जिन्दगी का कोई खास मतलब नहीं होता, सिवा इसके कि मरने के पहले ये जान लिया जाये कि जिन्दगी क्या है? कुछ लोग ये भी जानना चाहते हैं कि मरने से पहले ही, ऐसा कुछ जान लिया जाये कि कभी मौत ही ना हो, शरीर की भी। दो-चार सौ साल जिया... कोई शरीर तो कहीं दिखता नहीं, सो लोग किसी और सूक्ष्म रूप की कल्पना करते हैं और सोचते हैं वो ये सच हो जाये। खैर! मुझे ऐसी ही बातें करने में मजा आता है।
 
तुम यह जानते ही हो कि मुझे घुमा फिरा के बात करना अच्छा नहीं लगता मैं चाहता हूं कि सब साफ साफ रहे,
धुंधला-धुंधला, भ्रमित नहीं। जरूरत होने पर भी दुनियां की तरह वक्री चलने में मुझे बहुत तकलीफ होती है।
हालांकि हर वक्त परेशानी सताती है कि करूं तो क्या करूं। कुछ सूझता नहीं है और बरसों बरसों निकल गये हैं। ये बरसों बरसों का निकलता जाना भी दुख देता है। जवानी पक चली है, और बरस निकल रहे हैं। लगता है कि कुछ महत्वपूर्ण होना चाहिए पर सब महत्वरहित निकलता है... लगता है ”महत्वपूर्ण क्या है“, यह तय करने वाले हम नहीं हैं। ऐसा भी हो सकता है कि सारी दुनियां की तरह, मैं कुछ महत्वपूर्ण करना, चाहता ही ना होऊं और अपने आप को ही बना रहा होऊं। कौन अपने सुविधाओंभरे कोकून से निकलना चाहता है। कुछ चीजों की बातें करने में ही ज्यादा मजा है, बनिस्बत की वो हो जायें, शायद मैं ऐसे ही ना-सूझने में उलझा हूं। जो भी हो बड़ी बंधी-बंधाई सी है जिन्दगी... बरसों बरस से, मैं उकता चुका हूं.. उकताना बड़ा बुरा हो सकता है। मैंने सुना है-उकताने वाले लोग मानवबम बन जाते हैं। क्या किसी को इतना बोर किया जा सकता है कि वो मरने को तैयार हो जाये? योग, ध्यान, जप, तप, भक्ति..... हो सकता है ये सब बोर करने के ही तरीके हों, इतना बोर हो जाये कि मौत आये ना आये कोई फर्क ना पड़े बल्कि और सुभीता रहे कि चलो अब कोई अहसास नहीं रहा। अहसास का होना ही सबसे बड़े बीमारी है, अहसास जन्मजात रोग है.... आजन्म रहने वाला। 

 
दरअसल यह सब वो हकीकत है...जो मैंने सपने में देखी, मेरा कोई दोस्त परसों हुए बम विस्फोट में मारा गया वो अच्छा खासा भोपाल में जॉब कर रहा था, बीवी दो बच्चियां, मां बाप...सब हैं। कहता था बड़ा बोर हो गया है छोटे शहर की नौकरी से, उसका ग्राफिक्स डिजाइनिंग का काम औसत था। उसे उम्मीद थी कि मुम्बई में उसे किसी 5 दिन वर्किंग डे वाले अच्छे से आफि‍स में काम मिल जायेगा.. वो कहता था उसने जिन्दगी में कभी स्ट्रगल नहीं की। पढ़ाई के साथ ही नौकरी, नौकरी के साथ ही छोकरी, छोकरी के साथ ही बच्चे सब अनायास ही होता चला गया और.... आजकल वो बहुत बोर हो रहा था रोज 10 से 7
आफि‍स रूटीन से... सालों साल वैसी ही होली दिवाली... बीवी बच्चे मां बाप। मुझे लगता है वह नई नौकरी नहीं चाहता था क्योंकि भोपाल हो या मुम्बई... वहां पर भी तो यही सब होता.... शायद कुछ और झंझटें बढ़ जाती। मेरे ख्याल से वह इस तरह जिन्दा रहने के ख्याल से दुखी था। वह नहीं चाहता था कि उसे "कुछ ऐसा बोरियत सा, रूटीन सा महसूस हो" वो अहसास की कैद से रिहा होना चाहता था, हो गया... और इस बार भी... बिना कोई संघर्ष किये... बिना कोई स्ट्रगल किये... मुम्बई जाने के दो दिन बाद ही अनायास ही मौत भी मिल गई। 
मेरे पास वो बहुत सारे सवाल छोड़ गया है - क्या वो बम विस्फोट से मरा?  क्‍या आदमी को बोर नहीं होना चाहि‍ये? क्‍या बीवी-बच्‍चे-मां-बाप से बोर हुआ जाता है ? जि‍न्‍दगी में नयापन और अबोरि‍यतभरा क्‍या है? क्‍या वो वाकई ईश्‍वर की तलाश में था ?