मंगलवार, 15 जून 2010

उस मिट्टी में सौन्दर्य की प्रवाहना सी है


मेरी काया में जो आत्मा सी है
उसके लौट आने की संभावना सी है


वो बदल ले मार्ग या सम्बंध बदल ले
वही रहेगी, जो प्रेम की भावना सी है

मैं पानी की तरह पटकता रहूंगा सर
उस पत्थर में विचित्र चाहना सी है

मैं क्यों उस मौन को नकार मान लूं
उस मौन में मेरी सराहना सी है

छानूंगा, गूंथूंगा, गढूंगा, कभी तो संवरेगी
उस मिट्टी में सौन्दर्य की प्रवाहना सी है

सोमवार, 14 जून 2010

तुम कहती हो - ना डरा डरा सोचूं जो भी सोचूं हरा भरा सोचूं


तुम कहती हो ना
ना डरा-डरा सोचूं
जो भी सोचूं हरा-हरा सोचूं
तुम्हीं बताओ कैसे?

तुम बस एक ही बार मिली थी
मुझे साफ-साफ दिखा था
कि अब कोई मंजिल बाकी नहीं
पर तुम चलीं गयीं
अब सब बाकी है तुम्हारे सिवा
डर, घृणा, झूठ, बेबसी, अफसोस
और रोतले गीत, सिसकती गजलें

और अब फिर
क्या पता तुम हो भी कहीं?
वैसे ही जैसे कि
महसूस होती हो मेरे आसपास
तुम कहती हो - ना डरा डरा सोचूं
जो भी सोचूं हरा भरा सोचूं
तुम्हीं बताओ कैसे?
कि गांव खत्म हो गये हैं?
जहां बिना मतलब के बात करने वाले लोग थे
अब तो मुझे खुद
किसी से बेमतलब शब्द कहे या सुने
बरसों हो गये हैं

तुम थीं,
तुम कुछ भी नहीं थीं, ...
फिर भी तुम्हारा इंतजार रहता था
मैंने अजनबी होते हुए भी
तुमसे सबकुछ कहा था
यहां तक कि
वो सच भी
जिसे कहा नहीं जाता
‘‘कि मैं तुमसे प्यार करता हूं’’
पर तुमने सुना ही नहीं।
तुमने बरसों फैले
रेगिस्तान पर छोड़ दिया है रेत सा
और अब लौटी हो
एक मरीचिका बनकर
और कहती हो
कि जो भी सोचूं हरा हरा सोचूं।

पता नहीं तुम धोखा हो
या मेरा बुना हुआ सच
या पता नहीं किया
तुम बोलती हो मुझमें
या तुम्हारे बहाने में खुद से ही
बातें करने लगा हूं।
रेगिस्तानी सन्नाटे,
खुद से ही बातें करते हैं।

और देखो ना
कितना गहरा रेगिस्तान है
सीमेंट की इमारतें
लोहे की रेलिंग्स
गलतफहमियों की तरह
उस राह के हर ओर सजी हैं
जिस पर हजारों लाशें बिछीं हैं
जिन लाशों को
जिन्दा से दिखते लोग
रेत का भाव भी नहीं देते।

तड़क-भड़क-हवस से भरे माॅल
और अजनबी सी अंगे्रजी में
किसी भी उम्र की भीड़ में
तुम कहीं नहीं दिखती
ना मैं ही लायक रहा हूं
कि कॉल सेन्टर में काम कर सकूं

मेरे जिस्म में कुछ ढल सा गया है
जानबूझकर गलत अंजामों को जानते हुए
अब लड़ा सा नहीं जाता

बस कभी कभी
यही उम्मीद चमकती है
कि तुम थके हुए पार्कों में
कहीं मिल जाओ
अपने खेलते हुए बच्चों के किनारे
उस सुलझी हुई जिन्दगी से उदास
जिसके लिए
तुमने किसी भी प्रेम की आवाज
नहीं सुनी थी।

जो रहस्यमयी ऊर्जा से भरी आवाज
बहुत मंद हो कर
दुनियां के नक्कारखाने में
जब तब होती मौतों पर
अकेली ही गूंजती रहती है
जिसे कमउम्र लोग
निपट लीचड़पना और बोरियत
या राशिफल में लिखे
किसी आशंका सा
अपशकुन समझते हैं।

क्या पता तुम हो या नहीं ?
क्या पता मैं कितना बचा हूँ?

सोमवार, 7 जून 2010

अब कोई नहीं लौटेगा वहां


कहीं मिलते कभी, कुछ कही, कुछ सुनी होती
कभी दीवानों की कोई याद ही बुनी होती
यूं तो सबने ही चले जाना है
इस दुनियां से किसी अजनबी सा
किसी के ख्यालों की कोई राह ही चुनी होती

तुम तो बेगाने रहे, बेगाना ही हमको जाना
ना कभी शिकवा किया, ना कभी मारा ताना
ख्वामखा ख्यालों में जवानी का मौसम गुजरा
कुछ एक पल के धागे, हमको भी दिये होते
सासें भी ली हैं, आहें भी जी हैं और हर पल मरें हैं
कि उम्रें गुजरीं, हम भी कभी जिए होते

अफसोस ज्यादा है उस गम से, जो मिला ही नहीं
हमको गिला यही कि, तुमसे कोई गिला ही नहीं
कोई वादा नहीं किया, कोई रिश्ता नहीं बना
ना मुड़के देखा तुमने, कारवां तन्हाईयों का
हम ही अन्जान रातों में उस चांद से बातें करते हैं
उस चांद का जो अपना कभी रहा ही नहीं

उस चांद का तो पता नहीं, किस आसमान में खो गया है
बस काले दिन हैं, और जलन भरी राते हैं
चांदनी डसती है, दीवानाघर की दीवारें तरसती हैं
कि कभी तो आयेगा हकीकत-सा, कोई मिलने वाला
वैसे साये सा नहीं, जो खुद ही कोई बुन लेता है।

शुक्रवार, 4 जून 2010

ऐसा भी हुआ


नहीं ऐसा भी नहीं, कि हम खाली हाथ लौटे
उसके दर से लौटे हम, नई हसरत लिये हुए

मंगलवार, 1 जून 2010

ये ख्याल कब तक


इस सफर से,
मेरी मर्जी ना पूछ।
हवाओं से मजबूर तिनकों की,
क्या कोई मर्जी होती है?

जो भी अपना है,
बस उतना ही अपना है,
जितनी की मेरी गलतफहमी।

पता नहीं वक्त क्या होता है,
मंजिल क्या होती है।
ये ख्याल कब तक पलता है,
ये जिस्म कहां ढलता है।

सोमवार, 31 मई 2010

ख्वाबों का हकीकत हो जाना अपशकुन है।

मुझे किसी ने चाँद कहकर पुकारा था।
अब बरसों हो गये है...
बरसों से... हर रोज सवाल रहता है,
मैं आज को कैसे जिऊं?

मुझे नहीं पता,
इतना दिनों तक कौन जिन्दा रहा है,
मुझ में, मेरे सिवा।

मेरी पुरानी होती आंखों में
ख्वाब
वही बरसों पुराने और तरो ताजा हैं
बिना हकीकत में बदले।

लोग कहते हैं मुझसे
”सारे ख्वाबों का हकीकत हो जाना
अपशकुन होता है।“...........

और मैं पूछता हूं उनसे
ख्वाबों का आंखों में रहना,
क्या अच्छा शकुन है?
किसी भी उम्र के लिए?

आज भी
मेरी माँ
मुझे चांद कहती है।
मुझे लगता है
औरत होने का मतलब ही है
मेरी पगली माँ की तरह,
माँ होना।

और मैं पागल हूं
उसके लिए
जिसने मुझे चाँद कहा था
और बरसों तक जो,
अंधेरों में ही है।

मां सच कहती है -
ये भूत, पिशाच, चुड़ैलें, देवदूत और परियां
आदमी की जिन्दगी में ठीक नहीं।
ना सपनों में।

शनिवार, 22 मई 2010

आवाज दूं समन्दर को



अर्थों के किनारों तक
नहीं पहुंचती बहुत सी लहरें।

आंखों की गलियों के
बादल, बारिश से ये रिश्ते थे
उन बूंदों के नाम नहीं थे
इन्हें आंसू कहा,
जो कभी झरते थे,
कभी रिस्ते थे।

क्या कहते हैं उस अन्तर को?
सीने में फैली बाढ़
बहुत सी दीवारें तोड़ती है
मोड़ती है मेरा बर्हिमुखीपन
अन्दर को।
मचल सा जाता हूं कि दोस्ती करूं
आवाज दूं समन्दर को।

शुक्रवार, 21 मई 2010

मौत से निपटने के कई रास्ते हैं।



रेलवे ट्रेक के किनारे
कुछ मजदूर
मशीनों से निकले बड़े बड़े पत्थरों को
छोटे चौकोर अलंगों में तराशते हैं

ये लोग मूर्तिकार जितने पारंगत नहीं होते
इन लोगों को केवल उन चोटों का पता होता है
जिनसे किसी बड़े पत्थर का
एक नियत आकार का हिस्सा
चैकोर हो जाता है।

जबकि मूर्तिकार जानता है
सारे अनुपात।
घुमावदार कोणों पर,
चोटों की हल्की और भारी मात्रा,
उथलेपन, उभारों और गहराई के मायने।

मैंने पढ़ा है निराला की
”तोड़ती पत्थर“
और देखा है
पत्थर तोड़ता हुआ, पत्थर।

सूरज की गर्मी, त्वचा से उठते धुंए के बावजूद
हाथों-भुजाओं में उतरी ऊर्जा।

या ये मेरा भ्रम है
ये सब इंतजाम है
रोटी का नहीं
उस वक्त से बदला लेने का
जिसने उसे पत्थर बनाया है
जिसने उसे चैकोर किया है।

कि कोई पानी नहीं
टूटते हुए बदन पर
अन्दर और बाहर तक
ठर्रे का अभिषेक ही
इतनी राहत पहुंचायेगा
कि
कल तक फिर जिन्दा रहा जा सके!

झूठ है
मूर्तियां
अगले पिछले
ऊपरी या निचले उभार
झूठ हैं छैनी के
हल्के या दबावदार स्पर्श
झूठ हैं
अपने ही भीतर तक पड़ती
उथली और गहरी चोटें।

अधिकतर तो केवल यही सही है
कि आदमी चार कोनों वाला अलंगा है!
उसे किसी मकान की नींव बनना है।
या बंगले की बाउंड्री वाल में पेंट होकर सजना है।

मैं सोचता हूं
उस तोड़ते हुए पत्थर को
क्यों देखता हूं मैं?
क्योंकि मैंने निराला की कविता पढ़ी थी,
और मैं
गहरे भाग की व्यथा ही नहीं
उभरे हुए तल की बेबसी को गढ़ना चाहता था
साफ साफ।

या
अभी बहुत कुछ सीखना है आदमी को
बड़े बड़े पत्थरों को
बिना तराशे ही उपयोग में लेना।

या
मुझे कविता नहीं
उस आदमी के साथ
शाम के बेसुध होने के इंतजाम में
शरीक होना चाहिए।
और उसे समझाना चाहिए
कि यदि वह
मूर्ति बनाने की झंझट में नहीं पड़ना चाहता
तो क्या हुआ,
बेसुध होने के अलावा भी
मौत से निपटने के
कई रास्ते हैं।