पैसा खुदा क्यों?
भाई-भाई से जुदा क्यों?
बाप-बेटे में क्यों रंजिश है?
सब कुछ है फिर भी खलिश है?
बीमारियों का जाल क्यों फैला?
इंसान हुआ क्यों एड्स से मैला?
राहत राशि क्यों कम पड़ जाती है?
जीने की राह नजर नही आती है?
99वें का फेर क्या है?
देर में अंधेर क्या है?
राम को वनवास क्यों मिला?
रावण को राम से क्यों गिला?
भोजन काफी ज्यादा है, पर क्यों मिलता सबको आधा है?
दवा और दारू में क्या फर्क है?
क्या स्वर्ग है क्या नरक है?
कर्ज की जरूरत क्यों पड़ती है?
मर्ज की तेजी क्यों बढ़ती है?
होम करते हाथ क्यों जलते हैं?
चादर के बाहर खवाब क्यों पलते हैं?
उम्मीद का रहना क्या है?
संतों का गहना क्या है?
सुबह नींद जल्द क्यों नहीं खुलती?
अतीत की यादें क्यों नहीं घुलतीं?
रामराज का अर्थ क्या है?
किसी भी काज में अनर्थ क्या है??
आदमी कार्टून कब बन जाता है?
जुनून पागलपन कब कहाता है?
मन की शांति क्या है?
जग में भ्रांति क्या है?
विवेक क्या है, अविवेक क्या है?
बुरा क्या है, नेक क्या है?
सच की सजा क्यों हैं?
झूठ में मजा क्यों है?
लोभ पाप क्यों है?
सारे संताप क्यों हैं?
अनुशासन का क्या मतलब है?
तौल का क्या सबब है?
नजर कितनी होनी चाहिए?
बोवनी कितनी बोनी चाहिए?
विश्वास, अंधविश्वास क्या है?
प्रेम और मोहपाश क्या है?
कूकर में सेफ्टीवाल्व क्या है?
मनुष्य जीवन में काल क्या है?
आटे में नमक कितना डालें?
घाटे को कब संभालें?
इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर है-
जरूरत और हवस में अंतर है,
‘अति’ से बचना सबसे बड़ा मंतर है।
सोमवार, 31 अगस्त 2009
शनिवार, 29 अगस्त 2009
मनुष्य जाति की शर्मनाक हरकतें
गौरेया, मैना, कौआ, चील गिद्ध, बाज, मोर, तोता ये सारे पक्षी कभी भी इतने दुर्लभ नहीं थे कि इन्हें देखने के लिये चिड़ियाघर जाना पड़े।
वर्षा ऋतु में खिली-फैली हरियाली में तरह तरह के रंग-बिरंगे अजनबी बेनाम फूलों पर मंडराती सतरंगी तितलियाँ खो गई हैं।
गर्मी की छुट्टियों में घर जाते थे तो मिट्टी की दीवारों वाली गौशाला के बाल्लों पर गौरेया के घांेसलों के लिए जगह होती थी। झुण्ड के झुण्ड गौरेया के बच्चों का चिंचियाना अद्भुत आनंद का बायज बनता था।
सांप-सपोलिये बचपन से देखने सुनते आये थे। 25 बरस तक भूतल के आवास में की भी सांप बिच्छू सपोलिये कनखजूरों से पाला नहीं पड़ा। खेतों, जंगलों, खण्डहरों, झुरमुटों में उनका घर होता है ये कुदरती बात थी। इन स्थानों पर जाकर बिलों से बाहर निकले सांपों के सिर, नदी नालों मंे केकड़े, बिच्छु देखना एक नैसर्गिक रोमांचकारी मजा था। पर पिछले दशकों में या और खासकर हाल के सालों में शहर की आब ओ हवा और जमीन को आदमियों ने खतरनाक ढंग से बदल दिया है।
जिंदगी में पहली बार पंजाब के एक कस्बे से हमारे नये फ्लैट के गृहप्रवेश कार्यक्रम मंे आई मौसी ने प्रश्न उठाये - कैसे आप लोग इस छोटी सी दड़बानुमा जगह में रह लोगे, घुटन नहीं होती। पांचवे माले पर पलने वाले बच्चों का बचपन क्या होगा?
हमने कहां घुटन कहां नहीं होती। अब शहर में जमीन बची ही कहां है? खेतों जंगलों मंे इंसान की रिहायशी बस्तियों, औद्योगिक विकास की राह में आए प्रकृति में पलने जंगली जीव जाएं कहाँ? अब घरों-बंगलों में, 6-7 मंजिला फ्लैट्स की ऊंचाईयों पर सांप बिच्छू पकड़े जा रहे हैं तो प्रश्न स्वाभाविक ही है कि वो किस ग्रह पर जाएं?
पढ़े लिखे इंसान ने जानवरों के लिए अभ्यारण्य बनाकर उनकी हदों पर बोर्ड लगा दिये हैं, पर पढ़े लिखे लोगों के आग्येस्त्रों की बंदूकों की नलियों से निकली चिंगारियां गहरी काली अंधेरी गुफाओं का अछूतापन चीर गई हैं।
जंगलों का जीवन पूरी तरह नंगा कर दिया गया है। सेटेलाईट पर सजी इंसान की निगाहों से बचने के लिए जानवर अगर पढ़े लिखे होते और किसी ग्रह की कल्पना कर सकते तो अब उनका नितांत आवश्यक, जीने-मरने का प्रश्न यह होता कि अब किसी भी तरह इंसान से बचकर उस ग्रह पर कैसे पहुँच जाएं।
थलचर, नभचर की तरह जलचर भी इंसान की पहुंच से बाहर नहीं तेल, गैस, इंसान के खोजे रसायन सागरों की अतल गहराईयों में दबे ढंके जीवन के लिए खतरा बन गये हैं।
डोडो, सिंह, शेर, चीते, गेंडे, सोन चिरैया, सफेद कौआ, गिद्ध - और भी अन्य जिनके नाम हमें पता नहीं,, ये सारे उन जीवों के नाम हैं जिन्हें ‘‘इंसान’’ नाम के जानवर ने अपनी खूंखार और अचूक शक्तियों से मिटा डाला है या मिटा डालने को ही है।
हमारे निकट ही रहने वाले एक परिवार की महिला मुखिया एक छोटे से 25-50 ग्राम के पक्षी के अंडे और पक्षी का जिस्म यौन-शक्तिवर्धक मानते हुए समय समय पर उदरस्थ करती रहती है। कब तक हम अपनी शारीरिक हवस के लिए हम कुदरत के सुन्दर जीवों को खाने पीने का सामान बनाते रहेंगे?
उस जमाने में भी जब मानव के पास अचूक हथियार नहीं थे मानवभक्षी शक्तिशाली खूंखार जानवरों ने कभी भी कुछ ऐसा नहीं किया कि वो मनुष्यों का पूरा का पूरा टोला या एक बस्ती ही निगल गये हों। पर इस तरह की उपलब्धि मनुष्य नाम के जानवर के नाम अवश्य है, इसने जल-थल-नभचर जीवों-प्राणियों की प्रजातियाँ की प्रजातियाँ समूल नष्ट कर दी हैं।
एक समय निश्चित ही शिकार करने का मजा रहा होगा। जब किसी जानवर को मारने के लिये आदमी को तीर कमान भाले, तलवारों के साथ टक्कर का मुकाबला करना पड़ता होगा। लेकिन अब क्या मजा? अत्याधुनिक बंदूकें और उनसे भी अचूक वैज्ञानिक तरीके हैं जो किसी भी भयानक,खूंखार और जहरीले शक्तिशाली जीव को मिनटों में झुण्ड के झुण्डों में निर्जीव कर दे।
दाँतों के लिए हाथियों की, हड्डियों खालों के लिये सिंह, बाघों, भालुओं, पांडों की। शारीरिक शक्तिवर्धन के लिये हिरणों, मोर, कई प्रजाति की बत्तखों, खरगोशों को मौत के घाट उतार देना पृथ्वीग्रह पर मानव का ही कुकृत्य है।
निरीह प्राणियों को अपनी जुबान के चटखारों और जिस्मानी हवस का साधन बनाना, चाहे अनचाहे ऐसी गतिविधियाँ जो प्राकृतिक विनाश का कारण हैं, मनुष्य जाति की ये वो शर्मनाक हरकतें हैं जिसके लिये उसके वैज्ञानिक विकास, धर्म, अध्यात्म और सभ्यता जैसे खोखले शब्दों पर लानत भेजी जा सकती है?
वर्षा ऋतु में खिली-फैली हरियाली में तरह तरह के रंग-बिरंगे अजनबी बेनाम फूलों पर मंडराती सतरंगी तितलियाँ खो गई हैं।
गर्मी की छुट्टियों में घर जाते थे तो मिट्टी की दीवारों वाली गौशाला के बाल्लों पर गौरेया के घांेसलों के लिए जगह होती थी। झुण्ड के झुण्ड गौरेया के बच्चों का चिंचियाना अद्भुत आनंद का बायज बनता था।
सांप-सपोलिये बचपन से देखने सुनते आये थे। 25 बरस तक भूतल के आवास में की भी सांप बिच्छू सपोलिये कनखजूरों से पाला नहीं पड़ा। खेतों, जंगलों, खण्डहरों, झुरमुटों में उनका घर होता है ये कुदरती बात थी। इन स्थानों पर जाकर बिलों से बाहर निकले सांपों के सिर, नदी नालों मंे केकड़े, बिच्छु देखना एक नैसर्गिक रोमांचकारी मजा था। पर पिछले दशकों में या और खासकर हाल के सालों में शहर की आब ओ हवा और जमीन को आदमियों ने खतरनाक ढंग से बदल दिया है।
जिंदगी में पहली बार पंजाब के एक कस्बे से हमारे नये फ्लैट के गृहप्रवेश कार्यक्रम मंे आई मौसी ने प्रश्न उठाये - कैसे आप लोग इस छोटी सी दड़बानुमा जगह में रह लोगे, घुटन नहीं होती। पांचवे माले पर पलने वाले बच्चों का बचपन क्या होगा?
हमने कहां घुटन कहां नहीं होती। अब शहर में जमीन बची ही कहां है? खेतों जंगलों मंे इंसान की रिहायशी बस्तियों, औद्योगिक विकास की राह में आए प्रकृति में पलने जंगली जीव जाएं कहाँ? अब घरों-बंगलों में, 6-7 मंजिला फ्लैट्स की ऊंचाईयों पर सांप बिच्छू पकड़े जा रहे हैं तो प्रश्न स्वाभाविक ही है कि वो किस ग्रह पर जाएं?
पढ़े लिखे इंसान ने जानवरों के लिए अभ्यारण्य बनाकर उनकी हदों पर बोर्ड लगा दिये हैं, पर पढ़े लिखे लोगों के आग्येस्त्रों की बंदूकों की नलियों से निकली चिंगारियां गहरी काली अंधेरी गुफाओं का अछूतापन चीर गई हैं।
जंगलों का जीवन पूरी तरह नंगा कर दिया गया है। सेटेलाईट पर सजी इंसान की निगाहों से बचने के लिए जानवर अगर पढ़े लिखे होते और किसी ग्रह की कल्पना कर सकते तो अब उनका नितांत आवश्यक, जीने-मरने का प्रश्न यह होता कि अब किसी भी तरह इंसान से बचकर उस ग्रह पर कैसे पहुँच जाएं।
थलचर, नभचर की तरह जलचर भी इंसान की पहुंच से बाहर नहीं तेल, गैस, इंसान के खोजे रसायन सागरों की अतल गहराईयों में दबे ढंके जीवन के लिए खतरा बन गये हैं।
डोडो, सिंह, शेर, चीते, गेंडे, सोन चिरैया, सफेद कौआ, गिद्ध - और भी अन्य जिनके नाम हमें पता नहीं,, ये सारे उन जीवों के नाम हैं जिन्हें ‘‘इंसान’’ नाम के जानवर ने अपनी खूंखार और अचूक शक्तियों से मिटा डाला है या मिटा डालने को ही है।
हमारे निकट ही रहने वाले एक परिवार की महिला मुखिया एक छोटे से 25-50 ग्राम के पक्षी के अंडे और पक्षी का जिस्म यौन-शक्तिवर्धक मानते हुए समय समय पर उदरस्थ करती रहती है। कब तक हम अपनी शारीरिक हवस के लिए हम कुदरत के सुन्दर जीवों को खाने पीने का सामान बनाते रहेंगे?
उस जमाने में भी जब मानव के पास अचूक हथियार नहीं थे मानवभक्षी शक्तिशाली खूंखार जानवरों ने कभी भी कुछ ऐसा नहीं किया कि वो मनुष्यों का पूरा का पूरा टोला या एक बस्ती ही निगल गये हों। पर इस तरह की उपलब्धि मनुष्य नाम के जानवर के नाम अवश्य है, इसने जल-थल-नभचर जीवों-प्राणियों की प्रजातियाँ की प्रजातियाँ समूल नष्ट कर दी हैं।
एक समय निश्चित ही शिकार करने का मजा रहा होगा। जब किसी जानवर को मारने के लिये आदमी को तीर कमान भाले, तलवारों के साथ टक्कर का मुकाबला करना पड़ता होगा। लेकिन अब क्या मजा? अत्याधुनिक बंदूकें और उनसे भी अचूक वैज्ञानिक तरीके हैं जो किसी भी भयानक,खूंखार और जहरीले शक्तिशाली जीव को मिनटों में झुण्ड के झुण्डों में निर्जीव कर दे।
दाँतों के लिए हाथियों की, हड्डियों खालों के लिये सिंह, बाघों, भालुओं, पांडों की। शारीरिक शक्तिवर्धन के लिये हिरणों, मोर, कई प्रजाति की बत्तखों, खरगोशों को मौत के घाट उतार देना पृथ्वीग्रह पर मानव का ही कुकृत्य है।
निरीह प्राणियों को अपनी जुबान के चटखारों और जिस्मानी हवस का साधन बनाना, चाहे अनचाहे ऐसी गतिविधियाँ जो प्राकृतिक विनाश का कारण हैं, मनुष्य जाति की ये वो शर्मनाक हरकतें हैं जिसके लिये उसके वैज्ञानिक विकास, धर्म, अध्यात्म और सभ्यता जैसे खोखले शब्दों पर लानत भेजी जा सकती है?
शुक्रवार, 28 अगस्त 2009
सच की कड़वाहट
दो फिल्मी यार बरसों से फिल्म लाईन में स्थापित थे। सच और झूठ विषय को लेकर उन्होंने कई हिट फिल्में दीं थीं। रात की दारू पार्टी में दोनों अपने नयी फिल्मों की विषय सामग्री पर बातचीत कर रहे थे।
राम: क्या दारू पीकर सभी लोग सच बोलते हैं?
जाॅन: मेरे खयाल से वो वैसा सच बोलते हैं जो उनकी नस नस में बसा होता है, जिससे वो मजबूर होते हैं...
राम: मतलब?
जाॅन: सामान्यतौर पर झूठ बोलने वाला नशे में भी झूठ बोलता है और सच बोलने वाला सच ही बोलेगा। आजकल बोलने वाले सच अलग होते हैं और करने वाले सच अलग तो दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ता।
राम: फिर वही सवाल सामने आता है - जनता क्या चाहती है?
जाॅन: जनता थियेटर में सच झूठ देखने नहीं, बोरियत दूर करने टाईम पास को आती है।
राम: पर कुछ तो सच होता है न, अपना फेमस डाॅयलाॅग ‘सत्यमेव जयते’।
जाॅन: घंटा जयते। हजारों साल लोग झूठ का मजा लेते लेते बोर हो जाते हैं तो फिर टेस्ट चेंज करने को सच की मिर्च से स्वाद बदलते हैं। लेकिन इसकी जरूरत हजारों सालों में एक बार पड़ती है.... कभी कभी बस एक बार। जीसस, गांधी, हरिश्चन्द्र, राम ........ सब मिर्ची का काम करते हैं।
हजारों साल तक वही ढर्रा, वाॅर, एड्रेन्लिन जगाने वाला मसाला, ये सब झूठ है तो क्या? यही चलता है।
राम: चलो मैं एक फिल्म बनाता हूं सात्विक, धार्मिक हरिश्चन्द्र टाईप। एक फिल्म तुम एक्शन, मसाला एड्रेन्लिन जगाने वाली।
जाॅन: ओ.के.
डेढ़ दो साल बाद दोनों की फिल्में तैयार होकर आधुनिक थियेटरों पर चलीं।
जाॅन की फिल्म का नाम था ‘आग का दरिया’ और राम की फिल्म का नाम था ‘‘आब’’
‘आग का दरिया‘ की कहानी अपनी गदर फिल्म जैसी थी। मुसलमानों को भरपूर गालियाँ, हिन्दुओं की उदारता की गाथा, राम कृष्ण की धरती की महानता, किसी हिन्दू का उफान मारता जोश। फिल्म खूब चली। इसके जवाब में पाकिस्तानियों ने भी कई फिल्में बनाईं। जिनमें मोटी मोटी हीरोइने जाने किस शैली में डांस करती थीं। मोटापे के लिहाज से उन्हें भारतीय दक्षिण की फिल्मी हीरोइनों के डांस का अनुसरण करना चाहिए।
‘‘आब’’ में हिन्दू मुस्लिम एकता को मिसालें देते एक कबीरनुमा फकीर की कहानी थी। भारत पाक बार्डर के दोनों तरफ लोग उसके मुरीद हो जाते हैं और अमन और तरक्की के रास्ते पर चलते हैं तो यह हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के हुक्मरानों को और एड्रेन्लिन जागरण पसंद लोगों को अच्छा नहीं लगता। आखिर में कई प्रश्न हवा मंे छोड़ती हुई फिल्म द एंड को प्राप्त होती है। प्रश्न ये थे कि जो हिन्दुस्तान पाक के बीच पिस रहें हैं उनका क्या? जो खर्च हिन्दुस्तानी पाकिस्तानी सेनाओं पर सीमा की स्थिति संभालने के लिए खर्च हो रहा है, क्या वह तरक्की के लिए नहीं हो सकता? यह फिल्म कलासमीक्षकों को पसंद आई। थियेटरों में नहीं चली पर पुरस्कार मिले। सैकड़ा भर पाकिस्तानी कलाफिल्म पसंदों ने इसे पसंद किया।
राम और जाॅन, फिर दारू पार्टी पर मिले।
जाॅन: मैं बोला था न जनता को सच झूठ से मतलब नहीं। एड्रेन्लिन जागना चाहिए।
राम: हाँ, सच की उतनी ही जरूरत है जितनी आटे में नमक। ज्यादा सच जिंदगी को कड़वा कर देता है।
राम: क्या दारू पीकर सभी लोग सच बोलते हैं?
जाॅन: मेरे खयाल से वो वैसा सच बोलते हैं जो उनकी नस नस में बसा होता है, जिससे वो मजबूर होते हैं...
राम: मतलब?
जाॅन: सामान्यतौर पर झूठ बोलने वाला नशे में भी झूठ बोलता है और सच बोलने वाला सच ही बोलेगा। आजकल बोलने वाले सच अलग होते हैं और करने वाले सच अलग तो दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ता।
राम: फिर वही सवाल सामने आता है - जनता क्या चाहती है?
जाॅन: जनता थियेटर में सच झूठ देखने नहीं, बोरियत दूर करने टाईम पास को आती है।
राम: पर कुछ तो सच होता है न, अपना फेमस डाॅयलाॅग ‘सत्यमेव जयते’।
जाॅन: घंटा जयते। हजारों साल लोग झूठ का मजा लेते लेते बोर हो जाते हैं तो फिर टेस्ट चेंज करने को सच की मिर्च से स्वाद बदलते हैं। लेकिन इसकी जरूरत हजारों सालों में एक बार पड़ती है.... कभी कभी बस एक बार। जीसस, गांधी, हरिश्चन्द्र, राम ........ सब मिर्ची का काम करते हैं।
हजारों साल तक वही ढर्रा, वाॅर, एड्रेन्लिन जगाने वाला मसाला, ये सब झूठ है तो क्या? यही चलता है।
राम: चलो मैं एक फिल्म बनाता हूं सात्विक, धार्मिक हरिश्चन्द्र टाईप। एक फिल्म तुम एक्शन, मसाला एड्रेन्लिन जगाने वाली।
जाॅन: ओ.के.
डेढ़ दो साल बाद दोनों की फिल्में तैयार होकर आधुनिक थियेटरों पर चलीं।
जाॅन की फिल्म का नाम था ‘आग का दरिया’ और राम की फिल्म का नाम था ‘‘आब’’
‘आग का दरिया‘ की कहानी अपनी गदर फिल्म जैसी थी। मुसलमानों को भरपूर गालियाँ, हिन्दुओं की उदारता की गाथा, राम कृष्ण की धरती की महानता, किसी हिन्दू का उफान मारता जोश। फिल्म खूब चली। इसके जवाब में पाकिस्तानियों ने भी कई फिल्में बनाईं। जिनमें मोटी मोटी हीरोइने जाने किस शैली में डांस करती थीं। मोटापे के लिहाज से उन्हें भारतीय दक्षिण की फिल्मी हीरोइनों के डांस का अनुसरण करना चाहिए।
‘‘आब’’ में हिन्दू मुस्लिम एकता को मिसालें देते एक कबीरनुमा फकीर की कहानी थी। भारत पाक बार्डर के दोनों तरफ लोग उसके मुरीद हो जाते हैं और अमन और तरक्की के रास्ते पर चलते हैं तो यह हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के हुक्मरानों को और एड्रेन्लिन जागरण पसंद लोगों को अच्छा नहीं लगता। आखिर में कई प्रश्न हवा मंे छोड़ती हुई फिल्म द एंड को प्राप्त होती है। प्रश्न ये थे कि जो हिन्दुस्तान पाक के बीच पिस रहें हैं उनका क्या? जो खर्च हिन्दुस्तानी पाकिस्तानी सेनाओं पर सीमा की स्थिति संभालने के लिए खर्च हो रहा है, क्या वह तरक्की के लिए नहीं हो सकता? यह फिल्म कलासमीक्षकों को पसंद आई। थियेटरों में नहीं चली पर पुरस्कार मिले। सैकड़ा भर पाकिस्तानी कलाफिल्म पसंदों ने इसे पसंद किया।
राम और जाॅन, फिर दारू पार्टी पर मिले।
जाॅन: मैं बोला था न जनता को सच झूठ से मतलब नहीं। एड्रेन्लिन जागना चाहिए।
राम: हाँ, सच की उतनी ही जरूरत है जितनी आटे में नमक। ज्यादा सच जिंदगी को कड़वा कर देता है।
बुधवार, 26 अगस्त 2009
हाल-ए-दिल कैसे कहें ?
हाल ए दिल कैसे कहें- इन उलझनों में बिछड़ गए
तेरा मिलना ही परेशानी था, फिर क्या नहीं मुश्किल रहा।
शाम से चेहरा तेरा फिर जहन की दीवारों पर,
जाम की गहराई में तेरे लबों का तिल रहा।
मैं सोचकर हैरान हूं, ये दिल न मेरा दिल रहा,
ताजिन्दगी इक अज़नबी मेरे खवाबों की महफिल रहा।
उम्रों की उम्मीदों का, हाए बस यही हासिल रहा।
वो संग दिल था जब मिले, हम जब चले, संगदिल रहा।
सोमवार, 24 अगस्त 2009
शनिवार, 22 अगस्त 2009
शुक्रवार, 21 अगस्त 2009
राहुकालम पर चढ़ा मानुष
आप राहु ग्रह के बारे में क्या जानते हैं? खैर आपकी गलतफहमियाँ दूर करते हैं। राहु की पैदाइश की कहानी कहती है एक समय अमृत मंथन के दौरान त्रिदेवों ने प्लान बनाया कि असुरों से मेहनत तो करवा ली जाये पर इनको अमृत न चखने दिया जाये। लेकिन एक असुर ने कुछ ज्यादा ही समझदारी दिखाई, देवता का रूप बन देवताओं की लाईन में ही खड़ा हो गया। जब तक उनके पीछे खड़े देवताओं को पता चला कि ये तो असुर है और अमृत पी गया है, काफी देर हो चुकी थी। विष्णु जी ने चक्र से उसका सिर धड़ से अलग कर दिया। असुर एक ही था पर सिर यानि राहु और धड़ यानि केतु ने अलग-अलग ग्रह के नाम से जन्म ले लिया। धड़ और सिर, राहु और केतु कभी एक हो जाएँ ऐसा होता नहीं, तो अपने इस अधूरेपन का दुःख वो सिर और धड़ लोगों को दुखी कर जताते हैं।
दक्षिण में राहुकालम नाम से सप्ताह के प्रत्येक दिन में कुछ ऐसे घंटे होते हैं जिनमें शुभकार्य करना वर्जित माना जाता है, लेकिन सबको यह खबर कहाँ। राहु बेधड़क उन घंटों में सक्रिय रहता है।
सारे वो कार्य या गतिविधियाँ/घटनाएं जो हमारे आस पास के लोगों के दिमागों में खुराफात पैदा कर सम्पन्न की जा रही हैं वो पूरी तरह राहु प्रेरित हैं।
खयालों में रहना, झाड़ पर चढ़ जाना और ताजिंदगी उसी पर बने रहना राहुच्छादित मानुष का प्रथम लक्षण होता है। सिगरेट, शराब और शबाब (नीली फिल्मों) ने उनकी आंखों की रोशनी छीन ली। अजीब सी बीमारी हो गई, आंखों मे ंसूईयाँ सी चुभतीं थी। मोहल्ले के झोलाछाप डाॅक्टरों से इलाज कराते 5-7 बरस होने पर दो एक बार शासकीय अनुदान पर दिल्ली बैंगलोर चले गये। वहां के डाॅक्टरों ने क्या कहा पता नहीं। पर वहां से लौटे तो उन्होंने बताया कि जिस तरह की आंखों की बीमारी उनको है पूरे मध्यप्रदेश में किसी को नहीं। इस प्रकार उन्होंने इलाज करवाना बंद कर दिया, अब वो जो भी मिलता उस दुर्लभ बीमारी का बखान करते जो उनको है और भारत में किसी को नहीं। तो राहु मति की क्षति में अग्रगामी प्रभाव रखता है।
ऐसे ही ब्लाॅग लेखक, एलोपैथी प्रैक्टिशनर, कवि-कलाकार, जुगाड़ू लोग, कुछ नया-नया करने वाले,पागल-दीवाने, परायी बीवियों में इच्छुक लोग, परायी प्रेमिकाओं को आधार बनाकर शेर ओ शायरी करने वाले इन सब में समान बात ये है कि इन सभी का बस सिर चलता है। धड़ के लिए यानि आधार के लिए तड़पता है पर इन्हें जीवन भर किसी चीज का आधार नहीं मिलता। इनकी ये हालत राहु द्वारा इन्हें बुरी और पूरी तरह गिरफ्त में लिये जाने के कारण होती है। लोग बेवजह प्यार को अंधा कहते हैं, अंधेपन का कारक राहु होता है। वह सिर पर कुंडली मारकर बैठ जाता है और धड़ से दूर रखते हुए बाकी सब करवाता है। घर-परिवार-समाज वाले लोग इसे लड़के या लड़की का बरबाद हो जाना कहते हैं। प्यार की नजर तो बहुत तेज होती है इसलिए सांवले-काले आशिक गौरवर्ण गोरियों को आसानी से पटा लेते हैं।
गिरधारीलाल शायर थे। लिखना, गाना और बजाना शौक था। एक के बाद एक नौकरियां छूटती गईं। 10 सालों में मासिक आमदनी इतनी नहीं हो पाई की कोई घरवाली मिल जाए। एक राहुप्रभावित विदुषी मिलने पर उसकी परवरिश गिरधारीलाल के मित्रों को करनी पड़ी। गिरधारीलाल का सुबह 9 बजे काम पर जाना रात को 9 बजे आना। सुबह बच्चे स्कूल चले जाते थे और जब रात को लौटते बच्चे सो जाते थे। बच्चे अन्यों को पापा और गिरधारीलाल को अंकल कहते थे। भगवान राहु से बचाये।
चूंकि राहु का सिर ही सिर है धड़ है ही नहीं यानि हाथ पैर चलाने की कल्पना भर ही संभव है तो राहु लोगों के सिरों में घुसकर यह भाव अच्छी तरह पुष्ट कर देता है कि वो कुछ नहीं कर सकते। लेकिन करने के विचार तो आते हैं, इसलिए लोग ये मानते हुए कि करना-धरना कुछ नहीं पर अभिव्यक्त की आजादी तो भारतीय संविधान सम्मत है, ब्लाॅग लिखने लगते हैं, किताबें गढ़ने लगते हैं। राहु खुश हो जाता है।
कई लोगों के ब्लाॅग पर उनके ब्लाॅग लिखने की वजह लिखी है। हालांकि किसी ने पूछा नहीं होता कि ‘‘आप क्यों लिख रहे हैं।’’ जिनका कोई उद्देश्य हो वो पूछेगा ना। राहु सारे लोगों को उद्देश्यविहीन कर देता है। लोगबाग अपने कर्मों पर कमेन्ट्स करने वालों की तलाश में सभी तरह की सरकस करने लगते हैं। उनके ब्लाॅग पर लिखा होता है कि वो ‘‘दिल की भड़ास निकालने के लिए’’ ब्लाॅग लिखते हैं। भई, भड़ास निकालनी है तो मंत्रियों पर जूते फेंक कर निकालो। ये कोई जगह है भड़ास निकालने की। ब्लाॅगस्पाट ने आपको स्पाॅट क्या दे दिया आप तो फैलते ही जा रहे हैं। राहु के प्रभाव से ऐसी ही मति हो जाती है, जिसका खाएं उसकी ही में छेद करें। ब्लाॅग, ब्लाॅगस्पाट.गूगल वालों का विज्ञापन पराये शादी डाॅट काॅम और अन्य लोगों के।
राहु द्वारा सम्पन्न कर्मों में किसी भी गृहिणी द्वारा आयुपर्यन्त किये जा रहे समस्त गृहकार्य, राजनीति, चुनाव, लोकतंत्र-वोट देना, रोबोट की तरह काम करने वाले लोग जो जब तक जबरन वीआरएस देकर घर नहीं बैठा दिये जाते फेक्ट्री आॅफिस जाते रहते हैं इत्यादि शामिल हैं। इन्हें जिंदगी भर होश नहीं आता कि उस काम के अलावा कुछ किया जा सकता है जो वो पिछले दशकों से कर रहे हैं। राहुग्रसित व्यक्ति कईयों की हालत तो ये हो जाती है कि मरणशैय्या पर भी वही पिछले 5 दशकों की रूटीन दिनचर्या एक दिन और जीने की भीख माँगता है।
राहु प्रभावित व्यक्तियों की हाथ की उंगुलियाँ और टांगे बेहतर काम करने लगते हैं। हर कहीं उंगली करना और फटे में टांग अड़ाना सम्पूर्ण जीवन का ध्येय होता है। ऐसे लोग अच्छे भले काम में नुक्स निकाल सकते हैं। संदेह और शक इनकी आंखों में कीच की तरह जमा होता है। चारो ऋतुओं में इनकी आंखें दुखती रहती हैं। दुखती आंखें चहुं ओर अपना प्रदूषण फैलाती हैं। आलोचक टाईप के लोग इनके प्रतिनिधि अभिव्यक्ता होते हैं।
राहुग्रस्ति युवतियाँ 22-27 साल तक लड़की एमबीए, बीकाॅम सीए की डिग्रियाँ लेती है और आगे जाकर साल दो साल में ही सारी पढ़ाई छू मन्तर। इलेक्ट्रानिक्स चिमनी, माइक्रोवेव ओवन्स, मल्टीपरपज मिक्सर ग्राइन्डर, और सदियों पुराने चैका चूल्हे के आधुनिक संस्करण की आढ़ में सारी उपाधियाँ स्वाहा हो जाती हैं। कपड़े धोने, घर के झाड़ू पोंछे, बर्तनों की सफाई बच्चे पालने में ही प्रौढ़ावस्था पार हो जाती है।
राहुग्रसित वृद्ध अपने अतीत की दुहाई देते रहते हैं कि किस समय उन्होंने क्या तोप मारी थी। हालांकि ये सब खयाली बातें होती हैं राहुग्रस्तता के कारण जीवन भर ही कल्पना के अलावा कुछ और कर नहीं पाते वही कल्पनाएं उन्हें अपने अतीत का घटित सच लगने लगती हैं। कोई मनोवैज्ञानिक काम नही करता। क्योंकि राहुग्रसित व्यक्ति सिर ही सिर में जिंदा रहता है, लोगबाग ऐसे लागों को बुद्धिजीवी कहने लगते हैं।
सुअर बुखार की तरह राहु ग्रसित व्यक्ति के लक्षण भी सामान्य से दीखते हैं पर उभरने पर यकायक नरकारोहण के अलावा कुछ नहीं घटता। टेमूफ्लू की डोज बेअसर हो जाती है, इतने छोटे नाम की दवाई भला कैसे असर करेगी। सारे अखबार, टीवी चैनल्स के भय से लोग फ्लूग्रस्त हो जाते हैं। लोगों के बड़ी मात्रा में नजला होने से सरकार भयग्रस्त हो जाती है, कहीं ये नजला हम पर ही न आ गिरे। बड़े बड़े विज्ञापन छपवाने पड़ते हैं कि ऐसा नहीं वैसा है। लेकिन होता तो वही है, जो है। हकीकत इस बीमारी को एन1एच1 का नाम देने वालों को भी पता नहीं होती।
यही कहानी अमरीकियों के बारे में है ईरान से डायरेक्ट पंगा न लेने, मुस्लिम जगत के समक्ष और आक्रामक न होने के उद्देश्य और ईराक के तेल कुओं पर नजर लगाये अमरीका ने सद्दाम हुसैन को पाला, और अफगानिस्तान पर पकड़ के लिए तालिबान को पर सब सीखने और हथियार मिलने पर यह एक असुर का काम करने लगे। अब सद्दाम के जाने से लगा कि सिर और धड़ अलग हो गये पर आतंक जारी है। राहु आतंकवाद ही नहीं अन्यान्य कई रूपों में हमारे रोजमर्रा के जीवन में यत्र तत्र दिखता है।
तो भई राहुकालम का ध्यान रखिये। इस कालम पर चढ़ा व्यक्ति ईसा तो नहीं कहलाता पर हालत उनसे भी बुरी होती है।
दक्षिण में राहुकालम नाम से सप्ताह के प्रत्येक दिन में कुछ ऐसे घंटे होते हैं जिनमें शुभकार्य करना वर्जित माना जाता है, लेकिन सबको यह खबर कहाँ। राहु बेधड़क उन घंटों में सक्रिय रहता है।
सारे वो कार्य या गतिविधियाँ/घटनाएं जो हमारे आस पास के लोगों के दिमागों में खुराफात पैदा कर सम्पन्न की जा रही हैं वो पूरी तरह राहु प्रेरित हैं।
खयालों में रहना, झाड़ पर चढ़ जाना और ताजिंदगी उसी पर बने रहना राहुच्छादित मानुष का प्रथम लक्षण होता है। सिगरेट, शराब और शबाब (नीली फिल्मों) ने उनकी आंखों की रोशनी छीन ली। अजीब सी बीमारी हो गई, आंखों मे ंसूईयाँ सी चुभतीं थी। मोहल्ले के झोलाछाप डाॅक्टरों से इलाज कराते 5-7 बरस होने पर दो एक बार शासकीय अनुदान पर दिल्ली बैंगलोर चले गये। वहां के डाॅक्टरों ने क्या कहा पता नहीं। पर वहां से लौटे तो उन्होंने बताया कि जिस तरह की आंखों की बीमारी उनको है पूरे मध्यप्रदेश में किसी को नहीं। इस प्रकार उन्होंने इलाज करवाना बंद कर दिया, अब वो जो भी मिलता उस दुर्लभ बीमारी का बखान करते जो उनको है और भारत में किसी को नहीं। तो राहु मति की क्षति में अग्रगामी प्रभाव रखता है।
ऐसे ही ब्लाॅग लेखक, एलोपैथी प्रैक्टिशनर, कवि-कलाकार, जुगाड़ू लोग, कुछ नया-नया करने वाले,पागल-दीवाने, परायी बीवियों में इच्छुक लोग, परायी प्रेमिकाओं को आधार बनाकर शेर ओ शायरी करने वाले इन सब में समान बात ये है कि इन सभी का बस सिर चलता है। धड़ के लिए यानि आधार के लिए तड़पता है पर इन्हें जीवन भर किसी चीज का आधार नहीं मिलता। इनकी ये हालत राहु द्वारा इन्हें बुरी और पूरी तरह गिरफ्त में लिये जाने के कारण होती है। लोग बेवजह प्यार को अंधा कहते हैं, अंधेपन का कारक राहु होता है। वह सिर पर कुंडली मारकर बैठ जाता है और धड़ से दूर रखते हुए बाकी सब करवाता है। घर-परिवार-समाज वाले लोग इसे लड़के या लड़की का बरबाद हो जाना कहते हैं। प्यार की नजर तो बहुत तेज होती है इसलिए सांवले-काले आशिक गौरवर्ण गोरियों को आसानी से पटा लेते हैं।
गिरधारीलाल शायर थे। लिखना, गाना और बजाना शौक था। एक के बाद एक नौकरियां छूटती गईं। 10 सालों में मासिक आमदनी इतनी नहीं हो पाई की कोई घरवाली मिल जाए। एक राहुप्रभावित विदुषी मिलने पर उसकी परवरिश गिरधारीलाल के मित्रों को करनी पड़ी। गिरधारीलाल का सुबह 9 बजे काम पर जाना रात को 9 बजे आना। सुबह बच्चे स्कूल चले जाते थे और जब रात को लौटते बच्चे सो जाते थे। बच्चे अन्यों को पापा और गिरधारीलाल को अंकल कहते थे। भगवान राहु से बचाये।
चूंकि राहु का सिर ही सिर है धड़ है ही नहीं यानि हाथ पैर चलाने की कल्पना भर ही संभव है तो राहु लोगों के सिरों में घुसकर यह भाव अच्छी तरह पुष्ट कर देता है कि वो कुछ नहीं कर सकते। लेकिन करने के विचार तो आते हैं, इसलिए लोग ये मानते हुए कि करना-धरना कुछ नहीं पर अभिव्यक्त की आजादी तो भारतीय संविधान सम्मत है, ब्लाॅग लिखने लगते हैं, किताबें गढ़ने लगते हैं। राहु खुश हो जाता है।
कई लोगों के ब्लाॅग पर उनके ब्लाॅग लिखने की वजह लिखी है। हालांकि किसी ने पूछा नहीं होता कि ‘‘आप क्यों लिख रहे हैं।’’ जिनका कोई उद्देश्य हो वो पूछेगा ना। राहु सारे लोगों को उद्देश्यविहीन कर देता है। लोगबाग अपने कर्मों पर कमेन्ट्स करने वालों की तलाश में सभी तरह की सरकस करने लगते हैं। उनके ब्लाॅग पर लिखा होता है कि वो ‘‘दिल की भड़ास निकालने के लिए’’ ब्लाॅग लिखते हैं। भई, भड़ास निकालनी है तो मंत्रियों पर जूते फेंक कर निकालो। ये कोई जगह है भड़ास निकालने की। ब्लाॅगस्पाट ने आपको स्पाॅट क्या दे दिया आप तो फैलते ही जा रहे हैं। राहु के प्रभाव से ऐसी ही मति हो जाती है, जिसका खाएं उसकी ही में छेद करें। ब्लाॅग, ब्लाॅगस्पाट.गूगल वालों का विज्ञापन पराये शादी डाॅट काॅम और अन्य लोगों के।
राहु द्वारा सम्पन्न कर्मों में किसी भी गृहिणी द्वारा आयुपर्यन्त किये जा रहे समस्त गृहकार्य, राजनीति, चुनाव, लोकतंत्र-वोट देना, रोबोट की तरह काम करने वाले लोग जो जब तक जबरन वीआरएस देकर घर नहीं बैठा दिये जाते फेक्ट्री आॅफिस जाते रहते हैं इत्यादि शामिल हैं। इन्हें जिंदगी भर होश नहीं आता कि उस काम के अलावा कुछ किया जा सकता है जो वो पिछले दशकों से कर रहे हैं। राहुग्रसित व्यक्ति कईयों की हालत तो ये हो जाती है कि मरणशैय्या पर भी वही पिछले 5 दशकों की रूटीन दिनचर्या एक दिन और जीने की भीख माँगता है।
राहु प्रभावित व्यक्तियों की हाथ की उंगुलियाँ और टांगे बेहतर काम करने लगते हैं। हर कहीं उंगली करना और फटे में टांग अड़ाना सम्पूर्ण जीवन का ध्येय होता है। ऐसे लोग अच्छे भले काम में नुक्स निकाल सकते हैं। संदेह और शक इनकी आंखों में कीच की तरह जमा होता है। चारो ऋतुओं में इनकी आंखें दुखती रहती हैं। दुखती आंखें चहुं ओर अपना प्रदूषण फैलाती हैं। आलोचक टाईप के लोग इनके प्रतिनिधि अभिव्यक्ता होते हैं।
राहुग्रस्ति युवतियाँ 22-27 साल तक लड़की एमबीए, बीकाॅम सीए की डिग्रियाँ लेती है और आगे जाकर साल दो साल में ही सारी पढ़ाई छू मन्तर। इलेक्ट्रानिक्स चिमनी, माइक्रोवेव ओवन्स, मल्टीपरपज मिक्सर ग्राइन्डर, और सदियों पुराने चैका चूल्हे के आधुनिक संस्करण की आढ़ में सारी उपाधियाँ स्वाहा हो जाती हैं। कपड़े धोने, घर के झाड़ू पोंछे, बर्तनों की सफाई बच्चे पालने में ही प्रौढ़ावस्था पार हो जाती है।
राहुग्रसित वृद्ध अपने अतीत की दुहाई देते रहते हैं कि किस समय उन्होंने क्या तोप मारी थी। हालांकि ये सब खयाली बातें होती हैं राहुग्रस्तता के कारण जीवन भर ही कल्पना के अलावा कुछ और कर नहीं पाते वही कल्पनाएं उन्हें अपने अतीत का घटित सच लगने लगती हैं। कोई मनोवैज्ञानिक काम नही करता। क्योंकि राहुग्रसित व्यक्ति सिर ही सिर में जिंदा रहता है, लोगबाग ऐसे लागों को बुद्धिजीवी कहने लगते हैं।
सुअर बुखार की तरह राहु ग्रसित व्यक्ति के लक्षण भी सामान्य से दीखते हैं पर उभरने पर यकायक नरकारोहण के अलावा कुछ नहीं घटता। टेमूफ्लू की डोज बेअसर हो जाती है, इतने छोटे नाम की दवाई भला कैसे असर करेगी। सारे अखबार, टीवी चैनल्स के भय से लोग फ्लूग्रस्त हो जाते हैं। लोगों के बड़ी मात्रा में नजला होने से सरकार भयग्रस्त हो जाती है, कहीं ये नजला हम पर ही न आ गिरे। बड़े बड़े विज्ञापन छपवाने पड़ते हैं कि ऐसा नहीं वैसा है। लेकिन होता तो वही है, जो है। हकीकत इस बीमारी को एन1एच1 का नाम देने वालों को भी पता नहीं होती।
यही कहानी अमरीकियों के बारे में है ईरान से डायरेक्ट पंगा न लेने, मुस्लिम जगत के समक्ष और आक्रामक न होने के उद्देश्य और ईराक के तेल कुओं पर नजर लगाये अमरीका ने सद्दाम हुसैन को पाला, और अफगानिस्तान पर पकड़ के लिए तालिबान को पर सब सीखने और हथियार मिलने पर यह एक असुर का काम करने लगे। अब सद्दाम के जाने से लगा कि सिर और धड़ अलग हो गये पर आतंक जारी है। राहु आतंकवाद ही नहीं अन्यान्य कई रूपों में हमारे रोजमर्रा के जीवन में यत्र तत्र दिखता है।
तो भई राहुकालम का ध्यान रखिये। इस कालम पर चढ़ा व्यक्ति ईसा तो नहीं कहलाता पर हालत उनसे भी बुरी होती है।
गुरुवार, 20 अगस्त 2009
हाए। कहॉं गए तुम
तेरी मोहब्बत का जो सहारा मिलता
दिल की कश्ती को किनारा मिलता
चाँद तो सारी रात सबका रहा
अपनी किस्मत को सितारा मिलता
सारी शब तारे रहे गरदिश में
कुछ तो नजरों का इशारा मिलता
चेहरा भी धुंधला हुआ यादों में
कभी तेरी दीद का शरारा मिलता
दिल की कश्ती को किनारा मिलता
चाँद तो सारी रात सबका रहा
अपनी किस्मत को सितारा मिलता
सारी शब तारे रहे गरदिश में
कुछ तो नजरों का इशारा मिलता
चेहरा भी धुंधला हुआ यादों में
कभी तेरी दीद का शरारा मिलता
मंगलवार, 18 अगस्त 2009
आप और राकेश राहू, केतु और शनि
उम्र के साथ कई बातों पर अंधविश्वास हटता गया जैसे; सभी उम्रदराज लोग समझदार और परिपक्व होते हैं, सभी स्त्रियाँ........... नहीं होतीं, सभी बच्चे बचकानी बातें ही करते हैं, गधे अफगानिस्तान में ही पाए जाते हैं इत्यादि। विज्ञान कहता है कि किसी भी व्यक्ति के दिमाग का विकास 15 वर्ष की आयु तक होता है, शेष सारी उम्र, उस 15 वर्ष तक विकसित दिमाग से काम चलाना पड़ता है।
यानि 15 वर्ष की उम्र में आदमी का दिमाग अपने विकास के चरम पर होता है और देखिये सारी गलतियों की शुरूआत आदमी 15 वर्ष की उम्र से ही करता है। तू सोलह बरस की मैं सत्रह बरस का.... यानि सत्यानाशों की श्रंखला का आरंभ। लेडीज फस्ट तो वो 16 बरस से ही दंगल में कूद जाती है। जो आदमी 15 वर्ष की उम्र मंे सही काम करने लग जाए वह आदमी नहीं होता.... क्या उसे आदमी कहा जाना चाहिए यह शोध का विषय है? खैर मेरे शोध का विषय व्यक्ति की आयु... और दिमाग का विकास न होकर यह है कि ”व्यक्ति वैसा क्यों हो जाता है जैसा वो है” यानि कौन कौन से घटक हैं जो उसे ‘ऐसा‘ बना देते हैं।
बहुत से लोगों की तरह हमारे दिमाग का विकास भी 15 वर्ष के बाद बंद हो गया था, तो हमने कुछ अन्य लोगों से जो 15 वर्ष की आयु में बुद्धिमत्ता के चरम पर थे, यह जानकारी हासिल करनी चाही कि आदमी वैसा क्यों हो जाता है जैसा है। मैं सोचा किया कि जिन्दगी भर औरत घर चलाती है, कपड़े सीती है पर शीर्ष फैशन डिजाइनर पुरुष जे जे वाल्या ही क्यों होता है? जिन्दगी भर खाना बनाती है पर फेमस कुक संजीव कपूर क्यों होता है? कई शीर्ष स्त्री रोग विशेषज्ञ भी नर मनुष्य ही थे। सारे किले महाराणाओं, अकबरों ने जीते। सारे अमेरिकाओं की खोज भी कोलंबसों ने की। मैं ये भी सोचा किया कि दुनियांभर की उपलब्धियों और कीर्तिमानों की स्थापना के बाद 30 से 60 सेकण्ड के खेल में पुरूष अखबारों के सर्वाधिक मँहगे और प्रतिदिन छपने वाले विज्ञापनों का विषय क्यों बन जाता है?
किसी ने आत्मा परमात्मा के फंडे दिये, किसी ने किस्मत बद्किस्मती के, किसी ने आदमी की करनियों को इसकी वजह बताया। पर हमारी समझ में जो बात आई वो ज्योतिष के नौ ग्रहों वाली थी, इस परिकल्पना में बहुत दम नजर आया। इस बात को समझने के बाद हमें भी अपने पर नाज हुआ कि 15 साल तक विकसित मस्तिष्क भी किसी आदमी की जिंदगी के गुजारे के लिए काफी होता है। तो हमने इस परिकल्पना को अपने सारे सह-ब्लाॅगकर्ताओं तक पहुंचाने की कोशिश निम्नानुसार कोशिश की है:
ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रह होते हैं और 12 राशियाँ होती हैं, लेकिन घबराएं नहीं हमें कुल जमा 21 बिन्दुओं का विस्तृत अध्ययन नहीं करना है। हमें बस ज्योतिष के मूल यानि शनि, राहू, केतू के बारे में जानना समझना है।
किसी भी व्यक्ति की रोते हुए पैदाइश से लेकर सड़कों पर मुर्दे की रूप में नुमाईश करते हुए विदाई तक यही त्रि-दुर्देव जी जान से सक्रिय रहते हैं। अब आप कहेंगे कि अन्य ग्रहों के बारे में क्यों नहीं जानना चाहिये तो भाई आप ही बतायें जो लोग या जो ग्रह कायदे कानून के अनुसार ही चल रहे हैं उनका चलना न चलना बराबर है, किसी महत्व का नहीं। उसी आदमी की तरह जो बड़े सीधे साधे ढंग से जिंदगी जी रहा है - जहाँ रिश्वत दी जानी चाहिए दे रहा है, जहाँ जूते खाने चाहिए खा रहा है, जहाँ गेला समझा जा रहा है समझा जा रहा है। संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करता हुआ वोट दे रहा है, संवैधानिक रूप से मान्य भ्रष्ट हत्यारों, गंुडे मवालियों, चाटुकारों, बलात्कारियों, अवसरवादियों को नेता चुन रहा है यानि वो सब कर रहा है जो संविधानसम्मत है।
हजारों सालों से आदमी और अन्य ग्रह वही कर रहे हैं जो लकीरों में लिखा है। ये सारे लकीर के फकीर हैं इनके किये मनुष्य जाति की कोई प्रगति नहीं हो रही। पर कुछ हटकर किया जा रहा है तो वो मात्र इन तीन ग्रहों द्वारा। शनि, राहु और केतु जी-जान से प्रत्येक चर अचर प्राणी की जिंदगी में भरपूर उंगली कर उसकी जिंदगी को जीने लायक बना रहे हैं। अगर सब कुछ अच्छा ही अच्छा होता तो भारत में कश्मीर को ही स्वर्ग क्यों कहते। कहने का मतलब ये कि अन्य प्रदेशों से प्रत्येक व्यक्ति को परेशान कर एक ही जगह की ओर खदेड़ा जाता है जहाँ पहुंचकर उसे लगता है कि यह स्वर्ग है। यह कोई दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह हो सकती है जैसे; अमेरिका। जहाँ की समुन्नत इमारत को शनि-राहु -केतू के एैक्य सफल प्रयास ने एक स्मारक के रूप में बदल दिया। अन्य आश्रय स्थलियों में पूंजीवाद, अलगाववाद, समाजवाद, लोकतंत्र, धर्म, कोई गुरू भी हो सकता है, पर कौन इन त्रिदुर्दैवों की माया से परे रह पाया है। जो नहीं है उसकी बात क्यों करें, पर दुनिया में जो भी है वो संक्षेप में राहू-केतु-शनि रा.के.श. (राकेश) से ही है।
कांग्रेस, बीजेपी या अन्य किसी दल के नेता की ही तरह रा के श अलग होते भी एक ही तरह के कारगुजारियो में निरंतर संलग्न रहते हुए जन का ता... धिन... धिन.. जन ता करते हैं। ये निराकार रूप हैं और साकार भी हैं। इनकी माया को समझने वाला भी इनसे नहीं बचता - क्योंकि वही बात, ऊँट की करवट की तरह इनका भी कुछ पक्का पता नहीं होता पिछली बार अटल बिहारी के साथ, इस बार संता जी के साथ, मायावती की मूर्ति देह ग्रहण कर लेती तो उस करवट भी बैठ सकते थे।
राजनीतिक दलों के दलदलों से अखबारों में छपे व्यक्ति की अंदरूनी (सेक्) जिंदगी के विज्ञापनों तक रा के श ही व्याप्त हैं। इनकी महिमा भी हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता की तरह है, मेरे खयाल से ‘हरि’ की जगह ‘रा के श’ शब्द ज्यादा उचित है। क्योंकि जब रा के श कथा को मोड़ देते हैं तो हरि अपने ही तारणहार स्वरूप का स्मरण करते हुए, आदमी को अपने हाल पर छोड़ निहाल कर देते हैं।
रा के श की माया की सक्रियता के कारण यह पाठ्य सामग्री निश्चित ही आपके 15 वर्ष तक विकसित उध्र्व अंग मस्तिष्क की पहुंच से छिटक रही होगी इसलिए मैं सोचता हूं आपको इस कड़ी के बाद वाली कड़ी में रा के श का पूर्ण परिचय दे ही दूं।
इस बीच जो पूर्वानुमान, अंदाजे, गालियाँ, साधुवाद, मजा, उपेक्षा, अपेक्षा आदि जो भी अंकुरित होता है उसे रा के श की ही व्याप्तता जानें। सारी तल्खियों, उंगली करने की इच्छा और उंगली करने के बाद हुई हानि का प्रतिशोध रा के श प्रभाव है। किसी को बिना वजह भाव मिलता है और कोई भाव पाने के लिए जिन्दगी बिता देता है पर फूटी कौड़ी की औकात हासिल नहीं कर पाता सब रा के श का किया धरा है। सब कुछ मनचाहा मिलने के बाद भी आप बेचैन रहते हैं और यह गाना गाते हैं “सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है...”, ”कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं मिलता, कभी जमीं कभी आसमां नहीं मिलता“। सारे तेल और गोलियां इस्तेमाल करने के बाद भी अपेक्षित परिणाम न निकलना, घु-टनों मंे दर्द बना ही रहना रा के शा का ही आवेश है। सारे धुंधलके, सारे उजाले, सारी खिसियाहटें, सारे नाले (रोने), आपके तन, मन और जो भी आप अपने आप में सोचते हैं रा के श के अलावा कुछ भी नहीं। ब्लाॅग सामग्री जारी आ........हे......
यानि 15 वर्ष की उम्र में आदमी का दिमाग अपने विकास के चरम पर होता है और देखिये सारी गलतियों की शुरूआत आदमी 15 वर्ष की उम्र से ही करता है। तू सोलह बरस की मैं सत्रह बरस का.... यानि सत्यानाशों की श्रंखला का आरंभ। लेडीज फस्ट तो वो 16 बरस से ही दंगल में कूद जाती है। जो आदमी 15 वर्ष की उम्र मंे सही काम करने लग जाए वह आदमी नहीं होता.... क्या उसे आदमी कहा जाना चाहिए यह शोध का विषय है? खैर मेरे शोध का विषय व्यक्ति की आयु... और दिमाग का विकास न होकर यह है कि ”व्यक्ति वैसा क्यों हो जाता है जैसा वो है” यानि कौन कौन से घटक हैं जो उसे ‘ऐसा‘ बना देते हैं।
बहुत से लोगों की तरह हमारे दिमाग का विकास भी 15 वर्ष के बाद बंद हो गया था, तो हमने कुछ अन्य लोगों से जो 15 वर्ष की आयु में बुद्धिमत्ता के चरम पर थे, यह जानकारी हासिल करनी चाही कि आदमी वैसा क्यों हो जाता है जैसा है। मैं सोचा किया कि जिन्दगी भर औरत घर चलाती है, कपड़े सीती है पर शीर्ष फैशन डिजाइनर पुरुष जे जे वाल्या ही क्यों होता है? जिन्दगी भर खाना बनाती है पर फेमस कुक संजीव कपूर क्यों होता है? कई शीर्ष स्त्री रोग विशेषज्ञ भी नर मनुष्य ही थे। सारे किले महाराणाओं, अकबरों ने जीते। सारे अमेरिकाओं की खोज भी कोलंबसों ने की। मैं ये भी सोचा किया कि दुनियांभर की उपलब्धियों और कीर्तिमानों की स्थापना के बाद 30 से 60 सेकण्ड के खेल में पुरूष अखबारों के सर्वाधिक मँहगे और प्रतिदिन छपने वाले विज्ञापनों का विषय क्यों बन जाता है?
किसी ने आत्मा परमात्मा के फंडे दिये, किसी ने किस्मत बद्किस्मती के, किसी ने आदमी की करनियों को इसकी वजह बताया। पर हमारी समझ में जो बात आई वो ज्योतिष के नौ ग्रहों वाली थी, इस परिकल्पना में बहुत दम नजर आया। इस बात को समझने के बाद हमें भी अपने पर नाज हुआ कि 15 साल तक विकसित मस्तिष्क भी किसी आदमी की जिंदगी के गुजारे के लिए काफी होता है। तो हमने इस परिकल्पना को अपने सारे सह-ब्लाॅगकर्ताओं तक पहुंचाने की कोशिश निम्नानुसार कोशिश की है:
ज्योतिष के अनुसार नौ ग्रह होते हैं और 12 राशियाँ होती हैं, लेकिन घबराएं नहीं हमें कुल जमा 21 बिन्दुओं का विस्तृत अध्ययन नहीं करना है। हमें बस ज्योतिष के मूल यानि शनि, राहू, केतू के बारे में जानना समझना है।
किसी भी व्यक्ति की रोते हुए पैदाइश से लेकर सड़कों पर मुर्दे की रूप में नुमाईश करते हुए विदाई तक यही त्रि-दुर्देव जी जान से सक्रिय रहते हैं। अब आप कहेंगे कि अन्य ग्रहों के बारे में क्यों नहीं जानना चाहिये तो भाई आप ही बतायें जो लोग या जो ग्रह कायदे कानून के अनुसार ही चल रहे हैं उनका चलना न चलना बराबर है, किसी महत्व का नहीं। उसी आदमी की तरह जो बड़े सीधे साधे ढंग से जिंदगी जी रहा है - जहाँ रिश्वत दी जानी चाहिए दे रहा है, जहाँ जूते खाने चाहिए खा रहा है, जहाँ गेला समझा जा रहा है समझा जा रहा है। संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करता हुआ वोट दे रहा है, संवैधानिक रूप से मान्य भ्रष्ट हत्यारों, गंुडे मवालियों, चाटुकारों, बलात्कारियों, अवसरवादियों को नेता चुन रहा है यानि वो सब कर रहा है जो संविधानसम्मत है।
हजारों सालों से आदमी और अन्य ग्रह वही कर रहे हैं जो लकीरों में लिखा है। ये सारे लकीर के फकीर हैं इनके किये मनुष्य जाति की कोई प्रगति नहीं हो रही। पर कुछ हटकर किया जा रहा है तो वो मात्र इन तीन ग्रहों द्वारा। शनि, राहु और केतु जी-जान से प्रत्येक चर अचर प्राणी की जिंदगी में भरपूर उंगली कर उसकी जिंदगी को जीने लायक बना रहे हैं। अगर सब कुछ अच्छा ही अच्छा होता तो भारत में कश्मीर को ही स्वर्ग क्यों कहते। कहने का मतलब ये कि अन्य प्रदेशों से प्रत्येक व्यक्ति को परेशान कर एक ही जगह की ओर खदेड़ा जाता है जहाँ पहुंचकर उसे लगता है कि यह स्वर्ग है। यह कोई दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह हो सकती है जैसे; अमेरिका। जहाँ की समुन्नत इमारत को शनि-राहु -केतू के एैक्य सफल प्रयास ने एक स्मारक के रूप में बदल दिया। अन्य आश्रय स्थलियों में पूंजीवाद, अलगाववाद, समाजवाद, लोकतंत्र, धर्म, कोई गुरू भी हो सकता है, पर कौन इन त्रिदुर्दैवों की माया से परे रह पाया है। जो नहीं है उसकी बात क्यों करें, पर दुनिया में जो भी है वो संक्षेप में राहू-केतु-शनि रा.के.श. (राकेश) से ही है।
कांग्रेस, बीजेपी या अन्य किसी दल के नेता की ही तरह रा के श अलग होते भी एक ही तरह के कारगुजारियो में निरंतर संलग्न रहते हुए जन का ता... धिन... धिन.. जन ता करते हैं। ये निराकार रूप हैं और साकार भी हैं। इनकी माया को समझने वाला भी इनसे नहीं बचता - क्योंकि वही बात, ऊँट की करवट की तरह इनका भी कुछ पक्का पता नहीं होता पिछली बार अटल बिहारी के साथ, इस बार संता जी के साथ, मायावती की मूर्ति देह ग्रहण कर लेती तो उस करवट भी बैठ सकते थे।
राजनीतिक दलों के दलदलों से अखबारों में छपे व्यक्ति की अंदरूनी (सेक्) जिंदगी के विज्ञापनों तक रा के श ही व्याप्त हैं। इनकी महिमा भी हरि अनन्त, हरि कथा अनन्ता की तरह है, मेरे खयाल से ‘हरि’ की जगह ‘रा के श’ शब्द ज्यादा उचित है। क्योंकि जब रा के श कथा को मोड़ देते हैं तो हरि अपने ही तारणहार स्वरूप का स्मरण करते हुए, आदमी को अपने हाल पर छोड़ निहाल कर देते हैं।
रा के श की माया की सक्रियता के कारण यह पाठ्य सामग्री निश्चित ही आपके 15 वर्ष तक विकसित उध्र्व अंग मस्तिष्क की पहुंच से छिटक रही होगी इसलिए मैं सोचता हूं आपको इस कड़ी के बाद वाली कड़ी में रा के श का पूर्ण परिचय दे ही दूं।
इस बीच जो पूर्वानुमान, अंदाजे, गालियाँ, साधुवाद, मजा, उपेक्षा, अपेक्षा आदि जो भी अंकुरित होता है उसे रा के श की ही व्याप्तता जानें। सारी तल्खियों, उंगली करने की इच्छा और उंगली करने के बाद हुई हानि का प्रतिशोध रा के श प्रभाव है। किसी को बिना वजह भाव मिलता है और कोई भाव पाने के लिए जिन्दगी बिता देता है पर फूटी कौड़ी की औकात हासिल नहीं कर पाता सब रा के श का किया धरा है। सब कुछ मनचाहा मिलने के बाद भी आप बेचैन रहते हैं और यह गाना गाते हैं “सीने में जलन आंखों में तूफान सा क्यों है...”, ”कभी किसी को मुक्कम्मल जहाँ नहीं मिलता, कभी जमीं कभी आसमां नहीं मिलता“। सारे तेल और गोलियां इस्तेमाल करने के बाद भी अपेक्षित परिणाम न निकलना, घु-टनों मंे दर्द बना ही रहना रा के शा का ही आवेश है। सारे धुंधलके, सारे उजाले, सारी खिसियाहटें, सारे नाले (रोने), आपके तन, मन और जो भी आप अपने आप में सोचते हैं रा के श के अलावा कुछ भी नहीं। ब्लाॅग सामग्री जारी आ........हे......
सदस्यता लें
संदेश (Atom)


