शनिवार, 22 अक्टूबर 2011

मैं तो बाबुल तेरे आँगन की चिड़िया

ऐ बाबुल मेरी विदाई का दिन आया
बरसों खुशियों से तेरा आंगन महकाया
बजी शहनाईयां अब चारों ओर
मुस्कुराते चेहरे और आंसुओं का जोर

पर ऐ बाबुल ये कैसी कहानी
पल में ही कैसे हो गई मैं बेगानी
कल तक तो थी तेरी आंखों का सपना
करता पराया, रिश्ता कैसा ये अपना ?

याद आयेगा अब, तेरा पलकों पर बैठाना
मेरा रूठना और तेरा मनाना
गलतियों पर तेरा सहज हो समझाना
पोंछ के आंसू गले से लगाना

जब आई मेरी सेवा करने की बारी
लोग खड़े थे द्वारे, ले डोली की सवारी
जितनी भी मिन्नते कर ले तेरी दुलारी
चिडि़या उड़नी ही है अब तेरी प्यारी

आशीषें लेकर चली हूं, किसी घर अब पराये
उन रास्तों पर चलूंगी जो तूने दिखाये
कुछ इस तरह अपने फर्जों को निभाउंगी
सबके सम्मान को चार चांद मैं लगाऊंगी

रहें सदा आबाद, बेटियां, बाबुल की कलियां
रहें सदा ही शाद, बेटियां चिडि़यां भलियां
मेरी सारी ही उम्रें, बेटियों को लग जायें
जब जिस उम्र में देखूं सदा मुस्कायें

बुधवार, 5 अक्टूबर 2011

बहुत तेज जि‍न्‍दगी में जब वक्‍त मि‍ले... सोचि‍ये

भारतीय त्यौहारों का शुभारंभ मुख्यतः रक्षाबंधन से होता है, फिर जन्मअष्टमी, गणेश चतुर्थी, पितृपक्ष, ईद, नवरात्रि, दशहरा, दीवाली, क्रिमसम, नया साल, 26 जनवरी, होली तक कहानी जारी रहती है।

नवरात्रियों में आखिरी, आज नवमीं तिथि थी। मिश्रा जी की दो बेटियों के सुबह उठने से पहले ही 4 जगह से बुलौवा आ चुका था। बेटियां नहा धोकर तैयार किये जाने के बाद शर्मा जी के यहां जाने के लिए निकलीं तो श्रीमती रामचंदानी उन्हें हाथ पकड़ कर अपने घर घेर ले गईं। घंटे भर बाद बेटियां शर्मा जी के यहां से निकलीं तो घर वापिस नहीं पहुंची, चैहान जी अपने घर ले गये। दोपहर के तीन बजे जब मिश्रा जी की बेटियां घर पहुंचीं तो 5 घरों से कन्याभोज करवाया जा चुका था। बेटियां थकी हुई, खुश थीं कि उन्हें चाॅकलेट, छोटे पर्स, सिक्के और नोट, कुरकुरे आदि मिले थे। कन्याभोज का सिलसिला अष्टमी से ही शुरू हो जाता है और दशमी तक चलता है। इन्हीं तीन दिनों में सभी देवीभक्तों को कन्यापूजन, भोजन करवाना होता है। इन्हीं तीन दिनों में कन्याओं की जरूरत पड़ती है।  साल के बाकी 362 दिन कन्याओं की जो पूछपरख होती है, किसी से छिपी नहीं। नवरात्रि के पूर्व पितृपक्ष में बुजुर्गों के दर्शन, उनके हालचाल जानने, पूछपरख का भी यही हाल है।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने बेटियों के संरक्षण, उनकी तरक्की के बारे में जोर शोर से बहुत कुछ कहा है, योजनाएं लाएं हैं। उनमें से एक है लाडली लक्ष्मी योजना इसमें, चुनी गई निर्धन नवजात शिशु कन्याओं का पंजीकरण कर उन्हें वार्षिक आधार पर अच्छी खासी आर्थिक सहायता 5000 वार्षिक (उनके नाम बैंक में जमा कर दी जाती है) दी जाती है। कन्याओं की उम्र के पड़ावों पर जब जब उन्हें आवश्यकता होगी ये राशि काम आयेगी। भली योजना है।

पर सभी कन्याओं को जन्मदाता माता पिता इतने भले नहीं हैं। हमारी सोसायटी के एकबोटे साहब के यहां कन्या ने जन्म लिया। एकबोटे ने उसका नाम सुषमा रखा। एकबोटे कस्ट्रशन में काम आने वाला आयरन, सरिया आदि का काम चलाते हैं। ऊपरी कमाई इतनी कि 5 वर्ष में दो प्लाॅट, दस एफडी, सोने चांदी, कार जैसी चीजों से अमीर हो गये। एकबोटे की बहन एक आंगनवाड़ी में काम करती हैं। उन्होंने अपने भाई की कन्या का पंजीयन लाडली लक्ष्मी योजना में करा दिया, लाडली लक्ष्मी सुषमा को राशि मिलने लगी। एक योग्य जरूरतमंद निर्धन कन्या योजना का लाभ पाने से वंचित रह गई। यही एकबोटे साहब नवरात्रि को कन्याभोज करवाते हैं, कन्याओं के भले की बात करते हैं...तो इसे क्या कहें?

हमारे सभी काम इसी तरह से औपचारिक हैं, साल के विशेष दिनों में पूजे गये पितरों, कन्याओं, देवी देवताओं, ईश्वर... को वर्ष भर बिसराये रखा जाता है। जैसे जीवन का इनसे कोई सबंध ही ना हो।

सब कुछ एक फैशन और सामाजिक भेड़चाल का हिस्सा है। रीति-रिवाजों, कर्मकाण्डों का मात्र एक ही उद्देश्य होता है - धनधान्य की आवक निर्बाध बनी रहे। इस धन से समस्त सुविधाओं, इन्द्रिय भोगों का लक्ष्य पूरा होता रहे। ईश्वर से की जाने वाली यही असली प्रार्थनाएं, अपेक्षाएं और दूजों को दी जाने वाली शुभकामनाएं हैं, बाकी सब औपचारिकताएं हैं।

हमारे पूर्वजों, पंचांग बनाने वालों ने प्रत्येक दिन का एक महत्व देखा था और उस दिन को किये जाने वाले कर्म भी पहचाने थे। ये कर्म एक व्यक्ति को अन्य व्यक्ति से, प्रकृति से और ईश्वर से जोड़ते थे।

लेकिन आज, लोगों का आजीवन एकमात्र ध्येय धन रूपी ईश्वर कमाना ही होता है। धन के लिए समय देना होता है, तो लोग 16 घंटे जुते हुए हैं। नौकरी करने वाले छुट्टियों को भूल गये हैं, नियोक्ता प्रसन्न है...कि अच्छे से अच्छे कम्प्यूटर भी घंटों लगातार चलाये जाने पर हैंग होने लगते हैं...पर इन्हें चलाने वाले आदमी या गुलाम, मशीन से कई गुना ज्यादा मशीनी हैं.... ये रविवार को भी, ईद, दशहरे दिवाली को भी चलते है।

धन एक छद्म लोक का निर्माण करता है। इसे अर्जित करने के लिए लम्बे घंटों वाली, महीनों तक लगातार बिना छुट्टियों की नौकरी है और एक मोटी तनख्वाह है। इस तनख्वाह को पिछले लोन, शाॅपिंग माॅल, बर्थडे या डेट और नये इलेक्ट्रानिक गैजेटस पर खत्म हो जाना हैं। कभी फुर्सत ने आ घेरा तो एलसीडी होम थियेटर, कम्प्यूटर-फेसबुक... इस छद्मलोक में आपको बनाये रखते हैं। उम्र होती जाती है, खोती जाती है.... आपके साक्षात जीवित मित्र ना के बराबर और इंटरनेट पर फोलोअर्स की संख्या बढ़ती जाती है।

कभी-कभी चिंता आ घेरती है कहीं ”कंधे ही कम ना पड़ जायें‘‘ और लोग पिकनिक, पार्टी, कथा, जगराता रख लेते हैं, शादी-ब्याह में शामिल हो जाते हैं।

तो चलिये इस भाग दौड़ में कभी ठहरने का मौका मिले तो देखें कि किस दिन, किस समय, क्या किया जाना जरूरी है...जो किया जाना ही जिन्दगी है। ना कि 24 गुणा 7 गुणा 365 दिन धन का इंतजाम किया जाना। अगर आपने ठहर के पढ़ा है तो बताओ ना मि‍त्र साक्षात कब मि‍ल रहे हो ?

सोमवार, 26 सितंबर 2011

कब होंगे पूरे हम?



जन्म से अधूरे हम, लाख मांगी मनौतियां,
कब होंगे पूरे हम?

जिस मां से जन्म थे, वह भी तो सहमी थी
बीते कल में डूबी, आज से तो वहमी थी
सोचें क्या अब हट के, जड़ता के बूरे हम
जन्म से अधूरे हम, कब होंगे पूरे हम?

अपने ही हाथों से, भय को सजाया है,
पाया जो, उस पर भी, जोखिमों का साया है
आशंका की छत के, ऊपरी कंगूरे हम
जन्म से अधूरे हम, कब होंगे पूरे हम?

कोई, कैसी हो सांत्वना, रास नहीं आती है
मिटने की अभिलाषा, फि‍र-फि‍र सिर उठाती है
जन्मते ही खोया सब, विषफल के चूरे हम
जन्म से अधूरे हम, कब होंगे पूरे हम?

बुधवार, 21 सितंबर 2011

जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?



जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

जन्म के ही संग मिलीं हैं,
इच्छा की विषधर फुफकारें
उम्रों रही सिखाती जिन्दगी
आभावों को कैसे बिसारें
अपना किया ही सबने पाया
फिर लगता बेमजा क्यों है
जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

माई-बाप की अपनी उलझन
बचपन के रहे अपने बन्धन
जवानी ने बेईमानी दिखाई
उम्र गई, राग रहा ना रंजन
लगे अब, सब बेवजा क्यों है?
जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

जितनी भी सुविधायें पाईं
सत्पथ पर बाधायें पाईं,
चुनौतियों से जितना भागे,
उतनी ही मुंह-बाये आईं
दिल दिमाग का द्वंद्व क्षय है
फिर ये क्षय ही बदा क्यों है?

जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?


क्‍या करना है, क्‍या नहीं करना
लगा रहा उम्रों यही डरना
बीतें जन्‍म की बि‍सरी यादें
क्‍या कि‍या? कि‍ पड़ेगा भरना
सच और झूठ का एक तराजू
सदा सि‍र पर लदा क्‍यों है

जुर्म क्या? ये सजा क्यों है?

सोमवार, 19 सितंबर 2011

वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था

काग़ज की कश्ती, पानी का किनारा था
मन में मस्ती थी , दिल ये आवारा था
आ गये कहां से, ये समझदारी के बादल
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था

वो कंचों की खन-खन में दिन का गुजरना
यारों का झुण्डों में, मुहल्लों में टहलना
साईकिल पर मीलों तक, वो शाम की सैरें
उन सुबह और रातों का, मोहब्बत में बहलना
हैं यादें वो शीरीं, वो दिल की अमीरी
जेबों से फक्कड़ था, हिसाब में नाकारा था
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था


वो मीनू से यारी, वो सोहन से कुट्टी
वो मोहन से खुन्नस, वो गोलू की पिट्टी
था कौन सा काम? कि ना हो पहला नाम
पतंग उड़ानी हो या गढ़नी हो मिट्टी
अजब थी अदा, थे सबसे जुदा
कहते सब बदमाश, और सबसे न्यारा था
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था

फिर कहानियों से यारी,, फिर इश्क की बीमारी
दिन रातें खुमारी,, फिर सपनों की सवारी
नहीं जानते थे कि ऐसा, ना रहेगा हमेशा
बेफिक्री की सुबहें, रातें तारों वाली
लगता वहीं तक बस, जीवन सारा था
वो नादान बचपन, कितना ही प्यारा था
- राजेशा


मूल पंक्तियाँ-
कागज की कश्ती थी पानी का किनारा था, खेलने की मस्ती थी दिल ये आवारा था
कहां आ गए इस समझदारी के बादल में, वो नादान बचपन ही कितना प्यारा था
- यश लखेरा, मण्डला, मप्र

मंगलवार, 13 सितंबर 2011

क्‍या जि‍न्‍दगी एक अधूरा शॉट है ?

फिल्मी कलाकार, अक्सर इतने मंजे हुए अभिनेता होते हैं, या इतने सौभाग्यशाली कि उन्हें स्वयं पता नहीं होता।  जिनका एक शॉट पहली बार में ही ओ.के. हो जाता है। या दूजी बार,- या तीजी बार, या दसवीं, या पचासवीं या सौंवी..बस दो-चार सौंवी बार... और अभिनेता की किस्मत देखिये कि यदि शॉट ओ.के. नहीं हो पा रहा, तो डुप्लीकेट तैयार होता है, शॉट ओ.के. करने के लिए।
पर आम आदमी. और मुझ जैसे लोग. क्लर्क, मोची, धोबी, भंगी, या किसी नौकरी पर जाने वाले नौकर कहाने वाले। जि‍न्‍दगी भर मजबूरन कि‍सी तयशुदा काम या धंधे पर जाने वाले लोग। किसी काम के साथ में "वाला" जोड़कर पुकारे जाने वाले. दूधवाला, प्रेसवाला, किरानेवाला, पानवाला, सब्जीवाला, या मजदूर सड़क खोदकर फिर से बनाने वाला .. 50-60-70 बरस, जब तक हाथ पैर हिलें उसे बस एक तयशुदा शॉट ओ.के. करवाने में सारी जिन्दगी निकल जाती है.। और बावजूद इसके कोई अदृश्य ईश्‍वर या डायरेक्टर कभी भी आकर नहीं कहता कि ठीक है, शॉट ओ.के. है, तुम्हें अब कोई जन्म नहीं लेना। 


मेरा हर जन्‍म, कोई पूरा सीन या कहानी नहीं होता। वह पूरा शॉट भी नहीं होता। मेरी सारी जि‍न्‍दगी अधूरा शॉट होती है, जिसे मैं अनवरत रोज रीटेक करता हूँ। टूटकर गि‍र जाने तक।

एवंई, Misc, जो कि‍ बहुत जरूरी होता है Very Important

गुरुवार, 8 सितंबर 2011

इसे चिराग क्यों कहते हो?

ये बुझा हुआ है। 
रौशनी - ना तो बाहर है, ना ही अन्दर
और, इसे जलना भी नहीं आता।
इसे चिराग क्यों कहते हो?

शुक्रवार, 2 सितंबर 2011

मेरा आपसे रि‍श्‍ता


"मैं" कुछ पढ़ूं और
अगर, वो
बहुत ही विस्मयकारी,, रूचिकर और बेहतरीन हो
तो "मैं" सोचता हूँ, "मैं" तो कभी भी ऐसा उत्कृष्‍ट नहीं सोच पाऊंगा
और मुझे ग्लानि होती है
कि कितनी साधारण है मेरी सोच
कि क्या मुझे अपनी ‘सोच’ को, सोच कहना भी चाहिए?
ऐसी हीनभावना उठाने वाली किताब
"मैं" पटक देता हूं।

"मैं" कुछ पढ़ूं
और वो साधारण हो
तो "मैं" सोचता हूँ,
लो, इससे बेहतर तो "मैं" लिख सकता हूं!
"मैं" लिखता ही हूं।
"मैं"  इस तरह की चीजें क्यों पढ़ूं?
और "मैं" किताब पटक देता हूं।

फिर
"मैं" ने कुछ लिखा,
और किसी ने नहीं पढ़ा
तो भी "मैं"
अपनी किताब उठाता हूं
और पटक देता हूं।
इन लोगों की समझ में कुछ नहीं आयेगा।


फिर मैंने
दूसरों का लिखा पढ़ना,
खुद लिखना,
और अपना लिखा दूसरों को पढ़ाना
छोड़ दिया।

अब मुक्त हूं,
हर तरह  के
"मैं"  पन से।
 


Kavita, Ego, Read-Write, Poetry, Rajeysha पढ्ना-लि‍खना, कवि‍ता, अहं


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कैसे दुख से मुक्त हुआ जाये