Tuesday, 4 August 2009

आने वाला पल----------- जाने वाला है......

प्रत्येक मनुष्य के पास जीने के लिए प्रतिदिन 24 घंटे हैं। गांधी जी हों या -मदर टेरेसा, आईंस्टीन हो या रवीन्द्रनाथ टैगोर, भगवान बुद्ध हों या जीसस, महावीर या अन्य विभूति उनको भी वही 24 घंटे मिले थे। न एक मिनट ज्यादा न एक मिनट कम। उनके दिन में घंटों की संख्या 25 नहीं होती थी। तो उन्होंने उस समय को कैसे बिताया और हम उसी समय को कैसे बिता रहे हैं यह देखने वाली बात है।

अति हर चीज की बुरी होती है। ऐसा ही समय के साथ भी है। जब लोग समय को जरूरत से ज्यादा ही गंभीरता से लेने लगते हैं तब समय सिरदर्द बन जाता है। इस जहान को हिन्दुओं में मत्र्यलोक भी कहा गया है जिसका मतलब यह कि यह मरने वालों का लोक है। दूसरे शब्दों में हम यह भी जानते हैं कि जो पैदा होता है वह खत्म भी होता है, मरता भी है। तो जीव पैदा होते हैं, विकसित होते हैं, बचपन, किशोर, जवानी, बुढा़ते हैं और फिर विदा हो जाते हैं।
समय वैज्ञानिक भौतिक तौर पर एक जरूरी पैमाना है वैसे ही जैसे नापने के लिए मीटर या गज, तौलने के लिए तराजू आदि।
पर आदमी बड़ी सरल चीजों को विकराल समस्या के रूप में बदलने में सक्षम है। लोग समय को भी समस्या बना देते हैं, वो ऐसे कि वो समय को भी अन्य चीजों की तरह खोपड़ी में सहेज कर रखने लगते हैं। सहेजते हैं और फिर उस गुजरे जमाने के बारे में सोच-सोच कर पागल हुए जाते हैं, जिसे वह सुनहरा अतीत कहते हैं। या उस भविष्य के बारे में ही हवाई किले बनाते रहते हैं जो आयेगा तो क्या पता उसकी शक्ल क्या होगी, या स्वयं सोचने वाला भी रहेगा या नहीं।

आप भी कुछ अतीत जीवी लोगों को जानते होंगे। इन लोगों के ताकिया कलाम होते हैं - वो भी क्या जमाना था, अरे हमने भी वो दिन देखें हैं..... या जी करता है वो दिन फिर लौट आएं, उस समय ऐसा होता था या उस समय वैसा होता था। मेरा एक ऐसा ही मित्र है। कभी राजे रजवाड़े रहे होंगे, उनके पीढ़ियों में हमारे ये मित्र पैदा हो गये। काम से कोरियर बाॅय हैं पर अकड़ वही जो महलों में लगी तस्वीरों में मूंछों पर ताव दिये लोगों की होती है। रस्सी जल गई पर बल नहीं गए। बाकायदा अपने राजचिन्ह का लाॅकेट गले में पहनते हैं। उनके पिता भी सारी उम्र इसी गलतफहमी में जिए। खाने के लाले थे पर घोड़ा खरीद रखा था जो शादी ब्याह में किराये पर दिया जाता था। एक दो नाली बंदूक थी, पर शिकार प्रतिबंधित है तो आस पास के घरों में दिखने वाली गौरयों, कौवों, कबूतरों की शामत थी। उनकी औलांदे भी वैसी ही - उनका शरारती लड़का खिलौना बंदूक से लोगों के घरों की खिड़कियों के शीशे चटखाया करता था। बहादुरी बस ऐसी ही ऊटपटंाग बातों में थीं, चैक पर छिड़ती लड़की देख वो दुबक कर निकल जाते थे।

इसी तरह एक दूसरी अति पर सक्रिय लोग समय के भविष्य रूप के बारे में ही सोचते विचारते और योजनाएं बनाते रहते हैं। भविष्यजीवी लोग आने वाले कल की ही बातें करते हैं। आपने दीवारों पर लाल रंग की मिट्टी से लिखी वो लाईने तो पढ़ी सुनी ही होंगी.......जय सतगुरूेदव, कलियुग जायेगा, सतियुग आयेगा... जाने किसके लिए किस रूप में?
मैं अपने एक मित्र को जानता हूं जो काफी पढ़ा लिखा और समृद्ध है है परंतु काफी मधुर सबंध हो जाने के बाद भी मुझे अपने कभी घर नहीं ले कर गया। मुझे अन्य मित्रों से पता चला कि उसके भविष्य के संबंध मंे बड़े बड़ी योजनाएं हैं कि बंगला होगा, गाड़ी होगी, नौकर चाकर होंगे तब वह सारे दोस्तों को अपना घर दिखायेगा। अभी वह अपने ड्राइवर पिता के साथ एक दो कमरों के क्वाटर में रहता है सो उस (उसके हिसाब से शोचनीय) स्थिति मंे लोग देखें तो उसे बुरा लगता है।
इस प्रकार ये दोनों तरह के लोग अतियों पर रहते हैं और सदा दुख में रहते हैं क्योंकि अतीत हमेशा के लिए जा चुका है और भविष्य कभी भी नहीं आता। मजा वर्तमान में और वर्तमान में भी सेकण्ड सेकण्ड का आनंद निचोड़ लेने में है। हर पल को शिद्दत के साथ जीना ही असल जीना है।

गीता मंे भगवान श्रीकृष्ण जी एक स्थान पर अर्जुन से कहा था कि - हे अर्जुन जहां तुम खड़े हो वहां करोड़ों करोड़ों जीव कई कई जन्म बिताकर सिधार चुके हैं।
यही बात समय और घटनाओं के बारे में सच है - हमारे आस पास यदि बुराई ही बुराई दिखती है तो सोचें - क्या अतीत मंे सभी अच्छे लोग थे? यदि हमारे पास अच्छाई ही अच्छाई और तरक्की दिखती है तो भी सोचिये कि अतीत में भी कितनी समृद्ध सभ्यताएं और संस्कृतियों ने युगों बिताये हैं।

बिना अतीत के कैसे जिएं? यदि कोई पीछे मुड़कर देखने वाला न हो तो अतीत कहाँ है? हम ही अपना अतीत बनाते हैं। समय के परिप्रेक्ष्य में सोचते करते हैं और अतीत बन जाता है। हम ही अपने भविष्य के सपने गढ़ते हैं। हमें अपने अतीत को बिना भला बुरा कहे उससे सीख लेनी चाहिए और भविष्य के लिए मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए। नई चीजों को अपने विवेक के तराजू पर तौल कर सीखें। अतीत से बंधे न रहें। न तो सारा नया श्रेष्ठ होता है न सारा गुजरा हुआ।

इस मामले में अपने आस पास बचे जानवरों को देखें। उन्हें बीते कल का शोक नहीं होता और आने वाले कल की भी चिंता नहीं होती। क्या आदमी जानवर से भी गया बीता है।

अतीत के लिए जीते कई देवदास शराबखानों में मिल जाते हैं। पारो घर बार बसा कर मजे करती है और ये देवदास उन्हीं सुनहरे दिनों को याद कर अक्ल से हाथ धो बैठते हैं और शेर ओ शायरी कर गुजारा करने लायक भी नहीं बचते। सरकारी कार्यालयों में कई अतीतजीवी लोगों के दिमाग पूरी तरह ठस हो चुके हैं। मेज पर कम्प्यूटर भी रखा है और टाइपराइटर भी। पर आज भी सारा दिन टाईपराइटर ही खटर खटर करता है। सीखने की जरा इच्छा नहीं। कई कम्प्यूटर सीखने वाले भी ऐसे लोग हैं जो एक आध साफ्टवेयर सीख लिया तो रोबोट की तरह बस रटी रटाई कमांड एप्लाई करने में ही यकीन रखते हैं। कई उनसे भी महान लोग किसी साफ्टवेयर के नवीनतम संस्करण से उसी तरह परहेज रखते हैं जैसे स्वाइन फ्लू के बीमार से। उनके ये शब्द होते हैं, पुराना बेहतर है...., इसकी स्पीड अच्छी है, अरे नया समझ ही नहीं आता। अब इन लोगों के कौन समझाये कि पुराना अच्छा होता तो कहानी वहीं खत्म हो जाती क्यों अरबों डाॅलर लगाकर कई इंसानी दिमाग रात दिन नई सुविधाएं विकसित करने में जुटे हैं।

भावी के लिए संग्रह की मानवीय वृत्ति मँहगाई को कई गुना बढ़ा देती है। जमाखोरी ऐसी ही कुवृत्ति है। हमारे शहर में कई लोग अपनी सारी उम्र किराये के मकानों में निकाल चुके हैं लेकिन कई लोग ऐसे भी हैं जिनके शहर में उगी नई नई काॅलोनियों में 4 -5 मकान हैं और बंद पड़े धूल खा रहे हैं, सड़ रहे हैं। इसे सूझ-बूझ भरा निवेश न कहकर सामाजिक शोषण कहना चाहिए। क्या इस प्रकार की अन्य असमानताओं और वैषम्य का कारण यही अतीत या भविष्यजीवी मानवीय वृत्ति नहीं है?
तो प्रत्येक आयु अवस्था में व्यक्ति जिंदादिल रहे। पूर्वाग्रह न रखे। तथ्य को जस का तस देखे। कुतर्क न करे। न पीछे रहे न आगे हवा पर कदम रखे। जिस बढ़ते कदम के साथ जो उचित हो वही सनातन कर्म करे। सनातन शब्द का अर्थ ही यही ‘ऐसा जो अतीत, वर्तमान और भविष्य तीनों कालों में सत्य है’। और सनातन होती है हमारी दृष्टि जो किसी बात को वैसा का वैसा ही समझ ले, जैसी वो यथार्थ रूप में है। क्या आपने वो गीत नहीं सुना - ”आगे भी जाने न तू, पीछे भी जाने न तू जो भी है बस यही इक पल है“ इसी पल को भरपूर जीने में सार्थकता है। चाहे भले बनो या बुरे, गांधी बनो या हिटलर, राम बनो या रावण लेकिन समय को उसकी समग्रता में जिओ। प्रत्येक क्षण को समग्र रूप से जीने वाला व्यक्ति वक्त की सीमाओं को लांघ, अमर हो जाता है।