बहुत सारे
बौद्ध, हिन्दू, ईसाई, मुसलमान, सिख
अपनी सबसे बड़ी किताबें पढ़ रहे थे
मंत्र जप रहे थे, प्रार्थनाएं कर रहे थे
और अचानक सूनामी आ गया
बिना किसी बुद्ध, ईश्वर, अल्लाह की परवाह किये
बहुत सारे लोग
रोजाना के
खुद ही तय किये धंधों में लगे थे।
अक्षर मात्राएं गिन कर
कविताएं गजलें कर रहे थे।
लोग व्यस्त थे-
विचित्र भावों और
अनुभवों के संचारक लेख और
ब्लॉग्स पर पोस्ट्स लिखने में।
जो नहीं लिख पा रहे थे,
वो कमेंटस करने में।
और सुनामी आ गया
बिना इसकी परवाह किये
कि इंसान नाम की चीज
कितने जरूरी काम कर रही थी
बहुत सारे
आठ दस घंटे दफ्तरों में बिताने वाले लोग
दफ्तरों में बैठे
दुनियां भर की बतौलेबाजी कर रहे थे
और सुनामी आ गया
बिना तर्क दिये।
बहुत बड़ा अमीर और
बहुत बड़ा गरीब भी
झोंपड़ी और महल बनाने में लगे थे
पता नहीं किन उम्रों के लिए।
और सुनामी आ गया
हर झूठी सुविधा और स्थिरता भंग करने।
बहुत सारे वैज्ञानिक
रियेक्टरों को चला रहे थे
कि किसी बिजली से
दुनियां भर की तकनीकी चलती रहे
वो तकनीक
जिसके बल पर
आदमी इस पृथ्वी का सबसे बड़ा पशु है।
और सुनामी आ पहुंचा
आदमी की अपनी ही कुल्हाड़ी से
उसकी जाति काटने के लिए।
बहुत सारे वैज्ञानिक
अत्याधुनिक जल, थल, वायु पर चलने वाले
जहाज बना रहे थे
ऐसी कारें बन रही थी
जिनमें लेटे लेटे
जल थल आकाश भर में घूमते फिरते
ऐय़याशियां की जा सकें।
और सुनामी आ गया
सब कुछ बहा ले जाने के लिए
थल को आकाश में
आकाश को पाताल में
और पाताल को अधर में।
लेकिन आदमी बाज नहीं आयेगा
वो ये सब सहता हुआ, सीखना चाहेगा-
जल थल और आकाश के प्रलय से निपटना।
मिली हुई चीजों को भूल कर
उन सब चीजों को खोजेगा,
जो नहीं मिलीं।
वो कभी नहीं चाहेगा
कि जितनी भी उसकी उम्र है
उसे ही जश्न की तरह मना ले
ये महसूस करते हुए
कि बिना इंटरनेट के भी
सारी धरती पर रहने वाले इंसान
जु़ड़े हुए हैं आपस में
रोटी कपड़े मकान जैसी
निहायत ही बहुतायत से मिलने वाली
चीजों की प्रचुरता में
आकाश पर सूरज चांद के नजारों में
धरती आग हवा पानी की जादूनगरी में
प्रेम-हंसी-खुशी के रसों और
नृत्य-गान सौन्दर्य के अलंकारों के
खजानों के साथ।
क्या इंसान को
किसी सूनामी से निपटने के
उपाय ढूंढने चाहिये
या फिर से जानना चाहिए
कि
जीना किसे कहते हैं?
(पल में परलय होयगी फेर करेगा कब?)
क्योंकि हर आदमी की जिन्दगी में
साठ सौ साल बाद, आती ही है सूनामी
जिसकी हमारे पास पुख्ता पूर्व सूचना है।
जौ हर आदमी को पक्का बहाकर ले ही जायेगी।
जिसका कोई अपवाद नहीं।
जिसे आप और मैं
‘‘मौत’’ के नाम से भी जानते हैं।
6 टिप्पणियां:
बहुत अच्छा, मजा आ गया सच में
'maut '... to aani hai , sach hai . sunami insaan ki kripa , ishwar bhi dard se maun rahta hai . hum ishwar ka aahwan ker rahe ya sunamiyon ka
वक़्त की रफ़्तार
ब्लॉग पर अनियमितता होने के कारण आप से माफ़ी चाहता हूँ .
आप ने सच में बहुत अच्छा लिखा है.
पर इंसान में एक खासीयत है.
उसे पता है कि उसका अंत निश्चित है.
फिर भी वह ढूंढता है अनंत को .
क्योंकि अंत आनंत नहीं.
आपकी खूबसूरत रचना को सलाम.
खूबसूरत रचना को सलाम.
रंगों का त्यौहार बहुत मुबारक हो आपको और आपके परिवार को|
कई दिनों व्यस्त होने के कारण ब्लॉग पर नहीं आ सका
बहुत देर से पहुँच पाया ....माफी चाहता हूँ..
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