Thursday, 4 April 2013

जरा सी जिंदगी,किस किस तरह जीते

बड़े दिनों बाद... पागलपन आया याद



इक जरा सी जिंदगी, किस किस तरह जीते
बस एक ही क़तरा था, किस—किस तरह पीते.

सूरज आता, सताता कि कुछ कर
रात कहती, जिओ जैसे हों सुभीते

जो गये, बस खो गये, अब ढूंढे कैसे?
ढूंढो... जब त​क ये जिंदगी ना बीते.

ज़िंदगी ने लिया ही लिया, दिया क्या ?
ख्वाहिशें निकली हीं थी, लगे पलीते.