शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

शुरूआत तो हो

किसी से उम्मीद रहे
किसी का इंतजार रहे
जीने में मज़ा आता है
जो जिन्दगी में प्यार रहे

दो बोल अपने कहो
दो बोल मेरे सुनो
तुम भी मायूस न हो
मुझे भी करार रहे

एक अफसाना तो हो
जो सबसे कहतें फिरें
ऐसा मौसम गुजरे
कि यादों में बहार रहे

कुछ लम्हें ऐसे हों
न ताउम्र वैसे हों
जो मुड़ कभी देखें
जिन्दगी में सार रहे

बुधवार, 2 सितंबर 2009

तब की बात

तुमको अपना समझ लिया था,
फिर से गलत अनुमान था मेरा।

मेरा सलाम कुबूल हुआ था,
बस इतना सम्मान था मेरा।

सारे सितम हँस के सहता था
ये किस पर अहसान था मेरा?

जीते-जी कभी नहीं मिला था,
हाँ! वही तो भगवान था मेरा।

बरसों पहले भूल गया था,
क्या पहला अरमान था मेरा।

रोता और भड़क जाता था,
अभी जिन्दा इंसान था मेरा।

घुड़की-गाली सुन लेता था,
अहं नहीं परवान था मेरा।

*इस ब्लाग पर सम्पूर्ण पाठ्य(शब्द) सामग्री राजेशा रचित, मौलिक है।
**संपादित सामग्री को उचित सन्दर्भ, लिंक एवं मूल विवरण के साथ प्रस्तुत करने का हरसंभव प्रयास किया जाता है।

मंगलवार, 1 सितंबर 2009

मानव इतिहास के पांचवे महान वैज्ञानिक योशिरो नाकामत्सु

विभिन्न वैज्ञानिक खोजों के जनक जापान के डा योशिरो नाकामत्सु को मानव इतिहास में जन्मे महान मस्तिष्कसमृद्ध लोगों में शुमार किया जाता है। 3000 से अधिक पेटेंट हासिल करने वाले योशिरो को 36 वर्षों तक निरंतर, किये गये हर भोजन की बाकायदा फोटोग्राफी के साथ हर तथ्य का रिकार्ड रखने के लिए पोषण श्रेणी का नोबल पुरस्कार भी दिया गया। उन्हें अमेरिका की यूएस साइंस एकेडेमिक सोसायटी ने आर्कीमिडीज, माइकल फैराडे, मेरी क्यूरी, निकोल टेसला के बाद विश्व का पांचवा महान वैज्ञानिक घोषित भी किया।

एक स्कूलशिक्षक माता के गर्भ से, 26 जून 1928 को जापान में जन्में इस वैज्ञानिक ने 23 वर्ष की उम्र में कालेज लाइफ के दौरान फ्लाॅपी की खोज की थी, उसके बाद सीडी, डीवीडी, डिजीटल घड़ियाँ, कसरत और जागिंग के लिए आम आदमी से 3 गुना तेजी से दौड़ने में सहायक विशेष जूते, मानसिक क्षमता बढ़ाने वाली सेरेबेरेक्स चेयर, टैक्सीकेब मीटर, सिनेमास्कोप, कराओके मशीन, यौनशक्तिवर्धक स्पे्र लवजेड 200 इत्यादि उनके मुख्य आविष्कार रहे हैं। पानी से चलने वाले इंजन की यथार्थपरक परिकल्पना भी उनकी देन है। इन आविष्कारों की बदौलत उन्हें जापान का एडीसन कहा जाने लगा।

उनका आविष्कार सेरेबेरेक्स चेयर एक ऐसी कुर्सी है जिस पर आराम कर व्यक्ति की समरणशक्ति, गणित कौशल और दृष्टि क्षमता में सुधार होता है। इसके अलावा निम्न रक्तचाप, धमनियों में रक्त संचरण संबंधी रोगों में भी यह कुसी लाभदायक है। इस कुर्सी में विशेष ध्वनि तरंगे के कंपन पैरों से शुरू होकर मस्तिक तक प्रवाहित होते हैं। डा नाकामत्सु के अनुसार इस पर किया गया 20-30 मिनिट का विश्राम मस्तिष्क को 8 घंटे की आम नींद की ताजगी देता है।

अपने भोजन में वो रोज सूखे झींगे विशेष मिश्रण, समुद्री शैवाल, चीज, योगर्ट, ईल, अंडों, गोमांस और मुर्गे की कलेजी आदि लेते हैं। पौष्टिक भोजन, सुबह की सैर, व्यायाम के समर्थक डाॅ नाकामत्सु के अनुसार हमें अपने उन विचारों पर अधिक ध्यान देना चाहिए जो अचानक, एक फ्लैश लाइट्स की चमक की तरह आते और खो जाते हैं। क्योंकि इन्हें नोट कर इन पर अमल करना किसी भी व्यक्ति की जिंदगी बदलता या बदल सकता है।

उनकी खोजों का मुख्य समय रात्रि के 12 से सुबह के 4 बजे तक का है। वो दिन में 4 घंटे से ज्यादा नहीं सोते और मानते हैं कि किसी भी व्यक्ति के लिए 6 घंटे से ज्यादा सोना हानिकारक होता है। विशेष साधनों के साथ पानी के भीतर रहकर खोजें करने में आनंद मनाने वाले नाकामत्सु कहते हैं कि ‘‘आक्सीजन’’ मानव मस्तिष्क के लिए दुश्मन है।

जापान में डा नाकामत्सु के नाम से प्रसिद्ध इस वैज्ञानिक ने जीवन जीने यानि अपनी आयु का लक्ष्य 144 वर्ष रखा है। उनका ये भी कहना है कि वे अपने आयु लक्ष्य के दौरान संभवतः 6000 खोजें कर लेने का रिकार्ड बना डालेंगे।

सोमवार, 31 अगस्त 2009

सब प्रश्नों का एक ही उत्तर

पैसा खुदा क्यों?
भाई-भाई से जुदा क्यों?
बाप-बेटे में क्यों रंजिश है?
सब कुछ है फिर भी खलिश है?
बीमारियों का जाल क्यों फैला?
इंसान हुआ क्यों एड्स से मैला?
राहत राशि क्यों कम पड़ जाती है?
जीने की राह नजर नही आती है?
99वें का फेर क्या है?
देर में अंधेर क्या है?
राम को वनवास क्यों मिला?
रावण को राम से क्यों गिला?
भोजन काफी ज्यादा है, पर क्यों मिलता सबको आधा है?
दवा और दारू में क्या फर्क है?
क्या स्वर्ग है क्या नरक है?
कर्ज की जरूरत क्यों पड़ती है?
मर्ज की तेजी क्यों बढ़ती है?
होम करते हाथ क्यों जलते हैं?
चादर के बाहर खवाब क्यों पलते हैं?
उम्मीद का रहना क्या है?
संतों का गहना क्या है?
सुबह नींद जल्द क्यों नहीं खुलती?
अतीत की यादें क्यों नहीं घुलतीं?
रामराज का अर्थ क्या है?
किसी भी काज में अनर्थ क्या है??
आदमी कार्टून कब बन जाता है?
जुनून पागलपन कब कहाता है?
मन की शांति क्या है?
जग में भ्रांति क्या है?
विवेक क्या है, अविवेक क्या है?
बुरा क्या है, नेक क्या है?
सच की सजा क्यों हैं?
झूठ में मजा क्यों है?
लोभ पाप क्यों है?
सारे संताप क्यों हैं?
अनुशासन का क्या मतलब है?
तौल का क्या सबब है?
नजर कितनी होनी चाहिए?
बोवनी कितनी बोनी चाहिए?
विश्वास, अंधविश्वास क्या है?
प्रेम और मोहपाश क्या है?
कूकर में सेफ्टीवाल्व क्या है?
मनुष्य जीवन में काल क्या है?
आटे में नमक कितना डालें?
घाटे को कब संभालें?

इन सब प्रश्नों का एक ही उत्तर है-
जरूरत और हवस में अंतर है,
‘अति’ से बचना सबसे बड़ा मंतर है।

शनिवार, 29 अगस्त 2009

मनुष्य जाति की शर्मनाक हरकतें

गौरेया, मैना, कौआ, चील गिद्ध, बाज, मोर, तोता ये सारे पक्षी कभी भी इतने दुर्लभ नहीं थे कि इन्हें देखने के लिये चिड़ियाघर जाना पड़े।
वर्षा ऋतु में खिली-फैली हरियाली में तरह तरह के रंग-बिरंगे अजनबी बेनाम फूलों पर मंडराती सतरंगी तितलियाँ खो गई हैं।

गर्मी की छुट्टियों में घर जाते थे तो मिट्टी की दीवारों वाली गौशाला के बाल्लों पर गौरेया के घांेसलों के लिए जगह होती थी। झुण्ड के झुण्ड गौरेया के बच्चों का चिंचियाना अद्भुत आनंद का बायज बनता था।

सांप-सपोलिये बचपन से देखने सुनते आये थे। 25 बरस तक भूतल के आवास में की भी सांप बिच्छू सपोलिये कनखजूरों से पाला नहीं पड़ा। खेतों, जंगलों, खण्डहरों, झुरमुटों में उनका घर होता है ये कुदरती बात थी। इन स्थानों पर जाकर बिलों से बाहर निकले सांपों के सिर, नदी नालों मंे केकड़े, बिच्छु देखना एक नैसर्गिक रोमांचकारी मजा था। पर पिछले दशकों में या और खासकर हाल के सालों में शहर की आब ओ हवा और जमीन को आदमियों ने खतरनाक ढंग से बदल दिया है।

जिंदगी में पहली बार पंजाब के एक कस्बे से हमारे नये फ्लैट के गृहप्रवेश कार्यक्रम मंे आई मौसी ने प्रश्न उठाये - कैसे आप लोग इस छोटी सी दड़बानुमा जगह में रह लोगे, घुटन नहीं होती। पांचवे माले पर पलने वाले बच्चों का बचपन क्या होगा?
हमने कहां घुटन कहां नहीं होती। अब शहर में जमीन बची ही कहां है? खेतों जंगलों मंे इंसान की रिहायशी बस्तियों, औद्योगिक विकास की राह में आए प्रकृति में पलने जंगली जीव जाएं कहाँ? अब घरों-बंगलों में, 6-7 मंजिला फ्लैट्स की ऊंचाईयों पर सांप बिच्छू पकड़े जा रहे हैं तो प्रश्न स्वाभाविक ही है कि वो किस ग्रह पर जाएं?

पढ़े लिखे इंसान ने जानवरों के लिए अभ्यारण्य बनाकर उनकी हदों पर बोर्ड लगा दिये हैं, पर पढ़े लिखे लोगों के आग्येस्त्रों की बंदूकों की नलियों से निकली चिंगारियां गहरी काली अंधेरी गुफाओं का अछूतापन चीर गई हैं।

जंगलों का जीवन पूरी तरह नंगा कर दिया गया है। सेटेलाईट पर सजी इंसान की निगाहों से बचने के लिए जानवर अगर पढ़े लिखे होते और किसी ग्रह की कल्पना कर सकते तो अब उनका नितांत आवश्यक, जीने-मरने का प्रश्न यह होता कि अब किसी भी तरह इंसान से बचकर उस ग्रह पर कैसे पहुँच जाएं।

थलचर, नभचर की तरह जलचर भी इंसान की पहुंच से बाहर नहीं तेल, गैस, इंसान के खोजे रसायन सागरों की अतल गहराईयों में दबे ढंके जीवन के लिए खतरा बन गये हैं।

डोडो, सिंह, शेर, चीते, गेंडे, सोन चिरैया, सफेद कौआ, गिद्ध - और भी अन्य जिनके नाम हमें पता नहीं,, ये सारे उन जीवों के नाम हैं जिन्हें ‘‘इंसान’’ नाम के जानवर ने अपनी खूंखार और अचूक शक्तियों से मिटा डाला है या मिटा डालने को ही है।

हमारे निकट ही रहने वाले एक परिवार की महिला मुखिया एक छोटे से 25-50 ग्राम के पक्षी के अंडे और पक्षी का जिस्म यौन-शक्तिवर्धक मानते हुए समय समय पर उदरस्थ करती रहती है। कब तक हम अपनी शारीरिक हवस के लिए हम कुदरत के सुन्दर जीवों को खाने पीने का सामान बनाते रहेंगे?

उस जमाने में भी जब मानव के पास अचूक हथियार नहीं थे मानवभक्षी शक्तिशाली खूंखार जानवरों ने कभी भी कुछ ऐसा नहीं किया कि वो मनुष्यों का पूरा का पूरा टोला या एक बस्ती ही निगल गये हों। पर इस तरह की उपलब्धि मनुष्य नाम के जानवर के नाम अवश्य है, इसने जल-थल-नभचर जीवों-प्राणियों की प्रजातियाँ की प्रजातियाँ समूल नष्ट कर दी हैं।

एक समय निश्चित ही शिकार करने का मजा रहा होगा। जब किसी जानवर को मारने के लिये आदमी को तीर कमान भाले, तलवारों के साथ टक्कर का मुकाबला करना पड़ता होगा। लेकिन अब क्या मजा? अत्याधुनिक बंदूकें और उनसे भी अचूक वैज्ञानिक तरीके हैं जो किसी भी भयानक,खूंखार और जहरीले शक्तिशाली जीव को मिनटों में झुण्ड के झुण्डों में निर्जीव कर दे।
दाँतों के लिए हाथियों की, हड्डियों खालों के लिये सिंह, बाघों, भालुओं, पांडों की। शारीरिक शक्तिवर्धन के लिये हिरणों, मोर, कई प्रजाति की बत्तखों, खरगोशों को मौत के घाट उतार देना पृथ्वीग्रह पर मानव का ही कुकृत्य है।

निरीह प्राणियों को अपनी जुबान के चटखारों और जिस्मानी हवस का साधन बनाना, चाहे अनचाहे ऐसी गतिविधियाँ जो प्राकृतिक विनाश का कारण हैं, मनुष्य जाति की ये वो शर्मनाक हरकतें हैं जिसके लिये उसके वैज्ञानिक विकास, धर्म, अध्यात्म और सभ्यता जैसे खोखले शब्दों पर लानत भेजी जा सकती है?

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

सच की कड़वाहट

दो फिल्मी यार बरसों से फिल्म लाईन में स्थापित थे। सच और झूठ विषय को लेकर उन्होंने कई हिट फिल्में दीं थीं। रात की दारू पार्टी में दोनों अपने नयी फिल्मों की विषय सामग्री पर बातचीत कर रहे थे।

राम: क्या दारू पीकर सभी लोग सच बोलते हैं?

जाॅन: मेरे खयाल से वो वैसा सच बोलते हैं जो उनकी नस नस में बसा होता है, जिससे वो मजबूर होते हैं...

राम: मतलब?

जाॅन: सामान्यतौर पर झूठ बोलने वाला नशे में भी झूठ बोलता है और सच बोलने वाला सच ही बोलेगा। आजकल बोलने वाले सच अलग होते हैं और करने वाले सच अलग तो दोनों को कोई फर्क नहीं पड़ता।

राम: फिर वही सवाल सामने आता है - जनता क्या चाहती है?

जाॅन: जनता थियेटर में सच झूठ देखने नहीं, बोरियत दूर करने टाईम पास को आती है।

राम: पर कुछ तो सच होता है न, अपना फेमस डाॅयलाॅग ‘सत्यमेव जयते’।

जाॅन: घंटा जयते। हजारों साल लोग झूठ का मजा लेते लेते बोर हो जाते हैं तो फिर टेस्ट चेंज करने को सच की मिर्च से स्वाद बदलते हैं। लेकिन इसकी जरूरत हजारों सालों में एक बार पड़ती है.... कभी कभी बस एक बार। जीसस, गांधी, हरिश्चन्द्र, राम ........ सब मिर्ची का काम करते हैं।

हजारों साल तक वही ढर्रा, वाॅर, एड्रेन्लिन जगाने वाला मसाला, ये सब झूठ है तो क्या? यही चलता है।

राम: चलो मैं एक फिल्म बनाता हूं सात्विक, धार्मिक हरिश्चन्द्र टाईप। एक फिल्म तुम एक्शन, मसाला एड्रेन्लिन जगाने वाली।

जाॅन: ओ.के.

डेढ़ दो साल बाद दोनों की फिल्में तैयार होकर आधुनिक थियेटरों पर चलीं।
जाॅन की फिल्म का नाम था ‘आग का दरिया’ और राम की फिल्म का नाम था ‘‘आब’’
‘आग का दरिया‘ की कहानी अपनी गदर फिल्म जैसी थी। मुसलमानों को भरपूर गालियाँ, हिन्दुओं की उदारता की गाथा,  राम कृष्ण की धरती की महानता, किसी हिन्दू का उफान मारता जोश। फिल्म खूब चली। इसके जवाब में पाकिस्तानियों ने भी कई फिल्में बनाईं। जिनमें मोटी मोटी हीरोइने जाने किस शैली में डांस करती थीं। मोटापे के लिहाज से उन्हें भारतीय दक्षिण की फिल्मी हीरोइनों के डांस का अनुसरण करना चाहिए।

‘‘आब’’ में हिन्दू मुस्लिम एकता को मिसालें देते एक कबीरनुमा फकीर की कहानी थी। भारत पाक बार्डर के दोनों तरफ लोग उसके मुरीद हो जाते हैं और अमन और तरक्की के रास्ते पर चलते हैं तो यह हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के हुक्मरानों को और एड्रेन्लिन जागरण पसंद लोगों को अच्छा नहीं लगता। आखिर में कई प्रश्न हवा मंे छोड़ती हुई फिल्म द एंड को प्राप्त होती है। प्रश्न ये थे कि जो हिन्दुस्तान पाक के बीच पिस रहें हैं उनका क्या? जो खर्च हिन्दुस्तानी पाकिस्तानी सेनाओं पर सीमा की स्थिति संभालने के लिए खर्च हो रहा है, क्या वह तरक्की के लिए नहीं हो सकता? यह फिल्म कलासमीक्षकों को पसंद आई। थियेटरों में नहीं चली पर पुरस्कार मिले। सैकड़ा भर पाकिस्तानी कलाफिल्म पसंदों ने इसे पसंद किया।

राम और जाॅन, फिर दारू पार्टी पर मिले।
जाॅन: मैं बोला था न जनता को सच झूठ से मतलब नहीं। एड्रेन्लिन जागना चाहिए।
राम: हाँ, सच की उतनी ही जरूरत है जितनी आटे में नमक। ज्यादा सच जिंदगी को कड़वा कर देता है।

बुधवार, 26 अगस्त 2009

हाल-ए-दिल कैसे कहें ?




हाल ए दिल कैसे कहें- इन उलझनों में बिछड़ गए
तेरा मिलना ही परेशानी था, फिर क्या नहीं मुश्किल रहा।


शाम से चेहरा तेरा फिर जहन की दीवारों पर,
जाम की गहराई में तेरे लबों का तिल रहा।

मैं सोचकर हैरान हूं, ये दिल न मेरा दिल रहा,
ताजिन्दगी इक अज़नबी मेरे खवाबों की महफिल रहा।


उम्रों की उम्मीदों का, हाए बस यही हासिल रहा।
वो संग दिल था जब मिले, हम जब चले, संगदिल रहा।