Friday, 19 February 2010

मनुष्य का मशीनीकरण

 
जब रेडियो, टी.वी., सिनेमा, कम्प्यूटर आदि दृश्य-श्रव्य के मनोरंजन के साधन नहीं थे आदमी के पास मनोरंजन शब्द के क्या अर्थ थे? यह प्रश्न आज के प्रत्येक मनुष्य को सोचना चाहिये। क्योंकि इसी प्रश्न के उत्तर में मनुष्य के सामने आ खड़ी हुई कई समस्याओं का हल है। सोचिये ? क्या तब आदमी के पास “बोर होना” जैसी शब्दावली थी। क्या वह उस तरह की जिन्दगी से बोर होता था? या क्या उसके पास बोर होने का समय था?
आज के आदमी के पास चमत्कारी साधन मोबाइल फोन है, वह 25 घंटे 365 दिन अपने सम्बन्धियों के सम्पर्कों में रह सकता है। पर हुआ उल्टा है उसके सभी जिन्दा सम्बंध मुर्दानगी में बदल गये हैं। पड़ोसी से भी वह सेलफोन पर ही बात कर पाता है, यहां तक कि माँ-बाप-बीवी-बच्चों से भी दो साधारण बोल बोलने का मौका मोबाइल फोन पर ही मिल पाता है। और इन दो बोलों के अर्थ भी कितने सतही हैं, सब जानते हैं। वजह? वजह है आदमी का मशीनीकरण।

उस जमाने में आदमी के पास सुबह उठकर रेडियो, टीवी, आईपॉड का बटन ऑन कर या इन्टरनेट पर बैठ जाने के विकल्प नहीं थे, तो क्या यह उसके लिये मुश्किल पैदा करता था कि अब वो क्या करे? नहीं। आदमी के पास भरपूर समय था। आलसी से आलसी आदमी के पास भी सुबह उठकर सैर, कसरत, दातुन-स्नान, शौच के बहाने दूर निकल जाने की नैसर्गिक प्रेरणाएं थीं। उसके बाद काम धंधे पर लग जाने में भी आदमी दिन भर अपनी ही तरह की अन्य आदमजात प्राणियों के सम्पर्क में रहता था। शाम को भी गलियों, चौराहों, बाजारों, दुकानों पर मेल मुलाकातों के दौर चलते थे।

आज का आदमी देर रात तक कामधंधे या नौकरी से लौटता है, सुबह देर से उठता है और फिर सारा दिन वाहनों, कम्प्यूटरों, रेडियो, टी.वी., मोबाइल फोन के कृत्रिम सम्पर्कों में उलझा रहता है। कोशिश करके जिम वगैरह जाकर सेहत बनाने की कोशिश करता है तो भी सांस तो इसी वातावरण में लेनी है। जितना धुंआ उसकी कार फेंकती है उतना ही धुंआ प्रतियोगिता में उसके पड़ोसियों के वाहन, इस तरह आज के मनुष्य ने अपने लिए नर्क खुद ही गढ़ रखा है।

उस समय की कल्पना कीजिये जब आदमी के घर में मां-बाप, भाई बहन के रिश्ते थे और दो चार बाल बच्चे। आवागमन के साधन के रूप में पशुओं द्वारा खींचे जाने वाले वाहन थे। आदमी सुबह उठता और यदि उसका कहीं आने जाने का इरादा है तो उसे अपने गधे, घोड़े या बैल की सेहत, हाल-चाल पूछना जानना बहुत जरूरी थे क्योंकि उसके बिना किसी लम्बी यात्रा की कल्पना करना फिजूल था। इस प्रकार विभिन्न प्रकार के सरोकारों से सुअर, गाय घोड़े, गधे, कुत्ते, चिड़िया, कौए, गिद्ध आदि की देखरेख अपने आप ही हो जाया करती थी, ये नगर-निगम के संभालने के चीजें नहीं थे। अब दूसरी बात ये कि क्या आपने इतिहास में कोई ऐसी घटना पढ़ी है - जब अनायास किसी राहगीर की मौत  घोड़ा, बैल या गधे से चलने वाली गाड़ी से कुचल जाने से हो गई हो? जबकि आज देश में प्रत्येक दिन, हर घंटे सैकड़ो वाहन दुर्घटनाओं में हजारों लोग काल कवलित हो जाते हैं। सुबह आदमी घर से निकलता है तो शाम को तय नहीं होता कि वह घर सकुशल पहुंच ही जायेगा और इसी को हम, आदमी की तरक्की कहते हैं।
आज के आदर्श जीवन जीने वाले आदमी की यथार्थ स्थिति देखिये।
देर रात गये वह घर लौटता है। रातभर ए सी, पंखे कूलर या हीटर की हवा में सोता है। देर सुबह उठकर वह एक मशीन के अलार्म से जागता है, जिम जाता है यानि मशीनों से कार्यव्यवहार। घर में ड्राइंगरूम, बेडरूम, बाथरूम, रसोई, छत, आंगन, लॉन सब जगह यहां वहां खड़े बिजली से चलने वाले उपकरणों से उसका वास्ता पड़ता है। आदमी का काम होता है बटन दबाना बाकी सब चीजें अपने आप काम करती हैं। इस तरह इन उपकरणों ने आदमी से उसके आदमजात प्राणियों के संबंध छीन लिये हैं या कहें कि उनका स्थान इन मशीनों ने ले लिया है। अब आदमजात प्राणी इस आदमी को और ये आदमी उनको, हर क्षण प्रभावित करते थे, लेकिन ये मशीने? इन्हें आदमी क्या प्रभावित करेगा, इनसे ही आदमी प्रभावित रहता है। इन मशीनों का प्रभाव ये होता है कि उसके शरीर के ही कुछ अंग इन मशीनों के पुर्जों जैसे काम करने लगते हैं। यानि शरीर को पंखे, गीजर, टोस्टर, मिक्सर, ग्रांइन्डर, एसी कूलर, हीटर, हीट आयरन, कार, कम्प्यूटर, फोन इन सबकी जरूरत अपरिहार्य अंगों जैसे ही पड़ने लगी है। इनमें से यदि कुछ भी खराब होता है तो आदमी के शरीर की हालत तुरन्त पतली हो जाती है। आदमी की बेचैनी देखते बनती है। ऐसा लगने लगता है कि आदमी के प्राण तो इन मशीनों में हैं। जबकि पिछले हजारों साल आदमजात ने इन मशीनों की कल्पना से भी अजनबी रहते हुए बिताये हैं। ये मशीने तो उस जिन्न की तरह हो गई हैं जि‍न्‍हें पैदा होने के बाद कुछ ना कुछ करना ही है और आदमी इस कुचक्र में फंस गया है कि इनके लिए कोई ना कोई काम तलाश कर के रखे वर्ना ये मशीने उसे ही निगल जायेंगी।

अब इस लेखनुमा निवेदन का आशय यह नहीं कि पुराने पत्थर युग में लौट जाने की गुजारिश की जा रही है और मशीनीकरण से निजात पाने की जुगत सोची जाये.... कहना यह है कि आदमी, आदमी रहे इसकी कोशिश की जा सकती है।
यदि मौका और मौसम मिले तो रात को पंखे, एसी, हीटर की हवा के बगैर सोने  में क्या बुराई है? सुबह उठकर पार्क में जाकर सबके साथ योग, नृत्य या मार्शल आर्टस जैसे किसी साधन या घर में ही शरीर को हिलायें डुलायें ना कि मशीनों का सहारा लें। यदि दोपहिया वाहन से काम धंधे नौकरी पर जा रहे हैं तो किसी ऐसा ही मक्सद रखने वाले व्यक्ति को साथ ले लें। सामान ढोने जैसी वजह या 4-5 आदमियों के बगैर कार से यात्रा का क्या मजा हो सकता है? 24 घंटे मोबाइल फोन पास रखने से इसके विकिरण के दुष्प्रभावों का प्रसाद लेने से अच्छा है एक नियत समय पर ही इसका प्रयोग हो। यदि यात्रा आदि में ना रहना पड़ रहा हो तो, तो इसका प्रयोग लेंडलाईन फोन जैसा किया जाना... बेहतर विकल्प नहीं है क्या? यानि कि मोबाइल फोन से यह मुसीबत हो गई है कि आप शौचालय में भी दो घड़ी चैन से बैठकर निवृत्त नहीं हो सकते।
तो जो जि‍सकी जगह है वो उसकी जगह रहे। आदमी अपनी जगह, मशीन की उपयोगि‍ता अपनी जगह। यंत्र से यंत्र की तरह व्‍यवहार कि‍या जाये और इंसान से इंसान की तरह। एक जगह खबर पढ़ी कि‍ अब इंसान यंत्रों से भी काम संबंध स्‍थापि‍त कर पायेगा, क्‍या हालात इतने बदतर हो चुके  हैं? पहले हम धरती के अन्‍य जि‍न्‍दा लोगों से तो प्रेमपूर्ण रहना सीख लें। कभी कभी तो ऐसा प्रतीत होता है कि‍ पत्‍थर युग में आदमी ज्‍यादा संवेदनशील रहा होगा बनि‍स्‍बत आज के आदमी के। उस समय के आदमी ने पत्‍थर से आग नि‍कालने की कोशि‍श की पर आज का आदमी जि‍न्‍दा चीजों को जड़ वस्‍तुओं में बदलने पर तुला है, पॉलीथीन के प्रयोग की ही बात लें। ये ऐसी चीज है जो प्रयोग के बाद जहां भी अपनी अंत अवस्‍था में पहुंचती है खुद तो नष्‍ट नहीं होती, पर जहां ये खत्‍म होने के लि‍ये छोड़ दी जाती है, अपने सम्‍पर्क में आने वाली हर चीज को नष्‍ट भ्रष्‍ट कर देती है। आदमी का व्‍यवहार भी क्‍या ऐसा ही नहीं होता जा रहा है ?
हमें अपने जीवन में मशीनों की भूमि‍का के बारे में एक बार फि‍र सोचना पड़ेगा, क्‍या आपको ऐसा नहीं लगता ???