Wednesday, 11 March 2015

माँ

माँ का पिण्ड दान

दोस्त कुटुम्बी देते हैं ,
बारी बारी कान्धा तुझको,
और मैं कच्ची हांडी सा,
तेरा बच्चा, चलता हूँ आगे,
एक पकी हाँडी,
हाथ में ले कर ।

इस मिट्टी के बर्तन में,
लिये जाता हूँ माँ,
थोडा इतिहास, एक युग, एक जीवन,
चुट्की भर जवानी, एक अंजुली बचपन,
अट्कन बट्कन, दही चट्कन,
घी दूध मख्खन,
अलमारियों की चाबी,
गंगाजली का ढक्कन,
और तू कुछ बोलती नहीं।

यों तेरी गृहस्थी,
मटकी में किये बंद,
चलता हूँ मैं माँ,
नंगे पैर, कि तू ,
कन्धों से आंगन में,
उतर कर आ जाये।

पहले झगडे, चिढे, गुस्साये,
बाद में फ़ुसलाये,
"लल्ला नंगे पांव ना घूमो"
पर तू कुछ बोलती नहीं।

अन्तिम यात्रा कहते हैं लोग इसे,
रोने भी नही देते जी भर,
देते हैं मुझे हवाले ,
वासांसि जीर्णानि से,
नैनम छिन्दन्ति तक,
गीता से गरुड तक,
ईश्वर से नश्वर तक,
लौकिक से शाश्वत तक,
मैं मुस्कुरा के तुझे,
देता हूँ मुखाग्नि,
करता हूँ तेरा पिन्ड दान,
कि माएं ना पैदा होती हैं,
ना मरती हैं।
– दिव्यांशु शर्मा




मां और दुनियां

मेरे लिए एक छोटा रहस्य है।
दुनिया को जानने का कौतुहूल
जरूर बना रहा मन में
किंतु ‘माँ’ को जानकर
जाना जा सकता है
आसानी से इस ‘संसार’ को
 
यह बहुत देर में जाना.....
छोटी सी थी तो देखती....
माँ को बडे धैर्य से....
बडी शांति से वह संवार देती थी
’घर और जीवन’ की हर बिगडी चीज को
बिना माथे पर शिकन लाए
गाती गुनगुनाती सहजता से


सब्जी मे भूले से
ज्यादा नमक डल जाने पर
सोख लेती थी उसका ‘सारा खारापन’
सहजता से, आटे की पेडी डाल उसमें....
अधिक डली हल्दी के बदरंग और स्वाद
की ही तरह....
ठीक कर लेती थी
संबधों और परिस्थितियों के भी
बिगडे रंग और स्वाद...
चाय मे अधिक चीनी हो
या फिर फटा दूध
या कि 
स्वेटर बुनते हुए
असावधानी वश सलाई से छूट गया ‘फन्दा’
(गिरे हुये घर को)
कैसे आसानी से उठा लेती थी ‘माँ’
वह गिरा हुआ फन्दा
कैसे सहेजता से, 
बुनाई – सिलाई के झोल की ही तरह
निकाल लेती थी
जीवन के भी सारे झोल.....

हम तो घबरा उठते हैं
छोटी छोटी मुश्किलों में....
छोड देते हैं धैर्ये.....
चुक जाती है शक्ति.....
शायद ‘माँ’ होना
अपने आप मे ही ‘ईश्वरीय शक्ति’
का होना है।


मीनाक्षी जिजीविषा