Thursday, 7 February 2013

एक सपाट जि‍न्‍दगी


मूल कवि‍ता : वि‍लि‍यम हेनरी डेवि‍स 


व्यर्थ का धन-दौलत क्यों चाहूं
जबकि सूरज मेरा दोस्त है
जो कतई कंजूस नहीं है
लुटाता है, अपनी अपार रोशनी, बेवजह

हीरे जवाहरात जैसे कीमत पत्थर क्यों चाहूं
जबकि यह हरी भरी सुबह
जहां भी मैं जाऊं
बिनी किसी शुल्क के
ओस के मोती लुटा रही है


इन बेजान किताबों में क्या रखा है
जबकि मुंडेर पर बैठी चिडि़या
अपनी मीठी जुबान से
अपने सबसे खुशनुमा गीत
जोर-जोर से पढ़कर सुना रही है

क्यों चाहूं अद्वितीय चित्रकारी वाली
बहुमूल्य पेन्टिन्गस
जबकि बादल दिन में हजार बार
आकाश को कुछ नया ही रंग देते हैं
मेरे आंखों को खुश करने के लिए

नहीं चाहिये
सिर पर चढ़ बैठने वाली शराब।
जबकि, जब भी मैंने पिया है मौसम
वसंत मेरे कानों में
मधुर स्वरलहरियां घोलने के लिए
बेताब है।

नहीं चाहिये, बेतहाशा नई पोशाकें
जबकि हर जीव-जंतु
मुझे सिखा सकता है कि
कम से कम मैं कैसे खुश रहूँ।


मूल कवि‍ता

A Plain Life 
by 
William Henry Davies

No idle gold -- since this fine sun, my friend,
Is no mean miser, but doth freely spend.

No prescious stones -- since these green mornings show,
Without a charge, their pearls where'er I go.

No lifeless books -- since birds with their sweet tongues
Will read aloud to me their happier songs.

No painted scenes -- since clouds can change their skies
A hundred times a day to please my eyes.

No headstrong wine -- since, when I drink, the spring
Into my eager ears will softly sing.

No surplus clothes -- since every simple beast
Can teach me to be happy with the least.