Wednesday, 9 November 2011

आखिरकार

कल एक अवसर था श्मशान जाने का। पर एक नहीं 4-5 चिताएं एक साथ सजाई जाती हुई, जलती और राख होती देखीं। अगर मौत दुर्घटना नहीं है और इतनी अचानक ना आये तो हमें तैयारी करनी चाहिए। सांसे छूटने से कुछ साल पहले से अन्न त्यागना चाहिए, कुछ महीने पहले शाक आदि पेय, और आखिर जल पर निर्भर रहना चाहिए। इससे देह में रासायनिक क्रियाएं कम होंगी। देह हल्की रहेगी और चार कंधे देने वालों को सुविधा होगी। जगह और लकड़ी भी कम लगेगी। जीते जी भले ही आप एक सुन्दरतम हीरो या हीरोइन हों, मृत देह को छून से सब हिचकते हैं। इसलिए देह पर प्राकृतिक सुगंध जैसे चन्दन आदि का लेप भी लगाना चाहिए। अपने मित्रों की टेलीफोन, मेल लिस्ट भी किसी विश्वस्त व्यक्ति को देनी चाहिए कि टाईम पर लोगों को सूचित कर दे। श्मशान जाकर खुद ही अरेंजमेंट कर देने से घर वालों को सुविधा होगी।

कभी-कभी हमें जो महसूस हुआ वह लिखा नहीं जाया जाता। ये एक झूठी कोशिश है -

जिन्दगी है क्या देखो
जलती हुई चिता देखो

कैसे आती है मौत की खबर
क्या होता है दिल पे असर
क्यों झूठा जिन्दगी का समर
क्या खोया क्या मिला देखो
जलती हुई चिता देखो।

पल में सब छूटता है कैसे
सारा भरम टूटता है कैसे
मैं, मेरा, मुझे लूटता है कैसे
क्या रहा, क्या मिटा देखो
जलती हुई चिता देखो।

कैसे लकडि़यां सजाते हैं,
कैसे देह लेटाते हैं,
कैसे आग लगाते हैं,
आखिरी सफर है क्या, देखो
जलती हुई चिता देखो।

आग देह से लिपटे कैसे
उठती हैं लपटें कैसे
राख कर देने सब झपटे कैसे
सबकी नजर है क्या देखो
जलती हुई चिता देखो।