Wednesday, 6 October 2010

एक सुन्दरतम सन्ध्या


एक सुन्दरतम सन्ध्या
जब पावन काल
किसी साध्वी की मौन आराधना सा
शांत और मुक्त है।

इस खामोशी की मदहोशी में
एक सूरज
सागर के हर किनारे पर
अपने आप डूब रहा है।

स्वर्गीय विनम्रता
सागर की स्निग्ध छाती पर
उग आयी है।

सुनो
परमचेतना
जाग रही है।

उसके उगते हुए स्वरों में
किसी अत्यंतिक
तूफान सी सरसराहट है।

मेरे साथियों
यह प्रकृति कहीं भी
कम दिव्य नहीं है।

अपने सीने में
रहने वाले हर्ष को
सदैव महसूस करो।

उसी हर्ष के मन्दिर में
हमारी बाहरी भटकनों को जानने वाला
परमात्मा भी है।
भले ही हम उसे ना जानते हों।


विलियम वर्डसवर्थ की कवि‍ता का अनुभव