Tuesday, 14 September 2010

इस लहर के उठने का सबब याद नहीं है

मुद्दत से मेरा दिल है कि आबाद नहीं है
होंठों पे मगर आज भी फरियाद नहीं है

आता है खयालों में मेरे उसका ही चेहरा
बस उस के सिवा कुछ भी मुझे याद नहीं है

फिरते हैं सभी लोग यहां सहमे हुए से
इस शहर में जैसे कोई आजाद नहीं है

देखा है उजड़ते हुए कितने ही घरों को
है कौन जो इस इश्क में बर्बाद नहीं है

इक लहर सी उठी है आज मेरे भी दिल में
इस लहर के उठने का सबब याद नहीं है

पता नहीं कि‍सकी गजल है पर बेहतरीन लगी सो शेयर कर रहे हैं।