Saturday, 14 August 2010

सुकून का घर


मैं सालों से सोचता हूं
पर मैं जाना ही नहीं चाहता
हालांकि मुझे मालूम है
सुकून का घर

सुकून के घर में
रहती है
मौज और आनंद की धुंधली किरणों के साथ
ऊर्जा के सूर्यों की गर्मी
और चांदनी का पागलपन।

भ्रम है कि सुकून के घर में
रहती है
बेकारी, असफलता, आलस्य
सभी सफल, मशहूर, अमीर
कटते हैं
ऐसी बोर और मनहूस कही जाने वाली जगहों से


सुकून के घर में निवास करने वाले पर
लोग लानते भेजते हैं

सुकून के घर के बारे में
लगभग रोज ही
तकरीरें- कविताएं
लिखी और पढ़ी जाती हैं
गली-गली चैराहे-चैराहे पर
इस तरह ही लोगों को लगता है
कि वो जानते हैं
‘‘सुकून’’ शब्द का अर्थ
वरना वो कैसे
लोगों को समझा लेते,
कविता लिख लेते
गीत गा लेते।

यूं तो बहुत से लोग
सुकून के घर की तलाश करते हैं
क्योंकि
सुकून के बारे में सोचना, तलाश करना
हर जमाने का फैशन रहा है।
पर सुकून के घर में रहना
दुनियां में हमेशा नासमझी रहा है।

लोग ऐसा भी कहते हैं कि
सुकून के घर में
उम्र भर की हम्माली है
रोटी कपड़े मकान के लिए
दर-दर की भटकन है

सुकून के घर में
साथ ही रहता है
सर्दी जुकाम बुखार जैसी छोटी सी बीमारियों से
मर जाने का खतरा भी।

पर फिर भी
सुकून के बारे में लिखे हुए मंत्र
हर सुबह या शाम को
दीपक की लौ और अगरबत्तियों के धुंए में
खूब जपे जाते हैं
गाई जाती हैं आरतियां
ताकि
सुकून की चाह की तकलीफ से
बचा जा सके।

पता नहीं क्या है हकीकत
या जानते समझते हुए....
या कि हम समझना ही नहीं चाहते
कि पढ़ना, सुनना,
कहना, या लिखना
या सुकून के घर में रहने जैसा दिखना
सुकून नहीं लाता।

सुकून से रहने के लिए
जरूरी है
कि हम सुकून के घर में रहें।