Tuesday, 3 August 2010

यदि

यदि लोग अपनी कमजोरियों के लिए, तुम्हें दोष दे रहे हों
और तुम तन कर खड़े रह सको
अगर सब तुम पर शक करें
और तुम खुद पर भरोसा कर,
उनके शक को ’निराधार’ होने का उपहार दो।

अगर तुम इंतजार कर सको
और इंतजार करते हुए थको नहीं
या, झूठ तुम्हें डुबो रहा हो, पर तुम झूठा व्यवहार ना करो
या, नफरत से, नफरत कर ना निपटो
और इस तरह बहुत अच्छे ना दिखो
या बहुत अच्छा कहने वाला ना दिखो

अगर तुम सपने देख सको और सपनों को खुद पर सवार ना होने दो
अगर तुम सोच सको और विचारों को अपना लक्ष्य ना बनने दो
अगर तुम विजयी दुदुंभियों और त्रासदियों की खामोशी से
एक सा निर्वेद व्यवहार करते हुए मिलो

अगर तुम अपने ही कहे सत्य को
मूर्खों द्वारा तोड़ मरोड़ कर पेश करने पर
सुनते हुए संभले रहो
अगर तुम जीवन को दिये तोहफों को टूट बिखरता देखो
तो उसे रोको और तत्क्षण पुनर्निमाण में रम जाओ

यदि तुम अपने सारी जीतों को
हमेशा नये दांव पर लगाने को तत्पर रहो
अगर हारो भी तो, बार बार शुभारंभ के कर गहो

सांस भर भी टिप्पणी ना करो पराजयों पर हानियों पर
अगर तुम अपने तन-मन को मिटने के अंतिम क्षण तक
दृढ़ मांसपेशियों से बलवान रखो
तब भी.... जब कि तुम्हारे पास कुछ भी ना हो
सिवा इन शब्दों के कि ‘‘जमे रहो।’’

यदि तुम भीड़ से बातें करते हुए अपने जीवन मूल्यों को बचाये रख सको
या, राजाओं के साथ चलते हुए एक आम आदमी का सामान्यपन ना खोओ
ना तो दुश्मन ही तुम्हें दुखी कर सके, ना मित्र ही तुम्हारा दिल दुखा सके
यदि सभी लोगों को अपने ही साथ गिन सको, पर किसी को भी विशेष ना जानो
यदि तुम अक्षम्य क्षणों में भी उद्विघ्न ना होओ
और अक्षम्य क्षणों से पार जाने के लिए
तुम्हें 60 सेकेंडस भी जरूरत से ज्यादा हों
तो तुम धरती माता की असली संतान हो
जिसमें सारी दुनियां समाई है
और यह उससे भी ज्यादा है..
कि तुम इंसान हो मेरे पुत्र।

रूडयार्ड किपलिंग की कविता ‘यदि’ का राजेशाकृत हिन्दी अनुवाद