Monday, 12 July 2010

तुम्‍हारे लि‍ये ही......


मुझे तुम्हारा बहुत ही इंतजार था
मैंने तुम्हारे सपने देखे
मैं दुनियां की भीड़ में अकेला
तुम्हारे लिये तरसता रहा
ऐ मेरे दोस्त
मुझे रोजी-रोटी और बोटी से फुरसत ही नहीं मिली
कि उन लम्हों का आयोजन कर पाता
जिनसे मेरी जिन्दगी कहे जाने वाले लम्हे
कुछ और लम्बे हो जाते
बच अचानक
कभी पान की दुकान पर,
कभी पंचर बनाते हुए,
कभी चैराहे पर लालबत्ती के ट्रेफिक में ठहरे हुए
कभी बाजार में सब्जी खरीदते वक्त
या
बिजली का बिल जमा करते हुए
या
नेट पर कभी कभार!
तुम्हारे साथ
गंदे थियेटरों में देखी फिल्में
पार्कों में खाई मूंगफली
दोराहों पर पी काॅफी
और खड़कती बसों में किया गया सफर
सब बड़ा सुहाना था
उन दिनों भी
जब बारिश के दिनों में
पानी नहीं बरसता था।
या
सर्दियों में भी
हम गले में स्वेटर नहीं लटकाते थे
कि गर्मी लगती थी।
चिलचिलाती, उमस भरी
या अनचाही गर्मियों में भी
बस तुम्हारा साथ
बहुत ही सुहाना
फुहार सा
और गुनगुना लगता।
हर बार
बहुत अचानक तुम मिले हो
बस कुछ गिने चुने पलों के लिए।
मुझे अक्सर अफसोस रहा
उन व्यस्तताओं से
जो तुम्हारे साथ के बहानों को
खा जाती।
बस मैंने अपशकुन के डर से
तुमसे कभी भी
फिर से मिलने का वक्त नहीं तय किया
कि तुम्हारा अचानक मिलना
बड़ा ही सुकून देता
सांसों की वीरान बस्ती में।
कभी कभी बड़ा ही भाया मुझे
बदकिस्मत होना
क्योंकि ऐसी ही उलझन भरी उदासियों में
कभी नेट पर बैठे
या कभी ताल के किनारे पर
या सारे संसार से रूठकर
किसी अन्जान पार्क में
तुम अनचाहे ही आ गये हो।
कभी कभी तो लगा
कि मेरी उदासियों और
तुम्हारे आने में
शायद कोई सम्बंध हो
पर मैं खुद से भी छुपाता रहा
ऐसी किन्हीं भी उदासियों में
तुम्हारा इंतजार।
आज मैंने सोचा
कि कुछ पल हैं
तो तुम्हारे लिए
संदेश लिख छोड़ूं
कि तुम कभी कहीं खोलो
कोई मेल
तो उसमें दर्पण की तरह
तुम्हारी चाहतें भी
मेरी अनाम आशाओं के
दर्पण में नजर आयें।
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उन सभी लोगों के नाम
जो मुझे जिन्दगी में
कभी कहीं मिले थे और
जिनके साथ बिताये
कुछ लम्हों ने
मेरी मौत की तरफ बढ़ती उम्र से बचकर
एक उम्र को
जिन्दगी का नाम दिया।