Thursday, 1 July 2010

और कोई नई ताजी ?


चि‍त्र : गूगल से साभार

जब भी घर पर होते हैं या घर से बाहर निकलते हैं किसी व्यक्ति से हैलो, हाय करने के बाद हमारे मुंह से एक ही सवाल निकलता है, और कोई नई ताजी ? लोगों को इस ‘सवाल’ की आशंका नहीं होती। तो लोग इस सवाल के जवाब में या तो बगले झांकने लगते हैं या कहते हैं ‘‘बस कट रही है,’’ आप सुनाओ? बूमरेंग की तरह अपने पर ही लौट के आया यह सवाल बड़ा ही परेशान करता है। जिन्दगी फिल्म थोड़ी ना है कि हर सीन में कहानी आगे बढ़े। जिन्दगी के सीन फिल्मों से ज्यादा लम्बे होते हैं। रिटेक के ज्यादा मौके होते हैं पर आदमी पर आदर्श भूमिका का नशा चढ़ा होने के कारण वह ‘‘बुरा’’ करे या ‘‘अच्छा’’, रिटेक नहीं करता। दूसरे शब्दों में इस को ही अहंकारी होना कहते हैं क्योंकि आदमी जिन्दगी और फिल्म में अंतर करता है। फिल्म फिल्म है, असल जिन्दगी असल जिन्दगी। पर कब्रों में समाये लोगों से पूछिये फिल्म और जिन्दगी में क्या अन्तर है या उस आदमी से फिल्मों और जिन्दगी में अंतर पूछिये, जिसकी फिल्म जिन्दगी के टाॅकीज से उतर गई है या फ्लाॅप रही है। आप कहेंगे कि हम फिर फिलासफी पर उतर आये... पर क्या किया जाये, इस कहानी को समझना फिलासफी की श्रेणी में ही आता है।

जब तक अर्थी तक नहीं पहुंचते, लोग अपने ही अर्थ निकालते रहते हैं। हकीकत को जानना या देखना, समझना ही नहीं चाहते। रामलुभाया की वसासम्पन्न 75 किग्रा के दो पहलवानो के वजन को मात करती बीवी ने हांफते हुए घर में प्रवेश किया और बोली, - ”सुनिये जी खिड़की दरवाजे बंद कर लीजिये, मैंने अभी अभी बाजार में सुना कि सर्कस से एक शेर भाग निकला हैं। मैंने सुना है कि वो हमारे मोहल्ले के आस-पास ही है।
इस पर रामलुभाया अपने ख्यालों में खोई निश्चिंत मुद्रा में बड़बड़ाये - चिंता क्यों कर रही हो दुर्भाग्यवती, शेर सर्कस से क्रेन लेकर थोड़ी ना भागा है कि तुम्हें ले उठा जायेगा। ऐसी सोच ने हमें सदा ही प्रभावित किया है जो घिसी पिटे अर्थों से भिन्न अर्थ प्रदान करती हों।

फलौदी जी तीन चीजों का एकसाथ उपयोग कर गर्भनिरोधक अभियान चला रहे हैं। पहली बात मोबाईल फोन जेब में रखो, दूजी बात नीम की दातुन करते समय 5 6 पत्तियां नियमित रूप से खाओ, तीसरा किराना इकट्ठा ना खरीद कर हर दिन किसी ना किसी चीज खरीदने के बहाने डिपार्टमेन्टल स्टोर जाओ और बिल जरूर लो इस बिल को अपने हाथों और मुंह के संपर्क में जरूर लाओ।

अब आप कहेंगे कि इन उपायों का वैज्ञानिक आधार क्या है? जी इनका वही वैज्ञानिक आधार है जिन आधारों पर विचार ना किया गया और आप पैदा हो गये। जी हां यह सब विज्ञानसम्मत तथ्य हैं। मोबाइल फोन से होने वाला विकिरण, नीम में मौजूद रसायन, और छोटे छोटे प्रिन्टरों में इस्तेमाल होने वाली स्याही इन सब से नंपुसकता का खतरा है। खतरा ही कभी-कभी वरदान भी साबित होता है यह हमें फलौदी जी ने ही बताया। वह स्लोगन तो आपने ही सुना होगा कि ‘‘डर के आगे जीत है।’’ इसलिए डर से डरने की नहीं, उसे समझने की जरूरत है। डरना खतरनाक है क्योंकि डर के ही मर गये तो समझेगा कौन - कि डर के आगे कौन से मजे थे।

डर से नहीं डरना चाहिये किन्तु ऐसे खयाल नहीं पालने चाहिए कि कयामत आ जाये, हमारे बाप का कुछ नहीं बिगड़ना है। अब यह वाकया ही लीजिए।

जिस दिन 9/11 को वल्र्ड ट्रेड सेन्टर पर हमला हुआ, उस दिन की बात है। सुबह कार्यालयीन समय में एक व्यक्ति अपनी पुरानी पत्नि के चंगुल से निकल, प्रेमिका के घर पहुंचकर स्वर्गीय नजारे ले रहा था। व्यवधानों की संभावनाओं को कम करने के लिए दरवाजे और टीवी, रेडियो बन्द थे।
अचानक विमान इमारत में घुस गया, उस व्यक्ति की पत्नि का टीवी चालू था, जिसमें ये भयावह वीडियो दिखाये जा रहे थे। घबराई, पगलाई बीवी ने पति को फोन लगाया, पूछा - आप कहां हो? पति का वही आम सा जवाब था - श्योरली डियर ऑफि‍स में। पत्नि सारा माजरा समझ गई और उसी दिन पत्नि ने तलाक के कागजात बनवाये और प्रेमिका के घर भिजवा दिये।

तो डर से आंख फेरना और डर के आगोश में जा समाना, यानि डर से पलायन और डर के स्वीकार के अलावा हमारे पास ये रास्ता है कि हम डर को समझें कि वो आखिर है क्या। इसी में सारा नयापन है ना कि रोजाना की ताजा जिन्दगी को बासी पुराने दृष्टिकोण की फफूंद लगाकर, फफूंदों का पहाड़ पालते रहना। विचार शब्द की मजबूरियों से परे, विचारातीत सोचना इसमें नयापन है। यही उस सवाल का जवाब है, जब मैं आपसे पूछूं कि ‘‘और कोई नई ताजी?’’