Tuesday, 22 June 2010

अकल को नकल में नहीं, नव सृजन में लगायें


हमारी परीक्षा प्रणाली याददाश्त पर आधारित है। साल भर पाठ्यक्रम में उल्लिखित हर प्रश्न का उत्तर अपने दिमाग में डाल लो और परीक्षा वाले दिन चुने हुए प्रश्नों के उत्तर उत्तरपुस्तिका पर उगल आओ। जो प्रश्न पूछा गया है यदि आपको उसका किताब में लिखा गया उत्तर शब्दशः याद है तो आपको पूरे अंक मिलेंगे यानि यहां आपकी याददाश्त के ही अंक दिये जाते हैं। यहां तक कि भौतिक, गणित जैसे विषयों के संबंध में भी ये बात सही है। गणितीय सवालों जवाबों, को भी छात्र रटकर परीक्षा देने जाते हैं और अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होते हैं। हम यह कहना चाह रहे हैं कि आपके बुद्धिमत्ता-स्तर से भारतीय शिक्षाप्रणाली का कोई सरोकार नहीं है।

अगर हमने जो याद किया है वो प्रश्न पत्र में पूछा गया है तो बल्ले बल्ले वर्ना आपकी हालत पतली हो जाती है। प्रश्नपत्र सामने होता है, जाने पहचाने इसी वर्ष पढ़े हुए प्रश्न हैं, पर उनके उत्तरों के बारे में हमें कुछ नहीं सूझता। यदि परीक्षक उदार है तो फिर परेशान आदमी अपने अगल-बगल, आगे-पीछे नजर डालता है। आगे पीछे कोई अपना ही राशि-भाई या बहन मिल जाये तो उसकी किस्मत में लिखा हुआ हम अपने पेपर में उतार कर, जो वो हो सकता है वही हम भी हो सकते हैं। यानि जिसकी उत्तर पुस्तिका से नकल की जा रही है वो पास तो हम भी पास वो फेल तो हम भी फेल। इसे सारे कुकर्म को नकल कहा जाता है।

छात्र के दिमागी, शारीरिक लक्षणों के अनुसार नकल के अनेक प्रारूप हैं। संबंधित विषय की सम्पूर्ण किताब, कॉपि‍यों को ले जाना अधोगति प्रदान करने वाला पाप है इसमें छात्र और परीक्षक दोनों फंसते हैं। किताबों कॉपि‍यों के लघु संस्करणों गाईड, 20 से लेकर 40 प्रश्नमाला तक को ले जाना भी डूबो सकता है। प्रश्न उत्तरों के संक्षिप्त और सूक्ष्म संस्करण काम आते हैं, पार लगाते हैं, अगर आप बच पाते हैं।

मेधावी छात्र आधा याद करते हैं, चैथाई भाग अगल-बगल या आगे पीछे वाले से कन्फर्म कर लेते हैं और चैथाई भाग के अपनी मेहनत से सूक्ष्म संस्करण तैयार करते हैं।

आप ये ना समझें कि यह ”भारतीय परीक्षा प्रणाली में नकल के तरीके“ विषय पर लेख है। यह सब आपको यह बताने के लिए था कि परीक्षा के दौरान नकल का क्या अर्थ है।  इस लेख का आशय उस मानवीय वृत्ति का उदघाटन करना है, जिसमें बचपन में जो सामने वाला कर रहा है वही प्रतिक्रिया उसे देना, यह तोता-रटन्तपना या बन्दरपन, हमारी सारी जिन्दगी पर फैल जाता है।

वानर आदमी के पूर्वज हैं ऐसा ही नहीं है। ये भी सत्य है कि अभी भी वानरजाति मौजूद है। अपने बचपन को देखें हम मां-बाप, भाई बहनों या अपने ही परिवेश में रहने वालों के हाव-भाव अपना लेते हैं। हमारे माता पिता और अन्य लोग भी यह जान देखकर खुश होते हैं कि हम उनकी नकल कर रहे हैं। स्कूल में प्रवेश लेते ही सहपाठी के पास उपलब्ध परिधान, जूते, बैग, पानी की बोतल, बरसाती आदि हम भी चाहने लगते हैं। तथाकथित पढ़ने में अच्छे बच्‍चों की कॉपि‍यॉं घर लाकर उतारने का उपक्रम शुरू हो जाता है।

स्कूली पढ़ाई खत्म होते होते, उम्र 18-20 वर्ष पार कर जाती है पर इन वर्षों में हम अनुकरण-वृत्ति में किसी ना किसी तरह निष्णात हो चुके होते हैं। पेंट शर्ट के पहनावे से लेकर अगले 5 से 10 वर्ष तक पढ़े जाने वाले विशिष्ट विषयों के चयन पर भी हमारे सहपाठियों या परिवेश का प्रभाव हम पर पड़ता है। यानि सहेली ने बायो लिया तो मुझे भी बायो लेना है और दोस्त ने विज्ञान विषय लिया तो अपन भी विज्ञान विषय ही लेंगे। कैरियर के मामले में भी हम बाजार की हवा में बह जाते हैं, जिस नौकरी धंधे में उठाव चल रहा हो उसी में हम भी तैरने लगते हैं। गजब तो तब होता है जब आदमी अपनी जिन्दगी भर के लिए लिये जाने वाले फैसले भी देखा-देखी करता है यानि प्रेम, शादी विवाह जैसी बातें। गौर से देखने पर आप पायेंगे कि जिन्दगी से मौत तक आदमी एक भेड़चाल में चला जा रहा है। उसे पता ही नहीं कि कहानी कहां से शुरू हुई और कब्र का ये गड्ढा कब आ गया।

नकल क्या है?
नकल एक विवशता है: जब जिन प्रश्नों के उत्तर हमें नहीं सूझते, उन दुर्बोध प्रश्नों के उत्तरों के लिए हम नई, पुरानी किताबों, गुरूओं या दूजों के विचारों, धारणाओं में उनके उत्तर ढूंढते हैं। यानि ये हमारी प्रश्न का उत्तर ना पा पाने की अक्षमता है। इसलिए हम दूसरों का कहा हुआ मान लेते हैं, हकीकत वही रहती है कि हम उस विषय के बारे में जानते नहीं है। ये सब हमारे बचपन में किया जाने वाला वो काम है जिसके तहत जब हमें कुछ समझ नहीं आता तो हम प्रतिक्रिया में वही करते हैं जो सामने वाला कर रहा है।

नकल अक्षमता है: नकल करने का यह भी मतलब है कि आप मौलिक सोच-विचार करने में अक्षम हैं। आपका विषय विशेष के बारे में कोई समझ, अनुमान या ज्ञान नहीं है, आपका दिमाग उस विषय या कार्य को नये तरीके से देख ही नहीं पा रहा। सामने क्या क्रिया हो रही है उसे हम पहचान ही नहीं पा रहे हैं।

नकल मूढ़ता है: यदि आप शेव बना रहे हैं तो आपकी देखा-देखी बन्दर उस्तरे से अपने गाल छील लेगा। इसी तरह दूसरे की गतिविधियों की नकल उतारना आपकी जिन्दगी में खतरनाक हो सकता है। आपको याद है दिल्ली में रेडियोएक्टिव पदार्थ पकड़ा गया था, उसकी चपेट में आने वाले ऐसे ही लोग थे जिनको उसकी कोई जानकारी, ज्ञान नहीं था। या उन्हें यही पता हो कि यह कीमती चीज है पर कितनी खतरनाक इसका अंदाजा ही नहीं था।

हम नकल क्यों करते हैं?
सुविधा: क्योंकि इसमें हमारे दिमाग पर जोर नहीं पड़ता। हमें सब पका पकाया मिल जाता है, दूसरों का लिखा, पढ़ा या सुना देखा हुआ। हमें बस यंत्रबद्ध होकर वही करना है जो पहले भी हो चुका है। यानि लकीर का अनुसरण ही तो करना है। इससे मार्ग पर आने वाले विध्न बाधाओं की आशंका भी नहीं रहती। पर इन सभी आसानियों और सुविधाओं के कारण किसी भी विषय या कार्य में सामान्य और विशिष्टता का भेद पैदा होता है। अर्थात् एक ही तरीके से करने वालो को असफलता ओर संघर्ष तथा अपने विशेष गुणों से किसी कार्य को खास तरीके से करने वाले को अभूतपूर्व सफलता व समृद्धि मिलती है।

विषय के सच झूठ में अन्तर कर पाने की असामर्थ्‍य : जब हम किसी विषय या कार्य की असलियत से वाकिफ नहीं होते तब भी हम अनुसरण या नकल की वृत्ति की चपेट में आ जाते हैं। हमारे एक मित्र थे। अपने दफ्तर के सामने ही बन रही इमारत में लगे एक ठेकेदार को देखा कि साल भर में ही उसने एक खुदाई मशीन से कमाई करके दूसरे खुदाई मशीन भी खरीद ली है। तो हमारे मित्र ने भी अपनी बरसों की जमा पूंजी से एक खुदाई मशीन खरीद ली। अब इस ठेकेदारी क्षेत्र के उतार चढ़ाव से तो वो परिचित नहीं थे। 2 - 4 महीने मशीन किराये पर रही, निश्चित आमदनी देती रही फिर महीनों बेकार पड़ी रही, समय समय पर ड्राइवर भी नहीं मिलते थे। डेढ़ साल बाद ही उन्हें वह मशीन बहुत ही घाटे में बेचनी पड़ी, फिर तो किसी भी अनजाने क्षेत्र में प्रवेश से या अन्धानुकरण से तौबा कर ली।

यथार्थ या सत्य से पलायन : क्योंकि यथार्थ और सत्य बड़ा ही अनिश्चित, भलाई या बुराई से परे, सुविधा असुविधा से परे होता है इसलिए इन सब बातों से बचने का हम एक आसान सा शार्टकट ढूंढते हैं। हम सड़क पर पड़े पत्थर की पूजा करने लगते हैं, अपने ही भावों और भजनों से उसमें प्राण प्रतिष्ठा करते हैं। वो पत्थर हमारी ही पूजा, भक्ति, श्रद्धा के अनुसार हमारे ही चेतन-अचेतन द्वारा तय परिणाम देने लगता है। ईसाई को पूजा पाठ में सफल होने पर गणेश जी नहीं दिखते ईसा ही नजर आते हैं। मुसलमान को बन्दगी सफल होने पर आयतें सुनाई पड़ती हैं, ना कि गीता के श्लोक। यह पत्थर प्राचीन हो यानि कोई मन्दिर, मस्जिद जितना ही पुराना हो, पुरानी शराब सा वह उतना ही मादक होता है। कहने का मतलब ये कि जिस रास्ते पर करोड़ों लोग गयें हों उसी रास्ते पर चलने में ज्यादा मजा आता है, बनिस्बत कांटे हटाकर, गड्ढे भरकर, खाईयां पार कर, पहाड़ चढ़कर नये रास्तों पर जिन्दगी के सच देखने के।

स्वाभिमान का अभाव : जब किसी में स्वाभिमान का अभाव होता है तो वो ऐसे सारे कार्यों में आसानी से संलग्न हो जाता है जो दूसरे कर रहे हों, भले ही वो कार्य सही हों या गलत। किसी कार्य को अपनी विशिष्ट शैली में करने में जो आनन्द है उसका मुकाबला कोई भी ईनाम नहीं दे सकता। जब हम खुद में कुछ खास नहीं होते तभी हम दूसरों की तरह बनना चाहते हैं। अगर हम में कुछ खास है और उसे हम पहचान नहीं पा रहे तो भी हम दूसरों द्वारा किये जाने वाले, श्रेष्ठ घोषित कामों, चीजों की नकल करते हैं।

सुनिश्चितता: हम इस बारे में आसानी से सुनिश्चित हो जाते हैं कि ऐसा तो हो ही चुका है। हमें तो बस तयशुदा प्रक्रिया अपनानी है परिणाम भी वही होंगे जो तय हैं। ये वाक्य हमी ने तो गढ़ा हुआ है कि ‘‘इतिहास अपने को दोहराता है’’ जबकि इस इतिहास का आधार हम ही होते हैं ये आसमान से नहीं टपकता। हम खुद को दोहराते हैं। अनिश्चय के रोमांच में मजा है, पर ये बेहद तनाव भरा है इस तनाव में ना उतरने वाले भी तयशुदा यांत्रिक क्रियाओं में लगे रहते हैं।

प्रत्याशा: हम नकल इसलिए भी करते हैं क्योंकि अन्य को जो करने से लाभ हुआ होगा वही हमें भी होगा। उदाहरण तो सामने ही होता है, हमें बस वैसा का वैसा ही आचरण करना होता है। हम यह नहीं जानते कि किसी की देखा देखी किया गया कार्य वह परिणाम नहीं देगा जो हमारी शारीरिक मानसिक सामथ्र्य अनुसार कुदरती, स्वाभाविक, सहज प्रेरणा से किया जाने वाला काम।

लोभ: हममें यह लोभ होता है कि दूसरे ने उस कार्य को किया तो उसे बहुत मजा आया वही मजा हमें भी आयेगा जबकि ऐसा हो सकता है कि उस व्यक्ति ने कुछ ऐसे बिन्दुओं को बड़े ही मजे से पार कर लिया, या उसमें कुछ ऐसी जन्मजात विशेषताएं हों जो जिन्हें तय करने में आपकी उम्र ही निकल जाये। दूसरी बात यह भी है कि यदि एक बार हमें किसी काम को करने में बड़ा मजा आया तो वही मजा हम बार बार चाहते हैं पर हो सकता है वक्त के साथ बदले घटकों से वही खुशी दोबारा प्राप्त ना हो। हमारे जीवन में आनन्द हमेशा एक अलग अंदाज में आता है, जिससे पहचानना जरूरी है। इस प्राकर अतीत के अनुभवों का लोभ भी हम से नकल करवाता है।

संपूर्णतत्व का बोध: हमने ही एक और सिद्ध वाक्य बनाया हुआ है प्रैक्टिस मेक मेन परफेक्ट अर्थात ”अभ्यास से कार्य सिद्ध और व्यक्ति कुशल हो जाता है।“ लेकिन हम यह नहीं जानते कि हम उसी में संपूर्णत्‍व प्राप्त करते हैं जो हम कर रहे होते हैं और एक समय बाद यंत्र की तरह हमारी आदत भी घिसते घिसते क्षरण को प्राप्त होती है। यानि यदि आप कोई गलत कार्य कर रहे हैं तो गलती ही बढ़ते बढ़ते भयंकर परिणाम को प्राप्त होती है, अभ्यास से गलत काम सही नहीं हो जाता। क्या आपने ऐसे कारीगर नहीं देखे जो अपनी सारी उम्र एक ही काम करते रहे हों पर उन्हें उस कार्य की पृष्ठभूमि का ही ज्ञान नहीं। इसलिए भी लोग उम्र भर वह काम करते हैं जिसमें उन्हें भले ही रस ना हो। आपने ऐसे दसियों बरसों से चल रहे रेस्टोरेंट नहीं देखे जिनके आगे नया-नया आया खोमचे वाला महीनों में ही शहर वालों का दिल जीत कर होटल मालिक की ईष्र्या का कारण बन जाता है।

असंवेदनशीलता, आलस या झंझट में ना पड़ने की आदत: यानि जैसे कोई काम किया जाता है उसे वैसे ही जैसे-तैसे सम्पन्न कर के पिंड छुड़ाना। किसी कार्य की जटिलता, या उसके सत्य से, असलियत से पलायन करना। किसी भी कार्य को उसकी संपूर्णता में ना करने से उसके अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते। पानी को उबलने की अवस्था में आने के लिए 100 डिग्री तापमान की जरूरत होती है इससे कम पर पानी नहीं उबलता। इसी तरह मनुष्य को नये विषय पर काम करने के लिए 100 प्रतिशत समर्पण चाहिये होता है पर अनमनापन, फुर्ती का अभाव और कठिनाईयों से जूझने की अनिच्छा आदमी को अतीत का अनुकरण कराती है। किसी कार्य मंे संपूर्णता या नवीनता के लिए अथक परिश्रम और बुद्धिमत्ता की आवश्यकता होती है। इन सब से बच के, केवल धकमपेल से, हम अभीष्ट लक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकते।

लोकोपवाद: हमें यह संकोच और भय भी रहता है कि किसी कार्य को नई तरीके से सोचने-करने पर लोग क्या कहेंगे? हम असफल हो गये तो लोग कहेंगे कि देखो ये अपनी ही राह बनाने चले थे जब कि पारंपरिक रास्ता तो था ही। इसलिए भी हम रीति-रिवाजों, परपंराओं का अनुसरण करते हैं। पारंपरिक मार्ग की नकल या लोगों का अनुसरण करने पर लोग कुछ नहीं कहते और एक छद्म सपोर्ट मिलता है। पर बने बनाये रास्तें से आप नई मंजिलें नहीं तय कर सकते, नयी अछूती मंजिलों के लिए आपके कदमों को नयी राहों पर ले जाना होगा।

नकल के दुष्परिणाम:
हम वही गाना गाने लगते हैं जो पड़ोसी गा रहा है: पूंजीवाद, समाजवाद जैसे वादों के बारे में हम आसपास के लोगों की सुनी सुनाई बातों पर विश्वास कर लेते हैं। कभी कभी तो हमारे निर्णय बड़े ही बचकाने होते हैं। यदि हमारा कोई शासकीय काम कोई रिश्वत लेकर कर दे तो हम निकटवर्ती चुनाव में उसी पार्टी को वोट देंगे जिसने हमारा काम कर दिया। यदि हमें संस्थान की लेबर यूनियन में कोई पद मिल जाये तो हम समाजवादी या माक्र्सवादी हो जाते हैं। आपके सरकारी काम अटकने लगें, आपसे हुई लूट को थाने में दर्ज नहीं किया जाता तो हम नक्सली भी हो सकते हैं। लेकिन हम क्यों नहीं देखते कि इन सब बातों मंे हम अनायास ही किसी की नकल कर रहें या एक ढांचाबद्ध प्रक्रिया में लगे हुए हैं।

हम अंधविश्वास और विश्वास शब्द का प्रयोग भिन्न भिन्न अर्थों में करते हैं पर क्या कभी आपके मन में यह प्रश्न उठा कि इन दो शब्दों अंध-विश्वास और विश्वास में आखिर फर्क क्या है? रास्ते में बिल्ली रास्ता काट जाती है तो इसे आप अंधविश्वास कहते हैं पर यदि आप अपने किसी मित्र या रिश्तेदार के भरोसे थे कि वो आपकी आकस्मिक विशेष परिस्थितियों में मदद करेगा और वो ऐन वक्त पर फैल जाता है तो इसे आप विश्वास का टूटना ना कहकर अंधविश्वास क्यों नहीं कहते? आपके पीर फकीरों देवी-देवताओं के बारे मंे तो यह बात और भी भयानक साबित होती है। दोस्त नकारा निकल जाये तो आप उसे विश्वासघात कहते हैं पर देवता मनौती पूरी ना करे तो भय के कारण विश्वासघात जैसा इल्जाम नहीं लगाते बल्कि आसपास के लोगों की या बाजार में आजकल जिसकी मांग है उस परंपरा की देखा-देखी किसी दूसरे देवता की शरण ले लेते हैं। देवी देवता भी आपके अपने तय किये हुए नहीं बल्कि आपकी अपूर्ण इच्छाओं या दूसरे के सुझाये-दिखाये हुए हैं।

हमारे एक परिचित की बिटिया कि 12-14 वर्ष की अल्पायु में कैंसर से मृत्यु हो गई। उस समय वो जिन बाबा को मानते थे उनके कहे कर्मकाण्ड आदि करने, आशीर्वाद लेने के बाद भी यह सब हुआ तो उन्होंने उनको मानना छोड़ दिया... वापिस अपने देवी देवता की शरण में आ गये। फिर बरसों बाद उनके बेटे का विवाह के बाद नई बहू घर आयी तो समधियों के गुरू के वचनों में ही उन्हें मजा आने लगा। तो यह सब एक ‘‘मानने’’ कि प्रक्रिया है, जानने की नहीं।

दरअसल हम जानने से ज्यादा मानने में सुविधा पाते हैं। क्योंकि किसी भी विषय के बारे में जानने, समझने, बूझने में शारीरिक मानसिक श्रम लगता है, जो हम कदापि नहीं चाहते। मानने में ना कुछ लगता है ना जाता है, मुफत में कुछ उपलब्ध हो जाने या किसी तरह का संतोष या आशा मिल जाती है। जबकि ये मानने की प्रक्रिया एक तरह का पूर्वाग्रह है यानि जैसा आप चाहते हैं या मानते हैं वैसा मिल जाये तो उसकी शरण में बने रहना। हमारे मन को पंरपरा, रीति-रिवाजों, संस्कृति आदि में इस कारण ही रस आता है क्योंकि इन सबकी पूर्वनिर्धारित या ढांचागत प्रक्रिया है। नकल करने की वृत्ति इतनी गहरी है कि अपनी उम्र के बाद के वर्षों में हम अपनी ही पुरानी होती आदतों की नकल या अनुकरण में एक झूठा सुख हासिल करने लगते हैं। यदि इस सारी प्रक्रिया के बारे में हमें कोई बताये समझाये तो हम कहते हैं हम क्या करें, सारी उम्र तो यह किया अब फिर से कुछ नया समझें, तलाशें, करें अब नहीं होगा.... आदि आदि।

भौतिक जगत में अपने जीवन में व्यवस्था, शारीरिक सुविधा के लिए हमने यंत्र और अन्य साधन बनाये हैं जिनकी तयशुदा या ढांचागत, प्रतिक्रियाएं, गतिविधियां होती हैं -ये ठीक हैं, लेकिन हम मन की उड़ान को भय, अनिश्चितता, कठिनाइयों, नये अनुभवों से बचाकर तयशुदा राहों पर चलेंगे तो कहीं नहीं पहुंचेंगे। मजे मंजिलों पर नहीं, उन कदमों में होते हैं जो मंजिल तक पहुंचने के लिए हम तय करते हैं।