Friday, 21 May 2010

मौत से निपटने के कई रास्ते हैं।



रेलवे ट्रेक के किनारे
कुछ मजदूर
मशीनों से निकले बड़े बड़े पत्थरों को
छोटे चौकोर अलंगों में तराशते हैं

ये लोग मूर्तिकार जितने पारंगत नहीं होते
इन लोगों को केवल उन चोटों का पता होता है
जिनसे किसी बड़े पत्थर का
एक नियत आकार का हिस्सा
चैकोर हो जाता है।

जबकि मूर्तिकार जानता है
सारे अनुपात।
घुमावदार कोणों पर,
चोटों की हल्की और भारी मात्रा,
उथलेपन, उभारों और गहराई के मायने।

मैंने पढ़ा है निराला की
”तोड़ती पत्थर“
और देखा है
पत्थर तोड़ता हुआ, पत्थर।

सूरज की गर्मी, त्वचा से उठते धुंए के बावजूद
हाथों-भुजाओं में उतरी ऊर्जा।

या ये मेरा भ्रम है
ये सब इंतजाम है
रोटी का नहीं
उस वक्त से बदला लेने का
जिसने उसे पत्थर बनाया है
जिसने उसे चैकोर किया है।

कि कोई पानी नहीं
टूटते हुए बदन पर
अन्दर और बाहर तक
ठर्रे का अभिषेक ही
इतनी राहत पहुंचायेगा
कि
कल तक फिर जिन्दा रहा जा सके!

झूठ है
मूर्तियां
अगले पिछले
ऊपरी या निचले उभार
झूठ हैं छैनी के
हल्के या दबावदार स्पर्श
झूठ हैं
अपने ही भीतर तक पड़ती
उथली और गहरी चोटें।

अधिकतर तो केवल यही सही है
कि आदमी चार कोनों वाला अलंगा है!
उसे किसी मकान की नींव बनना है।
या बंगले की बाउंड्री वाल में पेंट होकर सजना है।

मैं सोचता हूं
उस तोड़ते हुए पत्थर को
क्यों देखता हूं मैं?
क्योंकि मैंने निराला की कविता पढ़ी थी,
और मैं
गहरे भाग की व्यथा ही नहीं
उभरे हुए तल की बेबसी को गढ़ना चाहता था
साफ साफ।

या
अभी बहुत कुछ सीखना है आदमी को
बड़े बड़े पत्थरों को
बिना तराशे ही उपयोग में लेना।

या
मुझे कविता नहीं
उस आदमी के साथ
शाम के बेसुध होने के इंतजाम में
शरीक होना चाहिए।
और उसे समझाना चाहिए
कि यदि वह
मूर्ति बनाने की झंझट में नहीं पड़ना चाहता
तो क्या हुआ,
बेसुध होने के अलावा भी
मौत से निपटने के
कई रास्ते हैं।